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Sunday, 27 May 2018

इस निर्मम वक्त में नायक होने के मायने

                                       
मंदिर में भीड़ एक लड़के को मारने पर उतारू है। एक पुलिस कर्मी उस लड़के को बचाने की कोशिश कर रहा है। भीड़ उसे पीटना चाहती है क्यूँकि वो मुसलमान है। भीड़ हिन्दू आतंकवादियों की है। आतंक का इतिहास भारत के लिए नया नहीं है। दलितों और औरतों ने सदियों से बीमार शोषक मर्दों का आतंक सहा है आज भी सह रहे है। भीड़ का न्याय भी नया नहीं है। चुड़ैल , डायन के नाम से पीट पीट कर हत्या या मुंह काला कर के गधे की सवारी कुंठित भीड़ के मनोरंजन के साधन रहे है। हमने अभी तक अपने इतिहास को स्वीकार तक नहीं किया है उससे सीखना तो बहुत दूर की कौड़ी है। पिछले चार सालों में भीड़ का इन्साफ जिस गति से बढ़ रहा है कि लगता है हमें कबीलाई समाज की तरफ वापिस जाने की बहुत जल्दी है। गौ आतंकवादियों से शुरू हुआ सिलसिला दिन ब दिन अपने कदम आगे बढ़ा रहा है। वो उसे पीटना चाहते थे क्योंकि वो दूसरे धर्म का था। इसी धर्म के लोग हर साल कितने ही लड़के लड़कियों के सपनो का गला घोंट देते है क्यूँकि वो अपने ही धर्म में किसी और जाती में शादी करना चाहते है। मनु महाराज ने कहा था कि लड़की को आजाद नहीं रहना चाहिए। लड़की की आजादी धर्म के खिलाफ है। दलितों की आजादी धर्म के खिलाफ है। कोई भी दलित या लड़की इस कानून का उलंघन करती है वो सजा के हकदार है। लड़की की आजादी गांव की अपेक्षा शहर , शहर की अपेक्षा बड़े शहर , बड़े शहर की अपेक्षा महानगर में ज्यादा होती जाती है। ये सब हमले उसी आजादी पर है। जो बीमार मर्दों की आँखों में जबरदस्त खटकती है। जिससे हतोत्साहित होकर गंदे वीभत्स गालियाँ और चुटकले बनाये जाते है। मंदिर वाली भीड़ हर जगह मौजूद है वो मौका मिलने पर किसी पर भी हमला कर सकती है। उस युवक को तो उस बहादुर पुलिसकर्मी के साहस ने बचा लिया। पर सबको ये मौका न मिल पाए। आज सोशल मिडिया पर उस पुलिसकर्मी की जमकर तारीफ हो रही है जिसका वो हकदार भी है। ठीक इसी वक्त उसी सोशल मिडिया पर उसके खिलाफ नफरत का प्रोपगेंडा भी चलाया जा रहा होगा जो उस भीड़ की खुराक है  जो सड़कों पर उतरती है। पर क्या जो सोशल मिडिया आज उस पुलिस कर्मी को नायक बना रही है वो उसके मुसीबत के वक्त में उसके साथ खड़ी होगी ? हमारा इतिहास तो कम से कम इस बात की गवाही नहीं देता।

पिछले साल सहारनपुर में दंगे हुए दलितों के घर जला दिए गए। उनके बचाव के लिए भीम आर्मी आती है। भीम आर्मी के सर्वेसर्वा चंद्र शेखर आजाद को बहुत ही कम समय में सोशल मिडिया में नायक बना दिया जाता है। आज चंद्र शेखर आजाद जेल में है उनपर बहुत संगीन धाराएं लगी है। उनका कसूर यही है कि दलित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई। पिछले एक साल में ऐसा कोई आंदोलन ऐसी कोई प्रभावी मुहीम दिखाई नहीं दी जो सरकार पर चंद्रशेखर की आजादी के लिए दबाव डाल सके।  क्या चंद्र शेखर आजाद से देश की आजादी को कोई खतरा है ? पिछले ही दिनों भीम आर्मी के एक और सदस्य की गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

पिछले ही साल अगस्त में गोरखपुर में सरकारी अस्पताल बालसंहार हुआ। छोटे  बच्चों की  एक के बाद एक
हत्या कर दी जाती है ठीक उसी वक्त डॉक्टर कफील की तस्वीर आती है उन बच्चों को बचाने की जीतोड़ कोशिश करते हुए।  डॉक्टर कफील भी एक नायक की तरह उभर कर आते है। हर जगह उनकी तस्वीर वायरल होती है। डॉक्टर कफील अगले नौ महीने जेल में गुजारते है बच्चों को बचाने की कोशिश करने के अपराध में। पर अफ़सोस ये है हमारे पास उनका साथ देने के लिए नौ महीने नहीं थे। हर रोज एक नया मुद्दा आता है दस  नए बयान आते है। हर दूसरे महीने चुनाव आते है। डॉक्टर कफील को जमानत मिल गयी है चंद्रशेखर आजाद अभी जेल में ही हैं।

मंदिर में उस लड़के को बचाने वाला पुलिसकर्मी सिख था। सिख की पहचान दूर से ही उनकी पगड़ी और दाढ़ी की वजह से हो जाती है। उसके लिए उनकी आई कार्ड देखने की जरूरत नहीं होती। पर अगर वो पुलिसकर्मी सिख न होता तो ? उसे पहले अपनी आईडी दिखाकर बताना पड़ता कि वो मुसलमान नहीं है। और अगर वो मुसलमान होता तो ?  तो  शायद उसे अपनी जान बचाने के लिए कोई कन्धा देखना पड़ता। पुलिसकर्मी गगनदीप ने बहुत प्यारी बात कही है कि हिन्दू मुस्लिम या सिख सबको प्यार करने का अधिकार है। क्या हम अपने दिल पर हाथ रखकर ये कह सकते है कि हमें अपने घर की औरतों के इस मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया है ?

किसी द्वारा किये सही काम को सराहना और उसकी हिम्मत बढ़ाना बहुत जरुरी है और उससे भी ज्यादा जरुरी है उस काम की वजह से उस पर आने वाली परेशानियों के वक्त उसके साथ होना। दूसरा काम थोड़ा मुश्किल है पर निहायत ही जरुरी है उसके बिना उस सराहना की कोई कीमत नहीं है वो बस आपके मनोरंजन मात्र का एक साधन बन के रह जाती है।


Friday, 25 May 2018

आर्यवीर से मुलाकात -1

                                             

उम्र 45 साल , पेट निकला हुआ। रंग गेहुँआ कद पांच आठ। आर्यवीर की शख्सियत में बयाँ करने लायक कोई ख़ास बात न थी सिवाय उसके बोलने के अंदाज से। बाकियों से बहुत ज्यादा बोलता था। राजनैतिक , सामाजिक ऐसा कोई विषय नहीं था ऐसी कोई समस्या नहीं थी जिसका समाधान आर्यवीर के पास न हो। चूँकि मुझे भी राजनैतिक सामाजिक विषयो पर सुनना बोलना अच्छा लगता था तो आर्यवीर से बातें लगभग हर रोज होने लगी। यूँ एक दिन बात चल रही थी

- बनारस में निर्माणाधीन पुल गिर गया काफी लोग मर गए। सरकार नागरिकों के लिए दिन ब दिन संवेदहीन होती जा रही है।

आर्यवीर - हर बात के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं हो सकती। इसके लिए हमारा शिक्षा तंत्र जिम्मेदार है

- वो कैसे

आर्यवीर- आधे से ज्यादा इंजीनियर कोटे से सेलेक्ट होते है जिनमें ना काबिलियत है न टैलेंट। अब ऐसे इंजीनियर फ्लाई ओवर बनाएंगे तो यही हश्र होगा। अब बताओ मेरे सामने मिश्रा जी का बेटा कितना मेहनती है टेस्ट में 90 नंबर आये फिर भी नहीं हुआ कोटे वाले 60 नंबर में एड्मिसन ले जाते है।

आर्यवीर की ख़ास बात है की वो जब बोलता है तो बस वो ही बोलता है। उसकी कही बात परम् सत्य होती है उसमें कहीं अगर मगर की गुंजाइश नहीं होती। आर्यवीर बोल ही रहा था कि उसके बेटे का फोन आ गया। फोन से बात में व्यवधान आ गया। बात का रुख सामाजिक की बजाय निजी परेशानियों की तरफ चला गया

आर्यवीर - बेटे के कॉलेज वालों ने 50000 रूपये और मांगे है। लूट मची हुई है हर जगह। इतना टफ कॉम्पिटिशन है हर जगह। बेटे को इंजीनियरिंग टेस्ट के लिए एक साल कोचिंग दिलाई थी फिर भी 55 ही नंबर आये अब इतने नंबर में तो पेड  सीट पर दाखिला हो पाया। पूरी इंजीनिरयिंग 25 लाख में पड़नी है। लड़के की उम्र बीत जानी है इतने पैसे कमाने में। अब बताओ लोग सरकारी नौकरों पर बेईमानी का आरोप लगाते है ( बताना भूल गया आर्यवीर एक सरकारी अफसर भी है ) बच्चो की पढाई इतनी महंगी हो रखी है तनखाह पर कैसे गुजारा सम्भव है। इतने पैसे लगाकर सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई करो तो वहां भी आरक्षण वाले आगे मिलते है। ये सब ऐसे ही चलता रहा तो हमारे बच्चो के लिए तो कुछ बचेगा ही नहीं। भूखे मरेंगे सब।

- आपको बेटे को पैसे ट्रांसफर करने थे  " मैंने याद दिलाया

आर्यवीर - हाँ यार। अभी एक कॉन्ट्रेक्टर को फोन करता हूँ दो महीने हो गए कमीशन देकर ही नहीं गया।

(आर्यवीर कॉन्ट्रेक्टर से मिलने चला गया। मैं भी अख़बार पढ़ने में व्यस्त हो गया। )

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है ?
क्या ये मुल्क हमारा है या ये भी बस एक नारा है ?

हवा पानी में जहर भरा , सीनों पर गोली दागी
जनता की चुनी सरकारों ने , चुन चुन जनता को मारा है।

हर जोर जुल्म की टक्कर हड़ताल हमारा नारा था।
हड़ताल ही  है अब देशद्रोह, मजदूर का कहाँ गुजारा है

वो राजा है या सेवक है वो  जोकर है या हिटलर है
भाइयों , बहनो वो जो भी है सेठो की आँख का तारा है।

बच्चों की साँसों को रोका मजदूरों को आग में झोंका
मरने पर इनाम है बांटा, हाकिम का खेल निराला है

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है

Sunday, 20 May 2018

लोकतंत्र बच गया पर गरीब अवाम का बचना नहीं हो पा रहा है

अख़बार के बीच वाले पन्नो में कहीं एक खबर है - गोकशी के शक में दो लोगों की मार मार कर हत्या।
 


2015 की अखलाख की हत्या से लेकर 2018 की रियाज की हत्या तक , अख़बार के पहले पन्ने से बीच के पन्ने तक भारत सरकार ने गरीब मजलूम लोगों की धर्म के नाम पर हत्याएं सामान्य बनाने में बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। अब ये रोजमर्रा की चीज हो गयी है। दहेज़ के लिए जलाने , प्यार में तेजाब गिराने की तरह। राजनाथ सिंह ने कहा है कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। रियाज के पास भी मांस का टुकड़ा मिला है जिसे जांच के लिए भेजा गया है। चार लोगों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। अखलाख की हत्या के लिए जो आरोपी गिरफ्तार किया गया था वो जब जेल में  मरा तो  उसकी लाश तिरंगे में लपेट कर लायी गयी थी। शायद अब जो लोग गिरफ्तार हुए है उन्हें कोई न कोई वीरता पुरस्कार मिल जाए। रियाज पेशे से दर्जी था तीन बच्चे है। शकील अभी कॉमा में है। पिछले 4 साल में कितने लोग गौ आतंकवाद के हाथो अपनी जान गँवा चुके है। कितने भय के साये में रहने को मजबूर है इसका आंकड़ा शायद कहीं दर्ज नहीं होगा। सरकार का फर्ज है जनता को रोजगार मुहैया करवाए ताकि वो सुबह शाम खाना खा सके। यहाँ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि लोग खाना खाने से ही डरने लगे रोजगार की फिर जरुरत ही क्या होगी। शायद ये भी कोई मास्टर स्ट्रोक हो।

कर्नाटक के विधान सभा में भले ही तथाकथित रूप से लोकतंत्र की हत्या होते होते बची हो पर भारत की सड़को पर हर रोज गरीब लोग की साजिशन हत्या हो रही है। ये बहुत भयावय है। लोगों से ही लोकतंत्र बनता है। पूंजीपतियों की फेक्ट्रियो में जलाकर मार दिए गए गरीब मजदूर हो या पुल गिराकर उसके नीचे दबाये हुए निर्दोष लोग हो या ओक्सिजन के अभाव में दम तोड़ते बच्चे हो या गौ आतंकवादियों के हाथो बेरहमी से मारे गए रियाज और अखलाख हो इन सब की हत्याओं के साथ लोकतंत्र हर रोज मर रहा है। जितना इन घटनाओ के लिए प्रतिरोध का स्वर घटता जाएगा उतना ही हम फासिज्म की तरफ बढ़ते जाएंगे। जिस समाज में इस तरह की घटनाये बिना किसी विरोध प्रतिरोध के हो रही हो वहां डेमोक्रेसी के राग अलापना किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है

निकलना खलक से आदम का सुनते आये थे लेकिन



राजनीती मजेदार चीज है। कहाँ जाता है राजनीती में कुछ भी स्थाई नहीं होता न दुश्मनी न दोस्ती। राजनीती में जो होता है वो दिखता नहीं है। जो दिखता है वैसा हो भी जरुरी नहीं है। हर घटना के अलग अलग तरह से विश्लेषण किये जाते है। सब से ज्यादा मजे विश्लेषकों के ही है। लोकतंत्र की जान हर पल सांसत में रहती है। हर चुनाव में लोकतंत्र की हत्या हो जाती है। ठीक उसी पल दूसरे खेमे में लोकतंत्र की जीत भी हो रही होती है। लोकतंत्र पिछले 70 साल में कन्फ्यूजन में जी रहा है कि मरने का मातम बनाये या जीत का जश्न बनाये। कर्नाटक वाले ड्रामे में तो लोकतंत्र की हालत एकदम टाइट हो रखी थी। जब चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए तो बीजेपी तेजी से बहुमत की तरफ भाग रही थी। लड्डू वड्डू बंटने लगे। अख़बार , मिडिया सब मोदी का जादू , अमित शाह का जलवा , और राहुल का बचपना दिखाने में मशगूल हो गए। सट्टा बाजार के जुआरी भी जोश में आ गए। एक तो ये शेयर मार्किट की कहानी मेरे कभी समझ नहीं आयी। पिछले 15 सालों से जब जब बीजेपी जीतती है तो शेयर मार्किट बढ़ने लगता है। क्या सारे जुआरी बीजेपी के ही है क्या। जुआरियो को बीजेपी इतनी पसंद क्यों है ? क्या बाकी पार्टी वाले बिलकुल जुआ नहीं खेलते ? कुछ तो गड़बड़ है।  पर शाम होते होते बीजेपी सात आठ सीट कम रह गयी। कांग्रेस और बीजेपी की बी टीम जनता दल (सेक्युलर ) साथ आ गए। उनके पास 8 सीट ज्यादा हो गयी। पर जुआरियो के चेहरे पर ज्यादा चिंता नहीं नजर आ रही थी। सरकार अपनी ऊपर से स्वदेशी घर का बना हुआ,  शुद्ध 24 कैरेट का चाणक्य पास में ,  राज्यपाल साहब पहले से ही आरती में मशगूल है

जो खिल सके न वो फूल हम है
तुम्हारे चरणों की धूल हम है।

यदुरप्पा साहब बोले अपन बड़ी पार्टी , लोकतंत्र की जीत , अपन मुख्यमंत्री। दूसरी तरफ लोकतंत्र की हत्या होने ही वाली थी। हो ही गयी थी। कांग्रेस जेडीएस के पास बहुमत। लोकतंत्र बीच में फंसा हुआ था आधे मुंह में लड्डू  जबरन घुसेड़ खुश होने की कह रहे थे आधे उसके मरने की शोक बना रहे थे। इधर चेतन भगत का ट्वीट आया कि  हंग विधानसभा में नैतिकता नहीं देखी जानी चाहिए। हॉर्स ट्रेडिंग भी एक कला है। जो ख़रीदे  वो सिकंदर। चेतन को देखकर लगता है कि इस आदमी को मुन्नाभाई के झापड़ की सबसे सख्त जरूरत है। एक तो जिन विधायकों को भेड़ बकरियों की तरह रिसोर्ट में बंद कर दिया उन्हें ये घोडा कह रहा है। बेचारो के मोबाईल भी छीन लिए।   मोबाइल बच्चो के खेलने की चीज नहीं है , कोई टॉफी दिखाये तो पास मत जाना बोरी में बंद कर के ले जाते है। खैर चेतन अगर चुने हुए विधायकों की तुलना घोड़ों से कर रहा है तो अगर चेतन भगत और प्रसून जोशी जैसे लोगों की तुलना किसी जानवर से करनी हो तो किस से की जाए ? वो जो हड्डी के लालच में लार टपकाये मालिक के पास खड़े रहते है। पर मुझे नहीं लगता आदमी की तुलना किसी भी जानवर से की जा सकती है। केंचुए से भी नहीं। उसके पास तो रीढ़ की हड्डी होती ही नहीं।  रीढ़ की हड्डी होकर भी रेंगकर चलना ये आदमी के ही बस की बात है। विधायकों की खरीद फरोख्त को कला बताने वाला चेतन  भगत मेरिट पर लेक्चर देता है। भारत की सारी मेरिट का यही हाल है। इन लोगों को किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करवाकर बेसिक नॉलिज देनी चाहिए। बहुत जरूरत है इसकी।

राज्यपाल ने येदुरप्पा को 15 दिन का वक्त दे दिया। ऐसा दिलदार आदमी और कहाँ मिलना है। उधर चाणक्य साहब को पता न क्या दौरा पड़ा कि ऐसे ऊलजलूल बयान देने लगे कि बस अब हम सारे चुनाव जीतेंगे। इस साल जीतेंगे , अगले साल जीतेंगे और फिर अगले पचास साल जीतेंगे। ओवरटाइम ज्यादा करने का यही नतीजा होता है। दरअसल बीजेपी को 2014 से लेकर 2018 तक चार साल ही हुए है राज करते हुए। 2014 में धूम धड़ाम से जीतकर आयी बीजेपी 2018 तक हांफने लगी है। इतिहास की नजरो में चार साल के क्या मायने होते है सबको पता है। हम जब इतिहास में पढ़ते थे कि फलाने राजा ने 1728 से लेरक 1730 तक राज किया इसी बीच छह सात लड़ाई भी लड़ी तो हमारे दिमाग में यही आता था बेचारा दुखी ही रहा। खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आने। पिछले 4 सालों में अमरीका में, इंग्लैंड में शो करवा दिए। मिडिया से लेकर सोशल मिडिया तक नॉन स्टॉप पब्लिसिटी करवाई। नतीजा क्या निकला ? बिहार में पिटे। हालाँकि फिर नितीश के डीएनए से अपना डीएनए मैच करवा के उसे चाणक्य का नाम दे दिया। गोवा में ऐसी पिटाई हुई कि देश के रक्षा मंत्री को देश की रक्षा छोड़कर अपने गांव भागना पड़ा। नागालैंड मणिपुर का हाल पता ही है सबको। गुजरात में ऐसी टक्कर हुई कि प्रधानमंत्री को रोना पड़ गया। यूपी और असम के दो इलेक्शन को छोड़कर हर इलेक्शन में बीजेपी की दुर्गत ही हुई। पंजाब का तो क्या ही बोले। लोकसभा में 282 से 274 पर आ गयी। योगी जी अपने इलाके की सीट ही हार गए। 2014 में जिस धूम धड़ाके के साथ बीजेपी आयी थी सबको लगता था कि अगले दस साल तो आराम से गुजरेंगे। इस लोकसभा से पहले कभी भी किसी भी प्रधानमंत्री की इतनी दुर्गति किसी ने नहीं देखी थी। विधानसभा के चुनावो में सामन्यत प्रधानमंत्री एक आध रैली करते थे। यहाँ तो विधानसभा की कौन बात करे नगरपालिका के चुनाव तक  प्रधानमंत्री जी के जिम्मे लगा दिए। इतना मजबूर बेबस प्रधानमंत्री पहले नहीं देखा कभी जिसे हर चुनाव में इतनी मेहनत करनी पड़ रही है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री जी से बेगार करवाई जा रही है। हर जगह हर विधानसभा में दस दस रैली। इतना बर्डन होने के बाद कैसी किसी को याद रह सकता है कि भगत सिंह से मिलने कांग्रेस वाले गए थे या नहीं। अब उनके भाषणों में वो जोश दिखता भी नहीं है। मुझे तो लगता है हमें इंसानियत के नाते आरएसएस से गुहार लगानी चाहिए कि प्रधानमंत्री जी को थोड़ा आराम करने का मौका दिया जाए।  कल कर्नाटक का फ्लोर टेस्ट हो गया। इतनी बुरी तरह से पिटाई हुई कि ये भी याद न रहा कि जिस राष्ट्रीय गान को डेडपूल से पहले सिनेमाहाल में जबरन चलाने पर आमदा थे कम से कम उसे तो सुनते जाओ। आगे राजनीति में क्या होगा कौन जानता है पर कल जब येदुरप्पा जब विदाई गीत गए रहे थे तो मुझे उसमें ग़ालिब के शेर की झलक नजर आ रही थी

निकलना खलक से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।


Friday, 11 May 2018

असंवेदनशीलता और हम




खबर - हिसार के खेदड़ प्लांट में बॉयलर साफ़ करने गए 6 मजदूर दुर्घटना का शिकार हो गए उनमे से तीन अपनी जान गँवा चुके है और तीन गंभीर रूप से घायल है।



हरियाणा के मंत्री कृष्ण लाल पंवार खेदड़ में आकर घोषणा करते है कि मरने वाले के परिवार वालों को 17.50 लाख रूपये की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी यही नहीं रुकते है। इसके आगे घोषणा करते है कि घायलों को 7.50 लाख की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी शायद सीधे किसी खेल प्रतियोगिता से घटना स्थल पर आ रहे थे। 6 मजदूर एक कम्पनी की लापरवाही की वजह से गंभीर हादसे का शिकार हुए थे। उनमे से तीन मजदूरों की जान जा चुकी थी। ऐसी जगह पर जाकर मंत्री जी कहते है कि मरने वालों को इनाम दिया जाएगा। ये महज 'स्लिप ऑफ़ टंग' नहीं है। ये हमारे समाज की असंवेदनशीलता की हकीकत है। मजदूरों के हत्याओं से किस को फर्क पड़ता है। हर दिन कहीं न कहीं मजदूरों की हत्याओं की खबर आती रहती है। एक जलते बायलर के अंदर मजदूरों को भेजने से संगीन अपराध क्या होगा ? मंत्री जी अपनी बदमजा ड्यूटी निभाने आते है और मजदूरों को उनकी मौत का इनाम सुनाकर चले जाते है। हमारे लिए ये मामूली घटना है। हो जाता है। ग़लती से मुंह से निकल गया। स्लिप ऑफ़ टंग।



मंत्री जी कहते है अगस्त में बच्चो का मरना नॉर्मल है। मंत्री जी मजदूरों की हत्याओं पर इनाम राशि की घोषणा करते है। ये सब सामान्य है। कोई बड़ी बात नहीं है कोई मंत्री इन हत्याओं के लिए मजदूरों को ही जिम्मेदार न बता दे। असंवेदनशीलता के जिस स्तर पर आज हम है वहां सब जायज है। हरियाणा सरकार बच्चो से सवाल पूछती है कि हरियाणा में इनमें से किस को अपशकुन नहीं माना जाता



A- खाली घड़ा
B ईंधन से भरा डिब्बा
C काले ब्राह्मण से मुलाकात
D ब्राह्मण लड़की का दिखना



इस सवाल में व्यंग्य की ढेरों संभावनाएं नजर आती है। इसमें सरकार का मजाक उड़ाया जा सकता है। पर शायद ही हम ये सोचने की जहमत करे कि इतनी असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करने का साहस सरकार में कहाँ से आता है। शायद लोगों का रिएक्शन देखकर ही आता हो। ये सवाल बहुत ही जातिवादी है। काला ब्राह्मण जैसा शब्द मैंने इससे पहले नहीं सुना था। काला रंग किस से जुड़ा हुआ है सब जानते है। किस को देखना खुद को उच्च कहने वाली बीमार जातियों के लोग अपशकुन मानते है ये भी जग जाहिर है। ये सवाल परीक्षा में देना नाकाबिले बर्दाश्त हरकत है , बेशर्मी की इंतेहा है पर हमारे लिए ये मजाक का विषय है। वो खुले आम शोषितो का , मजदूरों का बेशर्मी से मजाक उड़ा रहे है , उन्हें जान से मार रहे है। उनके अधिकारों पर चोट की जा रही है। दूसरी तरफ असंवेदनशीलता के सताए हुए लोग है जो रोड एक्सीडेंट पर सेल्फी खींचते है। भूकंप का , आंधी तूफ़ान का मजाक उड़ाते है। दरअसल अपनी हर असंवेदनशीलता को मजाक , व्यंग्य या मानवीय भूल का चोला ओढ़ाना हमारी आदत बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि हम में संवदनाएँ नहीं है या हम आहत नहीं होते है पर अफ़सोस की बात है कि हमारी सारी संवेदनाएं हमारे खुद के लिए ही है। हम सरे आम शोषितो का मजाक उड़ाते है। मई दिवस हमारे लिए मजाक है। मजदूर हमारे लिए कामचोर है। नारी विरोधी दलित विरोधी गालियाँ हमारे लिए कूल है। सलमान खान हमारे हीरो है। सलमान ने शेड्यूल कास्ट के लिए कैमरे के सामने बहुत ही अश्लील और गैर क़ानूनी बात कही। पर वो हमारे लिए नॉर्मल है। क्यूंकि हम दिन में दस बार बोलते है। कोर्ट में जब इस बात के लिए जनहित याचिका लगाई गयी तो जज ने याचिका कर्ता पर जुर्माना लगा दिया। ये हम है। ये हमारे जज है। ये सब हमारे लिए नॉर्मल है। शोषक के लिए हम बेहद नरम है। ग़लतियाँ हो जाती है। उनका वो मतलब नहीं था। पर अगर कोई हमारी सुविधाओं पर , हमारी गरीबों , वंचितों के प्रति मानसिकता पर व्यंग्य करता है तो वो हमारे लिए असंवेदनशीलता है। गाली पर टोकना असंवेनशीलता है। अत्याचारों पर बात करना अतिवाद है। दुनिया बहुत प्यारी है देखो मेरे तो बाजू वाला भी ऐसी में बैठता है दूसरी साइड वाला भी ऐसी में बैठता है मेरे दफ्तर में सभी ऐसी में बैठते है। हम तो साथ खाना भी खा लेते है। गालियां मजाक है हमारे दफ्तर में तो लड़कियाँ भी देती है।



हम कौन है ?



हम कुंठाओ के घर है हम मिडल क्लास बीमार जातियों की पैदाइश है हम वो है जिन्हे बचपन में ही मानवीयता से इतनी दूर कर दिया गया है कि अब इंसानियत भी एक रोग लगता है।

Monday, 7 May 2018

हरियाणा - बेरोजगारी , महंगाई , मजहब और नमाज



हरियाणा भारत देश की 10 लोकसभा सीट वाला राज्य। 1966 से पहले पंजाब का हिस्सा। 1947 से  पहले संयुक्त पंजाब का हिस्सा। भारत की कुल जमीन का एक दशमलव चार फीसदी के आसपास जमीन हरियाणा के हिस्से आती है। ढाई करोड़ के आस पास की आबादी।   ढाई करोड़ में से 91 फीसदी के आस पास  आबादी हिन्दू और सिखों की है। सिख 4 फीसदी , हिन्दू 87 फीसदी। बाकी बची 9 फीसदी आबादी में 7 फीसदी आबादी मुस्लिम है जिसमें से अधिकांश नूह और मेवात के इलाके में रहते है। नूह और मेवात नेशनल कैपिटल रीजन के दो बड़े शहरों फरीदाबाद और गुड़गांव को जोड़ने वाला इलाका। फरीदाबाद और गुड़गांव हरियाणा के दो सबसे कमाने वाले शहर। आई टी हब , ऑटो हब ,और पता न क्या क्या हब। नूह और मेवात हरियाणा का शायद सबसे पिछड़ा हुआ इलाका। मेवात से कुछ किलोमीटर दूर जमीन करोड़ों में मेवात में कुछ भी नहीं। राजनीति किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित करती है नूंह और मेवात इसका जीता जागता उदारहण है। पिछले साल इसी नूंह मेवात के ही एक गाँव के कुछ लोगों को प्रसासन ने खुले में शौच जाने के लिए गिरफ्तार कर लिया था और एक पुलिस अफसर ने उनकी फोटो अपने फेसबुक अकाउंट पर भी डाल दी थी उन्हें अपराधियों की तरह गिरफ्तार करके बिठाया हुआ था। उस गाँव में जब  हम गए थे तो पता चला कि सफाई का हाल गाँव में ही बहुत बुरा था। कीचड़ से भरी हुई कच्ची गलियां थी। अधिकतर गाँव वाले गुड़गांव जाकर मजदूरी करते थे। माली हालत बहुत ख़राब थी। घर पर शौचालय बनाने की बात कौन करे रसोई के लिए ही जगह नहीं थी।बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता मेवात में खुले में शौच जाने के लिए गिरफ्तारी हुई।

पिछले हफ्ते की खबर है कि गुड़गांव में पार्क में नमाज पढ़ते लोगों को रोका गया। सीएम मनोहर लाल खटटर ने बयान दिया कि नमाज को मस्जिद के अंदर पढ़ा जाए। पार्क में नमाज पढ़ना ग़लत है इससे तनाव फैलता है। मनोहर लाल खटटर २०१४ में हरियाणा के सीएम बने थे। भाजपा के हरियाणा में पहले मुख्य मंत्री। काफी समय अपनी जिंदगी का इन्होने स्वयं सेवक बन कर बिताया है। मैंने 2014 से पहले कभी अपने शहर या गांव में कोई शाखा नहीं देखी। पिछले साल हिसार के क्रांतिमान पार्क में देखी थी सुबह सुबह शाखा लगी हुई थी। सुना है पार्कों में या खुली जगहों पर स्वयं सेवक शाखाएं लगाते रहते  है। उन शाखाओं में क्या सिखाते है ये बात जानने  के लिए शाखा में जाने की जरूरत नहीं है उनके नेताओ के बोल बचनों से ही पता लग सकता है। पार्क या किसी भी सार्वजानिक स्थल पर क्या करना चाहिए क्या नहीं इसके लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है आप में अगर बेसिक डेमोक्रेसी की समझ है तो आप आसानी से तय कर सकते है कि आपको पार्क में क्या करना है और क्या नहीं ? नमाज एक शांतिप्रिय प्राथना है जिससे किसी भी दूसरे नागरिक को कोई परेशानी नहीं होती। पार्क जनता की सुविधा के लिए होता है। जब तक आप दुसरो की सुविधा में खलल नहीं डालते आप पार्क का इस्तेमाल कर सकते है। मैट बिछाकर आप योगा कर रहे है या नमाज पढ़ रहे है या रोमांस कर रहे है किसी को क्या दिक्कत होनी चाहिए ? कुछ भी नहीं। दिक्कत की बात  है जब आप वहां जोर जोर से चिल्लाते है। या ऊँचे स्वर में गाना गाने लगते है।  लाऊड स्पीकर लगाते है। बहुत सरल सी बात है।

पर सरल बात उतनी सरल नहीं दिखती जब दिमाग में जाले लगे हो। हरियाणा में 2014 में बीजेपी की सरकार आने से पहले हमेशा तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की सरकार रही है पर नूंह मेवात की बदहाली कभी मुद्दा नहीं बनी। क्यों देश की राजधानी के पास एक जगह को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया ? गुड़गांव में साल में एक या दो बार विशेष अवसर पर आसपास के मुसलमानो को नेशनल हाइवे पर नमाज अदा करने की परमिशन दी जाती है। कोई बड़ी बात नहीं थी कि ऐसे अवसरों पर उन्हें कोई भी जगह नमाज के लिए दे दी जाती। हाई वे को नमाज के लिए रोकने का कोई सेन्स नहीं बनता। ऐसी रियायतों को हिन्दू संगठन तुष्टिकरण का नाम देते है। कोई पूछने वाला हो हाई वे पर नमाज पढ़ने देने से गरीब जनता का क्या भला हो गया ? आपने उनको बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा। उनके बच्चो की शिक्षा , सेहत , रोजगार कभी मुद्दा नहीं बनता। सालो साल वो लोग बदहाली की जिंदगी बशर करते है। मुद्दा नमाज बनता है ये मुद्दे कौन छोड़कर गया तथाकथित तुष्टिकरण करने वाली पार्टियां। उस तुष्टिकरण से मेहनतकश अवाम को मिला क्या ? मुजफरनगर , गुजरात। हरियाणा में भी यही सब हो तो कोई  आश्चर्य की बात नहीं है । मनोहर लाल कह रहे है कि पार्कों में नमाज अदा होकर मस्जिद में होनी चाहिए। यही मनोहर लाल दो दिन पहले कह रहे थे कि सबको रोजगार नहीं मिल सकता। सब अपना रोजगार खुद ढूंढो। मुख्यमंत्री को जनता के रोजगार की बजाय 7 फीसदी आबादी की नमाज सार्वजानिक स्थल में करना ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा लगता है। प्रदेश की 91 फीसदी आबादी को भी बेरोजगारी से बड़ा मुद्दा  यह लगता है कि अल्प संख्यक नमाज कहाँ कर रहा है। 91 फीसदी के अंदर यह डर बिठाया जा रहा है कि 7 फीसदी लोग नमाज पढ़कर उनकी जमीन पर कब्ज़ा कर लेंगे। अफवाहों और झूठ का कितना बड़ा दौर चला होगा जनता को इस तरह बरगलाने के लिए। सबसे ज्यादा शिकार पढ़ी लिखी आबादी है जो अपने से ज्यादा होशियार किसी को नहीं समझती। सारी सारी रात बीच सड़क पर माता के जागरण के नाम पर हंगामा करने वाले नमाज के नाम पर इतने चिंतित नजर आते है कि मानो डेमोक्रेसी तुष्टिकरण के भेंट चढ़ गयी हो। इसी चिंता में उन्हें न पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों से फर्क पड़ता है ना बढ़ रही बेरोजगारी से। क्या इनको कोई समझा सकता है कि किसी के नमाज पढ़ने या ना पढ़ने देने से उनकी जिंदगी में क्या फर्क आ जायेगा ? पार्क में कोई नमाज पढ़े या रोमांस करे इससे आपकी सेहत पर फर्क क्यों पढ़ना चाहिए। चाणक्य ने नहीं तो किसी और महापुरष ने कहा होगा कि राजा को बिना किसी  टेंशन के राज करना है तो जनता को बिना बात की अफवाहों और अंध विश्वास में उलझाए रखो। सरकार इस सलाह को  पूरे तन मन धन से अम्ल में ला रही है। देखो रोजगार  की बात मत करो हम नमाज नहीं पढ़ने दे रहे। महंगाई वहंगाई सब मिथ्या है देखो बीफ खाने वाले मारे पीटे जा रहे है। अच्छा आपके  आस पास मुसलमान नहीं रहते तो आस पास की कोई कास्ट को पकड़ लीजिये। वही आपका  हक खा रही है हम ही आपको उनसे बचाएंगे। किताबों में हमने पढ़ा था कि अंग्रेजो ने "फूट डालों और राज करो " की नीति अपना कर भारत पर दो सौ साल इस्तेमाल किया। हमारे आने वाली पीढ़ी को भी आज के  नेताओ के बारे में यही पढ़ने को मिलेगा।



Wednesday, 2 May 2018

फेसबुक बुद्धिजीवी से वार्तालाप







- क्या लगता है अगली बार फिर भाजपा की सरकार आएगी ?

"पता है पहली बार इतनी ईमानदार सरकार बनी है कि खुद भाजपा के वर्कर कह रहे है अगली बार भाजपा को वोट नहीं देंगे। हमारे ही काम नहीं होते। "

- आप तो भाजपा को वोट देंगे ना

"हाँ हाँ मैं तो जरूर दूँगा। मेरी पेमेंट तो एक तारीख को ही हो जाती है। "

- पेमेंट ?
"नहीं वो अलग मसला है। मैं पार्टी के कार्यों के प्रसार के लिए काम करता हूँ जिसकी मुझे सैलरी मिलती है"

- आप सरकार के लिए आईटी सेल में काम करते है ?

"नहीं नहीं सरकार के लिए नहीं करता मैं भाजपा पार्टी के लिए काम करता हूँ आपको भाजपा पार्टी और सरकार में फर्क समझना होगा।"

- क्या फर्क है

"अगर आपको ये फर्क भी नहीं पता तो आप से बहस नहीं हो सकती। भारत में लोग वैचारिक रूप से शून्य है। भाजपा पार्टी और सरकार दो अलग अलग बातें है बिलकुल वैसे जैसे मेरा भाजपा के लिए जॉब करना और मेरा व्यक्तिगत रूप से मेर अपने विचार अपनी प्रोफ़ाइल पर पोस्ट करना दो अलग बाते है। मैं समझाता हूँ। आप भी पूंजीवादी सेठो के खाते सँभालते है उसकी आपको पेमेंट मिलती है और फेसबुक पर जो पोस्ट करते है उसमें और आपके काम में विरोधाभास है पर ये दो अलग बातें है।"

-यानी आप भाजपा के लिए आप काम करते है और फेसबुक पर आपके अपने विचार है।

"हाँ बिलकुल"

- भाजपा के लिए आप क्या काम करते है ?

उनके कामों की तारीफ और प्रसार

-अपनी प्रोफ़ाइल पर आपके विचार क्या करते है
"भाजपा के कामों की तारीफ और प्रसार"

दोनों में क्या फर्क हुआ ?
"आपको फर्क समझना होगा जॉब मजबूरी में की जाती है वहां भाजपा की तारीफ करना मेरी ड्यूटी है अपनी प्रोफ़ाइल पर मैं अपनी मर्जी से भाजपा की तारीफ करता हूँ क्यूँकि मुझे उनके काम पसंद है।"

-पर आप पहले तो प्रगतिशील खेमे में थे तब तो आप भाजपा की आलोचना करते थे

"हाँ तब मैं दूसरी जॉब में था"

- यानी जॉब बदलने के साथ विचार भी बदल गए ?

"देखिये विचार कोई पहाड़ नहीं है जो एक जगह खड़े रहे है विचार तो पानी है उसे अगर एक जगह रखा जाएगा तो वो सड़ जाएगा। विचारों को तो नदी की तरह होना चाहिए। गतिमान। ये एक संयोग ही है कि जॉब के साथ मेरे विचार भी बदल गए। ऐसा संयोग मेरे साथ चार बार हो चुका है"

- कितनी जॉब बदली है आपने अब तक
"चार"

-कमाल है

"है न कमाल। ये तो कुछ कमाल नहीं है कमाल तो सरकार कर रही है पता है कल ही एक सौ पाँच क्लर्कों की भर्ती हुई है अब विपक्ष वाले बेरोजगारी का रोना कैसे रोयेंगे ये देखने वाली बात है।"


- अभी आप जॉब पर है या ये आपके निजी विचार है ?

"आपने पर्सनल अटैक कर के हर्ट कर दिया मैं बहुत संवेदनशील इंसान हूँ।"

- ओह माफ़ी चाहता हूँ। ऑफकोर्स ये विचार है। खैर आप दिन भर फेसबुक पर बहस करते है कभी काम और निजी विचार आपस में नहीं टकराते? मतलब आप बहुत संवेदनशील है आपको बहुत बार फेसबुक पर ये कहते देखा है कि सामने वाला चीप पब्लिसिटी के लिए ऐसी पोस्ट कर रहा है। आप फेसबुक पर किसलिए पोस्ट करते है ?

"मैं कभी भी चीप पब्लिसिटी के लिए पोस्ट नहीं करता। पोस्ट ही करना है तो महंगी पब्लिसिटी के लिए करो। चीप पब्लिसिटी वाले सबका नुकसान कर रहे है। मैं ये मुद्दा बहुत बार उठा चुका हूँ पर कोई मानता ही नहीं सबको चीप पब्लिसिटी ही चाहिए।"

- चलिए आपसे बात कर के बहुत अच्छा लगा
"जनाब अच्छा तो सरकार कर रही है। बोलती बंद कर दी है सबकी।"

Tuesday, 1 May 2018

कुछ न कहने से भी छीन जाता है एजाज ऐ सुखन



एक दिन में 24 घंटे , 30 दिन का एक महीना , 12 महीनो का एक साल। वक्त ऐसे ही चलता रहता है। कैसी भी अनहोनी हो। कुछ भी घट जाए। बादल फट जाए सुनामी आ जाए पर वक्त का चलना बदूस्तर जारी रहता है। वक्त के साथ साथ इंसान भी चलता रहता है। बहुत घटनाएं दिल को हिला जाती है। दोस्त दूर हो जाते है अपने दुनिया से अलविदा कह जाते है पर जो जिन्दा है उनके पास वक्त के साथ साथ चलने के अलावा दूसरा ऑप्शन नहीं होता। पिछले साल के अगस्त महीने की उस घटना को अब 8 महीने होने को आये है जिसने सबके दिलों को हिला दिया था। गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में एक के बाद एक बच्चो के मरने की खबर आने लगी। बच्चें जो वहां इलाज के लिए आये हुए थे वो महज इसलिए मर गए क्योंकि अस्पताल में ऑक्सीजिन की सप्लाई बिल पेमेंट न होने की वजह से रोक दी गयी थी। कितनी भयावय बात थी। उस घटना के बाद कई दिन तक रातो को नींद आनी कम हो गयी थी। वैसे तो सरकारी अस्पतालों के हालात हर जगह कमोबेश एक जैसे ही है पर इस कद्र असंवेदनशीलता। छोटे बच्चों की लाशें सपने में आती थी। ये सभ्यता के किस स्तर को हम पार कर चुके है कि छोटे बच्चो की हत्याएं सामान्य घटना मान ली जाती है। उस वक्त मंत्री जी ने कहा था कि अगस्त में तो बच्चे मरते ही है। आज उस बयान को भी 8 महीने होने को आये है। अब 4 महीने बाद अगस्त आने वाला है। पिछली बार की घटना ने मानक स्तर को काफी ऊपर उठा दिया है अब शायद 20 -30 बच्चों की मौतें खबर भी न बने। आंकड़े और किस काम आते है। पिछले साल भी तो मरे थे। आगे जब किसी दूसरे दल की सरकार आएगी तो शायद उनके पास दिखाने को पिछले साल के आंकड़े होंगे। देखो योगी के राज में ज्यादा बच्चे मरे थे। अब हमारे में तो कम मर रहे है। सबको पता है हमारी तर्क शक्ति यही तक है। अगस्त में बच्चे हर साल मरते है। पहले भी मरते थे। पिछले साल भी मर गए। बेशर्मी के लिए कोई मानक तय नहीं किया जा सकता। हर दिन ये एक नए आयाम को छूती है। इस घटना को तकरीबन 8 महीने गुजर चुके है और इतने ही महीने डॉक्टर कफील ने जेल में बिताये। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े सूबे में जनता के वोट से जीतकर आयी सरकार ने उस डॉक्टर को जेल में डाल दिया जिसने बच्चों को बचाने के लिए अपनी जी जान से कोशिश की। उनकी बच्चो को देखते हुए बेबसी की वो तस्वीर आज भी आँखों के सामने घूमती है। एक डॉक्टर को अपना फर्ज निभाने का इनाम मिला जेल। हालाँकि इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। जिस देश में छोटे बच्चों की यूँ हत्याए अपराध नहीं है एक नॉर्मल बात है वहां उन बच्चों को बचाने की कोशिश करना अपराध की श्रेणी में क्यों नहीं आएगा। ऐसी बातें हम फिल्मों में देखा करते थे। ईमानदारी से काम करने वाले नायक को ही नेता और पुलिस वाले फंसा देते है जेल में डाल देते है। असली जिंदगी में इतनी साफगोई से ये सब करना वाकई हिम्मत का काम है। अभी उत्तर प्रदेश में ही स्कूल से आ रही बस ट्रैन से टकरा गयी जिससे छोटे छोटे बच्चे मौत की आगोश में समा गए। दिल कांप गया खबर सुनके। उससे भी ज्यादा इस बात से दिल दहला कि क्या डॉक्टर कफील के वाकये के बाद कोई इंसान बच्चो को बचाने की कोशिश करेगा ? क्या पता बच्चो को बचाने की जी तोड़ कोशिश करते वक्त कोई फोटो खिंच ले। क्या पता उस पर बच्चों को बचाने का आरोप लग जाए। नायक बनने के आरोप में 8 महीने जमानत न हो। क्या उन बच्चों के माँ बाप जब बच्चो के गम में चीख पुकार कर रहे थे उनके मन के किसी कोने में ये डर नहीं था कि कहीं उन्हें ही उनके बच्चो का कातिल बना कर जेल में न डाल दिया जाए ? क्या बहुत बड़ी बात है ? बिलकुल भी बड़ी बात नहीं है। लोग दूसरों के बच्चों के मरने पर तो चुप रहना सीख ही गए है अब वो वक्त ज्यादा दूर नहीं लगता जब अपने बच्चें मरने पर भी आंसू आना बंद हो जाएंगे। आराम और जिंदगी किसे प्यारी नहीं है। वक्त रुकता नहीं है आगे बढ़ता रहता है। बच्चे के लिए रोना अगर जेल जाने का कारण बन सकता है तो हम नहीं रोयेंगे।
एक निजी कम्पनी ने सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई इसलिए बंद कर दी कि सरकार ने उस कम्पनी के बिल की पेमेंट नहीं की थी और इस अपराध के लिए डॉक्टर को जेल में डाल दिया गया। अभी तो भारत में निजी क्षेत्र ने पाँव पसारना शुरू ही किया है। अभी तो हमें रेलवे स्टेशन के बिकने पर आश्चर्य होता है। अभी एक अमेरिकन डॉक्यूमेंट्री फिल्म देख रहा था। मेरे अचरज की कोई सीमा नहीं रही जब पता लगा वहां जेल तक निजी कंपनियों के हाथ में है। जेल की सुरक्षा , जेल का खाना सब निजी कम्पनियाँ चलाती है। अगर जेल में एक कैदी भी कम हो जाता है तो उनके प्रॉफिट में कमी आ जाती है। वहाँ कैदियों की संख्या हर साल बढ़ती ही है। अभी तो हमें बहुत कुछ देख कर मरना है। प्राइवेट रेलवे स्टेशन की डायनेमिक पार्किंग रेट से ही तौबा तौबा कर रहे है। क्या होगा जब चुप रहना भी काम नहीं आएगा। हमारे पैसे से चलने वाले जेल में हमारी ही जरूरत होगी क्योंकि कैदी बढ़ेंगे तभी तो प्रॉफिट बढ़ेगा। आज भी भारत की जेल में डाक्टर कफील जैसे जाने कितने बेगुनाह सजा काट रहे है। अमेरिका की जेलों में बंद नागरिकों में सबसे ज्यादा तादाद उन काले लोगों की ही है जिन पर इतिहास में गोरे लोगों ने बेइंतेहा जुल्म किये। इतिहास से और कोई सबक लेता हो न लेता हो शासक और शोषक वर्ग तो जरूर लेता है। वक़्त के साथ कैसे अपडेट होकर नए तरीके ईजाद कर लिए जाते है। और हर वक्त का सभ्य जहीन नागरिक चैन की नींद सोता है कि पुराने वक्त के लोग क्रूर थे अब तो सभ्य और नरम दिल लोगों का ज़माना है। अब की दुनिया में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करना चाहिए। शोषित दमित लोगों पर हिंसा , नफरत के नए नए तरीके ईजाद किये जाते है जिन पर सब की मौन सहमति रहती है। जब कभी प्रतिरोध का स्वर बुलंद होता है तो वही सभ्य और नरम दिल लोग का दिल कहने लगता है कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। ये कथन अपने आप में बहुत हिंसक है। गांव में दलितों पर अत्याचार होता है वो गांव छोड़ने पर मजबूर होते है। विरोध के लिए शहर आते है शांतिप्रिय लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करते है और प्रसाशन उन्हें लकड़ी चोरी के इल्जाम में जेल में डाल देता है और दो दो महीने फिर जमानत नहीं होती। उनका खाना बनाने के लिए लकड़ी जलाना भी जुर्म है। आगे से जब कभी भी किसी आंदोलन के लिए " हिंसा नहीं होनी चाहिए " का ख्याल दिल में आये तो मेरी इल्तजा है कि थोड़ा सा ध्यान इस बात पर भी कर लीजियेगा कि घर पर बैठकर खाना खाना सबको अच्छा लगता है। कोई सुबह से शाम तक धुप में पुलिस की लाठियां खाने शौक से नहीं जाता। ये सिस्टम शोषितो के लिए किस कदर क्रूर है इसका अहसास होना हर संवेदनशील इंसान के लिए बहुत जरुरी है। कोरेगांव हिंसा की एकमात्र गवाह 19 साल की लड़की की लाश मिली है। डॉक्टर कफील की गिरफ्तारी , कोरेगांव हिंसा की गवाह की ऐसे हत्या ये सब कोई सामान्य घटनाएं नहीं है। मेरी नहीं तो शायर की बात पर जरूर ध्यान दीजियेगा।


कुछ न कहने से भी छीन जाता है एजाज ऐ सुखन
जुल्म सहने से भी जालिम को मदद मिलती है

प्रगतिशीलता - मर्ज या दवा



प्रगति बहुत अच्छी चीज है प्रगतिशीलता भी बहुत अच्छी है। कम से कम दिखती अच्छी है। इसी भरम में आदमी एक पैर आगे बढ़ाता है दो पीछे करता है। और उस एक पैर आगे बढ़ाने का अहसान बाकी जिंदगी जताता रहता है। सुना है कुत्ते ने आदमी से बहुत कुछ सीखा है। शायद ट्रैन के साथ भागते रहने पर ट्रैन को चलाने का भरम भी उसने इंसानो से ही सीखा हो कई बार दिल करता है काश कुत्तों की भाषा सीख पाता तो उनके विचार जान पाता कि उन्हें कैसा लगता है जब ट्रैन उनके भागने की कद्र किये बगैर आगे चली जाती है। क्या उन्हें ट्रैन से ये गिला होता है कि ट्रैन को उनके लिए रुकना चाहिए था। जब वो आराम करके दोबारा भागने की हालत में होते तो फिर दोबारा चलना चाहिए था। मानवता तो यही कहती है। इंसानियत का यही तकाजा है। पर उनसे बात करना तो सम्भव नहीं है पर फिर भी कुत्तों का जज्बा काबिले तारीफ है वो हर ट्रैन के पीछे भागते है। थकते है। रुकते है फिर दूसरी ट्रैन के पीछे भागते है पर रहते अपनी उसी एक डेढ़ किलोमीटर के दायरे में है। क्या उन्हें कभी ये ख्याल नहीं आता कि यार ट्रैन के साथ साथ भागने की बजाय ये अच्छा नहीं है कि ट्रैन में चढ़ ही लिया जाए फिर काफी चीजें आसान हो जाएंगी। पर फिर उसमें भी अनिश्चिता का खतरा है। ट्रैन जाने कहाँ कहाँ किस रास्ते पर लेकर जाए। आगे क्या मिले क्या पता। यहाँ तो पता है एक डेढ़ किलोमीटर तक सब रास्ता देखा भाला है। शायद उन्हें भी लगता होगा कि इतनी प्रगतिशीलता ही ठीक है।


अधिकतर को लगता है कि किसी एग्जाम की तरह , किसी डिग्री की तरह एक बार थोड़ी से मेहनत कर के प्रगतिशील बना जा सकता है। डिग्री का तो ऐसा है कि आज के वक्त खरीदी भी जा सकती है। पैसे में बल होता है। जब आपके पास पैसा है तो उस पैसे का क्या फायदा अगर आप डिग्री ही न खरीद सको। नाम के आगे डॉक्टर लग गया तो क्या फर्क पड़ता है आप काहे के डॉक्टर है। पर प्रगतिशीलता मुंह चिढ़ाती है। आप जब कोई प्रगतिशीलता के पास पास जाता हो तो पता चलता है ये कोई एक दो दिन या महीने का काम नहीं है ये तो जिंदगी भर का टंटा मोल ले लिया। हर रोज की मेहनत। फिर मेहनत जवाब दे जाती है तो प्रगतिशीलता ताने मारने के काम आती है। बहुत से लोग तो इस अहसान में ही जिंदगी बिता देते है कि हम भी कभी प्रगतिशील थे। मैं तो कहता हूँ कि किसी की मेहनत जाया नहीं जानी चाहिए। मैं तो ये भी कहता हूँ कि एक प्रगतिशीलता की भी शील्ड हर साल ,ओह साल बहुत बड़ा होता है, हर महीने हर दिन के हिसाब से देते रहना चाहिए। अमुक आदमी १ दिसंबर 2012 से लेकर 16 मई 2014 तक प्रगतिशील था इसके लिए समस्त प्रगतिशील समाज इनक ऋणी रहेगा। वो तो बुरा हो मोदी सरकार का वरना अमुक आदमी आगे भी प्रगतिशील रह सकता था। पर कोई नहीं जब तक जितना प्रगतिशील रहा वो भी अच्छा ही था।

या अमुक आदमी फलानि नौकरी मिलने तक प्रगतिशील रहा इसके लिए हम उस भाई के अहसान मंद रहेंगे ।

या अमुक आदमी अपनी शादी तक बहुत प्रगतिशील रहा शादी से दहेज़ तक अल्पकाल तक प्रगतिशीलता रुकावट पर रही जिसके लिए खेद है। अब भी होली दीवाली और शादी ब्याह को छोड़कर अमुक आदमी हमेशा प्रगतिशीलता का साथ देता है जिसके लिए हम इसका तहे दिल से अहसान मंद है।


उस शील्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में ये शेर लिखवा दिया जाए


अहसान इस दिल पर तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

विद रिगार्ड्स
प्रगतिशीलता।

ऐसा करने से सम्भव है कि सांत्वना पुरस्कार मिलने पर वो लोग अप्रगतिशील होने पर प्रगतिशीलता को गाली कम निकाले। अब गुस्सा जायज बनता है जितने दिन मेहनत से काम किया उसका तो एक आना मिला नहीं अब ये पूछ रहे हो कि भाई जान ये क्या हुआ। एकाएक जापान जाते जाते चीन कैसे पहुँच गए ? जिंदगी बड़ी होती है सारी जिंदगी का ठेका थोड़ी ले रखा है। पीछे ही पड़ गए। सैडिस्टिक लोग। दुसरो को चोट पहुंचा कर मजा आता है। हम अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए। ये एक अलग श्रेणी के लोग है जो कभी भी ' इतने प्रगतिशील " नहीं हो पाते। इनसे कोई पूछने का कष्ट करे कि भाई "इतने प्रगतिशील " बनने में कितने जन्म लगेंगे। मतलब दिक्क्त क्या है ? कोई प्रगतिशीलता के रास्ते में बड़ा पत्थर पड़ा हुआ तो हमें बताये हम कोशिश करे उसे हटाने की। इन लोगों के लिए अलग से सर्टिफिकेट जारी किये जा सकते है। जैसे कानून की किताबों में लिखा जाता है ' इसके अलावा ' कुछ नमूने इन सर्टिफिकेट के मैं आपके सामने रख सकता हूँ

- अमुक आदमी हर चीज में प्रगतिशील है सम लैंगिक , थर्ड जेंडर और ट्रांसजेंडर के बाबत राय को छोड़कर। इस मामले में ये भी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है अभी कोई उम्मीद भी नहीं है पर जैसे हर आदमी हर काम नहीं कर सकता ऐसे ही एक आदमी हर मसले पर प्रगतिशील नहीं हो सकता। ये मुद्दे उन्होंने हायर लेवल के प्रगतिशीलों के लिए छोड़ रखे है बाकी और इनकी प्रगतिशीलता में कोई कमी नहीं है।
-अमुक आदमी की प्रगतिशीलता बहुत काबिले तारीफ है अध्यात्म को छोड़कर। इस मामले में अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है
- अमुक आदमी बहुत प्रगतिशील है अपनी जाति के मसले के इलावा । जाति के मामले में ये अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि जाति पर गर्व क्यों बुरा है ये समझ आ सके। अपनी जाति में अपने बेटे बेटियों के रिश्ते क्यों नहीं ढूंढ़ने चाहिए ये बात इनके समझ नहीं आती बाकी सब में ये प्रगतिशील है।
-अमुक आदमी बहुत प्रगतिशील है गालियो पर समझ के इलावा। वहां ये इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि समझ आ सके कि शोषित जाति , सेक्स से सम्बंधित गालियां या मजाक क्यों असंवेदनशीलता बल्कि क्रूरता के दायरे में आता है।
ये कुछ सैम्पल है ऐसे हजारों नहीं तो सैंकड़ो नमूने मिल सकते है जिन्हे हम उपरोक्त नमूनों की नकल कर प्रगतिशीलता का सर्टिफिकेट दिया जा सकता है। अभी तो बहुत तरह के प्रगतिशील बचे हुए है। तुम्हें शायद यकीन न हो आज भी इस देश में ऐसे प्रगतिशील बचे हुए है जो सरे आम ये कहने कि हिम्मत रखते है कि मैं जातिवाद को नहीं मानता। मैं तो शेड्यूल कास्ट के लोगों के साथ पानी भी पी लेता हूँ। खाना भी खा लेता हूँ। अब क्या इस प्रगतिशीलता के लिए उन्हें बहादुरी अवार्ड नहीं मिलना चाहिए। मुझे अपनी इसी छोटी सी जिन्दगी में ऐसे भी प्रगतिशील मिले है जो कहते है कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनकी होने वाली पत्नी की पिछली जिंदगी में कितने अफेयर थे। अहा देखिये प्रगतिशील प्रगतिशीलता के लिए कितना बड़ा त्याग , कितना बड़ा अहसान कर रहा है । इनको तो नोबल भी मिल जाए तो थोड़ा है। एक अंडरस्टुड बात को बोलने का मतलब स्तूपिडिटी और कुंठा होती है पर ये अभी इतने प्रगतिशील नहीं हुए है कि ये बात समझ सके। शायद इस जिंदगी में हो भी न पाए। आज तक हमारा प्रगतिशील युवा वर्जिनिटी पर अटका हुआ है। कभी गर्व करने लगता है। कभी अफ़सोस करने लगता है कभी अफ़सोस भरा गर्व करने लगता है। दिल में है प्रगतिशीलता दिमाग में है वर्जिनिटी।

ऐसा नहीं है कि लोग तरक्की नहीं करते। मुझे याद है मैं बरसों पहले जब मैं बच्चा था तो एक अंकल को मैंने कहते सुना था कि कैसे अपनी घर की बहु बेटियों से बाहर काम करा लेते है लोग। घर की लाज तो घर में ही रहनी चाहिए अगर इतना भी न कमा सको कि अपने घर की औरतो बच्चो को खिला सको तो चूड़ी पहन लेनी चाहिए। अभी हाल ही में वो अंकल मिले तो बड़े गर्व से कह रहे थे कि जी हम तो प्रगतिशील है हमारी तो बहु बेटियाँ बाहर जॉब करती है। वक्त लगता है पर प्रगतिशील बन जाते है लोग। बिलकुल उसी वक्त एक इससे विपरीत मामला भी मेरे सामने आया। उस जमाने में जब मैं बच्चा हुआ करता था एक अंकल की बीवी और बहन दोनों जॉब करती थी। उस जमाने में भी लोग प्रगतिशील हुआ करते थे। आज जब वो मिले तो बड़े शान से बता रहे थे कि खुदा की फजलों करम से उन्हें तो जमाई भी ऐसा मिला है जो उनकी बेटी से कहता है कि तू घर में आराम कर , काम के लिए मैं हूँ। हालाँकि बेटी एमबीए है पर जमाई की सोच कितनी अच्छी है कि बीवी की कमाई नहीं खानी । औरत घर में ही अच्छी लगती है। मैंने तो अपनी बहु से भी कह दिया है कि बेटा तू घर में आराम कर। बाहर जॉब वॉब के चक्कर में मत पड़ना। बेटा जब कमा ही रहा है। देखो हमारे घर में बहु और बेटियों में कोई फर्क नहीं होता।

खैर जितने तरह के प्रगतिशील उतनी तरह की उनकी बातें। उनकी बातें सुनकर अकबर इलाहाबादी का एक शेर याद आता है

क़द्रदानों की तबीयत का अजब रंग है आज

बुलबुलों को ये हसरत, कि वो उल्लू न हुए