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Saturday, 21 April 2018

भारतीय समाज , उसके नेता और बलात्कार




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अगर  एक लड़की अगर शालीन कपडे पहनती है तो कोई लड़का उसे ग़लत नजर से नहीं देखेगा। अगर आजादी चाहिए तो नंगे घूमना चाहिए। आजादी की अपनी सीमायें है। छोटे छोटे कपडे पश्चिम पहनावा है हमारी संस्कृति शालीन कपडे पहनने की है। "

"बाल विवाह बलात्कार और महिलाओ के खिलाफ बाकी अपराध रोकने में मददगार है। "

"अगर लड़की की 16 साल की उम्र में शादी कर दी जाए तो शारीरिक जरूरतों के लिए उसके पास पति होगा उसे बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी। "

"मुझे ये कहने में बिलकुल संकोच नहीं है कि 90 प्रतिशत मामलों में लड़की अपनी मर्जी से आदमी के साथ जाती है और वो ही रेप का शिकार होती है। "

"अगर औरत नैतिकता की सीमा लांघेगी तो इस तरह की घटनाये होती रहेंगी। "

"सिर्फ इस कारण से कि भारत को आजादी आधी रात को मिली है , औरतों का आधी रात को घूमना सही है ?"

"अगर आप बलात्कार रोक नहीं सकते तो उसमें आनंद ढूंढ लीजिये। "

" जिस ऑटो में तीन आदमी पहले से बैठे हो उस ऑटो में लड़की को नहीं बैठना चाहिए। "

मनोहर लाल खटटर , ओम प्रकाश चौटाला , सूबे सिंह सुमैन , धर्मवीर गोयत , कैलाश विजय वर्गीय बोत्सा सत्यनारायण , रंजीत सिन्हा और किरण खैर के ये बयान जो आपने ऊपर पढ़े है वो बस एक छोटी सी झलकी है भारत के नेताओ और तथाकथित सम्मानित लोगों द्वारा दिए गए ऐसे बयान लगभग हर रोज अख़बार भरे रहते है। सवाल ये है कि ऐसे बयान ये नेता क्यों देते है ? अगर ये सब बयान अगर ये नेता नहीं देते तो क्या इनके वोटबैंक में कमी जाती? ये लोग मासूम है या शातिर है ? शातिर की सम्भावना ही ज्यादा है   क्या ऐसी बात है जो किसी हस्ती को , किसी नेता को ऐसे बयान देने पर मजबूर करती है। इन बयानों के क्या मायने निकाले जाने चाहिए। क्या इनका असर होता है ? जैसे लोग मासूमियत  के कारण बात बात पर गाली दे देते है पर उनका मतलब वो नहीं होता वैसे ही क्या नेता भी मासूमियत के कारण ये सब बोल जाते है उनका वो मतलब नहीं होता। एक तो " वो मतलब " मुझे आजतक समझ नहीं आया। वो कौन सा मतलब है जो कि नहीं होता है। और अगर वो नहीं ही होता है तो वो आता कहाँ से है। आजकल तो बोला भी इतना जोर से और स्पष्ट जा रहा है कि किसी और मतलब की तो गुंजाईश भी नहीं बचती।  मोदी जी कहते है कि बांग्ला देश की प्रधानमंत्री  शैख़ हसीना का  , औरत होने के बावजूद , आतंकवाद के खिलाफ रुख काबिले तारीफ है। मोदी जी कहते है कि बेटी नहीं बचाओगे तो अपने बेटो के लिए बहु कहाँ से आएँगी ? इन सब का क्या मतलब निकाला जाए। क्या मोदी जी का ये मतलब नहीं था कि औरते सामान्यत बहादुर नहीं होती। या अगर बेटो के लिए बहु के इलावा लड़कियों की जरूरत नहीं है। क्या मैं ज्यादा क्रूर हो रहा हूँ ये मतलब निकालते वक्त ?

जो भी मतलब हो , उत्तर से लेकर दक्षिण तक , पूर्व से लेकर पश्चिम तक ये हमारे नेता है जिन्हे हम वोट देकर चुनते है फिर ये सरकार चलाते है।  ये नेता कानून बनाते है कि बलात्कार की सजा फांसी होगी। सब नेता , सारा समाज अपने मन में मान चुका है कि बलात्कार लड़की की ग़लती के कारण होता है तो फांसी किसे होगी ? हाई कोर्ट लड़की की ना को हाँ मानता है तो बलात्कार कैसे होगा ? 8 साल की लड़की का बलात्कार होता है हत्या होती है और अख़बार लिखता है कि फलाने अस्पताल की जानी मानी स्त्री रोग विशेषज्ञ का कहना है कि हिमेन चोट लगने से भी फट सकती है। ये लिखते हुए उस आदमी के हाथ नहीं काँपे होंगे ? मेरा पढ़ते हुए दिल लरज रहा था। इब्ने इंशा ने भी  जब  अख़बार वाले से  ये इल्तजा की होगी कि सिर्फ अख़बार बेच , ईमान मत बेच। तब उसने ये तो  नहीं सोचा होगा कि अख़बार वाले ईमान बेचने से भी आगे बढ़ सकते है। 

 हिन्दू मुसलमान अब गाय और सुवर की बजाय छोटी बच्ची के बलात्कार पर लड़ रहे है।  मंटो को अश्लील कहा जाता था। कैसी कहानी लिखता था। दो आदमी एक लड़की खरीद के लाते है बाद में उन्हें अफ़सोस होता है जब उन्हें पता चलता है कि वो लड़की तो दूसरे धर्म की ना होकर उनके धर्म की ही है। हम 1947 से आगे बढ़ गए है आज 2018 है। मंटो नहीं है आज वो होता तो क्या लिखता ? आज तो सब कुछ वैसे ही लिखा जा रहा है। अख़बार वाला लिखता है सिर्फ मर्डर हुआ है बलात्कार नहीं हुआ। 

बलात्कार एक घिनौनी हरकत है मंदिर में लड़की का धर्म देखकर बलात्कार करना और भी घिनौनी हरकत है। इससे भी ज्यादा घिनौना तर्क ये है कि बलात्कार तो हर धर्म की लड़कियों का हो रहा है। इतना भयावय वक्त चल रहा है कि हर गंदे से गंदे काम को ,हर बेहयाई को जस्टिफाई करने के लिए उससे बड़ी बेहयाई मिल जाती है। धूप फिल्म में एक सीन है जब एक पुलिस इंस्पेक्टर एक शहीद के बाप से रिश्वत मांगता है तो बाप उससे पूछता है कि आपके हरियाणा के तो बहुत जवान शहीद हुए है आपको रिश्वत मांगते शर्म नहीं आती। इस पर इंस्पेक्टर बेशर्मी से जवाब देता है कि हमारे यहाँ कोई भेदभाव नहीं है हम तो हरियाणा वालों से भी उतनी ही रिश्वत लेते है जितनी आप से ले रहे है। अब जब इस बेहयाई तक बात जाती है कि ये तर्क जाए कि मुस्लिम लड़की की क्या बात है हम तो हिन्दू लड़कियों के भी ऐसे ही बलात्कार करते है। तो आगे क्या रह जाता है। 

इस घटना का चारो तरफ विरोध हो रहा है। विरोध करने वाले भी कह रहे है कि विरोध पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। "पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए " बाकी सब पूर्वाग्रहों की तरह ये जुमला भी हमारे अंदर तक इतना बैठ गया है कि हम गाहे बगाहे ये बात कहते रहते है बिना ये सोचे कि ये देश , ये दुनिया सब पोलटिक्स से ही चल रहा है। सारे कानून , हमारे जीवन के सारे फैसले पोलटिक्स ही तय करती है। ये सब पोलटिक्स करने का ही नतीजा है कि कोई आदमी रात के 8 बजे आकर कहता है कि सुबह सबको लाइन में लगना है और हम सुबह सुबह लाइन में लग जाते है क्यूँकि पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। नेता लोग जब ये बात कहते है कि फलाने मुद्दे पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो उनकी चिंता समझ आती है वो क्यों चाहेंगे कि जनहित के मुद्दे पर पोलटिक्स हो। पर हम क्यों ये दुमछल्ला साथ लगाते है कि विरोध प्रदर्शन होना चाहिए पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। अगर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो मोमबत्ती तो अपने घर में भी जला सकते है।बिना विचारधारा के विचार , बिना पोलटिक्स के विरोध से हासिल क्या होगा ? 
बिना पोलटिक्स के गुजारा नहीं है। पोलटिक्स अच्छी बुरी नहीं होती।  पोलटिक्स या तो जनता के हक में होती है या शोषक के हक में होती है। अगर छोटे बच्चे बच्चियों के बलात्कार पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो दुनिया में ऐसा कोई मुद्दा ही नहीं है जिस पर पोलटिक्स हो सके। इस मुद्दे पर तो इस कदर पोलटिक्स होनी चाहिए कि कोई नेता भविष्य में ऐसे बयान देने की जुर्रत कर सके। 


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