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Sunday, 18 February 2018

डॉक्टर तुलसी राम हाजिर हो



- डॉक्टर तुलसीराम, जिनका देहांत 2015 में हो चुका है और जिन्हे फेसबुक अदालत में मूर्खता और कुंठा कानून 2013 के तहत पिछले हफ्ते   दोषी करार दिया जा चुका है, को फेसबुक पर हाजिर होने का हुक्म दिया जाता है। 

तुलसी राम जी आप जहाँ भी हैं इसे खत समझे या वारंट ये आपके लिए ही है। जैसे ही आपको मिले तो जल्द से जल्द फेसबुक पर आएं। इससे पहले कि आप हैरान हो कि ये क्या मसला है और फेसबुक कोर्ट और कानून क्या है मैं आपको फेसबुक अदालतों के नियमों से जरा अवगत करा दूँ जो की  आपके लिए फायदेमंद रहेगा। 

1 . पक्ष न सुने जाने की अनिवार्यता -  न्याय का एक महत्वपूर्ण नियम है सुने जाने का अवसर प्रदान करना। opportunity of being heard . यानी जिसके खिलाफ आरोप है उसका पक्ष सुना जाना जरुरी है। पर फेसबुक की त्वरित अदालतों में ये नियम एक बाधा है इसलिए इस नियम की जगह एक नया नियम आया है कि अगला पक्ष नहीं सुनने की बाध्यता। आप के केस् में आप तो जन्नत नशीं हो तो आपका पक्ष तो किसी भी हालत में नहीं सुना जा सकता तो आपका केस फेसबुक पर चलाने के लिए बिलकुल मुफीद है। ऐसे ही एक दो मुकदमों मेरी हाजरी के ऑर्डर भी आ चुके थे । आपकी तरह मैं जन्नत नशीं नहीं हुआ था  और सब की पहुँच में भी था पर सभी मुकदमों में मेरे सभी अजीज दोस्तों ने  फैसला पब्लिकली सुनाने के बाद फेसबुक अदालत में आने का ऑर्डर दिया जिसे मैंने बड़ी ही बेअदबी से ठुकरा दिया। तो मुझे थोड़ा निजी अनुभव है। इस तरह की अदालतों में दो तीन तरह के लोगों का इंवोल्मेंट होता है। पहले वो होते है जो भले लोग होते है। सारे जहाँ का दर्द अपने दिल में समेटे हुए। वो गुड फेथ में फैसला सुनाते है। भले ही उनके गुड फेथ से अगले आदमी का बीपी बढ़ जाए पर उनका इरादा नेक होता है। और अगले आदमी का पक्ष न सुनने के नियम से वो भी बंधे होते है। दूसरे वो होते है  जिन्हे  उस इंसान से खुंदक होती है जिसके खिलाफ मुक्द्म्मा चल रहा है।  प्रेमचंद की एक कहानी है जिसमें जज बनने पर आदमी का दिल बदल जाता है और अपने दुश्मन के हक़ में फैसला दे देता है। अब कहानी  बिलकुल  बदल चुकी है अब अगर कहीं भी दुश्मन का मुकदद्मा चल रहा हो तो भाई भागकर वहां पहुँच जाता है इस मुकदद्मे का जज तो मैं बनूँगा।  फांसी वाली रस्सी कहाँ है। कुछ लोग तो बाकायदा अपने फेसबुक में ऐसा सिस्टम बना कर रखते है कि अमुक आदमी का मुकदमा अगर कहीं चल रहा हो तो अपने आप नोटिफिकेशन में आ जाये  .  मैं फिर से अपना अनुभव आपसे शेयर कर रहा हूँ। ऐसे ही किसी पुराने मुकदमें में एक भाई मेरे खिलाफ गवाही दे रहा था तो मेरे एक दोस्त से उसे टोक दिया कि यार तू जिस के पक्ष में गवाही दे रहा है वो आदमी ग़लत है। झूठा है। भाई ने फट से जवाब दिया मुझे उसके झूठ से फर्क नहीं पड़ता।  मैं किसी के पक्ष में गवाही नहीं दे रहा मैं तो अमोल के खिलाफ गवाही दे रहा हूँ। मेरे किसी दोस्त ने एक बार फेसबुक अदालतों की भयावयता दिखाती ऐसी अदालतों में हिस्सा न लेने की अपील करती एक लम्बी पोस्ट लिखी। पोस्ट बहुत ही प्रभावी तरीके से लिखी हुई थी लिखना एक ऐसा काम है जिसमें आपका हुनर काम आता है। आप ढंग से पढ़े लिखे है तो गू को भी ऐसे लिख सकते है कि  वो पढ़ने वालों को गुलाब दिखने लगता है। एक दफे मैंने अपने दोस्त से कहा कि यार तुम किस आदमी की पोस्ट लाइक करते हो ? ये सरे आम एक कम्युनिटी के खिलाफ जहर लिखता है। बिलकुल गू लिखता है दिल तुम देते हो बदबू मेरे तक आती है। दोस्त मासूमियत से कहने लगा " नहीं यार देख सेंट छिड़क कर लिखता है गू  गुलाब दिखता है।   खैर मैं मुद्दे से भटक रहा हूँ। तो मेरे दोस्त की पोस्ट बहुत प्रभावी थी। मैंने लाइक करने को बढ़ा तो देखा एक दूसरी पोस्ट के कमेंट वही दोस्त फांसी का फंदा लिए खड़ा था। मैं बोला यार पांच मिनट पहले तो स्टेटस लिखा था। तो कहने लगा यार इस आदमी से तो मेरा राडा चल रहा है। ये लोग सबसे ज्यादा स्पष्टवादी और मासूम होते है।  तीसरे वो लोग होते है जिन्हे दुनियादारी से ज्यादा मतलब नहीं होता। ये सब को लाइक कर  देते है। आपके केस में भी ये तीन तरह के लोग ही होने है।  बहरहाल आपके केस में आप तो पहले ही पहुँच से बाहर हो। आपके अलावा आपकी पत्नी और बेटी का भी जिक्र मुकदमें में है  उनसे भी पहले कोई सम्पर्क नहीं स्थापित किया है।   उनको  भी सीधे फेसबुक पर ही पहुँचने का फरमान जारी है जैसा की फेसबुक का रिवाज है 

2 . कुंठा  - फेसबुक अदालत में कुंठा का विशेष स्थान है। यहाँ पोस्ट इस तरह से डिजाइन की जाती है कि कुंठा को छुपाना सामने वाले का मकसद होता भी नहीं। हर शब्द हर लाइन में सामने वाले को इस तरह से चीख चीख कर आरोपी बोला जाता है कि शायद बॉलीवुड फिल्मों में भी न बोला जाता हो। आप का केस भी इससे जुदा नहीं है आप पर संगीन आरोप है कि आपने "उच्च जाति " की लड़की से शादी की। खाली शादी से बात में वजन नहीं आता। उच्च जाति से शादी ज्यादा संगीन आरोप लगता है क्यूंकि शास्त्रों में भी तो इसकी मनाही है। साथ ही आपके समाजवादी होने को भी साथ लपेटे में ले लिया गया है। भले ही आपको सीपीएम छोड़े अरसा हो गया हो। पर जब लपेटे में ही लेना है तो सब कुछ लिया जाए। आप पर जो सबसे संगीन आरोप है वो ये है कि आपने मुर्दहिया और मणिकर्णिका लिखी। अगर आप ये दो किताब नहीं लिखते तो शायद आप पर ये केस भी नहीं चलता। मुर्दहिया और मणिकर्णिका ऐसी किताबें है जो देश के लाखों शोषितो , दलितों की कहानी है जो पहले बहुत कम लिखी गयी है। जाति और वर्ग के अपने फायदे होते है अपने आदर्श होते है। आप ने निम्न वर्ग से मध्यम वर्ग तक का सफर किया। बेसिकली आपका अपराध भी यही है। जो पैदा ही  मध्यम या उच्च वर्ग में हुए है अपने वर्ग की घिनौनी रीड विहीन केंचुए जैसी आदतें और हरकतें उनके लिए अपराध नहीं है। भाई मध्य वर्ग में पैदा हुए अपने वर्ग में गाजे बाजे के साथ शादी की। अपने वर्ग में दोस्ती की। तीन किताबें गिफ्ट की साढ़े तीन किताबें गिफ्ट में वापिस ले ली। उसके  लिए कोई राधा या कोई संतोष देवी की समस्या इतनी है कि उसका प्रोफ़ाइल पिक लगाया जा सकता है। जस्टिस फॉर का हेश टैग दिया जा सकता है। मेरे देश में एक राधा नहीं है। मेरे शहर में जब बच्चे नंगे बदन ठंडी सड़क पर सोते है। उठने पर भीख मांगते है। मेहनत करने की कोशिश में किसी फैक्ट्री में जलकर मरते है और मैं सिनेमा हाल में बैठकर फिल्म देखता हूँ ये मेरे लिए अपराध नहीं है पर ये आपके लिए अपराध है आप ने निम्न वर्ग ऊपर से शेड्यूल कास्ट से होने के बावजूद मध्यम वर्ग में आने का अपराध किया है तो मध्यम वर्ग की बुराइयां अपनाने के लिए आपको दोषी करार दिया जाता है वो भी आपका पक्ष सुने बिना। 

3 . साइलेंस या रायता  -- फेसबुक की अदालत में आरोपी के पास दो ऑप्शन है या तो आप चुप रहिये उस सूरत में आपको अपराधी मान लिया जाएगा दस से पंद्रह दिन या कई बार एक डेढ़ महीने फेसबुक पर ही हंगामा होगा फिर सब नए केस की तरफ चले जाएंगे।  दूसरा ऑप्शन अपना पक्ष रखने का है और खुदा न खास्ता अगर पीड़ित ने वो ऑप्शन चुन लिया तो वो रायता फैलेगा जिसे साफ करते करते 6 महीने या साल लग जाने है। आरोपी का पक्ष ही जानने का कोई इच्छुक होता तो आजकल सब आधार कार्ड देकर दो दो सिम लिए हुए है। 24 घंटे फेसबुक पर रहते है। कभी भी फोन करके पूछा जा सकता है। पर वो पूछना किसे है। फेसबुक अदालत का एक और नियम है ये एक जगह नहीं चलती। आपके जवाब की दस लाइन पर अलग अलग जगह सौ नए मुकदद्मे शुरू हो जायेंगे आगे तो फिर रायतों का अम्बार ही है। 

4 . इंसाफ  -ये आखिरी मोड़ है कि आखिर चाहत क्या है। नॉर्मली चाहत फेसबुक रायते से इतर कुछ नहीं होती है। जहाँ तक आपके केस की बात है तो जहाँ तक मौजूदा भारत के कानून की बात है  तो जितना मुझे पता है बाल विवाह तब तक वैध नहीं है जब तक कि दोनों पक्ष बालिग होने पर उसे स्वीकार न कर ले। पैसे की लेन देन की जितनी बातें है वो भी आपके हुए बिना साबित करना नामुमकिन है। तो कानूनन तो शायद कुछ नहीं बनता। जहाँ तक समाजवाद की बात है तो राधा के साथ साथ देश की करोड़ों जनता के साथ जो अपराध हो रहा है उसके लिए डॉक्टर तुलसी राम जिम्मेदार नहीं है देश के पूंजीपति और उन पूंजीपतियों की सेवा में लगा रीढ़ विहीन मध्यम वर्ग ही जिम्मेदार है  तीसरा जो रास्ता है वो ये है कि जो राधा देवी की फोटो अपने प्रोफ़ाइल पिक पर लगाए हुए है वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी ले ले और राधा देवी के अच्छे रहन सहन का बंदोबस्त कर दे। इतना बड़ा काम नहीं है। 


खैर ये सब बातें मैंने आपको गुड फेथ में बताई है वरना मेरा काम तो महज वारंट पहुंचाने का था। आपसे इल्तजा है कि किसी को मत बताइयेगा कि मैंने आपको ये सब बताया है वरना मेरे खिलाफ भी तीन चार केस और खुल जाएंगे। अभी तो मेरे पहले वाले मुकदद्मों का ही ढंग से निपटारा नहीं हुआ है। मैं गरीब आदमी हूँ। भलाई के चक्कर में मरना नहीं चाहता। 


एक हरकारा 

अमोल सरोज 

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