Followers

Saturday, 20 January 2018

जाहिद शराब पीने दे। कहीं पीने दे भले ही

                                जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर 
                                 या वो जगह बता जहाँ पे खुदा न हो। 

ये लोकप्रिय और क्रन्तिकारी  शेर किसने लिखा है इसका मुझे पक्का पता नहीं है पर ये पक्का है कि लिखा किसी आदमी ने ही है। दरअसल क्रांति करने की सुविधा भी हर किसी के पास एक जैसी नहीं होती। जिसने भी शेर लिखा उसे शराब नॉर्मली पीने की मनाही नहीं ही रही होगी तभी उसने मस्जिद में बैठकर पीने की जिद की। (अगर आजाद भारत में पैदा होता तो गुजरात में पीने की जिद करता वैसे आजाद भारत उतना कटटर नहीं है थोड़े से ज्यादा पैसो में गुजरात में भी पीने की इजाजत दे देता है। ) दूसरा उसे मस्जिद में जाने की मनाही नहीं थी बस वहां बैठकर दारु नहीं पी सकता था जिसे ये दो प्राइविलेज मिले हो तो वो ये शेर भी लिख सकता है हालाँकि ये शेर लिखना भी अपनी जान जोखिम में डालने से कम नहीं है पर औरतों को अपनी मर्जी से अपनी जान जोखिम में डालने का हक़ भी नहीं है। जिसके लिए मस्जिद के दरवाजे ही बंद होंगे वो तो अंदर जाने में ही गंगा नहाया मान लेगा। जिसके लिए शराब का नाम लेना ही मुसीबतों को बुलावा देना है वो मस्जिद में बैठकर  पीने की जिद नहीं कर सकता। उसके लिए तो घर के किसी कोने में भी पीने को मिल जाए वो भला है। तो ये पक्का है कि ये शेर किसी औरत ने नहीं लिखा। दरअसल मर्द को हर जगह इतना प्राइविलेज मिला हुआ है कि वो हर  जगह औरतों से कहीं आगे है।  बेवकूफी में भी आदमी औरत का कोई मुकाबला नहीं है। बेवकूफी करने के जितने भी मौके आदमियों को मिलते है वो इतनी जल्दी से वो मौका लपक बेवकूफी करते है मानों उनको डर लगा हो कि कहीं औरत उनसे बेवकूफी करने में आगे न चली जाए। 

खैर बात शराब की चल रही थी। शराब हमारे समाज में औरतें नहीं पीती। अपनी मर्जी से नहीं पीती ऑफकोर्स। हमारे समाज में मर्द शराब पीते है। कुछ नहीं भी पीते। कुछ पीकर दंगे भी करते है। कुछ नहीं भी करते। लोकतान्त्रिक देश है जो करते है अपनी मर्जी  से करते है। इसके बावजूद इस देश की जो  सबसे खूबसूरत बात है वो ये है कि यहाँ हर के आदमी के पास  हर विषय पर एक राय है और औरत के विषय में सब एक राय हैं  कि भगवान् ने उन्हें कमतर पैदा किया है और  उन्हें सलाह और आदेश देना मर्दों का विशेष अधिकार है। कुछ जो बेवकूफ होते है वो डंके की चोट पर बोल देते है कि नारी जो है वो ताडन की अधिकारी है। कुछ जो थोड़े समझदार होते है वो ताडन की भाषाई विशेषता बता उसका मतलब पालन कर देते है जैसे पशु पालते वैसे औरत भी पालते। जो सबसे  समझदार होते हैं वो औरत की प्रजनन के विज्ञान को ले आते है। (वैसे कुछ प्राइविलेज हो मर्द की शातिरता पर कई बार तारीफ करने का दिल करता है। मन्ने आदमी बच्चे पैदा नहीं कर सकता ये मुख्यत उसकी एक बहुत कमी है और उसने किस तरह औरत की प्रजजन क्षमता जो कि उसकी एक बहुत बड़ी खूबी है को ही  उसकी कमजोरी के रूप में प्रचलित कर दिया )


औरत के मामले में हम बहुत विशेषज्ञ है। औरत हमारे लिए खरबूजा है जिसके कटने पर सब में बंट जाना चाहिए।  एक दोस्त ने अपने एक प्रगतिशील दोस्त से हुई बातचीत के बारे में मुझे बताया था। दरअसल  एक लड़की से जुड़ा ही मसला था। किसी गाँव में एक लड़का शहर से एक लड़की पेड सेक्स के लिए ले आया था जहाँ बाद में उस लड़की को पैसे भी नहीं दिए और उस लड़के के दोस्तों ने भी जबरन सेक्स किया। जब मेरा दोस्त उस लड़की के लिए इन्साफ की गुहार लगाने अपने उस प्रगतिशील दोस्त के पास गया तो उसने बहुत ग़ज़ब की थेओरी दी कि जब तवा गरम हो दो रोटी फालतू सींक जाए तो क्या फर्क पड़ता है। दरअसल औरतों के लिए हमारे पास इतनी थेओरी है कि अगर इस में अगर नोबल होता तो  हर साल हमें ही मिलता। गांव की चौपाल से लेकर सुप्रीम खाप की पंचायत तक औरत के सेक्स प्रवृति को लेकर जो स्टेटमेंट है वो फिक्शन की सब हदों को पार करते है  

हमारे समाज में औरत होने के अपराध को तो हम फिर भी माफ़ कर सकते है एक समझदार इंटेलिजेंट औरत होना वो अपराध है जिसकी कोई माफ़ी नहीं है। वो नाकाबिले माफ़ी है। मेरी एक दोस्त हैं जो पेशे से वकील है उन्होंने कोर्ट के एक जजमेंट से सम्बंधित शराब को लेकर एक पोस्ट डाली। दोस्त सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती है। उस पोस्ट पर एक प्रगतिशील सज्जन उन्हें जज और वकील का फर्क समझा रहे थे। लड़की होकर शराब पीने की बात सुनकर एक गांधीवादी इतने आहत हो गए कि उन्हें देश में मोदी राज लाने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। ये कोई इकलौता किस्सा नहीं है। फेसबुक पर ये बहुत आम है। बहुत सी बहसों को लब्बोलुहाब ये ही निकलता है कि औरत होकर हमसे बहस करती हो। कई बार सब तर्क जब ख़त्म हो जाते हैं तो कुछ खिसिया कर तारीफ भी कर देते हैं  " इंस्पाइट ऑफ़ बीइंग वुमन यू आर वेरी इंटेलेक्चुअल। " उनसे वो फेमस सवाल पूछने का दिल करता है 

"भाई साहब आपने गाय का मूत पीना बंद कर दिया क्या ?"

सबसे बड़ा खतरा जेंडर इक्वलिटी से है। जहाँ जेंडर इक्वल्टी की बात आएगी वहां हमारी नैतिकता सबसे पहले जागेगी।  एक लड़की के शराब का स्टेटस डालने के कारण भारत में फासीवाद आ  गया। भले ही  लड़का शराब की खाली बोतलों से भरी छत की फोटो को अपना कवर पिक ले वो कुलपना है। वो फोटो राम राज में सहायक है। जेंडर इक्वल्टी की बात आते ही हमें इतने पेंच याद आ जाते है कि अगला कह उठे भाई ग़लती हो गयी। सब मस्त है कोई ग़लती नहीं है। 

जाते जाते हमारे मुख्यमंत्री जी का बयान भी सुना दूँ जो कह रहे है बलात्कार के लिए पिछले सरकारें जिम्मेदार है। वैसे बलात्कार और औरतों पर अगर माननीयो के स्टेटमेंट  पर बात होने लगी तो सिवाय जनाब शौक बहराइची के इस शेर के और कुछ भी कहना बेमानी है 

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी था 
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा। 



गुलिस्ताँ का अंजाम हमारे सामने ही है 

No comments:

Post a Comment