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Friday, 30 March 2018

दोस्ती




सूरज का आज फिर मूड उखड़ा हुआ था। बच्चो को देख कर लगता है दुनिया कितनी आसान कितनी सहज है। दिन में कितनी बार झगड़ा करते है थोड़ी देर बाद भूल जाते है। न झगड़ा करने की कोई वजह होती है न उसे याद रखने की। सूरज के कमरे में गयी तो वो सुबक रहा था। 

क्या हुआ बेटा 

- मम्मी मैं कभी कोई दोस्त नहीं बनाऊंगा। सब मुझसे नाराज हो जाते है। 

मुझे 9 साल पहले अपनी डायरी में लिखे शब्द याद आने लगे। मानो सूरज मेरी ही डायरी के शब्द मुझे सुना रहा हो जब अपनी बचपन की दोस्त सुमन  से लड़ाई करके घर आयी थी

  आज के बाद कोई दोस्त नहीं बनाना। न दोस्त होंगे न दिल दुखेगा। 

और सच में उस दिन के बाद कोई दोस्त नहीं बना। उसके एक साल बाद शादी हुई। मैंने शादी में भी सुमन को नहीं बुलाया। फिर शादी के बाद तो औरत की जिंदगी में दोस्ती की गुंजाईश वैसे ही कहाँ रहती है। 9 साल गुजर गए उन बातों को। सुमन से बोले हुए भी 9 साल गुजर गए। जिससे बिना बोले एक घंटा भी नहीं गुजरता था। 

मम्मी आप भी नहीं सुन रही मेरी बात।  कोई मुझे प्यार नहीं करता 

मेरा ध्यान फिर सूरज पर गया।  " अरे क्या हुआ ? ऐसे क्यों बोल रहे हो। "

" मेरा कोई बेस्ट फ्रेंड नहीं है। अर्णब भी साहिल और पीहू का बेस्ट फ्रेंड है। आज तो गुस्से में मैंने अर्णब को भला बुरा भी कह दिया। उससे भी मुझे ही बुरा लगा। मैंने सॉरी भी कहा पर अर्णब फिर बोला ही नहीं। अभी घर आकर मैंने उसे फोन भी किया। फोन भी नहीं उठाया। "

सूरज रोते रोते अपनी कहानी सुना रहा था। मुझे 1997 की अपनी डायरी याद आ रही थी। सूरज जितनी ही तो थी तब बस फर्क ये था मैं मम्मी की बजाय डायरी को सब बातें कहती थी। मैंने अलमीरा से वो डायरी निकाली। वो पेज निकाला। डेट लिखी थी 


  17
जनवरी 1997  

" आज सुमन को बहुत भला बुरा कहा फिर खुद को बुरा लगा। उसने मुझ से फिर बात भी नहीं की। मुझे भी पता नहीं किस बात पर गुस्सा आ जाता है। पर इतनी भी बड़ी बात नहीं थी कि बात ही न करे कोई। उसे क्या पता नहीं है कि मुझे कितना बुरा लग रहा है। कभी ऐसा भी होता होगा जब उसे बुरा लगता होगा और मुझे न पता चलता होगा। दोस्ती अजीब चीज है। मुझे नहीं पसंद। इससे अच्छा तो अकेले रह लो। 

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अभी सुमन को फोन किया मैंने माफ़ी मांगने को तो पता चला वो तो मैच देख रही है। इतना गुस्सा आया पर मैंने उसे कुछ नहीं कहा। उसे अच्छे से पता है मेरे घर केबल नहीं है। द्रविड़ की सेंचुरी बनने वाली होगी। अब मैं उससे कभी बात नहीं करुँगी। उससे क्या मैं किसी से बात नहीं करुँगी। मैं दोस्त ही नहीं बनाउंगी। 


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 आज का दिन कितना अच्छा था दोस्त कितने अच्छे होते है बिना कहे ही सब समझ लेते है। मैं बेवकूफ क्या क्या लिख रही थी तभी सुमन घर आ पहुंची थी और जाने कितनी बार सोर्री बोल कर पकड़ अपने घर ले गयी। हमने द्रविड़ की पूरी पारी देखी। हम दोनों को ही द्रविड़ बहुत पसंद है। 148 रन बनाये उसने। मैं कभी सुमन से नाराज नहीं होने की। सुमन मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। 

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 मैं सब पढ़कर रो रही थी और रोते पढ़ रही थी मुझे पता भी न चला कब अर्णब घर आया और सूरज उसके साथ खेलने भी चला गया। उफ्फ कितनी बड़ी अहमक थी मैं। 9 साल सुमन से बात नहीं की। अब नंबर कहाँ मिलेगा उसका। नंबर मिलना कौन सी बड़ी बात है। बड़ी बात तो फोन करना है। मोबाईल हाथ में आते आते हाथ कांपने लगे थे। ढेरो किन्तु परन्तु घूमने लगे थे। कांपते हाथो से फोन मिलाया 

- हेल्लो सुमन 

दूसरी तरफ से चीखती हुई आवाज आयी 

- पूनम 


अब टेक्नोलॉजी पर गुस्सा आ रहा था फोन में गले मिलने का ऑप्शन क्यों नहीं था 

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