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Tuesday, 10 April 2018

बलिहारी गुरु आपकी पेपर दिया आउट कराय

नॉस्टेल्जिया की बात ही निराली होती है। अच्छा लगता है पुराना वक्त याद करके। अहा क्या वक्त था। अब सब बेकार हो गया। जब मैं दसवीं में था तो पापा अपने वक्त को याद किया करते थे। कहते थे कि अब तो नंबर बहुत आने लगे। उनके वक्त में ऐसा नहीं था। पढाई बहुत तगड़ी होती थी। बहुत हार्ड मार्किंग होती थी। तब के 50 परसेंट मतलब आज के 70 परसेंट। आज मुझे दसवीं पास किये 21 साल हो गए। मुझे भी आज वैसी ही फीलिंग आ रही है। मेरे दसवीं में 50 फीसदी नंबर आये थे। अपने दोस्तों में सबसे कम। दसवीं में आये नंबर जिंदगी भर के लिए जैसे एक लैंड मार्क बन गया। बाकी सब एग्जाम में 50 फीसदी नंबर लेना ही टारगेट रहा। खैर हमारे वक्त की बात जुदा थी। आज वो बात कहाँ। अहा हमारे वक्त बोर्ड के एग्जाम एक उत्सव की तरह होते थे। बहुत से इम्तिहान देने वाले अपने साथ अपने भाई चाचा ताऊ पापा आदि को साथ लेकर आते थे। सब अपने अपने काम में स्पेस्लिस्ट होते थे। किसी का काम परीक्षा स्थल के अंदर रिश्तेदारी निकालने का होता था तो कोई स्कूल की छत पर चढ़ने का स्पेशलिस्ट होता था। हर पेपर में किसी न किसी की टांग पक्का टूटती थी जो उस किस्से को तब तक बड़े चाव से सुनाता था जब तक कि प्लास्टर रहता था। एक आध पुलिस के हाथ चढ़ते थे तो उनके चेहरे पर भाव ऐसे रहते थे मानो महाराणा प्रताप हल्दी घाटी से भागकर घास की रोटी खाने जा रहा हो। कुल मिलाकर रोमांच हवा में तैर रहा होता था। पेपर आउट होना तब इतना आम नहीं हुआ था। दसवीं बारहवीं के पेपर को आउट करवाने की जहमत कम ही लोग उठाते थे। अब तो सब आसान है। दसवीं का मैथ का पेपर आउट हो गया। परीक्षा से पहले पेपर हवाओ में उड़ रहा था। बोर्ड का कहना है कि पेपर दोबारा नहीं लिया जाएगा क्यूंकि इससे परीक्षार्थियों के साथ अन्याय हो जाएगा। बात बिलकुल सही है। बेचारों के पैसे भी लग गए अब पेपर दोबारा ले लो ये तो कोई इन्साफ नहीं हुआ। उपभोक्ता जागरूक हुआ है अब। पर जिन बच्चो के पास पेपर नहीं मिला उनका क्या उन्हें उनकी काहिली की सजा मिली है। इतनी महंगे स्कूल में पढ़ते है। फिर ट्यूशन लेते है तो पेपर आउट करने के लिए पैसे नहीं लगा सकते कंजूस कहीं के। वैसे भी ये तो बच्चो के साथ नाइंसाफी ही होती रही है कि पेपर में तो दस सवाल आने होते है और पढ़नी सारी किताब पड़ती है। ये शिकायत हमें भी हमारे वक्त में थी। हरिशंकर परसाई भी अपने वक्त पर ये शिकायत कर चुके है। बेहतर प्रणाली तो यही है कि वही सवाल बच्चो को याद करवाए जाए तो परीक्षा में आये। आज जमाना इतना फ़ास्ट है कि सारी किताब पढ़ना बिलकुल समय की बर्बादी है। वैसे भी जिस वक्त के बच्चो को एग्जाम के वक्त  " एग्जाम वॉरियर " जैसी किताब पढ़नी पड़े उन बच्चो से हमदर्दी बनती है। जिस वक्त ये किताब आयी उसी वक्त भाजपा का एक नेता अपने घर में ही बच्चो की परीक्षा करवाते पकड़ा गया। ठीक उसी वक्त बीजेपी ने दिल्ली में अपना बड़ा ऑफिस बनवाया। शायद वो ऑफिस बच्चो की सेवा के लिए ही बनाया गया अब कब तक नेता लोग अपने घर से ही देश सेवा करते रहें। इसी साल प्रधानमंत्री ने बच्चो से एग्जाम स्ट्रेस न लेने की सलाह दी। इसी साल बच्चो की टेंशन दूर करने के लिए प्रधानमंत्री ने " एग्जाम वारियर " नाम की किताब लिखी जिनके दिमाग़ में लड़ाई  रहती  हो उन्हें पढाई भी लड़ाई लगने लगती है। पढ़ने वाले लड़ाकू लगते है। खैर इसी साल दसवीं और बारहवीं के पेपर पहली रात ही सप्लाई हो गयी। अब हमें अफ़सोस होता है बच्चो का इतना भला सोचने वाली सरकार हमारे वक्त क्यों न हुई। हमारे वक्त तो दसवीं में होने से तीन साल पहले डराने लग जाते थे कि बेटा दसवीं में बोर्ड के एग्जाम होते है। नकल मरने पर केस हो जाता है फिर दो साल पढ़ नहीं सकते। कहाँ तो वो जमाना था जब जबरन स्ट्रेस दिया जाता था कहाँ ये ज़माना है कि पेपर आउट होने की खबर आम होने के बाद भी कहा जाता है कि बच्चों की भलाई के लिए दोबारा पेपर नहीं लिया जाएगा। मैं मेरे वक्त के लोगों से पूछना चाहता हूँ  हम बच्चे नहीं थे क्या  हमें भलाई बुरी लगती थी क्या 

पर वक्त बदल गया है हमारा वक्त बढ़िया था। हमारे पापा लोग भी यही कहते थे कि उनका वक्त ज्यादा बढ़िया था। मतलब वक्त वही बढ़िया होता है जो हमारा होता है। हमारे वाला तो सच में बढ़िया था। हम उस आखिरी पीढ़ी से है जब ट्यूशन पढाई में कमजोर बच्चे पढ़ते थे। ट्यूशन छुपकर पढ़ा जाता था। ट्यूशन पढ़ने वालों पर शक किया जाता था कि वो मास्टर की चमचागिरी कर के नंबर लेने के फ़िराक में है। आज ट्यूशन नाम पुराना हो गया है आज कोचिंग का जमाना है। जो बच्चे अलग से ट्यूशन या कोचिंग नहीं लेते उन्हें पिछड़ा हुआ समझा जाता है। और कोचिंग का स्टाइल क्या है  ? पिछले दस बारह सालों के प्रश्न पत्र का पैटर्न समझ कर आने वाले प्रश्न पत्र का अंदाजा लगाना। कुछ कोचिंग सेंटर अंदाजा लगाने में विश्वास नहीं रखते तो वो ऐसा इंतजाम करते है कि पेपर ही हाथ लग जाए जैसे पंजाब के शर्मा जी ने किया। अपने स्टूडेंट के लिए 12 वीं का इक्नोमिक्स का पेपर ही आउट करवा लिया। 

बलिहारी गुरु आपकी  पेपर दिया आउट कराय 

ये गुरु भी अजीब है किसी के  लिए पेपर आउट करवा देते है। किसी को कॉलेज से निकलवाने के लिए शिक्षा मंत्री तक को पत्र लिखने से गुरेज नहीं करते। कोई पीएचडी करने आती है  तो उसके शारीरिक छेड़खानी करने से बाज नहीं आते। कितनी प्रतिभा के धनी है हमारे गुरु जी। अपनी कास्ट क्लास वालों के लिए पेपर आउट करवा देते है। दलित दमित कास्ट क्लास के बच्चो को मानसिक यातना देने से बाज नहीं आते। लड़कियों के यौन शोषण को अपना अधिकार समझते है। बहरहाल मैं विषय से भटक रहा हूँ। गुरु का अपमान करने या नकारत्मकता फैलाने का मकसद नहीं था। मेरे दोस्तों की शिकायत बजा है कि मैं एकरसता का शिकार हो रहा हूँ। कोई भी बात हो लेदे कर वहीँ असमानता भेदभाव को लेकर बैठ जाता हूँ। दुनिया में यही सब नहीं है। अच्छी बातें भी है। गुरु जी सिर्फ लड़कियों का शोषण ही नहीं करते है। सभी ऐसे नहीं है कुछ बच्चो के लिए पेपर आउट भी करवाते है। नॉट आल टीचर।  मैं अपने को सुधारने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं वापिस अपने वक्त पर लौटता हूँ। 

हाँ तो हमारा वक्त कितना अच्छा था। अहा मास्टर कितनी प्यारी पिटाई करते थे। कितने नए नए तरीके निकालते थे बच्चो को पीटने के। हाथ उल्टा करवा के डस्टर मारते थे। कोई हाथ हटा लेता था तो दस और मारते थे। हमारे माता पिता भी अपने दोस्तों के आगे कितनी शेखी बघारते थे कि हमने तो अपने बेटे के मास्टर से कह रखा है कि अगर एक डंडा मारना हो तो हमारे के दो मारना। अहा कितने निष्पक्ष पेरेंटस  होते थे अहा बेवकूफी में भी आदर्श ढूंढ लेते थे। मास्टर बच्चे को थप्पड़ मारकर सीखाता था 

"समझ नहीं आता कितनी बार बताया गाँधी जी के दो हथियार  - सत्य और अहिंसा। "

बच्चा भी थप्पड़ खाकर गाँधी जी के हथियार अच्छे से याद कर लेता था। 

बच्चा भी थप्पड़ खाकर गाँधी जी के हथियार अच्छे से याद कर लेता था। फिर घर पर घरवालों को बिजली चोरी करते देखता है धीरे धीरे सत्य अहिंसा ईमानदारी सब प्रेक्टिकली इतने अच्छे से सीखता है पता नहीं आजकल के बच्चे सीखते है या नहीं। तभी हम ज्यादा ईमानदार होते थे। अब सब मिलावटी हो गया है। आज के वक्त में वो बात कहाँ है। 


2 comments:

  1. @मास्टर बच्चे को थप्पड़ मारकर सिखाता था.........आज जेब काट कर !!

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन स्वार्थमय सोच : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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