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Tuesday, 1 May 2018

प्रगतिशीलता - मर्ज या दवा



प्रगति बहुत अच्छी चीज है प्रगतिशीलता भी बहुत अच्छी है। कम से कम दिखती अच्छी है। इसी भरम में आदमी एक पैर आगे बढ़ाता है दो पीछे करता है। और उस एक पैर आगे बढ़ाने का अहसान बाकी जिंदगी जताता रहता है। सुना है कुत्ते ने आदमी से बहुत कुछ सीखा है। शायद ट्रैन के साथ भागते रहने पर ट्रैन को चलाने का भरम भी उसने इंसानो से ही सीखा हो कई बार दिल करता है काश कुत्तों की भाषा सीख पाता तो उनके विचार जान पाता कि उन्हें कैसा लगता है जब ट्रैन उनके भागने की कद्र किये बगैर आगे चली जाती है। क्या उन्हें ट्रैन से ये गिला होता है कि ट्रैन को उनके लिए रुकना चाहिए था। जब वो आराम करके दोबारा भागने की हालत में होते तो फिर दोबारा चलना चाहिए था। मानवता तो यही कहती है। इंसानियत का यही तकाजा है। पर उनसे बात करना तो सम्भव नहीं है पर फिर भी कुत्तों का जज्बा काबिले तारीफ है वो हर ट्रैन के पीछे भागते है। थकते है। रुकते है फिर दूसरी ट्रैन के पीछे भागते है पर रहते अपनी उसी एक डेढ़ किलोमीटर के दायरे में है। क्या उन्हें कभी ये ख्याल नहीं आता कि यार ट्रैन के साथ साथ भागने की बजाय ये अच्छा नहीं है कि ट्रैन में चढ़ ही लिया जाए फिर काफी चीजें आसान हो जाएंगी। पर फिर उसमें भी अनिश्चिता का खतरा है। ट्रैन जाने कहाँ कहाँ किस रास्ते पर लेकर जाए। आगे क्या मिले क्या पता। यहाँ तो पता है एक डेढ़ किलोमीटर तक सब रास्ता देखा भाला है। शायद उन्हें भी लगता होगा कि इतनी प्रगतिशीलता ही ठीक है।


अधिकतर को लगता है कि किसी एग्जाम की तरह , किसी डिग्री की तरह एक बार थोड़ी से मेहनत कर के प्रगतिशील बना जा सकता है। डिग्री का तो ऐसा है कि आज के वक्त खरीदी भी जा सकती है। पैसे में बल होता है। जब आपके पास पैसा है तो उस पैसे का क्या फायदा अगर आप डिग्री ही न खरीद सको। नाम के आगे डॉक्टर लग गया तो क्या फर्क पड़ता है आप काहे के डॉक्टर है। पर प्रगतिशीलता मुंह चिढ़ाती है। आप जब कोई प्रगतिशीलता के पास पास जाता हो तो पता चलता है ये कोई एक दो दिन या महीने का काम नहीं है ये तो जिंदगी भर का टंटा मोल ले लिया। हर रोज की मेहनत। फिर मेहनत जवाब दे जाती है तो प्रगतिशीलता ताने मारने के काम आती है। बहुत से लोग तो इस अहसान में ही जिंदगी बिता देते है कि हम भी कभी प्रगतिशील थे। मैं तो कहता हूँ कि किसी की मेहनत जाया नहीं जानी चाहिए। मैं तो ये भी कहता हूँ कि एक प्रगतिशीलता की भी शील्ड हर साल ,ओह साल बहुत बड़ा होता है, हर महीने हर दिन के हिसाब से देते रहना चाहिए। अमुक आदमी १ दिसंबर 2012 से लेकर 16 मई 2014 तक प्रगतिशील था इसके लिए समस्त प्रगतिशील समाज इनक ऋणी रहेगा। वो तो बुरा हो मोदी सरकार का वरना अमुक आदमी आगे भी प्रगतिशील रह सकता था। पर कोई नहीं जब तक जितना प्रगतिशील रहा वो भी अच्छा ही था।

या अमुक आदमी फलानि नौकरी मिलने तक प्रगतिशील रहा इसके लिए हम उस भाई के अहसान मंद रहेंगे ।

या अमुक आदमी अपनी शादी तक बहुत प्रगतिशील रहा शादी से दहेज़ तक अल्पकाल तक प्रगतिशीलता रुकावट पर रही जिसके लिए खेद है। अब भी होली दीवाली और शादी ब्याह को छोड़कर अमुक आदमी हमेशा प्रगतिशीलता का साथ देता है जिसके लिए हम इसका तहे दिल से अहसान मंद है।


उस शील्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में ये शेर लिखवा दिया जाए


अहसान इस दिल पर तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

विद रिगार्ड्स
प्रगतिशीलता।

ऐसा करने से सम्भव है कि सांत्वना पुरस्कार मिलने पर वो लोग अप्रगतिशील होने पर प्रगतिशीलता को गाली कम निकाले। अब गुस्सा जायज बनता है जितने दिन मेहनत से काम किया उसका तो एक आना मिला नहीं अब ये पूछ रहे हो कि भाई जान ये क्या हुआ। एकाएक जापान जाते जाते चीन कैसे पहुँच गए ? जिंदगी बड़ी होती है सारी जिंदगी का ठेका थोड़ी ले रखा है। पीछे ही पड़ गए। सैडिस्टिक लोग। दुसरो को चोट पहुंचा कर मजा आता है। हम अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए। ये एक अलग श्रेणी के लोग है जो कभी भी ' इतने प्रगतिशील " नहीं हो पाते। इनसे कोई पूछने का कष्ट करे कि भाई "इतने प्रगतिशील " बनने में कितने जन्म लगेंगे। मतलब दिक्क्त क्या है ? कोई प्रगतिशीलता के रास्ते में बड़ा पत्थर पड़ा हुआ तो हमें बताये हम कोशिश करे उसे हटाने की। इन लोगों के लिए अलग से सर्टिफिकेट जारी किये जा सकते है। जैसे कानून की किताबों में लिखा जाता है ' इसके अलावा ' कुछ नमूने इन सर्टिफिकेट के मैं आपके सामने रख सकता हूँ

- अमुक आदमी हर चीज में प्रगतिशील है सम लैंगिक , थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर के बाबत राय को छोड़कर। इस मामले में ये भी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है अभी कोई उम्मीद भी नहीं है पर जैसे हर आदमी हर काम नहीं कर सकता ऐसे ही एक आदमी हर मसले पर प्रगतिशील नहीं हो सकता। ये मुद्दे उन्होंने हायर लेवल के प्रगतिशीलों के लिए छोड़ रखे है बाकी और इनकी प्रगतिशीलता में कोई कमी नहीं है।
-अमुक आदमी की प्रगतिशीलता बहुत काबिले तारीफ है अध्यात्म को छोड़कर। इस मामले में अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है
- अमुक आदमी बहुत प्रगतिशील है अपनी जाति के मसले के इलावा । जाति के मामले में ये अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि जाति पर गर्व क्यों बुरा है ये समझ आ सके। अपनी जाति में अपने बेटे बेटियों के रिश्ते क्यों नहीं ढूंढ़ने चाहिए ये बात इनके समझ नहीं आती बाकी सब में ये प्रगतिशील है।
-अमुक आदमी बहुत प्रगतिशील है गालियो पर समझ के इलावा। वहां ये इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि समझ आ सके कि शोषित जाति , सेक्स से सम्बंधित गालियां या मजाक क्यों असंवेदनशीलता बल्कि क्रूरता के दायरे में आता है।
ये कुछ सैम्पल है ऐसे हजारों नहीं तो सैंकड़ो नमूने मिल सकते है जिन्हे हम उपरोक्त नमूनों की नकल कर प्रगतिशीलता का सर्टिफिकेट दिया जा सकता है। अभी तो बहुत तरह के प्रगतिशील बचे हुए है। तुम्हें शायद यकीन न हो आज भी इस देश में ऐसे प्रगतिशील बचे हुए है जो सरे आम ये कहने कि हिम्मत रखते है कि मैं जातिवाद को नहीं मानता। मैं तो शेड्यूल कास्ट के लोगों के साथ पानी भी पी लेता हूँ। खाना भी खा लेता हूँ। अब क्या इस प्रगतिशीलता के लिए उन्हें बहादुरी अवार्ड नहीं मिलना चाहिए। मुझे अपनी इसी छोटी सी जिन्दगी में ऐसे भी प्रगतिशील मिले है जो कहते है कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनकी होने वाली पत्नी की पिछली जिंदगी में कितने अफेयर थे। अहा देखिये प्रगतिशील प्रगतिशीलता के लिए कितना बड़ा त्याग , कितना बड़ा अहसान कर रहा है । इनको तो नोबल भी मिल जाए तो थोड़ा है। एक अंडरस्टुड बात को बोलने का मतलब स्तूपिडिटी और कुंठा होती है पर ये अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि ये बात समझ सके। शायद इस जिंदगी में हो भी न पाए। आज तक हमारा प्रगतिशील युवा वर्जिनिटी पर अटका हुआ है। कभी गर्व करने लगता है। कभी अफ़सोस करने लगता है कभी अफ़सोस भरा गर्व करने लगता है। दिल में है प्रगतिशीलता दिमाग में है वर्जिनिटी।

ऐसा नहीं है कि लोग तरक्की नहीं करते। मुझे याद है मैं बरसों पहले जब मैं बच्चा था तो एक अंकल को मैंने कहते सुना था कि कैसे अपनी घर की बहु बेटियों से बाहर काम करा लेते है लोग। घर की लाज तो घर में ही रहनी चाहिए अगर इतना भी न कमा सको कि अपने घर की औरतो बच्चो को खिला सको तो चूड़ी पहन लेनी चाहिए। अभी हाल ही में वो अंकल मिले तो बड़े गर्व से कह रहे थे कि जी हम तो प्रगतिशील है हमारी तो बहु बेटियाँ बाहर जॉब करती है। वक्त लगता है पर प्रगतिशील बन जाते है लोग। बिलकुल उसी वक्त एक इससे विपरीत मामला भी मेरे सामने आया। उस जमाने में जब मैं बच्चा हुआ करता था एक अंकल की बीवी और बहन दोनों जॉब करती थी। उस जमाने में भी लोग प्रगतिशील हुआ करते थे। आज जब वो मिले तो बड़े शान से बता रहे थे कि खुदा की फजलों करम से उन्हें तो जमाई भी ऐसा मिला है जो उनकी बेटी से कहता है कि तू घर में आराम कर , काम के लिए मैं हूँ। हालाँकि बेटी एमबीए है पर जमाई की सोच कितनी अच्छी है कि बीवी की कमाई नहीं खानी । औरत घर में ही अच्छी लगती है। मैंने तो अपनी बहु से भी कह दिया है कि बेटा तू घर में आराम कर। बाहर जॉब वॉब के चक्कर में मत पड़ना। बेटा जब कमा ही रहा है। देखो हमारे घर में बहु और बेटियों में कोई फर्क नहीं होता।

खैर जितने तरह के प्रगतिशील उतनी तरह की उनकी बातें। उनकी बातें सुनकर अकबर इलाहाबादी का एक शेर याद आता है

क़द्रदानों की तबीयत का अजब रंग है आज

बुलबुलों को ये हसरत, कि वो उल्लू न हुए

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