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Sunday, 1 April 2018

जीवन की हकीकत और मोटिवेशनल किताबों के डायलॉगों के बीच हिचकोले खाती फिल्म हिचकी




यशराज बैनर की  फिल्म हिचकी अधिकतर बॉलीवुड सतही प्रगतिशील फिल्मों से थोड़ी सी अलग दिखती है तो उसका एकमात्र कारण रानी मुखर्जी का शानदार अभिनय है। फिल्म की कहानी में दो अहम् मुद्दे उठाये हुए है। एक तो फिल्म के नाम से ही पता चलता है। नायिका नैना माथुर  टोरेट सिंड्रोम   से ग्रसित है जिसके कारण घडी घडी नायिका को हिचकी आती है। बोलने में दिक्कत है जिसके कारण नायिका को बचपन से ही मजाक और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। ज्यादा टेंशन में ये समस्या ज्यादा हो जाती है। बच्चों को पढ़ानाटीचर बनना उसका 
ड्रीम जॉब है। पर अधिकतर जगह उसे अपने सिंड्रोम के कारण रिजेक्शन ही मिलती है। 

दूसरा मुद्दा अमीर बनाम गरीब बच्चों की पढ़ाई है। एक बेहद ही अमीरों के स्कूल में किसी मजबूरी के कारण स्कूल वालों को गरीब बस्ती के बच्चो को भी पढ़ाना पढता है जिसे वे एक बदमजा जिम्मेदारी की तरह निभाते है। उन बच्चों की समस्याऐं उनकी मानसिकता उसके हल बताने की फिल्म में कोशिश की गयी है।  फिल्म के  प्रोमोशन में भले ही टोरेट  सिंड्रोम से पीड़ित एक लड़की की कहानी को प्रमुखता से प्रचारित किया हो पर शुरुवात के 20 -25 मिनट के बाद ही फिल्म दूसरे मुद्दे पर चली जाती है और हकलाहट से बोलने वाली नायिका की कहानी  गौण हो जाती  है। 


फिल्म के बारे में बाते करे उससे पहले उन सिनेमटिक फ्रीडम के आधार पर जो छूट फिल्म में ली गयी है उनकी बात करते है। फिल्म एक ऐसे स्कूल के बारे में है जिसमें सिर्फ एक ही क्लास है  - नौंवी   ( हालाँकि नायिका को बचपन में उसी स्कूल में पढ़ा बताया गया है। आखिरी में भी सभी छोटे बड़े बच्चे दिखाए है पर जब नायिका वहां पढ़ाने जाती है तो वहां बस एक क्लास है - नौंवी ) विज्ञानं की प्रतियोगिता में भी सिर्फ नौवीं के बच्चे ही भाग लेते है। नौंवी के ही बच्चो को इनाम मिलता है। नौंवी क्लास के 6 सेक्शन है। और टीचर विषय के अनुसार न होकर सेक्शन वाइज है। एक क्लास की टीचर दूसरे क्लास को नहीं पढ़ाती। ऐसा करना कहानी की मांग थी। अगर ऐसा नहीं होता तो फिल्म शुरू ही न हो पाती। 

फिल्म की कहानी पर आये तो तौरेत सिंड्रोम से पीड़ित नैना माथुर को फाइनली मिड टर्म में जॉब मिलती है पर वो जॉब नॉर्मल नहीं है। स्कूल में नौवीं के सेक्शन फ को पढ़ाने का जिम्मा नैना माथुर को मिलता है जिसमें सब गरीब बस्ती के बच्चे है। जो की बहुत ज्यादा उदंड , बदमाश और वाहियात टाइप के है सिगरेट पीना जुआ खेलना गन्दा बोलना सब तरह के ऐब है। स्कूल उन्हें झेल रहा है वो स्कूल के झेल रहा है। नैना और क्लास के बच्चो की शुरुवाती झड़प के बाद धीरे धीरे दिखाया जाता है कि वो बच्चे स्कूल के शिक्षकों की उपेक्षा और अमीर बच्चो द्वारा मजाक उड़ाए जाने के कारण इतने बदमाश हो गए है। फिर उनके घर के हालत भी जिम्मेदार है जहाँ की हर तरह की प्रॉब्लम है। धीरे धीरे जब उन्हें प्यार दुलार और मार्गदर्शन मिलता है तो सब ठीक हो जाते है। बीच बीच में नैना माथुर की हकलाहट की समस्या और अपने पापा के साथ कटु रिश्ता भी आता रहता है। 


जहाँ जहाँ फिल्म नैना माथुर की हकलाहट पर बात करती है वहां फिल्म बहुत बेहतरीन है। उसका कारण रानी मुखर्जी है। रानी मुखर्जी का शानदार अभिनय नैना माथुर के चरित्र की समस्याओ को पूरी तरह से उभार कर लाता है। 

   पर जहाँ फिल्म अमीर गरीब बच्चो पर शिफ्ट होती है। शिक्षा पर शिफ्ट होती है। भेदभाव पर शिफ्ट होती है और उससे भी बदतर जब उसके समाधानों पर बात करती है तो बहुत ही सतही और कहीं कहीं अश्लील हो जाती है। गरीबों को इतना स्टीरियोटाइप दिखाया गया है जैसा की मिडल क्लास सोचता है। गरीब बस्ती में कोई भी बच्चे नॉर्मल काम नहीं करते। गरीब बस्ती में लड़की के  बाप का उसकी माँ को छोड़कर अलग रहना नॉर्मल है। बच्चो का जुआ खेलना नॉर्मल है। लड़कियाँ सब्जी लेकर क्लास जाती है और क्लास में सब्जी काटती है। क्लास टीचर से बेहूदगी से बात करते है।  फिर नैना माथुर "जीत आपकी " जैसी किताबों की बातों की तर्ज पर समझाती है कि हर बच्चे में कुछ न कुछ गुण होता है। "क्यों ? और क्यों नहीं " सब सोच का मसला है। अपने डर पर काबू पाओ। अमीर बच्चे और शिक्षक अगर गरीब बच्चो की तरफ हिकारत से देखते है तो गरीब बच्चे भी उनसे नफरत करते है। बच्चों को ये बात समझ आ जाती है और और उनमे से दो लड़कियां टॉप कर जाती है जिनका पास होना भी मुश्किल है। हालाँकि नौंवी क्लास वाले मसले की तरह ही ये मसला भी अनसुलझा ही रहता है कि जो बच्चे इतने नाकारा ,बदमाश टाइप थे जिनका नौवीं में पास होना नामुमकिन था उन्होंने सातंवी आठवीं कैसे पास की खैर  आखिर में अमीर गरीब दोनों  सुधर जाते है। दोनों साथ बैठते है सब समस्या ख़त्म हो जाती है। बाद में जब नैना माथुर स्कूल से रिटायरमेंट लेती है तो दिखाते है कि वो सब बच्चे सफल भी है। शायर ने शायद निर्देशक और अधिकतर उपदेशको की बातें सुनकर ही कहा होगा 

बहुत मुश्किल है दुनियां का संवरना
तिरी जुल्फों का पेचो-ख़म नहीं है। 


आखिर में 

फिल्म क्यों देखे ?
- रानी मुखर्जी के कारण। जितनी बेहतरीन वो अदाकारा है उतनी अच्छी फिल्मे उनके खाते में नहीं है। ये उनके प्रसंशको के लिए अफ़सोस जनक बात है 
- फिल्म छोटी है। बोझिल नहीं है। जबरन घसीटा नहीं है 
- जो लोग "जीत आपकी " "कैसे सफलता हासिल करे " "कैसे लोगो को आकर्षित करे " " नकारत्मकता को कैसे दूर करे " टाइप किताबों को किताब मानते है गीता बाइबिल मानते है। उनके लिए तो ये फिल्म कल्ट भी हो सकती है 

फिल्म क्यों न देखे 

-   बिजी है तो मत जाइये। 

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