Followers

Friday, 6 April 2018

जिस धज से कोई मकतल से गया वो शान सलामत रहती है


आदमी को गोली मार दी जाती है। फांसी पर लटका दिया जाता है। जहर का प्याला दे दिया जाता है। मौत का खौफ हमें सारी ज़िंदगी बोलने से रोकता है। मौत से भी ज्यादा शायद जीते जी प्रताड़ना का भय ज्यादा होता है। जिसके कारण अधिकतर लोग चुपचाप अपनी जिंदगी बशर कर लेते है। अन्याय
 जुल्म  की घिनौनी साजिशों से देश की अधिकतर आबादी बद से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है। बहुत से इसे ऊपर वाले की मर्जी मान लेते है। कुछ ज्यादा समझदार होते है वो इसे कर्म का लेखा मान लेते है यानी जो गरीब है वो नालायक है। जो अमीर है वो मेहनती है। अहा कितनी प्यारी थेओरी है। हींग लगे ना   फिटकरी रंग भी चौखा आये। अपने सारे प्राइविलेज और बदमाशियाँ को मेहनत का नाम दे दिया। अब सब सकून है। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हुए है जो अन्याय जुल्म शोषण के खिलाफ खड़े हुए। उन्हें कोई चीज सिर्फ इसलिए सही नहीं लगी कि वो सब कर रहे है। उन्होंने सबको अहसास करवाया कि भाई ग़लत बात सिर्फ इसलिए ही तो सही नहीं हो जाती कि उसे सब कर रहे है या उसे सब मान रहे है। एक भाई ने अपने आसपास वालों को बताया कि भाई लोगों ये धरती चपटी नहीं है गोल है और तो और गोल ही नहीं है ये घूमती भी है। आज भले ही ये बात पूरी दुनिया में बच्चा बच्चा मानता हो , पर उस वक्त सब ये मानते थे कि दुनिया चपटी है और सूरज धरती के चक्कर लगाता है सब की जिंदगी मजे में चल रही थी। उस भाई को जान से मार दिया गया।  बहुत साल बाद मारने वालों ने माफ़ी भी मांग ली। ग़लती हो जाती है।  भारत देश में एक मोहनदास करम चंद गांधी था।  एक भाई ने उन्हें गोली मार दी। आज गोली मारने वाले भाई के मंदिर बन रहे हैं । मोहनदास ने भारत देश की आजादी के लिए कांग्रेस पार्टी को मजबूत किया। भारत को आजादी मिली। कांग्रेस पार्टी को राज गद्दी मिली। उसी आजाद भारत में सफदर हाश्मी का जन्म हुआ । गाँधी के जाने के बाद जो कांग्रेस बची  उस कांग्रेस के गुंडों ने सफदर हाश्मी की उस वक्त गोली मार कर हत्या कर दी जब वो नुक्क्ड़ नाटक " हल्ला बोल " कर रहे थे।  दुनिया गोल है ये बात कितने तरीकों से हमें पता चलती है ये भी एक कमाल बात है।  मोहनदास  को गोडसे गोली मार देता है। और गाँधी जी के जाने के बाद जो कांग्रेस बचती है  उस  कांग्रेस के लोग सफदर हाशमी को गोली मर देते है। पर उनकी गोली से ना मोहनदास मरता है न सफदर हाश्मी मरता है।  वक़्त रुकता नहीं चलता रहता है। जहाँ जुल्म अन्याय शोषण असमानता के खिलाफ चुप्पी साधकर बल्कि शातिराना ढंग से उनके पक्ष में लिखकर फायदा उठाने वालों की भी कभी कमी नहीं रही तो जुल्म ,अन्याय के खिलाफ बोलने वाले  भी अपनी जान देते रहे हैं। समय समय पर ऐसे लोग हुए जिन्होंने ग़लत को ग़लत बताया। उस वक्त के लोगों को भले ही उनकी बात समझ नहीं आयी पर उनसे फर्क पड़ा।

अप्रैल 1968 को अमेरिका में मार्टिन लूथर जूनियर को उनके देश वालों ने ही गोली मार दी। उस भाई का गुनाह पता है  क्या था। वो सपना देखता था कि अमेरिका में रंग के आधार पर भेदभाव ख़त्म हो जाए। सब आपस में मिलजुलकर साथ रहे। बस में चढ़ते उतरते सीट पर बैठते वक्त किसी के रंग को न देखा जाए। स्कूल अस्पताल में नौकरियों में पार्कों में " ओनली फॉर व्हाइट " के बोर्ड न लगे हो। उसका सपना था अमेरिका राष्ट्र ने जो वादे उनसे किये थे वो एक दिन पूरे होंगे। जब दास प्रथा के शोषित और शोषकों की संतानें एक ही टेबल पर बैठकर खाना खाएंगी। उसका सपना था कि उसके बच्चे एक ऐसे राष्ट्र में सांस लें जहाँ कोई भी उन्हें उनके रंग के आधार पर जज न करे। क्या ये कोई बहुत बड़ा सपना था ?  पर वहां के गोर लोगों को ये बातें उस वक्त समझ ही नहीं आती थी। उन्होंने बाकायदा कानून बना रखा था कि बस में अगर कोई गोरा खड़ा है तो काले रंग के नागरिक को बैठने का अधिकार नहीं है उसे खड़ा होना पड़ेगा। एक दिन एक लड़की ने खड़ा होने से मना कर दिया। ये कैसा कानून है उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जुर्माना लगाया गया। मार्टिन लूथर किंग और उसके साथियों ने उस लड़की  के साथ मिलकर बस सर्विस का बॉयकॉट किया। महीनो बाद कोर्ट को समझ आया कि ये तो ग़लत है। उन्होंने बसों में से गोर काले नागरिकों की अलग अलग बैठने की व्यवस्था को गैर क़ानूनी करार दिया। शोषक वर्ग के लोगों को लगा कि उनके अधिकारों का हनन हो गया। उन्होंने अगले कुछ महीने खूब दंगे किये।  बस जला दी गोली मारने लगे। काले नागरिकों की चर्चों पर बम फेंक दिए। जिन गोरे  नागरिकों ने दिल से काले नागरिकों का साथ दिया उन्हें भी निशाना बनाया। 

आज अमेरिका में गोर कालों के लिए अलग अलग कानून नहीं है। लूथर की मौत के 50 साल बाद जिन बातों के लिए लूथर ने अपनी जान दी वो सब बातें नॉर्मल हो गयी है। आज उस बात के लिए वहां किसी को जान नहीं देनी पड़ती। जैसे आज धरती गोल है बताने के लिए किसी को जान से हाथ नहीं गंवाना पड़ता। इसका मतलब ये भी कतई नहीं है कि सब बराबर हो गया है। शोषण अन्याय के नए तरीके आ गए है जिन्हे आज के लोग नॉर्मल मानते है। जिनके खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल दिया जाता है। मार दिया जाता है। पर हालात पहले से अगर बेहतर है तो उसके लिए वो लोग जिम्मेदार है जिन्होंने मानवता इंसानियत के लिए संघर्ष किया। लड़े मरे। 

भारत महान की बात करे तो कुछ बात तो है इसकी कि इसकी हस्ती मिटती नहीं है। यहाँ काल का चक्र मोड़ने में ये कामयाब रहते है। माननीय सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि एस सी एस टी एक्ट का दुरूपयोग होता है। जो कानून दलितों के बचाव के लिए बनाया गया था। जिसके बन जाने के बाद भारत के खुद को उच्ची जाति के कहने वाले बीमार लोगों  को समझ आया था कि किसी की जाति को गाली की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।  इतने सालों में सिर्फ इतना सा हुआ था कि अब बीमार लोग गाली देते वक्त इधर उधर थोड़ा देखने लगे थे। उस एक्ट का दुरूपयोग हो रहा है तो उसे थोड़ा सा ढीला किया जाए।  कितने बुद्धिजीवी आज ये तर्क दे रहे है कि जाति आधारित गालियाँ बड़ी बात नहीं है। हर जाति का मजाक बनाया जाता है। नॉट ऐ बिग डील यू नो। कानून ग़लत था सुप्रीम कोर्ट ने ठीक किया। ऐसे ही मासूम लोग है जो कहते है हम स्त्री को नीचा दिखाने के लिए गालियाँ नहीं देते हम तो दोस्त को प्यार दिखाने के लिए गाली देते है। नॉट ऐ बिग डील यू नो। शोषक वर्ग हमेशा से इतना ही मासूम रहा है। इतना ही शांतिप्रिय रहा है। बहरहाल भारत के बीमार मर्द समय को उल्टा खींचने की कोशिश कर रहे है। कितना कामयाब होंगे नहीं पता। हो भी सकते है। दुनिया में असम्भव कुछ भी नहीं है 

कल मार्टिन लूथर जूनियर को दुनिया से अलविदा कहे 50 साल हो गए। अगले साल दो तारीख को सफदर हाशमी को 30 साल हो जायेंगे। दुनिया कितनी बेहतर बनी है कितनी नहीं ये सब हमारे सामने ही है। पर ऐसे लोगों के लिए फैज अहमद फैज का शेर ही याद आता है 


जिस धज से कोई मकतल  से गया वो शान सलामत रहती है 
ये जान तो आनी जानी है इस जान की कोई बात नहीं 




No comments:

Post a Comment