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Tuesday, 1 May 2018

कुछ न कहने से भी छीन जाता है एजाज ऐ सुखन



एक दिन में 24 घंटे , 30 दिन का एक महीना , 12 महीनो का एक साल। वक्त ऐसे ही चलता रहता है। कैसी भी अनहोनी हो। कुछ भी घट जाए। बादल फट जाए सुनामी आ जाए पर वक्त का चलना बदूस्तर जारी रहता है। वक्त के साथ साथ इंसान भी चलता रहता है। बहुत घटनाएं दिल को हिला जाती है। दोस्त दूर हो जाते है अपने दुनिया से अलविदा कह जाते है पर जो जिन्दा है उनके पास वक्त के साथ साथ चलने के अलावा दूसरा ऑप्शन नहीं होता। पिछले साल के अगस्त महीने की उस घटना को अब 8 महीने होने को आये है जिसने सबके दिलों को हिला दिया था। गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में एक के बाद एक बच्चो के मरने की खबर आने लगी। बच्चें जो वहां इलाज के लिए आये हुए थे वो महज इसलिए मर गए क्योंकि अस्पताल में ऑक्सीजिन की सप्लाई बिल पेमेंट न होने की वजह से रोक दी गयी थी। कितनी भयावय बात थी। उस घटना के बाद कई दिन तक रातो को नींद आनी कम हो गयी थी। वैसे तो सरकारी अस्पतालों के हालात हर जगह कमोबेश एक जैसे ही है पर इस कद्र असंवेदनशीलता। छोटे बच्चों की लाशें सपने में आती थी। ये सभ्यता के किस स्तर को हम पार कर चुके है कि छोटे बच्चो की हत्याएं सामान्य घटना मान ली जाती है। उस वक्त मंत्री जी ने कहा था कि अगस्त में तो बच्चे मरते ही है। आज उस बयान को भी 8 महीने होने को आये है। अब 4 महीने बाद अगस्त आने वाला है। पिछली बार की घटना ने मानक स्तर को काफी ऊपर उठा दिया है अब शायद 20 -30 बच्चों की मौतें खबर भी न बने। आंकड़े और किस काम आते है। पिछले साल भी तो मरे थे। आगे जब किसी दूसरे दल की सरकार आएगी तो शायद उनके पास दिखाने को पिछले साल के आंकड़े होंगे। देखो योगी के राज में ज्यादा बच्चे मरे थे। अब हमारे में तो कम मर रहे है। सबको पता है हमारी तर्क शक्ति यही तक है। अगस्त में बच्चे हर साल मरते है। पहले भी मरते थे। पिछले साल भी मर गए। बेशर्मी के लिए कोई मानक तय नहीं किया जा सकता। हर दिन ये एक नए आयाम को छूती है। इस घटना को तकरीबन 8 महीने गुजर चुके है और इतने ही महीने डॉक्टर कफील ने जेल में बिताये। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े सूबे में जनता के वोट से जीतकर आयी सरकार ने उस डॉक्टर को जेल में डाल दिया जिसने बच्चों को बचाने के लिए अपनी जी जान से कोशिश की। उनकी बच्चो को देखते हुए बेबसी की वो तस्वीर आज भी आँखों के सामने घूमती है। एक डॉक्टर को अपना फर्ज निभाने का इनाम मिला जेल। हालाँकि इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। जिस देश में छोटे बच्चों की यूँ हत्याए अपराध नहीं है एक नॉर्मल बात है वहां उन बच्चों को बचाने की कोशिश करना अपराध की श्रेणी में क्यों नहीं आएगा। ऐसी बातें हम फिल्मों में देखा करते थे। ईमानदारी से काम करने वाले नायक को ही नेता और पुलिस वाले फंसा देते है जेल में डाल देते है। असली जिंदगी में इतनी साफगोई से ये सब करना वाकई हिम्मत का काम है। अभी उत्तर प्रदेश में ही स्कूल से आ रही बस ट्रैन से टकरा गयी जिससे छोटे छोटे बच्चे मौत की आगोश में समा गए। दिल कांप गया खबर सुनके। उससे भी ज्यादा इस बात से दिल दहला कि क्या डॉक्टर कफील के वाकये के बाद कोई इंसान बच्चो को बचाने की कोशिश करेगा ? क्या पता बच्चो को बचाने की जी तोड़ कोशिश करते वक्त कोई फोटो खिंच ले। क्या पता उस पर बच्चों को बचाने का आरोप लग जाए। नायक बनने के आरोप में 8 महीने जमानत न हो। क्या उन बच्चों के माँ बाप जब बच्चो के गम में चीख पुकार कर रहे थे उनके मन के किसी कोने में ये डर नहीं था कि कहीं उन्हें ही उनके बच्चो का कातिल बना कर जेल में न डाल दिया जाए ? क्या बहुत बड़ी बात है ? बिलकुल भी बड़ी बात नहीं है। लोग दूसरों के बच्चों के मरने पर तो चुप रहना सीख ही गए है अब वो वक्त ज्यादा दूर नहीं लगता जब अपने बच्चें मरने पर भी आंसू आना बंद हो जाएंगे। आराम और जिंदगी किसे प्यारी नहीं है। वक्त रुकता नहीं है आगे बढ़ता रहता है। बच्चे के लिए रोना अगर जेल जाने का कारण बन सकता है तो हम नहीं रोयेंगे।
एक निजी कम्पनी ने सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई इसलिए बंद कर दी कि सरकार ने उस कम्पनी के बिल की पेमेंट नहीं की थी और इस अपराध के लिए डॉक्टर को जेल में डाल दिया गया। अभी तो भारत में निजी क्षेत्र ने पाँव पसारना शुरू ही किया है। अभी तो हमें रेलवे स्टेशन के बिकने पर आश्चर्य होता है। अभी एक अमेरिकन डॉक्यूमेंट्री फिल्म देख रहा था। मेरे अचरज की कोई सीमा नहीं रही जब पता लगा वहां जेल तक निजी कंपनियों के हाथ में है। जेल की सुरक्षा , जेल का खाना सब निजी कम्पनियाँ चलाती है। अगर जेल में एक कैदी भी कम हो जाता है तो उनके प्रॉफिट में कमी आ जाती है। वहाँ कैदियों की संख्या हर साल बढ़ती ही है। अभी तो हमें बहुत कुछ देख कर मरना है। प्राइवेट रेलवे स्टेशन की डायनेमिक पार्किंग रेट से ही तौबा तौबा कर रहे है। क्या होगा जब चुप रहना भी काम नहीं आएगा। हमारे पैसे से चलने वाले जेल में हमारी ही जरूरत होगी क्योंकि कैदी बढ़ेंगे तभी तो प्रॉफिट बढ़ेगा। आज भी भारत की जेल में डाक्टर कफील जैसे जाने कितने बेगुनाह सजा काट रहे है। अमेरिका की जेलों में बंद नागरिकों में सबसे ज्यादा तादाद उन काले लोगों की ही है जिन पर इतिहास में गोरे लोगों ने बेइंतेहा जुल्म किये। इतिहास से और कोई सबक लेता हो न लेता हो शासक और शोषक वर्ग तो जरूर लेता है। वक़्त के साथ कैसे अपडेट होकर नए तरीके ईजाद कर लिए जाते है। और हर वक्त का सभ्य जहीन नागरिक चैन की नींद सोता है कि पुराने वक्त के लोग क्रूर थे अब तो सभ्य और नरम दिल लोगों का ज़माना है। अब की दुनिया में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करना चाहिए। शोषित दमित लोगों पर हिंसा , नफरत के नए नए तरीके ईजाद किये जाते है जिन पर सब की मौन सहमति रहती है। जब कभी प्रतिरोध का स्वर बुलंद होता है तो वही सभ्य और नरम दिल लोग का दिल कहने लगता है कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। ये कथन अपने आप में बहुत हिंसक है। गांव में दलितों पर अत्याचार होता है वो गांव छोड़ने पर मजबूर होते है। विरोध के लिए शहर आते है शांतिप्रिय लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करते है और प्रसाशन उन्हें लकड़ी चोरी के इल्जाम में जेल में डाल देता है और दो दो महीने फिर जमानत नहीं होती। उनका खाना बनाने के लिए लकड़ी जलाना भी जुर्म है। आगे से जब कभी भी किसी आंदोलन के लिए " हिंसा नहीं होनी चाहिए " का ख्याल दिल में आये तो मेरी इल्तजा है कि थोड़ा सा ध्यान इस बात पर भी कर लीजियेगा कि घर पर बैठकर खाना खाना सबको अच्छा लगता है। कोई सुबह से शाम तक धुप में पुलिस की लाठियां खाने शौक से नहीं जाता। ये सिस्टम शोषितो के लिए किस कदर क्रूर है इसका अहसास होना हर संवेदनशील इंसान के लिए बहुत जरुरी है। कोरेगांव हिंसा की एकमात्र गवाह 19 साल की लड़की की लाश मिली है। डॉक्टर कफील की गिरफ्तारी , कोरेगांव हिंसा की गवाह की ऐसे हत्या ये सब कोई सामान्य घटनाएं नहीं है। मेरी नहीं तो शायर की बात पर जरूर ध्यान दीजियेगा।


कुछ न कहने से भी छीन जाता है एजाज ऐ सुखन
जुल्म सहने से भी जालिम को मदद मिलती है

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