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Friday, 30 March 2018

दोस्ती




सूरज का आज फिर मूड उखड़ा हुआ था। बच्चो को देख कर लगता है दुनिया कितनी आसान कितनी सहज है। दिन में कितनी बार झगड़ा करते है थोड़ी देर बाद भूल जाते है। न झगड़ा करने की कोई वजह होती है न उसे याद रखने की। सूरज के कमरे में गयी तो वो सुबक रहा था। 

क्या हुआ बेटा 

- मम्मी मैं कभी कोई दोस्त नहीं बनाऊंगा। सब मुझसे नाराज हो जाते है। 

मुझे 9 साल पहले अपनी डायरी में लिखे शब्द याद आने लगे। मानो सूरज मेरी ही डायरी के शब्द मुझे सुना रहा हो जब अपनी बचपन की दोस्त सुमन  से लड़ाई करके घर आयी थी

  आज के बाद कोई दोस्त नहीं बनाना। न दोस्त होंगे न दिल दुखेगा। 

और सच में उस दिन के बाद कोई दोस्त नहीं बना। उसके एक साल बाद शादी हुई। मैंने शादी में भी सुमन को नहीं बुलाया। फिर शादी के बाद तो औरत की जिंदगी में दोस्ती की गुंजाईश वैसे ही कहाँ रहती है। 9 साल गुजर गए उन बातों को। सुमन से बोले हुए भी 9 साल गुजर गए। जिससे बिना बोले एक घंटा भी नहीं गुजरता था। 

मम्मी आप भी नहीं सुन रही मेरी बात।  कोई मुझे प्यार नहीं करता 

मेरा ध्यान फिर सूरज पर गया।  " अरे क्या हुआ ? ऐसे क्यों बोल रहे हो। "

" मेरा कोई बेस्ट फ्रेंड नहीं है। अर्णब भी साहिल और पीहू का बेस्ट फ्रेंड है। आज तो गुस्से में मैंने अर्णब को भला बुरा भी कह दिया। उससे भी मुझे ही बुरा लगा। मैंने सॉरी भी कहा पर अर्णब फिर बोला ही नहीं। अभी घर आकर मैंने उसे फोन भी किया। फोन भी नहीं उठाया। "

सूरज रोते रोते अपनी कहानी सुना रहा था। मुझे 1997 की अपनी डायरी याद आ रही थी। सूरज जितनी ही तो थी तब बस फर्क ये था मैं मम्मी की बजाय डायरी को सब बातें कहती थी। मैंने अलमीरा से वो डायरी निकाली। वो पेज निकाला। डेट लिखी थी 


  17
जनवरी 1997  

" आज सुमन को बहुत भला बुरा कहा फिर खुद को बुरा लगा। उसने मुझ से फिर बात भी नहीं की। मुझे भी पता नहीं किस बात पर गुस्सा आ जाता है। पर इतनी भी बड़ी बात नहीं थी कि बात ही न करे कोई। उसे क्या पता नहीं है कि मुझे कितना बुरा लग रहा है। कभी ऐसा भी होता होगा जब उसे बुरा लगता होगा और मुझे न पता चलता होगा। दोस्ती अजीब चीज है। मुझे नहीं पसंद। इससे अच्छा तो अकेले रह लो। 

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अभी सुमन को फोन किया मैंने माफ़ी मांगने को तो पता चला वो तो मैच देख रही है। इतना गुस्सा आया पर मैंने उसे कुछ नहीं कहा। उसे अच्छे से पता है मेरे घर केबल नहीं है। द्रविड़ की सेंचुरी बनने वाली होगी। अब मैं उससे कभी बात नहीं करुँगी। उससे क्या मैं किसी से बात नहीं करुँगी। मैं दोस्त ही नहीं बनाउंगी। 


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 आज का दिन कितना अच्छा था दोस्त कितने अच्छे होते है बिना कहे ही सब समझ लेते है। मैं बेवकूफ क्या क्या लिख रही थी तभी सुमन घर आ पहुंची थी और जाने कितनी बार सोर्री बोल कर पकड़ अपने घर ले गयी। हमने द्रविड़ की पूरी पारी देखी। हम दोनों को ही द्रविड़ बहुत पसंद है। 148 रन बनाये उसने। मैं कभी सुमन से नाराज नहीं होने की। सुमन मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। 

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 मैं सब पढ़कर रो रही थी और रोते पढ़ रही थी मुझे पता भी न चला कब अर्णब घर आया और सूरज उसके साथ खेलने भी चला गया। उफ्फ कितनी बड़ी अहमक थी मैं। 9 साल सुमन से बात नहीं की। अब नंबर कहाँ मिलेगा उसका। नंबर मिलना कौन सी बड़ी बात है। बड़ी बात तो फोन करना है। मोबाईल हाथ में आते आते हाथ कांपने लगे थे। ढेरो किन्तु परन्तु घूमने लगे थे। कांपते हाथो से फोन मिलाया 

- हेल्लो सुमन 

दूसरी तरफ से चीखती हुई आवाज आयी 

- पूनम 


अब टेक्नोलॉजी पर गुस्सा आ रहा था फोन में गले मिलने का ऑप्शन क्यों नहीं था 

Thursday, 29 March 2018

फेयरवेल स्पीच


आज मैं फेसबुक के मैदान से संन्यास लेने की घोषणा कर रहा हूँ। इसके पीछे मेरा मकसद नौजवान खिलाडियों को मौक़ा देना है। ( ऐसा कहने का रिवाज है वरना तो सबको पता होता है एक प्लेयर के हटने से कौन से युवाओ को मौका मिल जाना है। खेल से तो तभी रिटायरमेंट लिया जाता है जब सांस फूलने लगता है। नए खिलाडी सोचने लगते है कि यार ये अंकल खेल का मजा ख़राब कर रहा है। )मेरे 8 साल लम्बे फेसबुक कैरियर में प्यार और स्नेह के साथ साथ जो गालियाँ मुझे यहाँ मिली उसके लिए मैं सब दोस्तों का तहे दिल से शुक्र गुजार हूँ। जब साल 2010 आधा जा चुका था तब मैंने फेसबुक खेलना शुरू किया था। तब से लेकर आज तक देखता हूँ तो एक लम्बा सफर तय कर लिया है। तुकबंदी से शुरुवात कर के फिर 2012 की क्रांति में भाग लेना फिर पिछले साल किताब तक का सफर बहुत यादगार है। मानस भारद्वाज मेरा पहला सोशल मिडिया दोस्त था जो की आज तक रहा। इसके लिए उसको नोबल नहीं तो कुछ न कुछ तो मिलना चाहिए। उसके बाद इस साल तक दोस्त बनने बिछड़ने का दौर जारी ही है। कुछ दोस्त तो लाइफ टाइम कार्ड के साथ आये हैं। 
जहाँ तक संन्यास के बाद की बात है तो मैं भी वही करूँगा जो बाकी खेलो के खिलाडी सन्यास लेने के बाद करते है। वैसे सन्यास के बाद ज्यादा कॅरियर ऑप्शन होते नहीं है। लेदेकर या तो आप कोच बन सकते है। या बाहर से कमेंट्री कर सकते है। फेसबुक पर बाहर से कमेंट्री करना बहुत आसान काम नहीं है। मैंने बहुत सन्यास लिए खिलाडियों को देखा है जो कमेंट्री करते करते मैदान में ही कूद आते है। मैं कोचिंग में अपना हाथ आजमाऊँगा। वैसे तो फेसबुक की कोचिंग देना भी कोई आसान काम नहीं है। पर इसमें अनुभव काम आ जाता है मैंने तो नाम भी सोच लिया है।

                                                           
अमोल सरोज फेसबुक कोचिंग सेंटर।
मेरी कोचिंग सेंटर में लड़कियों के इनबॉक्स में हाय कहने से लेकर प्रगतिशील बनने तक खेल के सब तकनीक को कायदे से सिखाया जाएगा। कोचिंग सेंटर के प्रोमोशन के लिए कुछ काम की बातें  रहा हूँ।
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फेसबुक बहुत प्यारी जगह है। यहाँ आप बहुत प्यारे और शानदार लोगों से मिल सकते है। दोस्त बना सकते है। बस रायता ना फैलाये। सबकी वाल का सम्मान करें। फेसबुक ट्रायल में किसी भी तरीके से भाग ना ले।  ग़लत बात पर कम से कम एक बार तो टोके। दोबारा कभी न टोके।
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कमेंट के रिप्लाई बॉक्स को बहुत सावधानी से इस्तेमाल करे। इसे ज्यादा लम्बा ना होने दे। जिनकी नीयत पर शक हो उन्हें कभी जवाब न दे।
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कुछ तकनीक खिलाडी तब सीखता है जब उसकी खेल छोड़ने की बारी आ जाती है। मेरी एक दोस्त के बदौलत ये बात भी मैंने अभी सीखी कि दोस्ती के पब्लिक  दिखावे से थोड़ा बचे। दोस्ती निजी होती है। खूब दोस्त बनाये। खूब गिफ्ट दे। खूब गिफ्ट ले। खूब पार्टी करे पर जितना हो सके फेसबुक पर कम दिखाए। आपकी नीयत ही सब कुछ नहीं होती है। फेसबुक एक सार्वजानिक प्लेटफॉर्म है। यहाँ सब तरह के लोग है। कब आपका गैंग बना दिया जाएगा पता भी न लगेगा। तो बेहतर है दोस्ती को फोन  और अपने घर  तक रखें।
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कभी भी , कभी भी न भूले फेसबुक एक सार्वजानिक प्लेटफॉर्म है। न गालियां दे ना ऐसे दोस्त बनाये जो गालियों को बढ़ावा देते हो। यहाँ दोस्तों की कमी नहीं है। ऐसे भी बहुत मिल जाने है जो गालियां नहीं देते होंगे। यकीन मानिये बहुत अच्छा लगता है जब आप बीमारी से दूर होते हो। बहुत मजा आता है बिना गालियों के बात करने में।
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कोशिश कीजिये कि सार्वजानिक रूप से कभी इंटेंशनली किसी दोस्त को हर्ट करने की कोशिश न करे। कमेंट करते वक्त दो बार सोच ले। इनबॉक्स का ऑप्शन भी खुला रहता है। एक बार तीर कमान से निकलने के बाद वापिस नहीं आता। अच्छे दोस्त को हर्ट करने के बाद जो फीलिंग आती है वो बहुत बुरी होती है। आनंद बक्शी ने बोला भी है
जब जिस रोज किसी का यार जुदा होता है
कुछ मत पूछो यारो दिल का हाल बुरा होता है।

बाकी तकनीक मैं अपने कोचिंग सेंटर के लिए बचा के रखता हूँ।
फेयरवेल पार्टी की जरुरत नहीं है। अरे नहीं नहीं रोने की भी जरुरत नहीं है। हँसके विदा करो। रोने की क्या बात है। रोने की कोई बात नहीं है। देखो इमोशनल कर दिया तुम लोगो ने मुझे भी 

Wednesday, 28 March 2018

खाप पंचायत , सुप्रीम कोर्ट और बालिग़ की शादी


यह अदालत का दायित्व है कि वह नागरिको के बीच ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करे कि बालिग बिना डर के मर्जी के शादी कर सकें। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून प्रतिष्ठा के नाम पर किसी समूह या पंचायत द्वारा प्रेम या विवाह को लेकर किसी को प्रताड़ित करने या उसके साथ अत्याचार करने की इजाजत नहीं देता। “

जब दो बालिग स्वेच्छा से शादी करते है तो वे अपनी राह खुद चुनते है वे समझते है कि यही उनका उद्देश्य है तो उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार है। उनके अधिकार में दखल देना असंवैधानिक है। कोई भी समूह या पंचायत किसी राजा की तरह लड़का लड़की को हाजिर होने के लिए नहीं कह सकता। “

ये स्टेटमेंट भारत की सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों के लिए दी है। ये स्टेटमेंट सुप्रीम कोर्ट को क्यों देनी पड़ी ? भारत देश में कभी मनु का संविधान चलता था। मनु का कहना था कि दलितों और औरतो को सम्पति रखने का अधिकार नहीं है। औरत को आजाद रहने का अधिकार नहीं है। सदियों बाद भारत को वो संविधान मिला जिसमें सब इंसानो को बराबर कहा गया। सबसे कमजोर तबके के हकों को भी सुनिश्चित किया गया। उसी संविधान में कहा गया कि बालिग होने पर देश का नागरिक अपनी मर्जी से अपने दोस्त , अपना जीवनसाथी चुन सकता है। शादी कर सकता है। पर अफ़सोस न तो भारत के लोग ऐसे संविधान के लिए तैयार थे न उन्हें तैयार किया गया। विज्ञानं की तरह उन्होंने इस किताब को भी रट भले ही लिया पर व्यवहार में उनका अपना कानून चलता रहा 

अब हरियाणा की बात करे तो यहाँ शादी के लिए  बालिग होना ही जरुरी नहीं है । आप अपनी जाति से बाहर शादी नहीं कर सकते। कानून इजाजत देता है पर फिर भी 99 फीसदी लोग अपनी ही जाति में शादी करते है आप अंदाजा लगा सकते है कि पहरा कितना गहरा होगा। फिर आप अपनी जाति में भी हर किसी से शादी नहीं कर सकते। आप अपनी गौत्र में शादी नहीं कर सकते। अगर आप ऐसा करते है तो समाज आपकी और आपके जीवनसाथी की हत्या करके आपकी शादी को नल एंड वोयड करार कर देगा। इसी परम्परा के खिलाफ कल सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिए है  ये देश के नागरिक के अधिकारों का हनन है। कोई कहीं भी शादी कर सकता है। उसे रोका नहीं जा सकता है।  कानून की किताब पढ़े इंसान से ऐसी ही बात की अपेक्षा की जाती है। पर कहानी अभी बाकी है। 

जो जज , जो कोर्ट अपने संविधान का रखवाला बताता है। जिसके जिम्मे संविधान की रक्षा  है उनका हाल देखिये। राजस्थान हाई कोर्ट के बाहर मनु की मूर्ति लगी है। इस मूर्ति का लगना ही बताता है कि जिन लोगों को भारतीय संविधान को लागू करने की जिम्मेदारी दी गयी है उनकी श्रद्धा किस कानून में है।  साल 2015 की बात है  राजस्थान हाईकोर्ट के जज ने अपनी 30 साल की बेटी घर मे कैद कर रखी थी । प्रेमी सुप्रीम कोर्ट गया । सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज को समझा बुझा कर बेटी और प्रेमी का मिलन करवा दिया।  हाईकोर्ट के इन जज साहब ने कितने हॉनर किलिंग के मामलों में जजमेंट दिया होगा । कितने प्रेमी युगल अपने पेरेंट्स से जान बचाते इनके पास आये होंगे ।

 अभी पिछले साल हादिया केस में केरल हाई कोर्ट के जजमेंट के अंश देखिये 

एक लड़की जो सिर्फ 24 साल की है इस उम्र में लडकी भावुक और आसानी से प्रभावित हो जाने वाली होती है जिसका की बहुत तरीको से शोषण सम्भव है 

वर्तमान हालातों में ये बहुत ही खतरनाक होगा कि अखिला जो चाहती है उसे करने दिया जाए 

-उसकी उम्र को देखते हुए कहा जा सकता है कि वो केवल अपने माँ बाप के पास ही सुरक्षित रह सकती है 

शादी एक लड़की की जिंदगी का महत्वपूर्ण निर्णय है ये  माँ बाप की इजाजत से ही लिया जा सकता है। 

अब ये सब बातें किस कानून में लिखी है  सबको पता है। केरल हाई कोर्ट ने एक 24 साल की लड़की  की शादी बिना उसकी मर्जी के रद्द कर दी जबकि वो लड़की न तो पागल थी न अपने निर्णय लेने में अक्षम थी। जिस सुप्रीम कोर्ट ने कल खाप पंचायतों को बालिग नागरिको की शादी में टाँग न अड़ाने का आदेश दिया है। उसी सुप्रीम कोर्ट के पास पिछले साल हादिया का केस गया था। केस तो कुछ था ही नहीं। पर सुप्रीम कोर्ट ने लड़की को पढ़ने के लिए कॉलेज में भेज दिया और केरल हाई कोर्ट के आदेश को रद्द भी नहीं किया और केस को अगली तारीख दे दी। 

सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश खाप पंचायत को दिए है वो स्वागत योग्य है बशर्ते कि कोर्ट अपने जजों को भी ये बात समझा सके। चिराग तले अँधेरे वाली बात इतने बड़े देश के सर्वोच्य अदालत के लिए कहना अच्छा नहीं लगता। पर उन्हें भी एक बार सोचना चाहिए। वो मनु महाराज की अदालत में नहीं बैठे है भारतीय लोकतंत्र की अदालत है। इसका सम्मान बचाये रखना उनकी जिम्मेदारी है 


Saturday, 24 March 2018

सुपरमैन अरविन्द हरियाणा बचाने आ रहे है


अरविन्द केजरीवाल कल हरियाणा बचाने हिसार आ रहे है। बहुत अफ़सोस की बात है कि मुझे कल जरुरी काम से भिवानी जाना पड़ रहा है तो मैं उनके हरियाणा को बचाने में शरीक नहीं हो पाउँगा। पर एक बात का सकून भी है कि कल भिवानी बेख़ौफ़ हो कर जा सकता हूँ। जब हरियाणा सारा ही बच जाएगा तो भिवानी को भी कल कुछ नहीं होने का। केजरीवाल जी को हरियाणा को बचाने कायदे से रात को आना चाहिए था। दिन में  एक चौथाई हरियाणा तो वैसे ही दिल्ली रहता है। सारे हरियाणा को तो नहीं बचा पाएंगे। बाकी को दिल्ली जाकर बचाना पड़ेगा।
  
वक़्त भी केजरीवल जी ने ग़लत चुना है।  हरियाणा की जनता बहुत दयालु है। पिछले तीन चार साल में कई बार केजरीवाल को मौक़ा देने के लिए हरियाणा में आग लगा दी थी पर केजरीवाल भाई बचाने आये ही नहीं। अभी पीछे ही मौका था जब राम रहीम वाले मसले पर पंचकूला जल रहा था। पूरा दिन जलता रहा है केजरीवाल का इन्तजार करता रहा कि भाई अब आये भाई तब आये। उससे पहले जाट आंदोलन ने भी केजरीवाल जी को हरियाणा बचाने के बहुत मौके दिए थे। खैर आदमी की सौ मजबूरियाँ होती है क्या बता उस वक्त उनका सुपरमैन वाला कुरता सिल कर ना आया। पर चलो देर आये दुरुस्त आये हरियाणा की जनता बहुत दयावान है केजरीवाल को और भी मौके देगी। 

केजरीवाल जी नेता है। बनिया भी है ये बात वो खुद ही बता चुके है। बनिया और नेता का कॉम्बिनेशन बहुत अच्छा होता है और फिर उन्हें तो प्रदेश बचाने का अनुभव भी बहुत है। 2010  में दिल्ली बचाने गए थे तब  दिल्ली को ख़त्म होने में बस डेढ़ महीना ही बचा था। सारे दिल्ली वाले भाग भाग कर जंतर मन्तर  पर खड़े हो गए थे।  तब से लेकर आज तक 8 साल हो गए मजाल की दिल्ली का कुछ बिगड़ा हो। अब कोई जंतर मन्तर पर खड़ा नहीं होता। सब आराम से अपने घर में सोते है। अभी डेढ़ साल पहले की ही बात है केजरीवाल पंजाब को भी बचाने गए थे। वहाँ ये बयान दिया था कि पंजाब क्या मैं तो पंजाब का सारा पानी भी बचाऊँगा। हरियाणा क्या करेगा पानी का। हरियाणा वालों को दारु पीने तक का शऊर नहीं है पानी का क्या करेंगे वो। पर पंजाब वालों को कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा था। कमाल ही बात है बिना केजरीवाल के , पंजाब भी बचा हुआ है अब तक। राजनीती में शब्द पीछा करते है कल केजरीवाल हरियाणा आ रहे है। क्या कहेंगे ?  पानी तो पंजाब से नहीं ला सकता बिना पानी वाला हरियाणा बचा लूँगा। पर जैसा मैंने आपको बताया कि केजरीवाल जी नेता है तो ये बयान वयान से निपटना उन्हें आता है। वैसे भी हरियाणा पंजाब के लोग पानी वाली बात को ज्यादा सीरियसली नहीं लेते। कांग्रेस , इनलो , बीजेपी अकाली तमाम पार्टी दोनों प्रदेश को पिछले 40 साल से ऐसे बेवकूफ बना रही है। हरियाणा में बोलते है पानी लाकर रहेंगे पंजाब जाकर कहते है पानी तो नहीं देने का किसी को भाई। बेवकूफ बनने का अपना मजा है। 

हरियाणा को बचाने केजरीवाल अकेले नहीं आ रहे है साथ में नवीन जयहिंद भी आ रहे है। उनकी आवाज आजकल एफएम पर सुनाई दे रही है। मराठी मानुस की तर्ज पर हरियाणवी में बोल रहे है कि हरियाणा का आदमी दुनिया में सबते बढ़िया है हरियाणा का आदमी दुनिया में सबते प्यारा है। 
हाय ऐसे सबसे बढ़िया आदमी के साथ नाइंसाफी हो रही है। पर अब टेंशन नहीं है सुपरमैन साहब आ रहे है दुनिया के सबसे बढ़िया और प्यारे आदमी को बचाने। वैसे हरियाणा के आदमी से नवीन का क्या आशय है वो ही जाने। ये भी कमाल बात है मैं 37 साल से हरियाणा में रह रहा हूँ। मुझे आजतक नहीं पता चला कि हरियाणा में दुनिया का सबते बढ़िया आदमी रहता है। हरियाणा जहाँ जातिवाद  और मर्दवाद चरम पर है। दलितों पर शोषण की नयी इबारत हर रोज लिखी जा रही है। हरियाणा जिसकी बोली के हर दूसरे शब्द में दलितों औरतों के लिए घृणा भरी रहती है उसका आदमी दुनिया में सबते बढ़िया है। खैर नवीन जयहिंद भी नेता है। अब कह रहा है तो सही ही कह रहा होगा। 

बाकी हरियाणा बच जाए तो इत्तला दे दीजियेगा। वैसे ऐसे ही बचाने वाले के बारे में हरिशंकर परसाई भी कुछ कहकर गए है। 

"जनतंत्र बचाने के पहले ये सवाल उठता है - किसके लिए बचाये ? जनतंत्र बच गया और फ़ालतू पड़ा रहा , तो किस काम का। बाग़ की सब्जी को उजाडु ढोरों से बचाते है , तो क्या इसलिए कि वह खड़ी खड़ी सूख जाए ? नहीं , बचानेवाला सब्जी पकाकर खाता है। जनतंत्र अगर बचेगा तो इसकी सब्जी पकाकर खाई जायेगी। मगर खानेवाले इतने ज्यादा है कि जनतंत्र के बंटवारे में आगे चलकर झगड़ा होगा।" 

Sunday, 11 March 2018

लाला कम्पनी और लाल

                                                     

हरियाणा के मुख्यमंत्री है हमारे मनोहर लाल खटटर। हरियाणा में समय समय पर लाल होते रहते है मनोहर जी लेटेस्ट है। हर दूसरे तीसरे हफ्ते वो कुछ ऐसा कमाल करते कहते रहते है कि मुझे मेरी दीवार को कष्ट देना पड़ता है। अभी पांच -छह महीने पहले की बात है जब कपडा व्यापारियों ने जीएसटी से होने वाली परेशानियाँ जब खटटर जी को बताई तो खटटर साहब कहने लगे कि कपडा व्यापारी ये चोरी छोड़ दे। वो भी कभी कपडा बेचते थे उन्हें सब पता है वो भी बहुत दो नंबर में काम करते थे। अब कोई क्या बोले। बेचारे बीजेपी समर्थक अपना सर फोड़ते हैं। 

 हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो। 

इस पर चुटकी लेते हुए एक विरोधी नेता ने कहा कि उस वक्त कपडे पर टैक्स तो लगता नहीं था तो खटटर साहब चोरी क्या करते थे। जरूर 6 मीटर की जगह 5 मीटर कपडा बेचते होंगे। 

अभी हाल ही में हरियाणा में आँगन बाड़ी वर्कर अपनी मांगो के लिए आंदोलन कर रही है। इस पर जवाब देते हुए मुख्यमंत्री साहब ने विधानसभा में कहा कि हरियाणा में लाल रंग की बदमाशी नहीं चलने दी जायेगी। अब बता नहीं वो ये कहते हुए डर रहे थे। डरा रहे थे। क्या कर रहे थे। खैर उन्होंने खुद ही कुछ महीनो पहले कहा था कि वो कपडे के व्यापारी थे और चोरी भी करते थे। टैक्स की चोरी गैर क़ानूनी है पर इस देश में श्रम की चोरी गैर क़ानूनी नहीं है बल्कि इसके खिलाफ आवाज उठाना गैरकानूनी है। इससे देश की इज्जत को ठेस पहुँचती है। अभी अभी प्रधानमंत्री जी भी कहकर हटे है कि भारत जैसा फ्री मार्किट दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। फ्री से निसंदेह ही उनका मतलब काम करने की सरलता से था। यानी आपको प्रदूषण करने की छूट है कोई टोकने वाला नहीं होगा। आपको श्रम की लूट की छूट है। भारत के  प्राइवेट सेक्टर में एक चिरपरिचित नाम अक्सर सुनने को मिलता है आपने भी सुना होगा - लाला कम्पनी। लाला कम्पनी ऐसा शुद्ध भारतीय विचार है जिसमें श्रम के अधिकतम शोषण पर बल दिया जाता है। आज भारत में 6 दिन की वर्किंग होती है नॉर्मली कार्य के घंटे 8 होते है। कुछ मल्टीनेशनल कम्पनी अपने देश के नियमों से चलकर 5 ही दिन काम करती है। लाला कम्पनी के बारे में बताने से पहले बता दूँ जिस लाल रंग को मुख्यमंत्री बदमाश कह रहे है। कार्य के घंटे 8 तक सिमित करने में उस लाल रंग का बहुत बड़ा हाथ है। ये सब बिना संघर्ष नहीं मिला है। खैर बात लाला कम्पनी की हो रही थी 

- सभी प्राइवेट स्कूल लाला मैनेजमेंट नियम के अनुसार ही चलते है। एक शहर में जाने कितने प्राइवेट स्कूल होंगे जहाँ एक अध्यापक की तनखाह 3000 रूपये के निम्नतम स्तर से शुरू होती है। कई जगह तो इससे भी नीचे। अनुशासन के नाम पर कई स्कूलों में क्लास में अध्यापक को कुर्सी नहीं मुहैया करवाई जाती हर शहर में ऐसे बंधुआ मजदूर हजारों की तादाद में है और कहीं कोई विरोध का स्वर कभी सुनाई नहीं देता। 

- अब आप प्राइवेट अस्पतालों पर आ जाइये जहाँ न आने का समय फिक्स होता है न जाने का। ट्रेनिंग के नाम पर साल साल फ्री में नर्स , बाकी स्टाफ से फ्री में काम लिया जाता है। उसके बाद भी सैलेरी मेहनत के मुताबिक आधी भी नहीं दी जाती। जॉब सिक्युरिटी को तो भूल ही जाइये 

-उसके बाद हर शहर में एक बड़ा बाजार होता है। दुकाने , शो रूम। वर्किंग ऑवर  सुबह से दस से शाम 11 बजे। तनखाह ? 5000 से दस हजार। छुट्टी ? कोई नहीं। 

-शहर के सेक्टरों में बड़ी बड़ी कोठियाँ कोठियां में नौकर। किस उम्र के ? 7 साल के दस साल के 15 साल की उम्र के। काम के घंटे नामालूम। सैलरी नामालूम। यौन शोषण नामालूम 

ये तो सब वो उदारहण है जिनसे हम हर रोज रु ब रु होते है। अभी फैक्ट्रियों की तरफ तो रुख किया ही नहीं है। जहाँ शोषण अपमान की एक इबारत लिखी जाती है। दस घंटे काम नॉर्मल माना जाता है। 6 बजे घर जाने वाले को सरकारी ऑफिस समझ रखा है क्या का ताना दिया जाता है। 

ये है लाला कम्पनी की एक झलक। भले ही लाल रंग पिछले कुछ सालों में मजदूरों के हक़ में विरोध का स्वर ठीक प्रकार से रखने में नाकाम रहा हो। भले ही हर रोज लाल रंग के दफनाए जाने के जश्न बनाये जाते हो । फिर भी उसका डर लाला लोगों को सताता रहता है उसकी वजह एक ही है कि उन्हें भी अच्छी तरह पता है कि जब गरीबों , मजदूरों का शोषण ज़िंदा है लाल रंग को खत्म करना  नामुमकिन है। जिस दिन शोषितो के हाथ में लड़ाई आएगी उस दिन लाला कम्पनी को अपने हर जुल्म का हिसाब देना पड़ेगा उसी दिन का डर मनोहर लाल जी का विधानसभा में भी पीछा नहीं छोड़ता आखिर वो भी तो कपडा व्यापारी थे और ये भी खुद ही स्वीकार  कर कर चुके है कि चोरी भी करते थे। 

Thursday, 8 March 2018

मैं औरत हूँ


मैं औरत हूँ। मेरे इंसान होने पर बहस सदियों से जारी है। अभी तक ये बहस किसी सिरे नहीं चढ़ सकी है। हालाँकि मैं इंसान के इलावा और क्या हो सकती हूँ इस पर भी रिसर्च सदियों से चल रही हूँ। उन रिसर्च में भारी विरोधाभास होने के कारण अभी तक मैं एक अनसुलझा मसला मानव जाति के लिए बनी हुई हूँ।  एक महानुभाव ने रिसर्च करके निष्कर्ष निकाला था कि नारी नरक का द्वार है। कुछ  की रिसर्च का नतीजा है कि औरत देवी है। एक देश में मनु नाम का वैज्ञानिक हुआ था। उसकी रिसर्च का नतीजा ये था कि औरत देवी तो है पर उसे स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं है। मर्द को उसपर नकेल कसकर रखनी चाहिए। किसी भी उम्र में औरत स्वतंत्र रहने के लायक नहीं है। कालांतर में वो देश विदेशियों के प्रभाव में आया बहुतों बार ग़ुलाम हुआ। आज वो एक आजाद देश है जिसका अपना एक संविधान है। उस संविधान में औरत को भी इंसान माना गया है। औरत को बह हर वो अधिकार दिया गया है जो आदमी को है। उस संविधान की रक्षा के लिए बनाये गयी न्याय पालिका के कार्य स्थल पर मनु महाराज की बड़ी मूर्ति लगाई गयी है। वही मनु जो औरत की स्वतंत्रता की कल्पना भी नहीं कर सकता था। जिसने औरत को किसी भी तरह की सम्पति न रखने का विधान बनाया था। उसी मनु की मूर्ति न्याय पालिका के प्रांगण में होना ये बताती है कि उस देश के लोगों को बीसवीं सदी में भी मनु में विश्वास है। वो आज भी काल का पहिला पुरातन काल में खिंच कर ले जाना चाहते है जहाँ शूद्र ढोर गंवार और नारी ताड़ना के अधिकारी थे। इस देश के लोग  आज भी दो बिलकुल एक दूसरे के धुर विरोधी संविधानों में पिस रहे है। एक मनु का संविधान जो उनके मन में छपा हुआ है एक भीमराव अम्बेडकर का संविधान जिसे पढ़कर आजकी न्याय पालिका फैसला सुनाती है। दोनों में हर रोज जंग होती है।  हर रोज नए तर्क उपजते है। इन सब तर्कों के परे औरत अपनी राह निकालने की कोशिश में उस  मनु के चंगुल से तो निकल कर कहीं आगे जा चुकी है। जिस कोर्ट में मनु की मूर्ति लगी है उसी मूर्ति के सामने से हंसती खिलखिलाती औरतें निकलती है तो मनु के मन पर क्या गुजरती होगी इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। मनु की मूर्ति लगी कोर्ट में ही तलाक के मुकददमे चलते है। आदमी औरत पर हाथ उठा देता है उसके मुकददमे चलते है बेबस मनु बुत बने सारा दिन ये सब देखता रहता है। इससे भी बढ़कर जबसे ये मूर्ति लगी है उस देश के कुछ नागरिक उस मूर्ति को हटाने की माँग भी कर रहे है पर जिस औरत ने मनु को संविधान झेला हुआ है वो चाहती है कि ये मूर्ति कभी न हटे। बल्कि मूर्ति के साथ साथ एक म्यूजियम भी बने जिसमें मनु का संविधान लिखा हुआ हो। उसमें औरतों और दलितों के शोषण की तस्वीरें हो। उस म्यूजियम के बाहर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ हो 

ये देश देश की औरतों और दलितों से क्षमा प्रार्थी है  

मैं चाहती हूँ कि मनु संविधान की यादें देश उसी तरह सहेज कर रखे जिस तरह  दूर देश के लोग होलोकॉस्ट की यादें संजोये है। मैं ये भी चाहती हूँ कि वो देश सिर्फ मनु को ही याद न रखें। उसी देश में ऐसे लोग भी हुए मनु के संविधान के पंजे से छुड़ाने में मेरी मदद की। उन्हें भी शिद्द्त से याद रखा जाए।  जिस देश में नारी विरोध की जड़ें इतनी गहरी है कि दुनिया भर की समाजवाद की किताबें पढ़ने के बाद भी कितने ही कामरेडों को "रंडी रोना " "विधवा विलाप " " हाथो में चूड़ी पहनने " जैसे मुहावरों का मतलब समझ नहीं आया है , उसी देश में ज्योतिबा फुले भी हुए उसी देश में सावित्रीबाई फुले भी हुई उसी देश में फातिमा शेख हुई जिन्होंने मनु शिष्यों के अत्याचार सहे। उनका फेंका हुआ गोबर सहा पर हिम्मत नहीं हारी। लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।  तब उस देश को अहसास हुआ लड़कियों को पढ़ाया जा सकता है। उसी स्कूल से निकली हुई लड़कियाँ आज टीचर है प्रोफेसर है और पूजती मनु को है। औरत की आजादी पर कहती है कि वो अभी इतनी प्रगतिशील नहीं हुई है। काश उन्हें कभी अहसास हो कि वो जितनी भी प्रगतिशील हुई है उसके पीछे सदियों का संघर्ष है। 
उस देश में बाल गंगाधर तिलक जैसे लोग हुए जिन्हे औरतो की पढाई धर्म विरोधी लगी। पैसे की बर्बादी लगी तो राजा राम मोहन जैसे  लोग भी हुए जिन्हे ये अहसास हुआ कि औरत को ज़िंदा जलाना ग़लत है। औरत को ज़िंदा नहीं जलाया जाना चाहिए। उसी देश में आज के ही दिन एक शायर भी पैदा हुआ जिसने औरत के हक में आवाज बुलंद की उसने तल्ख़ हकीकत को आँख मूंदे देश के सामने रखी 

मर्दों ने बनाई जो रस्में उनको हक़ का फरमान कहा 
औरतों के जिन्दा जल जाने को , कुर्बानी और बलिदान कहा 
किस्मत के बदले रोटी दी , उसको भी अहसान किया। 

मर्दों के लिए हर जुल्म रवां , औरत के लिए रोना भी खता 
मर्दों के लिए लाखों सेजें ,औरत के लिए बस एक चिता 
मर्दो के लिए हर ऐश का हक़ ,औरत के लिए जीना भी सजा। 



उसी देश में आज 21 वीं सदी में इस बात पर बहस हो रही है कि बच्चे को दूध पिलाते स्तन अश्लील हैं या नहीं ? गोया ये तो सबने मान लिया है कि औरत के स्तन तो अश्लील होते ही है। बहस इस बात पर है कि क्या बच्चो को दूध पिलाते वक्त इस मापदंड में कुछ छूट दी जाए या नहीं। 

क्या अचरज की बात है कि उस देश में आज लेनिन की मूर्ति बुलडोजर से ढहाई जा रही है। वो लेनिन जिसके साथ कंधे से कंधे मिलाकर आज के ही दिन हम औरतों ने समानता के लिए लड़ाई का बिगुल बजाया था। वो लेनिन जिसे बर्बाद करने , मिटाने , बदनाम करने के लिए पूंजीवादी दलाल एक सदी से बिना थके लगे हुए है और लेनिन हर बार बढे हुए कद के साथ उनके सामने आ खड़ा होता है मानो कह रहा हो 

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी 
सदियों रहा है दौरे दुश्मन जहाँ हमारा 

क्या ये महज एक इत्तेफाक है कि जो पूंजीवाद लेनिन के लिए एक सदी से अनर्गल प्रोपगैंडा फैला रहा है उसी पूंजीवाद ने औरत की गुलामी के नए आयाम रचे। जिसने एटम बम जैसा विंध्वंसक हथियार दुनिया पर थोपा और उसी के नाम औरत का परिधान बनाया माने औरत तबाही का हथियार है। वही विचार जो मनु महाराज देकर गए थे। जिसने मिस वर्ल्ड जैसे नारी विरोधी प्रतियोगिता रची। सुंदरता का बाजार बनाया और उस बाजार का मोहरा औरत को बनाया। 

इतना सब कुछ होने के बाद भी ये मनु के चेले जब मुझे नारी आजादी पर ज्ञान देते है फेमिनिज्म की परिभाषा सिखाते है तो यही कहने का दिल करता है 


हम एक उम्र से वाकिफ हैं अब ना समझाओ के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबान सितम क्या है