Followers

Tuesday, 3 April 2018

मिडल क्लास और अहिंसा परमो धर्म


दो दिन पहले शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब एक्ट को कमजोर करने के विरोध में भारत बंद का ऐलान हुआ। बहुत सालों बाद सड़कों पर विरोध दिखा। मैं सामान्यत नकारात्मक आदमी हूँ। हर चीज में मुझे नकारात्मकता पहले दिखती है पर उस दिन मेरा दिल जाने खुश हो गया। सड़को पर नारे लगाते लोगों को देख कर अच्छा लगा। अगले दिन अख़बार देखा तो लगा कि अपने हक़ के लिए खड़ा होना भारत में देश द्रोह कब का साबित हो चुका है। अख़बार में सिर्फ हिंसा और हिंसा की  खबर थी। ये खबर कहीं नहीं थी कि पूरे देश में कितने लोगों ने इस भारत बंद में हिस्सा लिया। दस पेज हिंसा की फोटुओं से भरे हुए थे। जो सुबह से शाम तक अपने घर से निकल कर सड़कों पर थे। क्या उन्होंने सारा दिन हिंसा की ? अगर नहीं तो सारा दिन उन्होंने क्या किया क्या कहा इसका कहीं जिक्र नहीं था। उस अख़बार को पढ़कर सारा मिडल क्लास व्यथित था। हाय रे हिंसा नहीं होनी चाहिए थी। उफ़ देश की सम्पति का नुकसान हो गया। जो लिबरल सवर्ण मिडल क्लास है वो इस तरह की दुहाई दे रहे थे। जो कोई मुखौटा ओढ़ने की जरुरत महसूस नहीं करते वो सीधे सीधे बोल रहे थे ये हमारी टट्टी मूत साफ करने वाले आज भारत बंद कर रहे है। इन्हे तो गोली मार देने चाहिए। सिर्फ हिंसा की तुलना की जाए तो सिर्फ उस एक दिन सवर्णो द्वारा जो मौखिक हिंसा शेड्यूल कास्ट के लिए हुयी है उसकी तुलना में भारत बंद के दौरान हुई हिंसा कहीं भी नहीं ठहरती। एक सवर्ण दोस्त की बात सुनी। वो कह रहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण बंद कर दिया तो इसमें आंदोलन करने का क्या है। सही बात का सम्मान करना चाहिए। आरक्षण की टीस कितनी अंदर तक है दलितों के लिए नफरत किस कदर है इसे महसूस करना इतना भी मुश्किल नहीं है जितना लिबरल हिन्दू समझता है। विरोध का कारण भी अफवाहों से सुनते है और फिर उस विरोध का गालियों के साथ विरोध करते है। ये भी कमाल भारत देश में ही सम्भव है कि सारा देश खुलकर दहेज़ लेता है और सारा देश दहेज़ के झूठे केस लगने के रोने रोता है  तमाम सवर्ण एस सी एस टी एक्ट के दुरूपयोग होने की बात करते है। और मैंने आज तक एक एक ऐसा सवर्ण नहीं देखा जिसके घर में शेड्यूल कास्ट की जातियों को गालियों की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाता हो। जो थोड़े बहुत समझदार अब हुए है उनकी भी इतनी हिम्मत नहीं है कि अपने माँ बाप को समझा सके कि ये ग़लत है। बावजूद इतने सख्त एक्ट के भी हर रोज मुझे ये कहीं न कहीं सुनने को मिल जाता है कोई माँ अपने बच्चे को कह रही होती है क्या शेड्यूल कास्ट के बच्चो की तरह बाल बनाये हुए हैं। कोई दोस्त अपने दोस्त को कहता हुआ मिल जाता है कि क्या शेड्यूल कास्ट की तरह मूर्खता कर रहा है। किसी एक को भी टोकने का मतलब है मानसिक उत्पीडना। जब सब लोग आज भी ये सब कर रहे है तो दुरूपयोग का सवाल कहाँ खड़ा हुआ। अगर लोग दहेज़ लेना बंद कर दे। गालियाँ देनी बंद कर दे तो एक्ट अपने आप ही ख़त्म हो जाना है। पर ऐसा करने से किडनी फेल होने का डर रहता है।  खैर बात हिंसा की हो रही थी तो मुझे एक अंग्रेजी फिल्म का क्लाईमेक्स याद आ रहा था सोचा उस क्लाइमेक्स को हिंदी में अनुवाद कर दिया जाए शायद लोगों को समझने में कुछ मदद मिले। एक डिबेट सीन है जिसमें एक टीम में काले खिलाडी हैं दूसरी में गोरे हैं। हम इसे शोषक बनाम शोषित टीम कह सकते है उनके तर्क भी उसी के अनुसार समझे जा सकते है  डिबेट का विषय है 

सिविल डिसओबिडियन्स यानी सविनय अवज्ञा आंदोलन कितना नैतिक कितना अनैतिक।  सविनय अवज्ञा आंदोलन यानी किसी कानून की  शांतिप्रिय अवेहलना।  अश्वेत खिलाडियों की टीम मानती है कि ये नैतिक है जब की श्वेत खिलाड़ियों की टीम इसे अनैतिक मानती है। उनके बीच हुए तर्क मैं अपनी काबिलियत के अनुसार हिंदी में अनुवाद कर के यहाँ लिख रहा हूँ। 



शोषक टीम - डेमोक्रेसी की सुंदरता और भार यही है कि कोई भी आइडिया बिना बहुमत के टिक नहीं सकता। जनता तय करती है क्या सही क्या नहीं कोई एक  इंसान नहीं। 

शोषित टीम - बहुमत ये तय नहीं कर सकता   कि क्या ग़लत है और क्या सही , खुद का जमीर तय करता है तो एक नागरिक को किसी कानून के आगे अपने जमीर का आत्म समर्पण क्यों कर देना चाहिए ? नहीं हमें संख्या के आगे अपने घुटने बिलकुल नहीं टेकने चाहिए। 

शोषक टीम - हम ये तय नहीं कर सकते कि कौन से कानून को मानना है और किस की अवेहलना करनी है। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मैं तो कभी रेड लाइट पर नहीं रुकुंगा। मेरे पापा उन इंसानो में से एक हैं जो हमारे और अराजकता के बीच में खड़े होते है। मेरे पापा एक पुलिस अफसर है। मुझे वो दिन याद है जब मेरे पापा के सबसे करीबी दोस्त उनके ड्यूटी पार्टनर को अपना फर्ज निभाने के कारण गोली मार दी गयी थी। मुझे उस दिन मेरे पापा का चेहरा आज तक याद है। कुछ भी , कुछ भी जो कानून के नियम को तोड़ता हो वो नैतिक नहीं हो सकता चाहे आप उसे कोई भी नाम दे ले 

( खूब तालियों की आवाज )

शोषित टीम - टेक्सास में , वो नीग्रोज  को लिंच करते है।  मैंने और मेरे साथियों ने एक आदमी को देखा जिसकी गर्दन रस्सी से बंधी हुई थी और नीचे आग लगी थी। हमने अपनी कार लिंचिंग करने वाली भीड़ में से निकाली। हमने अपने मुंह छुपा लिए। मैंने अपने साथियों की तरफ देखा। उनकी आँखों में डर देखा और उससे भी बदतर शर्म , ग्लानि देखी। उस नीग्रो का गुनाह क्या था कि  उसे घने जंगलों में बिना किसी ट्रायल के  फांसी दी जाए ? क्या वो चोर था या हत्यारा था ? या सिर्फ नीग्रो होना ही उसका गुनाह था ? क्या वो किराये की जमीन पर काम करने वाला किसान था ? क्या कोई उपदेशक था ? क्या उसके बच्चे उसका घर में इंतजार कर रहे थे ? और हम कौन है जिन्होंने उसको बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया बस अपना मुंह छुपा लिया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता उस आदमी ने क्या किया होगा वो भीड़ अपराधी थी। पर कानून ने  कुछ नहीं किया। क्यों ? विरोधी दल के मेरे साथी कहते है कि कानून के नियम की अवेहलना किसी भी तरह  से नैतिक नहीं हो सकती। पर वहां जिम क्रो साउथ में कोई कानून नहीं है। 

जब नीग्रो को घर देने से मना कर दिया जाता है 
उन्हें स्कूल अस्पताल में जाने से रोक दिया जाता है 
जब उन्हें लिंच कर दिया जाता है 

तो कोई कानून उनकी रक्षा के लिए नहीं आता। 

संत अगस्तीन ने कहा था 

"
An unjust law is no law at all ."

जिसका मतलब ये न केवल मेरा अधिकार है बल्कि मेरा फर्ज बनता है कि मैं अन्याय के खिलाफ विरोध करू हिंसा के साथ या सविनय अवज्ञा के साथ 


आपको प्राथना करनी चाहिए कि मैं आखिरी वाला ऑप्शन चुनूँ। 

(तालियों की गड़गड़ाहट )

फिल्म का नाम "द ग्रेट डिबेटर्स" है हो सके तो देखिएगा और " किसी भी हिंसा का समर्थन न करने जैसी बचकाना और मूर्खता भरी बात करने से गुरेज कीजिये। आपकी या मेरी औकात नहीं है कि हम हिंसा का समर्थन न करे। इस देश का हथियारों का बजट पता कीजिये। जो डंडे और बन्दुक पुलिस के हाथ में होते है वो अहिंसा के लिए  तो नहीं ही होते होंगे। किसी भी तरह की अहिंसा की बात करोगे तो फांसी से लेकर जेल तक सब आ जाएगा। हमारे घर की दीवार की ईंट से लेकर हमारे रसोई के अनाज तक सब हिंसा की पैदाइश है। हो सके तो कभी भट्टा मजदूरों की जिंदगी देख कर आइयेगा। जिनके श्रम के शोषण से आपके घर की ईंटों का निर्माण हुआ है।हिंसा और अहिंसा से बड़ी बेवकूफी की बात कोई नहीं हो सकती। हर वो कार्य "अहिंसक या हिंसक " जो जुल्म की , जालिम की , अन्याय की परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन करता है वो मुर्दाबाद है और हर वो काम जो अन्याय , जुल्म का विरोध करता है वो जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा।


1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन एक प्रत्याशी, एक सीट, एक बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    ReplyDelete