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Thursday, 9 August 2018

आर्य वीर से मुलाक़ात -II




उनसे मेरी मुलाकात अचानक ही हो गयी। वैसे तो " उन जैसों " से मिलना कोई बड़ी अचरज की बात नहीं थी। उन की बिरादरी में अधिकतर उन जैसे ही है गाहे बगाहे मुलाक़ात होती ही रहती है पर वो कुछ हटके थे। वो प्रोफेसर थे एक यूनिवर्सिटी में।  एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में। पत्रकारिता पढ़ाते थे। वैसे तो सबको पता ही है भारत में प्रोफेसर या किसी भी पढ़ी लिखी जमात के इंसान का विज्ञान से उतना ही ताल्लुकात होता है जितना कि , जितना कि। ......  जाने दो मुझे कोई उदारहण देने को मिल नहीं रहा है। मतलब मेरे कहने का ये है कि आप प्रोफेसर हो  , टीचर हो , इंजीनियर हो , सीए हो , डॉक्टर हो कुछ चीजें हम विज्ञान के नाम पर विज्ञान से ऊपर रखते ही है जैसे ये साइंस है कि सूरज को पानी चढाने से अल्ट्रा वायलेट किरणे निकल कर हमारे शरीर में घुस जाती है।  जैसे उत्तर की तरफ मुंह कर के सोने से मेग्नेट दिमाग में चिपट जाते है जिससे नींद अच्छी आती है जैसे दक्षिण की तरफ घर का मुंह करने से अशांति होती है ये सब वो विज्ञान है जिसको दिमाग में दही की तरह जमाने के बाद हम किताबें पढ़ना मतलब रटना शुरू करते है।  कुछ मूर्खताओं को हमने आम सहमति से विज्ञान मान लिया है। उसमें बहस की गुंजाइश नहीं है। खैर बात उनकी हो रही थी। उनकी बात जरा अलग थी। वो एक सफर में सहयात्री थे। सरनेम आर्य था।  चार पांच घंटे के सफर में प्रोफेसर आर्य से बहुत विषयों में बातें हुई।  मुझे मेरी उम्मीद से बढ़कर ज्ञान मिला।  कभी सुना था कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है तो सोचा आप सब को भी वो ज्ञान बाँट दूँ।  तो प्रोफेसर साहब से जरा सी जान पहचान करा दूँ आपकी।   प्रोफेसर साहब बच्चो को पत्रकारिता पढ़ाते है।  पर उन्हें गिल्ट है कि जितनी तनखाह वो लेते है उतना काम नहीं कर पाते। उस गिल्ट को दूर करने के लिए कॉलेज टाइम के बाद आर्ट ऑफ़ लिविंग सिखाते है ताकि जब ऊपर जाकर भगवान् को हिसाब देना पड़े तो मामला ढीला न पड़े। आर्ट ऑफ़ लिविंग से भी गिल्ट कम नहीं होता तो वो पोस्ट लाइफ ट्रामा , घोस्ट मिराक्ल एनालिसिस , प्रीवियस लाइफ हिप्टोजिम जैसे काम भी करते है ये सारे काम उन्होंने अंग्रेजी में बोले इन्हे हिंदी में बोले तो भूत निकालते है लोगों के। उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि भारत के महान ग्रंथो से चीजें सीख सीख कर जर्मन कितनी आगे चले गए , नासा ने कितने जहाज मंगल तक भेज दिए और एक हम है कि अपने ग्रंथो से सिर्फ इतना सीख पाते है कि भगवान् मनु नारी और दलित विरोधी थी। हमारा यही रैवया हमें सुपर पॉवर बनने से रोक रहा है। 
तो ऐसे प्रोफेसर आर्य के साथ हमने चार पांच घंटे सफर किया हिंदी वाला सफर भी , अंग्रेजी वाला सफर भी। बात  साथ में सफर कर रही एक लड़की की बात से शुरू हुई जिसमें लड़की को अफ़सोस हो रहा था कि आजकल की गलाकाट प्रतियोगिता में जहाँ जनरल सीट पर भारी प्रतियोगिता है वही रिजर्व सीट के लिए कट ऑफ़ बहुत कम जाती है उन्हें एड्मिसन आसानी से मिल जाता है। मैंने उस लड़की से पूछा कि आजकल कितनी कट ऑफ़ लिस्ट जाती है रिजर्व्ड कैटेगरी की।  जवाब प्रोफेसर साहब की तरफ से आया 

- शेड्यूल कास्ट की तो बहुत कम होती है 
मैंने फिर सवाल किया - कितना कम होता है ?  मतलब दस परसेंट बीस परसेंट कितना कम ?
आर्य साहब ने जवाब दिया कि देखो अन्याय तो अन्याय ही है आरक्षण जो है वो सिर्फ दस साल के लिए लाया गया था। मैंने कहा कि आप तो जर्निलिस्म पढ़ाते है। ऐसी बात मत कीजिए। कहाँ पढ़ा आपने कि दस साल के लिए आरक्षण आया था ? 
(ये आरक्षण के दस साल वाली बात भी हमारे लिए उतनी ही परम सत्य है जितनी कि सूरज को पानी देने वाली या नार्थ में सोने से होने वाली मेग्नेट प्रभाव वाली।)
  मेरे इस सवाल ने प्रोफेसर आर्य को चौंका दिया।  चौंका क्या दिया वो हँसने लगे। कहने लगे आप मुझे पढ़े लिखे मालूम होते हो ऐसी बात बाहर किसी के आगे मत कह दीजियेगा लोग हंसी उड़ाएंगे। मेरा कहने का मन हुआ कि मेरी तो जब उड़ाएंगे तब उड़ाएंगे आपकी तो मैं अभी उड़ा ही रहा हूँ। पर मैंने अपने मन की बात कही नहीं। सबको कहाँ अपने मन की बात कहने का इख्तियार होता है। मैंने उनसे कहा कि आप संविधान में या और कही से कोई रिफ्रेंस दे सकते है जहाँ लिखा हो आरक्षण सिर्फ दस साल के लिए था। डॉक्टर आर्य थोड़ा सोचने के बाद बोले - आप दिखा दीजिये कहाँ नहीं लिखा है कि आरक्षण दस साल के लिए नहीं था।  मैंने कहा कि सर जो कहीं नहीं लिखा है उसे कैसे दिखाऊं। कल को आप कहेंगे कि दिखाओ भगवान् नहीं है।  जो है ही नहीं उसे कैसे दिखाया जा सकता है। (भगवान् वाली बात पर प्रोफेसर और ज्यादा चौंक गए। भगवान्  वाले किस्से पर फिर आते है अभी आरक्षण पर ही रहते है ) 

दस साल वाले किस्से को छोड़कर प्रोफेसर सीधे गरीबी पर आ गए। 

"अच्छा आप बताइये कि क्या सिर्फ दलित ही गरीब होते है ? गरीब तो हर जाति में है। "
मैंने कहा कि  उनका सामाजिक शोषण हुआ है । उनकी जातियों के नाम तक का गालियों की तरह इस्तेमाल हुआ है ।
(मॉडर्न आदमी आरक्षण की बुराई करने के साथ साथ प्रगतिशील होने की तारीफ़ भी साथ साथ लेना चाहता है उसी में कई बार टाइमिंग गड़बड़ा जाती है। प्रोफेसर आर्य के मन में भी दलितों का उद्धारक होने की भावना प्रबल हुई और वही गड़बड़ हो गयी। वो फ्लैशबैक में अपने बचपन में चले गए )
-वो बीते वक्त की बात है । मैं मानता हूं उनके साथ बहुत नाइंसाफी हुई है । उन्हें तो कुए पर से पानी भी नही पीने दिया जाता था । मैं आपको बताता हूँ बहुत पहले की बात है मैं एक बार गांव गया तो कुए के पास कसरत कर रहा था कि एक आदमी मुझसे कहने लगा कि कुएं में से पानी निकाल कर मैं उसे दे दूं । मैंने कहा कि तुम खुद ले लो तो वो कहने लगा कि मुझे कुए को छूना मना है तो मैंने कहा - तुम लो पानी मैं देखता हूँ कौन रोकता है ।
मैंने बीच में टोक दिया 
- एक मिनट ये कब की बात है ?
ये तो पुरानी बात है
- कितनी पुरानी ?
25 -30 साल पुरानी
- यानी 1988 - 93 के बीच की । तब तक छुआछात था ?
आर्य साहब गड़बड़ा गए। एक दम अपनी भूल को सुधारने में लग गए 
“अरे बस आखिरी दौर पर था खत्म होने की कगार पर ही था।“
(मैंने मन में सोचा कि यही वो महानुभाव थे जिनके हाथों से छुआछात की प्रथा खत्म हुई। )
फिर आर्य साहब का ध्यान आरक्षण से हटकर मेरे ऊपर चला गया।  पूछने लगे कि आप क्या करते हैं ? मैंने कहा जी पिछले 8 साल से फेसबुक कर रहा हूँ। फिर कहने लगे कि फेसबुक पर तो पता नहीं क्या क्या झूठ और अफवाह फैलाई जाती हैं और आप जैसे लोग उन्हें सच मान लेते हो।  इस बात पर मुझे उनकी हाँ में हाँ मिलानी पड़ी।  मैं बोला ," ये बात तो ठीक है फेसबुक व्हटसअप बहुत अफवाह फैलाते है।  " आर्य साहब खुश होकर बोले ," और नहीं तो।  अब देखो फेसबुक पर एक ज्ञानी बता रहे थे कि भगवान् मनु नारी और दलित विरोधी है। अब बताओ हमारे वेद पढ़कर जर्मन इतने आगे निकल गए।  नासा आज भी संस्कृत को कोडिंग के लिए सबसे अच्छी भाषा मानता है और हम क्या सीख रहे है कि मनु महाराज नारी विरोधी थे।  " 
मैंने आर्य से पूछा कि ये जर्मन और नासा वाली बात उन्होंने कहीं व्हटसअप पर तो नहीं पढ़ी ?  तो बोलते - नहीं नहीं ये तो मुझे बहुत पहले से पता थी व्हटसअप पर आने के बाद तो लोगों को मेरी बात पर विश्वास होने लगा है पहले नहीं मानते थे।  
मैंने फिर सवाल किया ," आप ये बातें बच्चो को भी बताते है ? "
आर्य साहब कहने लगे ," मैं तो कॉलेज के बाद बच्चों को आर्ट ऑफ़ लिविंग भी सिखाता हूँ। दरअसल जितनी सैलरी मिलती है मैं उसको जस्टिफाई नहीं कर पाता इसलिए गिल्ट फील से बचने के लिए शाम को उन्हें आर्ट ऑफ़ लिविंग सिखाता हूँ। ऊपर जाकर जवाब देना पड़ेगा तो उसकी तैयारी करनी पड़ती है। "
मैंने मजाक में कहा ," सर ऊपर तो मंगल तक जा आएं हैं कहीं कुछ नहीं है। कोई सवाल पूछने वाला नहीं है वहां "
आर्य साहब को थोड़ा सा गुस्सा आया पर वो उन्होंने आर्ट ऑफ़ लिविंग की मदद से नियंत्रण में कर लिया। फिर बोले ," आप भगवान् को भी नहीं मानते ? "
मैंने कहा जी नहीं मानता।  प्रोफेसर कहने लगे ," आप लोगों को बुरी तरह बरगलाया गया है क्या आपको पता है कि ये सिर्फ हिन्दू धर्म की बात नहीं है हर धर्म भगवन को मानता है। "
मैंने उनसे कहा ," सर दुनिया में दस फीसदी से ज्यादा ऐसे लोग है जो न किसी धर्म को मानते है न किसी भगवान् को।  "
उन्होंने ठंडी आह भरते हुए कहा ," इसी बात का तो डर है। ये विज्ञान इंसान की भलाई के लिए बना था ये इंसान को तबाही के रास्ते पर ले जाएगा।  "

इसी ठंडी आह के साथ हमारा वार्तालाप भी खत्म ही हो गया आगे उन्होंने ओशो और कुछ एक दो और के प्रवचन सुनाए जिनको सुनको लगा ये जिनको पत्रकारिता सिखाएंगे वो फिर युधिष्टर की गुफा ही ढूंढेगे।  उनका दोष नहीं है।  





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