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Friday, 11 May 2018

असंवेदनशीलता और हम




खबर - हिसार के खेदड़ प्लांट में बॉयलर साफ़ करने गए 6 मजदूर दुर्घटना का शिकार हो गए उनमे से तीन अपनी जान गँवा चुके है और तीन गंभीर रूप से घायल है।



हरियाणा के मंत्री कृष्ण लाल पंवार खेदड़ में आकर घोषणा करते है कि मरने वाले के परिवार वालों को 17.50 लाख रूपये की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी यही नहीं रुकते है। इसके आगे घोषणा करते है कि घायलों को 7.50 लाख की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी शायद सीधे किसी खेल प्रतियोगिता से घटना स्थल पर आ रहे थे। 6 मजदूर एक कम्पनी की लापरवाही की वजह से गंभीर हादसे का शिकार हुए थे। उनमे से तीन मजदूरों की जान जा चुकी थी। ऐसी जगह पर जाकर मंत्री जी कहते है कि मरने वालों को इनाम दिया जाएगा। ये महज 'स्लिप ऑफ़ टंग' नहीं है। ये हमारे समाज की असंवेदनशीलता की हकीकत है। मजदूरों के हत्याओं से किस को फर्क पड़ता है। हर दिन कहीं न कहीं मजदूरों की हत्याओं की खबर आती रहती है। एक जलते बायलर के अंदर मजदूरों को भेजने से संगीन अपराध क्या होगा ? मंत्री जी अपनी बदमजा ड्यूटी निभाने आते है और मजदूरों को उनकी मौत का इनाम सुनाकर चले जाते है। हमारे लिए ये मामूली घटना है। हो जाता है। ग़लती से मुंह से निकल गया। स्लिप ऑफ़ टंग।



मंत्री जी कहते है अगस्त में बच्चो का मरना नॉर्मल है। मंत्री जी मजदूरों की हत्याओं पर इनाम राशि की घोषणा करते है। ये सब सामान्य है। कोई बड़ी बात नहीं है कोई मंत्री इन हत्याओं के लिए मजदूरों को ही जिम्मेदार न बता दे। असंवेदनशीलता के जिस स्तर पर आज हम है वहां सब जायज है। हरियाणा सरकार बच्चो से सवाल पूछती है कि हरियाणा में इनमें से किस को अपशकुन नहीं माना जाता



A- खाली घड़ा
B ईंधन से भरा डिब्बा
C काले ब्राह्मण से मुलाकात
D ब्राह्मण लड़की का दिखना



इस सवाल में व्यंग्य की ढेरों संभावनाएं नजर आती है। इसमें सरकार का मजाक उड़ाया जा सकता है। पर शायद ही हम ये सोचने की जहमत करे कि इतनी असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करने का साहस सरकार में कहाँ से आता है। शायद लोगों का रिएक्शन देखकर ही आता हो। ये सवाल बहुत ही जातिवादी है। काला ब्राह्मण जैसा शब्द मैंने इससे पहले नहीं सुना था। काला रंग किस से जुड़ा हुआ है सब जानते है। किस को देखना खुद को उच्च कहने वाली बीमार जातियों के लोग अपशकुन मानते है ये भी जग जाहिर है। ये सवाल परीक्षा में देना नाकाबिले बर्दाश्त हरकत है , बेशर्मी की इंतेहा है पर हमारे लिए ये मजाक का विषय है। वो खुले आम शोषितो का , मजदूरों का बेशर्मी से मजाक उड़ा रहे है , उन्हें जान से मार रहे है। उनके अधिकारों पर चोट की जा रही है। दूसरी तरफ असंवेदनशीलता के सताए हुए लोग है जो रोड एक्सीडेंट पर सेल्फी खींचते है। भूकंप का , आंधी तूफ़ान का मजाक उड़ाते है। दरअसल अपनी हर असंवेदनशीलता को मजाक , व्यंग्य या मानवीय भूल का चोला ओढ़ाना हमारी आदत बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि हम में संवदनाएँ नहीं है या हम आहत नहीं होते है पर अफ़सोस की बात है कि हमारी सारी संवेदनाएं हमारे खुद के लिए ही है। हम सरे आम शोषितो का मजाक उड़ाते है। मई दिवस हमारे लिए मजाक है। मजदूर हमारे लिए कामचोर है। नारी विरोधी दलित विरोधी गालियाँ हमारे लिए कूल है। सलमान खान हमारे हीरो है। सलमान ने शेड्यूल कास्ट के लिए कैमरे के सामने बहुत ही अश्लील और गैर क़ानूनी बात कही। पर वो हमारे लिए नॉर्मल है। क्यूंकि हम दिन में दस बार बोलते है। कोर्ट में जब इस बात के लिए जनहित याचिका लगाई गयी तो जज ने याचिका कर्ता पर जुर्माना लगा दिया। ये हम है। ये हमारे जज है। ये सब हमारे लिए नॉर्मल है। शोषक के लिए हम बेहद नरम है। ग़लतियाँ हो जाती है। उनका वो मतलब नहीं था। पर अगर कोई हमारी सुविधाओं पर , हमारी गरीबों , वंचितों के प्रति मानसिकता पर व्यंग्य करता है तो वो हमारे लिए असंवेदनशीलता है। गाली पर टोकना असंवेनशीलता है। अत्याचारों पर बात करना अतिवाद है। दुनिया बहुत प्यारी है देखो मेरे तो बाजू वाला भी ऐसी में बैठता है दूसरी साइड वाला भी ऐसी में बैठता है मेरे दफ्तर में सभी ऐसी में बैठते है। हम तो साथ खाना भी खा लेते है। गालियां मजाक है हमारे दफ्तर में तो लड़कियाँ भी देती है।



हम कौन है ?



हम कुंठाओ के घर है हम मिडल क्लास बीमार जातियों की पैदाइश है हम वो है जिन्हे बचपन में ही मानवीयता से इतनी दूर कर दिया गया है कि अब इंसानियत भी एक रोग लगता है।

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