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Sunday, 27 May 2018

इस निर्मम वक्त में नायक होने के मायने

                                       
मंदिर में भीड़ एक लड़के को मारने पर उतारू है। एक पुलिस कर्मी उस लड़के को बचाने की कोशिश कर रहा है। भीड़ उसे पीटना चाहती है क्यूँकि वो मुसलमान है। भीड़ हिन्दू आतंकवादियों की है। आतंक का इतिहास भारत के लिए नया नहीं है। दलितों और औरतों ने सदियों से बीमार शोषक मर्दों का आतंक सहा है आज भी सह रहे है। भीड़ का न्याय भी नया नहीं है। चुड़ैल , डायन के नाम से पीट पीट कर हत्या या मुंह काला कर के गधे की सवारी कुंठित भीड़ के मनोरंजन के साधन रहे है। हमने अभी तक अपने इतिहास को स्वीकार तक नहीं किया है उससे सीखना तो बहुत दूर की कौड़ी है। पिछले चार सालों में भीड़ का इन्साफ जिस गति से बढ़ रहा है कि लगता है हमें कबीलाई समाज की तरफ वापिस जाने की बहुत जल्दी है। गौ आतंकवादियों से शुरू हुआ सिलसिला दिन ब दिन अपने कदम आगे बढ़ा रहा है। वो उसे पीटना चाहते थे क्योंकि वो दूसरे धर्म का था। इसी धर्म के लोग हर साल कितने ही लड़के लड़कियों के सपनो का गला घोंट देते है क्यूँकि वो अपने ही धर्म में किसी और जाती में शादी करना चाहते है। मनु महाराज ने कहा था कि लड़की को आजाद नहीं रहना चाहिए। लड़की की आजादी धर्म के खिलाफ है। दलितों की आजादी धर्म के खिलाफ है। कोई भी दलित या लड़की इस कानून का उलंघन करती है वो सजा के हकदार है। लड़की की आजादी गांव की अपेक्षा शहर , शहर की अपेक्षा बड़े शहर , बड़े शहर की अपेक्षा महानगर में ज्यादा होती जाती है। ये सब हमले उसी आजादी पर है। जो बीमार मर्दों की आँखों में जबरदस्त खटकती है। जिससे हतोत्साहित होकर गंदे वीभत्स गालियाँ और चुटकले बनाये जाते है। मंदिर वाली भीड़ हर जगह मौजूद है वो मौका मिलने पर किसी पर भी हमला कर सकती है। उस युवक को तो उस बहादुर पुलिसकर्मी के साहस ने बचा लिया। पर सबको ये मौका न मिल पाए। आज सोशल मिडिया पर उस पुलिसकर्मी की जमकर तारीफ हो रही है जिसका वो हकदार भी है। ठीक इसी वक्त उसी सोशल मिडिया पर उसके खिलाफ नफरत का प्रोपगेंडा भी चलाया जा रहा होगा जो उस भीड़ की खुराक है  जो सड़कों पर उतरती है। पर क्या जो सोशल मिडिया आज उस पुलिस कर्मी को नायक बना रही है वो उसके मुसीबत के वक्त में उसके साथ खड़ी होगी ? हमारा इतिहास तो कम से कम इस बात की गवाही नहीं देता।

पिछले साल सहारनपुर में दंगे हुए दलितों के घर जला दिए गए। उनके बचाव के लिए भीम आर्मी आती है। भीम आर्मी के सर्वेसर्वा चंद्र शेखर आजाद को बहुत ही कम समय में सोशल मिडिया में नायक बना दिया जाता है। आज चंद्र शेखर आजाद जेल में है उनपर बहुत संगीन धाराएं लगी है। उनका कसूर यही है कि दलित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई। पिछले एक साल में ऐसा कोई आंदोलन ऐसी कोई प्रभावी मुहीम दिखाई नहीं दी जो सरकार पर चंद्रशेखर की आजादी के लिए दबाव डाल सके।  क्या चंद्र शेखर आजाद से देश की आजादी को कोई खतरा है ? पिछले ही दिनों भीम आर्मी के एक और सदस्य की गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

पिछले ही साल अगस्त में गोरखपुर में सरकारी अस्पताल बालसंहार हुआ। छोटे  बच्चों की  एक के बाद एक
हत्या कर दी जाती है ठीक उसी वक्त डॉक्टर कफील की तस्वीर आती है उन बच्चों को बचाने की जीतोड़ कोशिश करते हुए।  डॉक्टर कफील भी एक नायक की तरह उभर कर आते है। हर जगह उनकी तस्वीर वायरल होती है। डॉक्टर कफील अगले नौ महीने जेल में गुजारते है बच्चों को बचाने की कोशिश करने के अपराध में। पर अफ़सोस ये है हमारे पास उनका साथ देने के लिए नौ महीने नहीं थे। हर रोज एक नया मुद्दा आता है दस  नए बयान आते है। हर दूसरे महीने चुनाव आते है। डॉक्टर कफील को जमानत मिल गयी है चंद्रशेखर आजाद अभी जेल में ही हैं।

मंदिर में उस लड़के को बचाने वाला पुलिसकर्मी सिख था। सिख की पहचान दूर से ही उनकी पगड़ी और दाढ़ी की वजह से हो जाती है। उसके लिए उनकी आई कार्ड देखने की जरूरत नहीं होती। पर अगर वो पुलिसकर्मी सिख न होता तो ? उसे पहले अपनी आईडी दिखाकर बताना पड़ता कि वो मुसलमान नहीं है। और अगर वो मुसलमान होता तो ?  तो  शायद उसे अपनी जान बचाने के लिए कोई कन्धा देखना पड़ता। पुलिसकर्मी गगनदीप ने बहुत प्यारी बात कही है कि हिन्दू मुस्लिम या सिख सबको प्यार करने का अधिकार है। क्या हम अपने दिल पर हाथ रखकर ये कह सकते है कि हमें अपने घर की औरतों के इस मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया है ?

किसी द्वारा किये सही काम को सराहना और उसकी हिम्मत बढ़ाना बहुत जरुरी है और उससे भी ज्यादा जरुरी है उस काम की वजह से उस पर आने वाली परेशानियों के वक्त उसके साथ होना। दूसरा काम थोड़ा मुश्किल है पर निहायत ही जरुरी है उसके बिना उस सराहना की कोई कीमत नहीं है वो बस आपके मनोरंजन मात्र का एक साधन बन के रह जाती है।


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