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Friday, 27 April 2018

अजब तेरी कारीगिरी रे सरकार।

                                               

हरियाणा सरकार ने कॉमनवेल्थ विजेताओं के सम्मान समारोह को स्थगित करना पड़ा। रेडियो ऍफ़ एम् पर सरकार के विज्ञापन आते है पांच पांच मिनट के कि ऐसी खेल नीति ला दी इस सरकार ने कि मेडल ही मेडल आ गए। जैसे इस सरकार से पहले तो हरियाणा का खेलों में कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं था। खैर हरियाणा सरकार के विज्ञापनों की बात करेंगे तो बात जाने कहाँ चली जायेगी। पहले तो कॉमनवेल्थ और खेल नीती पर ही बात करते है। ऐसा शायद पहली बार हुआ होगा कि सरकार को सम्मान समारोह ही स्थगित करना पड़ा। कारण ? खिलाडीयों ने मना कर दिया कि बाबा ऐसा सम्मान नहीं चाहिए। क्यों किया खिलाडियों ने ऐसा ? हरियाणा सरकार ने घोषणा की थी कि कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतने वाले को डेढ़ करोड़ रूपये , सिल्वर जीतने वाले को 75 लाख रूपये और ब्रॉन्ज जीतने वाले को 50 लाख रूपये दिए जाएंगे। ये इनाम भी नए नहीं है। हरियाणा में ये इनाम पिछली सरकारों में भी मिलते रहे है। हरियाणा का कॉमनवेल्थ में योगदान भी नया नहीं है पर इस सरकार को शायद अपनी खेल नीति पर पूरा भरोसा था कि इस बार तो कहाँ पदक आने है। इनाम की घोषणा कर दी। अब हरियाणा के खिलाडी 22 पदक ले आये नौ  गोल्ड मेडल 6 सिल्वर मेडल और 7 ब्रॉन्ज। अब समस्या हो गयी कि इनाम देना पड़ेगा। रेडिओ पर विज्ञापन तो बजवा दिया पर खिलाड़ियों को पैसे देने का दिल नहीं है। पिछली बार के पैसे भी बहुत रो धो के सरकार ने दिए थे तो जैसे नोटबंदी में हर रोज नियम बदल रही थी सरकार तो यहाँ भी किसी बुद्धिमान ने एक नया अजीबोगरीब पेंच लगा दिया कि सरकार इनाम तो देगी पर अगर उस खिलाडी को अगर कहीं और से भी कोई इनाम मिला है तो वो रकम काट कर इनाम देगी। यानी अगर कोई खिलाडी रेलवे में नौकरी करता है  और रेलवे वाले अगर पचास लाख रूपये इनाम देती है तो हरियाणा सरकार उस खिलाडी को पचास लाख रूपये कम देगी। अनिल विज साहब  अब कह रहे है कि ये भी दया कर के दे रहे है वरना जो आर्मी या रेलवे की तरफ से खेलता है उसे तो हरियाणा सरकार को  इनाम देने का तुक ही नहीं बनता। जय हो हरियाणा सरकार। हरियाणा में सरकार हर दिन गर्त में जाने के नए कीर्तिमान बना रही है। ऐसे ऐसे तरीके खोज कर ला रही है जिसे छोटे मोटे बटमार भी नहीं सोच सकते। कॉमनवेल्थ में 13 खिलाडी ऐसे है जिन्हे खिलाडी के तौर पर रेलवे या कहीं और नौकरी मिली और उनकी तरफ से खेले गोल्ड जीता। हरियाणा सरकार ने ऍफ़ एम् पर गाना बजाया कि उनकी खेल निति से पदक आ गए। अब मंत्री जी कह रहे है उन 13 को हम इनाम नहीं देंगे।

खिलाडी बजरंग पूनिया का कहना है कि आगे सरकार ये न कह दे कि सैलरी के पैसे भी काटेंगे। किसी सरकार  के लिए कोई सम्मान समारोह का स्थगन करना कितने अपमान की बात होती है मतलब पहले होती थी। भाजपा की सरकार के लिए तो ये रोज की बात हो गयी है। केंद्र में मंत्री जी ट्वीट करते है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश  दिया है आधार लिंक करा लो। बेचारी सुप्रीम कोर्ट भी सोचती होगी  कि कहाँ फंस गए यार।  हर जगह ऐसी भसड़ मचाई हुई है कि क्या मजाल है किसी को कुछ समझ आ जाए। अभी मंत्री जी कह रहे है कि हरियाणा के जो खिलाडी किसी दूसरी संस्था से खेलते है उन्हें हरियाणा सरकार इनाम क्यों दे। ये पहली सरकार है जो इनाम देते वक्त नियम बदल रही है। अभी ओलम्पिक में साक्षी मालिक को ब्रॉन्ज मेडल मिलने पर इनाम दिया गया था वो भी रेलवे का प्रतिनिधित्व करती थी। पर अब के मसला जुदा हो गया शायद। इस बार 22 पदक आ गए। खुदा न करे कभी भारत अगर ओलम्पिक पचास साठ पदक ले आये (वैसे तो होने की सम्भावना न के बराबर ही है ) तो कहीं सरकार इनाम देने के डर से खुद को दिवालिया घोषित न कर दे।

23 वर्षीय विनेश फौगाट ओलम्पिक के क्वाटर फाइनल के मुकाबले में चोट ग्रस्त हो गयी थी। चेहरे की पीड़ा असहनीय थी। आप खेलते हुए सर्वश्रेष्ठ जगह पर पहुँचते हो। चोटिल होते हो फिर मेहनत करते हो फिर मेडल जीतते हो और फिर  सब्जी मंडी की तरह मोलभाव शुरू हो जाता है। ठीक ठीक लगा लो। पर शर्म हमें नहीं आती।

Thursday, 26 April 2018

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से वीरे की वेडिंग तक - गालियों का प्रभाव

               
कल  रात को मैंने जासूसी करने के लिए फेसबुक खोला तो मुझे वीरे दी वेडिंग का पता चला। फेसबुक स्वरा भास्कर की इस बात पर बुराई हो रही है कि जिस फिल्म में वो काम कर रही है उसमें इतनी गालियाँ है। मैं फेसबुक को डिएक्टिवेट करके दोबारा एक्टिव कर के देखा तो सच में स्वरा भास्कर की फिल्म में गालियों के लिए आलोचना हो रही थी। ये सच में ख़ुशी और आश्चर्य की बात थी आई एम् प्लीजेंटली सरप्राइज्ड।  फेसबुक पर , सोशल मिडिया पर गालियाँ देना एक कूल बात मानी जाती रही है। कुछ संवेदनशील लोग  गाली पर टोकने पर अपनी फजीहत करवाते रहे है फिर भी बाज नहीं आते। त एक के टोकने से क्या हो जाना है। जब बड़े बड़े तुर्रम खान गालियों वाली पोस्ट डालते है लव करते है शेयर करते है। पर आज अहसास हुआ हर बात का असर होता है। धीरे धीरे ही सही इतना धीरे कि शायद किसी को अहसास नहीं होता। आज फेसबुक पर गालियों वाली फिल्म की आलोचना हो रही है उसकी अभिनेत्री की भी आलोचना हो रही है। ये हौंसला बढ़ाने वाली बात है। अभी ज्यादा पुरानी बात तो नहीं है जब कूल लिबरल लोग , वो कौन सा यूट्यूब चैनल है जिसका नाम भी याद न आ रहा गंदा सा नाम है कोई  जिसके प्रोग्राम में दीपिका से लेकर जौहर तक रेसिस्ट और सेक्सिस्ट जोक्स पर खी खी कर रहे थे , के लिए "फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेसन " का झंडा उठाये हुए थे। छोटे छोटे प्रतिरोध से चीजे बदलती है। आज से 6 साल पहले अनुराग कश्यप की ' गैंग्स ऑफ़ वासेपुर " को कूल ड्यूड कल्ट का दर्जा दिए फिरते थे। उसे औसत से कम के डायलॉग को डायलॉग ऑफ़ द मिलेनियम बनाया हुआ था क्यूँकि उसके बीच में एक गाली थी जिसे अभिनेता ने पूरा जोर लगाकर कहा हुआ था। आज वही अनुराग कश्यप बनारस की पृष्टभूमि पर मुक्केबाज बनाता है बिना गालियों के। गालियां अब उतनी कूल नहीं रही।


अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है मेरी एक दोस्त ने अपनी फेसबुक वाल पर गाली लिखी हुई थी। मैं उसे ये समझाने में नाकाम रहा था कि लड़की को गाली क्यों नहीं देनी चाहिए ? मैं कैसे समझाता कि जो सवाल ही ग़लत हो उसका जवाब कैसे दिया जाए। लड़की या लड़का गाली किसी को नहीं देनी चाहिए। कंडीशनिंग है गाली देने की। उस कंडिशनिंग को मेहनत से बदला जा सकता है। कम से कम लिखते वक्त तो हमारे पास बहुत समय रहता है सोचने का। तब कितने ही प्रगतिशील लोग इस अकाट्य तर्क पर अटके हुए थे कि लड़की की वजह से गाली देने पर टोका जा रहा है। वक्त भले लगा पर आज ये बात समझ आ रही है कि लड़का या लड़की से फर्क नहीं पड़ता, गाली नहीं देनी चाहिए। गाली को फ्रस्ट्रेशन निकालने  या पाद मारने जैसा मानने  वालो को भी
नयी फिल्म का ट्रेलर फूहड़ लग रहा है।

स्वरा पर जो सवाल उठ रहे है सब बेहद जायज सवाल है पदमावत से जो ग़लत सन्देश जा रहा था वीरे दी वेडिंग से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जा रहा है। और फेसबुक पोस्ट पर गाली लिखने से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जाता। उसे लव लाइक शेयर करने से भी कोई अच्छा सन्देश नहीं जाता ऐसी पोस्ट को इग्नोर करने से भी अच्छा सन्देश नहीं जाता। ये सारी एक जैसी बातें है। आप सुविधा के किस कोने में रहना चाहते है ये आपको तय करना है। स्वरा की जो स्पष्ट और सीधी  आलोचना हुई है उसके बाद मुझे नहीं लगता कोई फेसबुक पर गाली लिखेगा या उसे शेयर करेगा या उसके लिए कुतर्क करेगा।

स्वरा ने जो पोस्ट की वो पब्लिसिटी के लिए की बहुत सम्भव है कि पदमावत की ही पब्लिसिट के लिए लिखी हो। पदमावत की पब्लिसिटी के लिए तो ॐ थानवी से लेकर सब बड़े बड़े लोगों ने झंडा उठाया हुआ था मुझे नहीं लगता कोई ऐसा बचा होगा जिसने पदमावत की पब्लिसिटी न की हो। ओम थानवी साहब तो वो फिल्म देखने के लिए दूसरे शहर भी जाने को तैयार थे। पर खुद की पब्लिसिटी का तर्क मुझे निजी तौर पर लगता है कि दरकिनार कर देना चाहिए वरना सोशल मिडिया पर कहने सुनने को कुछ बचेगा नहीं। हर इंसान इसीलिए तो लिख रहा है कि वाहवाही मिले लाइक मिले। मुझे तो आजतक ऐसा कोई न मिला जो कहता हो कि मैं फेसबुक पर जूते खाने के लिए लिखता हूँ। इससे ज्यादा बचकाना तर्क दूसरा नहीं हो सकता। चलो स्वरा ने हवा के साथ बहकर वो खत लिख दिया।  उसे पब्लिसिटी मिल गयी सॉरी चीप पब्लिसिटी मिल गयी।  अब गालियों वाली फिल्म भी कर रही है इसके लिए भी उसके पास तर्क होगा कि पैसे के लिए हर कोई कुछ न कुछ कर ही रहा है। तू बड़ा कॉमरेड बना फिरता है सुबह होते ही पूंजीपतियों की बही मिलाने बैठ जाता है। आज के दौर में कूतर्को की कमी थोड़ी है। एक ऐसा भी कमेंट देखने को मिला कि इससे सब अदाकारों को सबक मिलेगा कि वो जनहित के मामलों में बोलने से पहले सौ बार सोचेंगे और अपनी जुबान बंद रखेंगे। कोई शक नहीं है 99 फीसदी अपनी जुबान बंद ही रखते है। जुबान बंद रखने वाले यानी बोलने वाले से बेहतर हो गए ? हमें जो चाहिए वो चिरस्थायी चाहिए। हम ये नहीं कह सकते कि उस वक्त स्वरा का स्टैंड ठीक था आज उसमें विचलन आया है इसकी स्वरा से उम्मीद नहीं थी  पर आज के दौर में विचलन इतना आश्चर्य करने लायक बात तो नहीं ही है। सुबह हम हनी सिंह को गालियों के लिए आलोचना करने वाली पोस्ट लिखते है शाम को शादी में उन गानो पर डांस करते है उसे लाइव करते है। हमारे फोन में ये गाने स्टोर होते है। कमाल नहीं है ? बहुत सम्भव है कितने ही लोगों ने स्वरा की आलोचना वाली पोस्ट के तुरंत पहले या बाद में कोई गाली वाली पोस्ट पर दिल दिया हो। एक अपने लालनटोप वाले भाई लोग है वो सबसे मस्त लोग है वो बाकायदा उन लोगों को ट्रोल करते है जो फेसबुक गाली देने का विरोध करते है उन्हें ये कूल लगता है उन्हें ये भी लगता है कि वो अगले आदमी के मजे ले रहे है। हाउ क्यूट न। जब तक वो लोग न मिले थे मेरा मासूमियत पर से विश्वास उठने लगा था। मेरे एक दोस्त ने एक भाई की पोस्ट पर कमेंट कर दिया कि भाई गाली मत दे ये नारीविरोधी है। उस घटना के तीन महीने बाद भी किसी अलाने फलाने की पोस्ट टैग कर कर और फिर आपस में गन्दी गालियों में बात कर के उसे चिढ़ाने की कोशिश करते है। कितने मासूम लोग है।  उस दिन मुझे लल्तनतोप वाले अपने भाइयो पर दया आयी एक दूसरे को कीचड़ में लोट पॉट कर दूर खड़े साफ़ आदमी का मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहे कि देख हम तो कीचड़ में वो साफ़। उन्हें भी एक दिन अहसास होगा कि कीचड़ में इतने मजे है नहीं जितने साफ़ रहने में है।

चीजे प्रतिरोध से बदलती है। प्रतिरोध होना चाहिए

Wednesday, 25 April 2018

हम और हमारे पूर्वाग्रह



एक भाई ने ओला कैब मंगवाई ड्राइवर मुसलमान निकलने पर कैब कैंसिल कर दी। इस बहादुरी के अफ़साने को उसने पोस्ट भी किया। अब जिस फोन से उसने कैब पोस्ट की जिस फेसबुक पर उसने ये पोस्ट किया जाहिर है उसने सब जगह चेक कर लिया होगा कि कहीं पर भी मुसलमान काम नहीं कर रहा होगा। वरना जिस कदर का हिन्दू स्वाभिमानी मूर्खता उसने कैब के साथ दिखाई है उससे तो बहुत सम्भव है वो अपनी बाइक की टंकी में पेट्रोल की जगह गाय का मूत भरवा ले। ये भी सम्भव है कि अभी फिरंगियों वाले इंटरनेट को छोड़ वो अपने महाभारत काल वाला इंटरनेट इस्तेमाल करने लग जाए।पर ये सुविधा की मूर्खता है। सुविधा की सिर्फ क्रांति ही नहीं होती , सुविधा की मूर्खता भी होती है। आप उतनी ही मूर्खता करते हो जितनी अफोर्ड कर सकते हो। जो देश में टोपी पहनने से मना कर देते है वो विदेश में जाकर माथा टेक आते है। पर यहाँ मूर्खता वाला मसला नहीं है यहाँ फायदे , शातिरता वाला मामला है। अभी बात मूर्खता पर ही रहने देते है। ये कोई पहली बार नहीं है जब इस तरह की बात सुनी हो। एक बार मेरा एक दोस्त कह रहा था कि वो मुसलमान से सब्जी नहीं लेता। ये बात दीगर है कि उसका पसंदीदा खिलाडी इरफ़ान पठान था। सलमान खान की वांटेड वो तीन बार देख कर आया था पर मुसलमान से सब्जी नहीं खरीदता। मूर्खता घृणा नफरत इन सब पर अधिकतर बार सुविधा भारी पड़ती है। हर रोज इंसान को दुनिया भर की दुविधाओ से गुजरना पड़ता था। सब्जी ले या नाम पूछे। कैब ले ये न ले। बस में पास कौन बैठ गया। बताओ एक छोटे से बंद दिमाग़ के लिए कितनी परेशानियाँ है दिन भर में।



बचपन में हमारे अंदर दुनिया भर के पूर्वाग्रह भर दिए जाते है जो हमारे लिए अटल सत्य रहते है। उसके बाद बाकी तर्क वितर्क उन्ही पूर्वाग्रहों के आस पास रहते है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके बाद आपने क्या पढ़ाई की डॉक्टर बन गए आप शायर बन गए आप पत्रकार बन गए लेखक बन गए फिल्मकार बन गए भारत में तो अपवादों की बात छोड़ दे तो आप मुर्ख एक बाद बन गए तो बन गए बाद में क्या बने इससे फर्क नहीं पड़ता। खाने को लेकर तो ये हाल है कि एक उत्तरभारत का शाकाहारी किसी नॉन वेजेटेरियन को खाना खाते हुए नहीं देख सकता। दुसरो के खाने को देख इन्हे उलटी आती है। इतनी घृणा लेकर ये प्यार महोब्बत और मासूमियत की बात करते है। चमड़े के जूते पहनते है , चमड़े की बेल्ट पहनते है घर में हजार तरह की चीजे इस्तेमाल होती है जिसमें जानवर के मीट या खाल का इस्तेमाल होता है। पर घर में नॉन वेज नहीं बन सकता। इसलिए नहीं कि आपको जानवरों से प्यार है गाय से लेकर आवारा कुत्तो तक की जो हालत हमारे यहाँ है वो तो हम सब देखते ही है। घर में नॉन वेज इसलिए नहीं बन सकता क्यूंकि हम सब बीमार लोग है और बायडिफाल्ट तानाशाह है। हम नहीं खाएंगे तो कोई भी क्यों खायेगा ? ये बीमारी हम अगली पीढ़ी को ट्रांसफर कर जाते है। बीमारी को हमने सिद्धांत बना लिया है। उस सिद्धांत को अटल सत्य मान लिया है। पर ये सिद्धांत टूट जाता है जब हम बाहर जाते है विदेश में जाते है। तो नॉन वेज भले ही न खाये पर साथ खाने वाले को नहीं रोक पाते। वहां दिमाग का ढक्क्न खुलता है कि नॉन वेज सिर्फ मुसलमान ही नहीं खाते सारी दुनिया खाती है। वहाँ आप कुलीग के साथ बैठकर खाना भी खाते है। बहुत सम्भव है वो घर आये तो नॉन वेज ऑर्डर भी कर दे। पर जहाँ हजारों बीमार लोग एक साथ ही रहते हो तो उन्हें तो शायद ही कभी अपनी बीमारी का अहसास हो पाये। आपने अपने पडोसी से डिस्कसन किया पडोसी ने पडोसी के साथ डिस्कसन किया सब पड़ोसियों ने एक साथ डिस्कसन किया और जजमेंट दे दिया कि मुसलमान सात बच्चे पैदा करते है। पूर्वाग्रहित इंसान अपने जजमेंट के लिए जितना आश्वस्त होता है उतना और किसी के लिए मुमकिन नहीं होता। अभी पिछले महीने की बात है दो दोस्तों से तकरीबन 8 साल के बाद मिला। एक ने बच्चो के बारे में पूछ लिया तो मैंने कहा कि दो है एक लड़का एक लड़की। तो दूसरे ने कहा कि अपने हिन्दुओ में तो इतने ही बच्चे होते है ये कोई मुसलमान थोड़ी है कि सात - सात बच्चे हो। अब इस बात का क्या जवाब दूँ। छह साल की शादी में 7 बच्चे तो शायद किसी भी धर्म वालों के लिए सम्भव न हो। फिर मेरे पापा 7 भाई बहन है। चार मामा और एक मौसी को मिलाकर मेरी मम्मी के यहाँ भी 6 भाई बहन है। कमाल की बात ये है कि जिस भाई ने ये बात की वो मुझसे पहले वाली पीढ़ी की आखिरी संतान है उसके खुद के पांच या छह भाई बहन है बहुत सम्भव है उसने जिंदगी में मुसलमान देखा भी न हो। वो अपने जजमेंट के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त था उसमे कही किसी बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसी तरह की एक बहस में एक दोस्त ने पूरे जोश से लबरेज होकर तर्क दिया था कि मुसलमान जहाँ जाते है वहां मस्जिद बना लेते है।उसे लगता था कि मस्जिद कोई बुरी चीज है वहां आतंकवादी रहते है।



"मुंबई मेरी जान " में केके अपनी तरफ से पूरी तरह से जांच पड़ताल कर के आश्वस्त हो जाता है कि एक मुसलमान लड़का जो चाय की दुकान पर आता था वो मुंबई लोकल ट्रैन बम विस्फोट करने वालों में शामिल है। जबकि असल में तो वो शिरडी गया हुआ होता है। जब आप पूर्वाग्रह के साथ जजमेंट करने बैठते हो तो फैसला तो पहले ही आ चुका होता है। पूर्वाग्रह पर बहुत फ़िल्में बनी है एक से बढ़कर एक। 12 एंग्री मैन सबसे बेहतर है। हम जो सोचते है समझते है जिसे पत्थर की लकीर मानते है वो एक रेत का बनाया हुआ घर निकलता है। अब जहाँ लोग मुसलमान होने पर ओला कैब कैंसिल कर देने जैसी पोस्ट कर देते है वहां धर्म देखकर बलात्कार करना कौन सी बड़ी बात है। बहन के प्रेमी को देखकर उसकी हत्या कर देना कौन सी बड़ी बात है।



अब सवाल ये है इसका समाधान क्या हो। माचिस की तीलियों की तरह हम सब लोग आगे बारूद लगाकर एक डिब्बी में बंद कर दिए है। वो जब चाहते है तीली जला लेते है खाली तीली को फेंक देते है बाकियों को फिर डिब्बी में बंद कर देते है। समाधान तो प्रयास ही है जिस लेवल पर भी हो सके। हम अपने पूर्वाग्रह दूर करे। लाइफ इज ब्यूटीफुल में एक सीन है जब जोशुआ अपने पिता से पूछता है कि इस दूकान में यहूदी और कुत्तो का अंदर आना क्यों मना है। तो पिता हंस कर कहता है कि हम भी अपनी दूकान पर बोर्ड लगा लेंगे कि स्पाइडर और बुरे लोगो का अंदर आना मना है। यही कर सकते है कि बच्चो को इन पूर्वाग्रहों से दूर रखने की कोशिश करे। बजाय किसी कॉम्यूनिटी के लिए जहर रख कर पूरी कम्युनिटी का बॉयकॉट करने के , कहीं बेहतर है उन लोगों को बॉयकॉट करे जो ये जहर फैलाते है भले ही वो किसी कम्युनिटी के हो। हालाँकि ये जरा मुश्किल काम है खासकर जब तब जब ऐसे लोग भास्कर के सम्पादक हो या कोई फेमस कवि हो या कोई जाना माना लेखक हो। कोई कवि , लेखक ओपन प्लेटफॉर्म पर नारी विरोधी पोस्ट लिखता है। पता नहीं क्या क्या अनाप शनाप बोलता है आप उसे क्रांतिकारी कहकर उसके साथ फोटो खिंचवाते हो तो आपकी बातों के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। जब सबको पता है कि हमारा समाज बलात्कारियों के लिए , जहर फ़ैलाने वालो के लिए , छोटे मासूम बच्चो के कातिलों के लिए कितना सहिष्णु है तो क्यों जहर रुकेगा क्यों बलात्कार रुकेंगे क्यों मासूमों की हत्याए रुकेगी। इस बात में तो कोई दोराय नहीं है कि हम हद के दोगले इंसान है। अपने अंदर की कमजोरियों को फेंसी नाम देकर खुश हो लेते है कभी भी कोई गंभीर कोशिश नहीं करते उन कमजोरियों को हटाने की। क्योंकि उन कमजोरियों से हमें कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है। वो गाली मुसलमानो को दे रहा है वो गाली दलितों को दे रहा है वो गाली औरतो को दे रहा है पर यार इस वजह से वो ग़लत नहीं हो जाता। हर इंसान में कमियाँ होती है। कविता कितनी अच्छी करता है। डीजे पर हनी सिंह बज रहा है बच्चो की ख़ुशी है यार बच्चो के लिए तानाशाह थोड़ी बन सकते है अरे डेमोक्रेट इंसान तू खुद तो नाचने से बाज आ सकता है। उसकी विडिओ तो उपडेट करने से बाज आ सकता है। क्या भारत में गानो की कमी है ? नहीं कमी हमारे अंदर प्रतिरोध करने की है। छोटे बच्चे से लेकर माँ बाप बीवी पति दादा दादी तक हर किसी की वो बात हम बड़ी आसानी से मान लेते है जो भले ही हमारे सिद्धांतो के खिलाफ हो पर उससे हमारी सुविधा में कोई फर्क न पड़ता हो। छोटे छोटे प्रतिरोध बड़ा प्रतिरोध की शक्ल लेते है। हम कभी इतना लोड ही नहीं ले पाते कि गाली या ग़लत बात कहने पर दोस्त या घर वालों को टोक सके तो हश्र जो है वो सामने ही है।

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अमेरिका के संविधान में तेरहवी अमेंडमेंड हुई थी जिसके बाद वहां स्लेवरी को अपराध माना गया था। इसी को आधार मानकर 2016 में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म आयी 13 जो मैंने  देखी। डॉक्यूमेंट्री का सारांश लिख रहा हूँ बाकी तो फिल्म देखने पर ही पता लग पायेगा कि कितन लाजवाब डॉक्यूमेंट्री है 



हाँ तो कहानी अमेरिका की है। ग्रेट अमेरिका। जहाँ एक वक्त पर गोरे लोग काले लोगों की खरीद फरोख्त करते थे। स्लेवरी रोजमर्रा की बात थी। एक गोरा दूसरे गोरे से काले आदमी बच्चे औरत खरीदता था जिंदगी भर के लिए। पुराना वक्त था। ग़लत बात थी सिविल वार के बाद अमेरिका वालों को समझ आया कि ये नहीं करना चाहिए यार ग़लत है। तो उन्होंने अपने संविधान में १३वीं अमेंडमेंड की। स्लेवरी को अपराध घोषित कर दिया गया। अमेरिका डेमोक्रेट होने की राह पर आ गया। काले आदमियों को भी वोट करने का अधिकार मिल गया। हालाँकि औरतो को बहुत बाद में मिला अभी 13 वीं अमेंडमेंड की बात करते है। स्लेवरी को अपराध तो घोषित कर दिया पर एक अपवाद छोड़ दिया गया। अब अपवाद क्या कि अमेरिका में सभी आजाद है सब फ्री है सिवाय क्रिमिनल्स के , सिवाय सजायाफ्ता मुजरिम के। यानी जिसकों सजा हो गयी वो इस नियम का लाभ नहीं उठा पायेगा। अगले दस पंद्रह सालों में क्या हुआ पता है। अधिकतर काले लोग जेल के अंदर भेज दिए गए। वेलकम टू फ्रीडम। 

साल 1915 में ब्लॉकबस्टर फिल्म आयी 'बर्थ ऑफ़ द नेशन " जिसकी तारीफ राष्ट्रपति ने भी की। फिल्म में काले लोगो को रेपिस्ट , डाकू ,दिखाया गया। काले लोगो की इमेज बिल्डिंग शुरू हुई उस फिल्म से। काले लोग गोरी औरतो के बलात्कार करते है। लूटपाट करते है। नायक आकर उन्हें मार देता है।.फिर 1920 -25 में आया जिम साउथ क्रो यानी सेग्रीगेशन लॉ। स्लेवरी बैन हुई तो हमने सेग्रीगेशन ला बना दिया जी। क्या लॉ था ? काले लोगो के लिए अलग रस्ते। बस में पीछे सीट। बेंच अलग। दोनों में समानता की बात करना अपराध। ये बाकायदा कानून बनाकर किया गया। ये कानून अगले 40 साल तक रहा जब तक कि मार्टिन लूथर किंग समेत बाकी काले नेताओ ने सिविल राइट्स के लिए सरकार की नाक में दम न कर दिया। 1965 अमेरिकी सरकार को समझ में आया कि ये कानून ग़लत है समाज के खिलाफ है। ऐसे सब कानून को गैर कानूनी घोषित कर दिया। ऐसा नहीं है कि इन सब आंदोलनों की कीमत अदा नहीं करनी पड़ी। आने वाले पांच -6 सालों में उन सब नेताओ को जान से मार दिया गया या जेल में डाल दिया गया जो सिविल राइट्स मूवमेंट से जुड़े हुए थे। 21 साल के फ्रेड हैम्पटन तेजतर्रार युवा नेता जिसकी बात सुनने के लिए भीड़ इकट्ठी हो जाती थी पुलिस ने इनकाउंटर में मार दिया गया रात को उसके घर से। कहा जाता यही बंदूक बिलकुल सर से सटाकर गोली मारी गयी। 38 साल के मार्टिन किंग लूथर की 1968 में हत्या कर दी गयी। उसकी हत्या के लिए जिस आदमी को गिरफ्तार कर सजा दी गयी वो मरते दम तक जुर्म से इंकार करता रहा। खैर बलिदानो के बाद ही सही अमेरिका में सेग्रीगेशन कानून ख़त्म हो गए। सबको सम्मान अधिकार मिल गए। हैप्पी एंडिंग। 

पर पिक्चर अभी बाकी है। फिर आये राष्ट्रपति निक्सन साहब। उन्होंने अपराध को अमेरिका का दुश्मन नंबर वन घोषित किया। और अपराध पर जीरो टॉलरेंस का जुमला फेंका। और देखते ही देखते अमेरिका की जेलों में कैदियों की संख्या बढ़ने लगी। कैदी कौन ? वही काले लोग। अब उन्हें निगर  न बुलाकर क्रिमिनल का नाम दे दिया गया। 1970 से अमेरिका में कैदियों का ग्राफ जो बढ़ना शुरू हुआ वो आज तक ख़त्म नहीं हुआ। 1972 में वहां 300000 कैदी थी आज 2.3 मिलियन कैदी है। दुनिया भर के कैदियों की कुल संख्या के 25 फीसदी कैदी अमेरिका में है। निक्सन के बाद रोनाल्ड रीगन आये सबने अपराध ड्रग्स के खिलाफ जंग छेड़ी और उस जंग में और काले लोगो को जेल में भेज दिया। 1988 में जार्ज बुश सीनियर ने भी इसी को आधार बना कर चुनाव जीत लिया। एक ब्लैक अपराधी  ने पैरोल से भागकर और जुर्म किये। उस ब्लैक अपराधी की फोटो को चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाया गया कि ऐसा बुश के राज में नहीं हो पायेगा। एकदम रेसियल विज्ञापन था। बुश साहब भी जीत गए। 

फिर 1989 में एक पार्क में एक लड़की के साथ बलात्कार और फिर उसकी हत्या कर दी गयी। इस घटना ने पूरे अमेरिका को सकते में ला दिया। एक दो दिन के बाद पांच नाबालिग लड़को (सभी काले ) को पुलिस ने इस अपराध के लिए गिरफ्तार किया। उससे अगले दिन एक व्यापारी डोनाल्ड ट्रम्प ने हर अख़बार के पहले पन्ने पर लाखो रूपये खर्च कर विज्ञापन दिया। उस विज्ञापन में पांचो लड़को को फांसी देने की अपील थी ताकि सब बलात्कारियो को एक सन्देश मिल सके। उन लड़को को फांसी तो नहीं दी गयी पर दस से पंद्रह साल की सजाएँ हुई। हालाँकि कोई भी पक्का सबूत उन लड़को के खिलाफ नहीं था। उनकी उम्र 12 से 18 के बीच थी। 1999 में पुलिस ने एक आदमी को किसी जुर्म में पकड़ा और उसने कबूल किया कि उसने अकेले ने ही उस लड़की का बलात्कार और खून किया था उसका डीएनए भी मैच हो गया। 2001 में उन सब लड़को को बाइज्जत बरी कर दिया गया। 

1993 -94 में बिल क्लिण्टन साहब आये और उन्होंने और कड़े कानूनों की वकालत की और कानून बनाया कि जो बन्दा तीन बार जेल गया वो फिर जेल से बाहर नहीं आ पायेगा। इस कानून से और तेजी आयी। कमाल ही कानून था बाद में शायद 2002 या उसके बाद क्लिण्टन ने इस कानून के लिए माफ़ी मांगी। 

अमेरिका के अधिकतर राज्यों में आज भी stand your ground नाम का क़ानून लागू है। जिसमे अगर आप को किसी से खतरा महसूस हो रहा है तो सेल्फ डिफेन्स में आप अगले को गोली मार सकते हो आप गिरफ्तार नहीं होंगे। 2012 में एक गोरे आदमी ने पुलिस में फोन किया कि पार्क में एक काला लड़का घूम रहा है और उसे शक है वो अपराधी है। इतनी बात के बाद उसने उस 16 साल केलड़के को गोली मार दी जो अपने पापा के पास जा रहा था। उस गोरे आदमी की गिरफ्तारी नहीं हुई। काफी हो हल्ले के बाद जब केस चला तो वो बाइज्जत बरी होकर आ गया। 2016 में उस आदमी ने उस पिस्तौल की नीलामी की घोषणा की जिससे उसने वो लड़का मारा था। 

आज के दिन अमेरिका में जेल प्राइवेट कम्पनियो के हवाले है। खाना से लेकर सिक्युरिटी तक अरबों का बिजनेस है। एक कैदी कम होना भी वो अफोर्ड नहीं कर सकते प्रॉफिट कम हो जाता है। हर तीन काले आदमियों में से एक ने जेल की हवा खाई हुई है आज के दिन।  

ये तो उस डॉक्यूमेंट्री का सिर्फ 20 फीसदी हिस्सा बताया मैंने। डॉक्यूमेंट्री देखना। उसमे एक आदमी बोलता है कि अमेरिका और बाकी जगह भी शोषक अपने आप को अपडेट करता रहता है। शोषण के नए नए तरीके नए नए नाम ईजाद करता है जो नहीं बदलता वो होता है शोषण। 

इसी डॉक्यूमेंट्री का एक डायलॉग है 

हिस्ट्री इज नॉट जस्ट स्टफ डेट हैपेन बाय एक्सीडेंट।  we are the product of the history that our ancestor choos if we are white .if we are black we are the product of the history that our ancestor most likely did not choose.yet here we are together , the products of that set of choices.and we have to understand that in order to escape it. 


डॉक्यूमेंट्री भले ही अमेरिका की हो पर उसमें से सारा भारत दिखता है। 

Saturday, 21 April 2018

भारतीय समाज , उसके नेता और बलात्कार




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अगर  एक लड़की अगर शालीन कपडे पहनती है तो कोई लड़का उसे ग़लत नजर से नहीं देखेगा। अगर आजादी चाहिए तो नंगे घूमना चाहिए। आजादी की अपनी सीमायें है। छोटे छोटे कपडे पश्चिम पहनावा है हमारी संस्कृति शालीन कपडे पहनने की है। "

"बाल विवाह बलात्कार और महिलाओ के खिलाफ बाकी अपराध रोकने में मददगार है। "

"अगर लड़की की 16 साल की उम्र में शादी कर दी जाए तो शारीरिक जरूरतों के लिए उसके पास पति होगा उसे बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी। "

"मुझे ये कहने में बिलकुल संकोच नहीं है कि 90 प्रतिशत मामलों में लड़की अपनी मर्जी से आदमी के साथ जाती है और वो ही रेप का शिकार होती है। "

"अगर औरत नैतिकता की सीमा लांघेगी तो इस तरह की घटनाये होती रहेंगी। "

"सिर्फ इस कारण से कि भारत को आजादी आधी रात को मिली है , औरतों का आधी रात को घूमना सही है ?"

"अगर आप बलात्कार रोक नहीं सकते तो उसमें आनंद ढूंढ लीजिये। "

" जिस ऑटो में तीन आदमी पहले से बैठे हो उस ऑटो में लड़की को नहीं बैठना चाहिए। "

मनोहर लाल खटटर , ओम प्रकाश चौटाला , सूबे सिंह सुमैन , धर्मवीर गोयत , कैलाश विजय वर्गीय बोत्सा सत्यनारायण , रंजीत सिन्हा और किरण खैर के ये बयान जो आपने ऊपर पढ़े है वो बस एक छोटी सी झलकी है भारत के नेताओ और तथाकथित सम्मानित लोगों द्वारा दिए गए ऐसे बयान लगभग हर रोज अख़बार भरे रहते है। सवाल ये है कि ऐसे बयान ये नेता क्यों देते है ? अगर ये सब बयान अगर ये नेता नहीं देते तो क्या इनके वोटबैंक में कमी जाती? ये लोग मासूम है या शातिर है ? शातिर की सम्भावना ही ज्यादा है   क्या ऐसी बात है जो किसी हस्ती को , किसी नेता को ऐसे बयान देने पर मजबूर करती है। इन बयानों के क्या मायने निकाले जाने चाहिए। क्या इनका असर होता है ? जैसे लोग मासूमियत  के कारण बात बात पर गाली दे देते है पर उनका मतलब वो नहीं होता वैसे ही क्या नेता भी मासूमियत के कारण ये सब बोल जाते है उनका वो मतलब नहीं होता। एक तो " वो मतलब " मुझे आजतक समझ नहीं आया। वो कौन सा मतलब है जो कि नहीं होता है। और अगर वो नहीं ही होता है तो वो आता कहाँ से है। आजकल तो बोला भी इतना जोर से और स्पष्ट जा रहा है कि किसी और मतलब की तो गुंजाईश भी नहीं बचती।  मोदी जी कहते है कि बांग्ला देश की प्रधानमंत्री  शैख़ हसीना का  , औरत होने के बावजूद , आतंकवाद के खिलाफ रुख काबिले तारीफ है। मोदी जी कहते है कि बेटी नहीं बचाओगे तो अपने बेटो के लिए बहु कहाँ से आएँगी ? इन सब का क्या मतलब निकाला जाए। क्या मोदी जी का ये मतलब नहीं था कि औरते सामान्यत बहादुर नहीं होती। या अगर बेटो के लिए बहु के इलावा लड़कियों की जरूरत नहीं है। क्या मैं ज्यादा क्रूर हो रहा हूँ ये मतलब निकालते वक्त ?

जो भी मतलब हो , उत्तर से लेकर दक्षिण तक , पूर्व से लेकर पश्चिम तक ये हमारे नेता है जिन्हे हम वोट देकर चुनते है फिर ये सरकार चलाते है।  ये नेता कानून बनाते है कि बलात्कार की सजा फांसी होगी। सब नेता , सारा समाज अपने मन में मान चुका है कि बलात्कार लड़की की ग़लती के कारण होता है तो फांसी किसे होगी ? हाई कोर्ट लड़की की ना को हाँ मानता है तो बलात्कार कैसे होगा ? 8 साल की लड़की का बलात्कार होता है हत्या होती है और अख़बार लिखता है कि फलाने अस्पताल की जानी मानी स्त्री रोग विशेषज्ञ का कहना है कि हिमेन चोट लगने से भी फट सकती है। ये लिखते हुए उस आदमी के हाथ नहीं काँपे होंगे ? मेरा पढ़ते हुए दिल लरज रहा था। इब्ने इंशा ने भी  जब  अख़बार वाले से  ये इल्तजा की होगी कि सिर्फ अख़बार बेच , ईमान मत बेच। तब उसने ये तो  नहीं सोचा होगा कि अख़बार वाले ईमान बेचने से भी आगे बढ़ सकते है। 

 हिन्दू मुसलमान अब गाय और सुवर की बजाय छोटी बच्ची के बलात्कार पर लड़ रहे है।  मंटो को अश्लील कहा जाता था। कैसी कहानी लिखता था। दो आदमी एक लड़की खरीद के लाते है बाद में उन्हें अफ़सोस होता है जब उन्हें पता चलता है कि वो लड़की तो दूसरे धर्म की ना होकर उनके धर्म की ही है। हम 1947 से आगे बढ़ गए है आज 2018 है। मंटो नहीं है आज वो होता तो क्या लिखता ? आज तो सब कुछ वैसे ही लिखा जा रहा है। अख़बार वाला लिखता है सिर्फ मर्डर हुआ है बलात्कार नहीं हुआ। 

बलात्कार एक घिनौनी हरकत है मंदिर में लड़की का धर्म देखकर बलात्कार करना और भी घिनौनी हरकत है। इससे भी ज्यादा घिनौना तर्क ये है कि बलात्कार तो हर धर्म की लड़कियों का हो रहा है। इतना भयावय वक्त चल रहा है कि हर गंदे से गंदे काम को ,हर बेहयाई को जस्टिफाई करने के लिए उससे बड़ी बेहयाई मिल जाती है। धूप फिल्म में एक सीन है जब एक पुलिस इंस्पेक्टर एक शहीद के बाप से रिश्वत मांगता है तो बाप उससे पूछता है कि आपके हरियाणा के तो बहुत जवान शहीद हुए है आपको रिश्वत मांगते शर्म नहीं आती। इस पर इंस्पेक्टर बेशर्मी से जवाब देता है कि हमारे यहाँ कोई भेदभाव नहीं है हम तो हरियाणा वालों से भी उतनी ही रिश्वत लेते है जितनी आप से ले रहे है। अब जब इस बेहयाई तक बात जाती है कि ये तर्क जाए कि मुस्लिम लड़की की क्या बात है हम तो हिन्दू लड़कियों के भी ऐसे ही बलात्कार करते है। तो आगे क्या रह जाता है। 

इस घटना का चारो तरफ विरोध हो रहा है। विरोध करने वाले भी कह रहे है कि विरोध पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। "पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए " बाकी सब पूर्वाग्रहों की तरह ये जुमला भी हमारे अंदर तक इतना बैठ गया है कि हम गाहे बगाहे ये बात कहते रहते है बिना ये सोचे कि ये देश , ये दुनिया सब पोलटिक्स से ही चल रहा है। सारे कानून , हमारे जीवन के सारे फैसले पोलटिक्स ही तय करती है। ये सब पोलटिक्स करने का ही नतीजा है कि कोई आदमी रात के 8 बजे आकर कहता है कि सुबह सबको लाइन में लगना है और हम सुबह सुबह लाइन में लग जाते है क्यूँकि पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। नेता लोग जब ये बात कहते है कि फलाने मुद्दे पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो उनकी चिंता समझ आती है वो क्यों चाहेंगे कि जनहित के मुद्दे पर पोलटिक्स हो। पर हम क्यों ये दुमछल्ला साथ लगाते है कि विरोध प्रदर्शन होना चाहिए पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए। अगर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो मोमबत्ती तो अपने घर में भी जला सकते है।बिना विचारधारा के विचार , बिना पोलटिक्स के विरोध से हासिल क्या होगा ? 
बिना पोलटिक्स के गुजारा नहीं है। पोलटिक्स अच्छी बुरी नहीं होती।  पोलटिक्स या तो जनता के हक में होती है या शोषक के हक में होती है। अगर छोटे बच्चे बच्चियों के बलात्कार पर पोलटिक्स नहीं होनी चाहिए तो दुनिया में ऐसा कोई मुद्दा ही नहीं है जिस पर पोलटिक्स हो सके। इस मुद्दे पर तो इस कदर पोलटिक्स होनी चाहिए कि कोई नेता भविष्य में ऐसे बयान देने की जुर्रत कर सके।