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Wednesday, 25 April 2018

हम और हमारे पूर्वाग्रह



एक भाई ने ओला कैब मंगवाई ड्राइवर मुसलमान निकलने पर कैब कैंसिल कर दी। इस बहादुरी के अफ़साने को उसने पोस्ट भी किया। अब जिस फोन से उसने कैब पोस्ट की जिस फेसबुक पर उसने ये पोस्ट किया जाहिर है उसने सब जगह चेक कर लिया होगा कि कहीं पर भी मुसलमान काम नहीं कर रहा होगा। वरना जिस कदर का हिन्दू स्वाभिमानी मूर्खता उसने कैब के साथ दिखाई है उससे तो बहुत सम्भव है वो अपनी बाइक की टंकी में पेट्रोल की जगह गाय का मूत भरवा ले। ये भी सम्भव है कि अभी फिरंगियों वाले इंटरनेट को छोड़ वो अपने महाभारत काल वाला इंटरनेट इस्तेमाल करने लग जाए।पर ये सुविधा की मूर्खता है। सुविधा की सिर्फ क्रांति ही नहीं होती , सुविधा की मूर्खता भी होती है। आप उतनी ही मूर्खता करते हो जितनी अफोर्ड कर सकते हो। जो देश में टोपी पहनने से मना कर देते है वो विदेश में जाकर माथा टेक आते है। पर यहाँ मूर्खता वाला मसला नहीं है यहाँ फायदे , शातिरता वाला मामला है। अभी बात मूर्खता पर ही रहने देते है। ये कोई पहली बार नहीं है जब इस तरह की बात सुनी हो। एक बार मेरा एक दोस्त कह रहा था कि वो मुसलमान से सब्जी नहीं लेता। ये बात दीगर है कि उसका पसंदीदा खिलाडी इरफ़ान पठान था। सलमान खान की वांटेड वो तीन बार देख कर आया था पर मुसलमान से सब्जी नहीं खरीदता। मूर्खता घृणा नफरत इन सब पर अधिकतर बार सुविधा भारी पड़ती है। हर रोज इंसान को दुनिया भर की दुविधाओ से गुजरना पड़ता था। सब्जी ले या नाम पूछे। कैब ले ये न ले। बस में पास कौन बैठ गया। बताओ एक छोटे से बंद दिमाग़ के लिए कितनी परेशानियाँ है दिन भर में।



बचपन में हमारे अंदर दुनिया भर के पूर्वाग्रह भर दिए जाते है जो हमारे लिए अटल सत्य रहते है। उसके बाद बाकी तर्क वितर्क उन्ही पूर्वाग्रहों के आस पास रहते है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके बाद आपने क्या पढ़ाई की डॉक्टर बन गए आप शायर बन गए आप पत्रकार बन गए लेखक बन गए फिल्मकार बन गए भारत में तो अपवादों की बात छोड़ दे तो आप मुर्ख एक बाद बन गए तो बन गए बाद में क्या बने इससे फर्क नहीं पड़ता। खाने को लेकर तो ये हाल है कि एक उत्तरभारत का शाकाहारी किसी नॉन वेजेटेरियन को खाना खाते हुए नहीं देख सकता। दुसरो के खाने को देख इन्हे उलटी आती है। इतनी घृणा लेकर ये प्यार महोब्बत और मासूमियत की बात करते है। चमड़े के जूते पहनते है , चमड़े की बेल्ट पहनते है घर में हजार तरह की चीजे इस्तेमाल होती है जिसमें जानवर के मीट या खाल का इस्तेमाल होता है। पर घर में नॉन वेज नहीं बन सकता। इसलिए नहीं कि आपको जानवरों से प्यार है गाय से लेकर आवारा कुत्तो तक की जो हालत हमारे यहाँ है वो तो हम सब देखते ही है। घर में नॉन वेज इसलिए नहीं बन सकता क्यूंकि हम सब बीमार लोग है और बायडिफाल्ट तानाशाह है। हम नहीं खाएंगे तो कोई भी क्यों खायेगा ? ये बीमारी हम अगली पीढ़ी को ट्रांसफर कर जाते है। बीमारी को हमने सिद्धांत बना लिया है। उस सिद्धांत को अटल सत्य मान लिया है। पर ये सिद्धांत टूट जाता है जब हम बाहर जाते है विदेश में जाते है। तो नॉन वेज भले ही न खाये पर साथ खाने वाले को नहीं रोक पाते। वहां दिमाग का ढक्क्न खुलता है कि नॉन वेज सिर्फ मुसलमान ही नहीं खाते सारी दुनिया खाती है। वहाँ आप कुलीग के साथ बैठकर खाना भी खाते है। बहुत सम्भव है वो घर आये तो नॉन वेज ऑर्डर भी कर दे। पर जहाँ हजारों बीमार लोग एक साथ ही रहते हो तो उन्हें तो शायद ही कभी अपनी बीमारी का अहसास हो पाये। आपने अपने पडोसी से डिस्कसन किया पडोसी ने पडोसी के साथ डिस्कसन किया सब पड़ोसियों ने एक साथ डिस्कसन किया और जजमेंट दे दिया कि मुसलमान सात बच्चे पैदा करते है। पूर्वाग्रहित इंसान अपने जजमेंट के लिए जितना आश्वस्त होता है उतना और किसी के लिए मुमकिन नहीं होता। अभी पिछले महीने की बात है दो दोस्तों से तकरीबन 8 साल के बाद मिला। एक ने बच्चो के बारे में पूछ लिया तो मैंने कहा कि दो है एक लड़का एक लड़की। तो दूसरे ने कहा कि अपने हिन्दुओ में तो इतने ही बच्चे होते है ये कोई मुसलमान थोड़ी है कि सात - सात बच्चे हो। अब इस बात का क्या जवाब दूँ। छह साल की शादी में 7 बच्चे तो शायद किसी भी धर्म वालों के लिए सम्भव न हो। फिर मेरे पापा 7 भाई बहन है। चार मामा और एक मौसी को मिलाकर मेरी मम्मी के यहाँ भी 6 भाई बहन है। कमाल की बात ये है कि जिस भाई ने ये बात की वो मुझसे पहले वाली पीढ़ी की आखिरी संतान है उसके खुद के पांच या छह भाई बहन है बहुत सम्भव है उसने जिंदगी में मुसलमान देखा भी न हो। वो अपने जजमेंट के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त था उसमे कही किसी बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसी तरह की एक बहस में एक दोस्त ने पूरे जोश से लबरेज होकर तर्क दिया था कि मुसलमान जहाँ जाते है वहां मस्जिद बना लेते है।उसे लगता था कि मस्जिद कोई बुरी चीज है वहां आतंकवादी रहते है।



"मुंबई मेरी जान " में केके अपनी तरफ से पूरी तरह से जांच पड़ताल कर के आश्वस्त हो जाता है कि एक मुसलमान लड़का जो चाय की दुकान पर आता था वो मुंबई लोकल ट्रैन बम विस्फोट करने वालों में शामिल है। जबकि असल में तो वो शिरडी गया हुआ होता है। जब आप पूर्वाग्रह के साथ जजमेंट करने बैठते हो तो फैसला तो पहले ही आ चुका होता है। पूर्वाग्रह पर बहुत फ़िल्में बनी है एक से बढ़कर एक। 12 एंग्री मैन सबसे बेहतर है। हम जो सोचते है समझते है जिसे पत्थर की लकीर मानते है वो एक रेत का बनाया हुआ घर निकलता है। अब जहाँ लोग मुसलमान होने पर ओला कैब कैंसिल कर देने जैसी पोस्ट कर देते है वहां धर्म देखकर बलात्कार करना कौन सी बड़ी बात है। बहन के प्रेमी को देखकर उसकी हत्या कर देना कौन सी बड़ी बात है।



अब सवाल ये है इसका समाधान क्या हो। माचिस की तीलियों की तरह हम सब लोग आगे बारूद लगाकर एक डिब्बी में बंद कर दिए है। वो जब चाहते है तीली जला लेते है खाली तीली को फेंक देते है बाकियों को फिर डिब्बी में बंद कर देते है। समाधान तो प्रयास ही है जिस लेवल पर भी हो सके। हम अपने पूर्वाग्रह दूर करे। लाइफ इज ब्यूटीफुल में एक सीन है जब जोशुआ अपने पिता से पूछता है कि इस दूकान में यहूदी और कुत्तो का अंदर आना क्यों मना है। तो पिता हंस कर कहता है कि हम भी अपनी दूकान पर बोर्ड लगा लेंगे कि स्पाइडर और बुरे लोगो का अंदर आना मना है। यही कर सकते है कि बच्चो को इन पूर्वाग्रहों से दूर रखने की कोशिश करे। बजाय किसी कॉम्यूनिटी के लिए जहर रख कर पूरी कम्युनिटी का बॉयकॉट करने के , कहीं बेहतर है उन लोगों को बॉयकॉट करे जो ये जहर फैलाते है भले ही वो किसी कम्युनिटी के हो। हालाँकि ये जरा मुश्किल काम है खासकर जब तब जब ऐसे लोग भास्कर के सम्पादक हो या कोई फेमस कवि हो या कोई जाना माना लेखक हो। कोई कवि , लेखक ओपन प्लेटफॉर्म पर नारी विरोधी पोस्ट लिखता है। पता नहीं क्या क्या अनाप शनाप बोलता है आप उसे क्रांतिकारी कहकर उसके साथ फोटो खिंचवाते हो तो आपकी बातों के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। जब सबको पता है कि हमारा समाज बलात्कारियों के लिए , जहर फ़ैलाने वालो के लिए , छोटे मासूम बच्चो के कातिलों के लिए कितना सहिष्णु है तो क्यों जहर रुकेगा क्यों बलात्कार रुकेंगे क्यों मासूमों की हत्याए रुकेगी। इस बात में तो कोई दोराय नहीं है कि हम हद के दोगले इंसान है। अपने अंदर की कमजोरियों को फेंसी नाम देकर खुश हो लेते है कभी भी कोई गंभीर कोशिश नहीं करते उन कमजोरियों को हटाने की। क्योंकि उन कमजोरियों से हमें कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है। वो गाली मुसलमानो को दे रहा है वो गाली दलितों को दे रहा है वो गाली औरतो को दे रहा है पर यार इस वजह से वो ग़लत नहीं हो जाता। हर इंसान में कमियाँ होती है। कविता कितनी अच्छी करता है। डीजे पर हनी सिंह बज रहा है बच्चो की ख़ुशी है यार बच्चो के लिए तानाशाह थोड़ी बन सकते है अरे डेमोक्रेट इंसान तू खुद तो नाचने से बाज आ सकता है। उसकी विडिओ तो उपडेट करने से बाज आ सकता है। क्या भारत में गानो की कमी है ? नहीं कमी हमारे अंदर प्रतिरोध करने की है। छोटे बच्चे से लेकर माँ बाप बीवी पति दादा दादी तक हर किसी की वो बात हम बड़ी आसानी से मान लेते है जो भले ही हमारे सिद्धांतो के खिलाफ हो पर उससे हमारी सुविधा में कोई फर्क न पड़ता हो। छोटे छोटे प्रतिरोध बड़ा प्रतिरोध की शक्ल लेते है। हम कभी इतना लोड ही नहीं ले पाते कि गाली या ग़लत बात कहने पर दोस्त या घर वालों को टोक सके तो हश्र जो है वो सामने ही है।

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