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Thursday, 26 April 2018

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से वीरे की वेडिंग तक - गालियों का प्रभाव

               
कल  रात को मैंने जासूसी करने के लिए फेसबुक खोला तो मुझे वीरे दी वेडिंग का पता चला। फेसबुक स्वरा भास्कर की इस बात पर बुराई हो रही है कि जिस फिल्म में वो काम कर रही है उसमें इतनी गालियाँ है। मैं फेसबुक को डिएक्टिवेट करके दोबारा एक्टिव कर के देखा तो सच में स्वरा भास्कर की फिल्म में गालियों के लिए आलोचना हो रही थी। ये सच में ख़ुशी और आश्चर्य की बात थी आई एम् प्लीजेंटली सरप्राइज्ड।  फेसबुक पर , सोशल मिडिया पर गालियाँ देना एक कूल बात मानी जाती रही है। कुछ संवेदनशील लोग  गाली पर टोकने पर अपनी फजीहत करवाते रहे है फिर भी बाज नहीं आते। त एक के टोकने से क्या हो जाना है। जब बड़े बड़े तुर्रम खान गालियों वाली पोस्ट डालते है लव करते है शेयर करते है। पर आज अहसास हुआ हर बात का असर होता है। धीरे धीरे ही सही इतना धीरे कि शायद किसी को अहसास नहीं होता। आज फेसबुक पर गालियों वाली फिल्म की आलोचना हो रही है उसकी अभिनेत्री की भी आलोचना हो रही है। ये हौंसला बढ़ाने वाली बात है। अभी ज्यादा पुरानी बात तो नहीं है जब कूल लिबरल लोग , वो कौन सा यूट्यूब चैनल है जिसका नाम भी याद न आ रहा गंदा सा नाम है कोई  जिसके प्रोग्राम में दीपिका से लेकर जौहर तक रेसिस्ट और सेक्सिस्ट जोक्स पर खी खी कर रहे थे , के लिए "फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेसन " का झंडा उठाये हुए थे। छोटे छोटे प्रतिरोध से चीजे बदलती है। आज से 6 साल पहले अनुराग कश्यप की ' गैंग्स ऑफ़ वासेपुर " को कूल ड्यूड कल्ट का दर्जा दिए फिरते थे। उसे औसत से कम के डायलॉग को डायलॉग ऑफ़ द मिलेनियम बनाया हुआ था क्यूँकि उसके बीच में एक गाली थी जिसे अभिनेता ने पूरा जोर लगाकर कहा हुआ था। आज वही अनुराग कश्यप बनारस की पृष्टभूमि पर मुक्केबाज बनाता है बिना गालियों के। गालियां अब उतनी कूल नहीं रही।


अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है मेरी एक दोस्त ने अपनी फेसबुक वाल पर गाली लिखी हुई थी। मैं उसे ये समझाने में नाकाम रहा था कि लड़की को गाली क्यों नहीं देनी चाहिए ? मैं कैसे समझाता कि जो सवाल ही ग़लत हो उसका जवाब कैसे दिया जाए। लड़की या लड़का गाली किसी को नहीं देनी चाहिए। कंडीशनिंग है गाली देने की। उस कंडिशनिंग को मेहनत से बदला जा सकता है। कम से कम लिखते वक्त तो हमारे पास बहुत समय रहता है सोचने का। तब कितने ही प्रगतिशील लोग इस अकाट्य तर्क पर अटके हुए थे कि लड़की की वजह से गाली देने पर टोका जा रहा है। वक्त भले लगा पर आज ये बात समझ आ रही है कि लड़का या लड़की से फर्क नहीं पड़ता, गाली नहीं देनी चाहिए। गाली को फ्रस्ट्रेशन निकालने  या पाद मारने जैसा मानने  वालो को भी
नयी फिल्म का ट्रेलर फूहड़ लग रहा है।

स्वरा पर जो सवाल उठ रहे है सब बेहद जायज सवाल है पदमावत से जो ग़लत सन्देश जा रहा था वीरे दी वेडिंग से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जा रहा है। और फेसबुक पोस्ट पर गाली लिखने से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जाता। उसे लव लाइक शेयर करने से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जाता ऐसी पोस्ट को इग्नोर करने से भी अच्छा सन्देश नहीं जाता। ये सारी एक जैसी बातें है। आप सुविधा के किस कोने में रहना चाहते है ये आपको तय करना है। स्वरा की जो स्पष्ट और सीधी  आलोचना हुई है उसके बाद मुझे नहीं लगता कोई फेसबुक पर गाली लिखेगा या उसे शेयर करेगा या उसके लिए कुतर्क करेगा।

स्वरा ने जो पोस्ट की वो पब्लिसिटी के लिए की बहुत सम्भव है कि पदमावत की ही पब्लिसिट के लिए लिखी हो। पदमावत की पब्लिसिटी के लिए तो ॐ थानवी से लेकर सब बड़े बड़े लोगों ने झंडा उठाया हुआ था मुझे नहीं लगता कोई ऐसा बचा होगा जिसने पदमावत की पब्लिसिटी न की हो। ओम थानवी साहब तो वो फिल्म देखने के लिए दूसरे शहर भी जाने को तैयार थे। पर खुद की पब्लिसिटी का तर्क मुझे निजी तौर पर लगता है कि दरकिनार कर देना चाहिए वरना सोशल मिडिया पर कहने सुनने को कुछ बचेगा नहीं। हर इंसान इसीलिए तो लिख रहा है कि वाहवाही मिले लाइक मिले। मुझे तो आजतक ऐसा कोई न मिला जो कहता हो कि मैं फेसबुक पर जूते खाने के लिए लिखता हूँ। इससे ज्यादा बचकाना तर्क दूसरा नहीं हो सकता। चलो स्वरा ने हवा के साथ बहकर वो खत लिख दिया।  उसे पब्लिसिटी मिल गयी सॉरी चीप पब्लिसिटी मिल गयी।  अब गालियों वाली फिल्म भी कर रही है इसके लिए भी उसके पास तर्क होगा कि पैसे के लिए हर कोई कुछ न कुछ कर ही रहा है। तू बड़ा कॉमरेड बना फिरता है सुबह होते ही पूंजीपतियों की बही मिलाने बैठ जाता है। आज के दौर में कूतर्को की कमी थोड़ी है। एक ऐसा भी कमेंट देखने को मिला कि इससे सब अदाकारों को सबक मिलेगा कि वो जनहित के मामलों में बोलने से पहले सौ बार सोचेंगे और अपनी जुबान बंद रखेंगे। कोई शक नहीं है 99 फीसदी अपनी जुबान बंद ही रखते है। जुबान बंद रखने वाले यानी बोलने वाले से बेहतर हो गए ? हमें जो चाहिए वो चिरस्थायी चाहिए। हम ये नहीं कह सकते कि उस वक्त स्वरा का स्टैंड ठीक था आज उसमें विचलन आया है इसकी स्वरा से उम्मीद नहीं थी  पर आज के दौर में विचलन इतना आश्चर्य करने लायक बात तो नहीं ही है। सुबह हम हनी सिंह को गालियों के लिए आलोचना करने वाली पोस्ट लिखते है शाम को शादी में उन गानो पर डांस करते है उसे लाइव करते है। हमारे फोन में ये गाने स्टोर होते है। कमाल नहीं है ? बहुत सम्भव है कितने ही लोगों ने स्वरा की आलोचना वाली पोस्ट के तुरंत पहले या बाद में कोई गाली वाली पोस्ट पर दिल दिया हो। एक अपने लालनटोप वाले भाई लोग है वो सबसे मस्त लोग है वो बाकायदा उन लोगों को ट्रोल करते है जो फेसबुक गाली देने का विरोध करते है उन्हें ये कूल लगता है उन्हें ये भी लगता है कि वो अगले आदमी के मजे ले रहे है। हाउ क्यूट न। जब तक वो लोग न मिले थे मेरा मासूमियत पर से विश्वास उठने लगा था। मेरे एक दोस्त ने एक भाई की पोस्ट पर कमेंट कर दिया कि भाई गाली मत दे ये नारीविरोधी है। उस घटना के तीन महीने बाद भी किसी अलाने फलाने की पोस्ट टैग कर कर और फिर आपस में गन्दी गालियों में बात कर के उसे चिढ़ाने की कोशिश करते है। कितने मासूम लोग है।  उस दिन मुझे लल्तनतोप वाले अपने भाइयो पर दया आयी एक दूसरे को कीचड़ में लोट पॉट कर दूर खड़े साफ़ आदमी का मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहे कि देख हम तो कीचड़ में वो साफ़। उन्हें भी एक दिन अहसास होगा कि कीचड़ में इतने मजे है नहीं जितने साफ़ रहने में है।

चीजे प्रतिरोध से बदलती है। प्रतिरोध होना चाहिए

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