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Sunday, 11 March 2018

लाला कम्पनी और लाल

                                                     

हरियाणा के मुख्यमंत्री है हमारे मनोहर लाल खटटर। हरियाणा में समय समय पर लाल होते रहते है मनोहर जी लेटेस्ट है। हर दूसरे तीसरे हफ्ते वो कुछ ऐसा कमाल करते कहते रहते है कि मुझे मेरी दीवार को कष्ट देना पड़ता है। अभी पांच -छह महीने पहले की बात है जब कपडा व्यापारियों ने जीएसटी से होने वाली परेशानियाँ जब खटटर जी को बताई तो खटटर साहब कहने लगे कि कपडा व्यापारी ये चोरी छोड़ दे। वो भी कभी कपडा बेचते थे उन्हें सब पता है वो भी बहुत दो नंबर में काम करते थे। अब कोई क्या बोले। बेचारे बीजेपी समर्थक अपना सर फोड़ते हैं। 

 हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो। 

इस पर चुटकी लेते हुए एक विरोधी नेता ने कहा कि उस वक्त कपडे पर टैक्स तो लगता नहीं था तो खटटर साहब चोरी क्या करते थे। जरूर 6 मीटर की जगह 5 मीटर कपडा बेचते होंगे। 

अभी हाल ही में हरियाणा में आँगन बाड़ी वर्कर अपनी मांगो के लिए आंदोलन कर रही है। इस पर जवाब देते हुए मुख्यमंत्री साहब ने विधानसभा में कहा कि हरियाणा में लाल रंग की बदमाशी नहीं चलने दी जायेगी। अब बता नहीं वो ये कहते हुए डर रहे थे। डरा रहे थे। क्या कर रहे थे। खैर उन्होंने खुद ही कुछ महीनो पहले कहा था कि वो कपडे के व्यापारी थे और चोरी भी करते थे। टैक्स की चोरी गैर क़ानूनी है पर इस देश में श्रम की चोरी गैर क़ानूनी नहीं है बल्कि इसके खिलाफ आवाज उठाना गैरकानूनी है। इससे देश की इज्जत को ठेस पहुँचती है। अभी अभी प्रधानमंत्री जी भी कहकर हटे है कि भारत जैसा फ्री मार्किट दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। फ्री से निसंदेह ही उनका मतलब काम करने की सरलता से था। यानी आपको प्रदूषण करने की छूट है कोई टोकने वाला नहीं होगा। आपको श्रम की लूट की छूट है। भारत के  प्राइवेट सेक्टर में एक चिरपरिचित नाम अक्सर सुनने को मिलता है आपने भी सुना होगा - लाला कम्पनी। लाला कम्पनी ऐसा शुद्ध भारतीय विचार है जिसमें श्रम के अधिकतम शोषण पर बल दिया जाता है। आज भारत में 6 दिन की वर्किंग होती है नॉर्मली कार्य के घंटे 8 होते है। कुछ मल्टीनेशनल कम्पनी अपने देश के नियमों से चलकर 5 ही दिन काम करती है। लाला कम्पनी के बारे में बताने से पहले बता दूँ जिस लाल रंग को मुख्यमंत्री बदमाश कह रहे है। कार्य के घंटे 8 तक सिमित करने में उस लाल रंग का बहुत बड़ा हाथ है। ये सब बिना संघर्ष नहीं मिला है। खैर बात लाला कम्पनी की हो रही थी 

- सभी प्राइवेट स्कूल लाला मैनेजमेंट नियम के अनुसार ही चलते है। एक शहर में जाने कितने प्राइवेट स्कूल होंगे जहाँ एक अध्यापक की तनखाह 3000 रूपये के निम्नतम स्तर से शुरू होती है। कई जगह तो इससे भी नीचे। अनुशासन के नाम पर कई स्कूलों में क्लास में अध्यापक को कुर्सी नहीं मुहैया करवाई जाती हर शहर में ऐसे बंधुआ मजदूर हजारों की तादाद में है और कहीं कोई विरोध का स्वर कभी सुनाई नहीं देता। 

- अब आप प्राइवेट अस्पतालों पर आ जाइये जहाँ न आने का समय फिक्स होता है न जाने का। ट्रेनिंग के नाम पर साल साल फ्री में नर्स , बाकी स्टाफ से फ्री में काम लिया जाता है। उसके बाद भी सैलेरी मेहनत के मुताबिक आधी भी नहीं दी जाती। जॉब सिक्युरिटी को तो भूल ही जाइये 

-उसके बाद हर शहर में एक बड़ा बाजार होता है। दुकाने , शो रूम। वर्किंग ऑवर  सुबह से दस से शाम 11 बजे। तनखाह ? 5000 से दस हजार। छुट्टी ? कोई नहीं। 

-शहर के सेक्टरों में बड़ी बड़ी कोठियाँ कोठियां में नौकर। किस उम्र के ? 7 साल के दस साल के 15 साल की उम्र के। काम के घंटे नामालूम। सैलरी नामालूम। यौन शोषण नामालूम 

ये तो सब वो उदारहण है जिनसे हम हर रोज रु ब रु होते है। अभी फैक्ट्रियों की तरफ तो रुख किया ही नहीं है। जहाँ शोषण अपमान की एक इबारत लिखी जाती है। दस घंटे काम नॉर्मल माना जाता है। 6 बजे घर जाने वाले को सरकारी ऑफिस समझ रखा है क्या का ताना दिया जाता है। 

ये है लाला कम्पनी की एक झलक। भले ही लाल रंग पिछले कुछ सालों में मजदूरों के हक़ में विरोध का स्वर ठीक प्रकार से रखने में नाकाम रहा हो। भले ही हर रोज लाल रंग के दफनाए जाने के जश्न बनाये जाते हो । फिर भी उसका डर लाला लोगों को सताता रहता है उसकी वजह एक ही है कि उन्हें भी अच्छी तरह पता है कि जब गरीबों , मजदूरों का शोषण ज़िंदा है लाल रंग को खत्म करना  नामुमकिन है। जिस दिन शोषितो के हाथ में लड़ाई आएगी उस दिन लाला कम्पनी को अपने हर जुल्म का हिसाब देना पड़ेगा उसी दिन का डर मनोहर लाल जी का विधानसभा में भी पीछा नहीं छोड़ता आखिर वो भी तो कपडा व्यापारी थे और ये भी खुद ही स्वीकार  कर कर चुके है कि चोरी भी करते थे। 

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