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Tuesday, 30 January 2018

बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी की तैसी

                                 


पिछले दो महीनो में संयोगवश ही तीन चार ऐसी फिल्म देखने का मौका मिला जिनमें अमेरिका के इतिहास का दर्शन था। 1962 में बनी " ूto killing a mocking bird"  हो या 2007 की फिल्म " great debatators " हो या " 12 years a slave"  हो या 2013 की " 12 years a slave " हो या 2017 की " mudbound" सभी फिल्मों में अमेरिकी इतिहास के क्रूर सच्चाई को पूरी ईमानदारी से पेश किया गया है।  किलिंग ऐ मॉकिंग बर्ड में दिखाया है कि अदालत में नायक बिलकुल साफ़ साफ़ साबित कर देता है कि रॉबिन्सन बिलकुल निर्दोष है। फिर भी जूरी के सभी सदस्य उसे दोषी करार दे देते है क्यूंकि रॉबिन्सन काला था और जूरी के सभी सदस्य गोरे थे। 12 years a slave में दिखाया गया है किस कदर अमानवीय तरीकों से उस समय काले लोगों के साथ व्यवहार होता था और सभी उसे सही भी मानते थे। वो सब कुछ नॉर्मल था। फिल्म के कुछ दृश्य तो हिला देने वाले है। मडबाउंड फिल्म में बावजूद इसके कि नायक एक वार हीरो है नायक की जीभ सिर्फ इस अपराध के लिए काट दी जाती है कि उसने एक गोरी लड़की से शादी की और उससे मिक्स्ड रेस का बच्चा हुआ। फिक्शन फिल्म "DJANGO" तो लाजवाब है। गोरों के महल को उड़ाकर नायिका के साथ शान से जाता है। ये सारी ऐतिहासिक फ़िल्में है और इन फिल्मो में इतिहास शोषितों  की नजर से दिखाया गया है ना की  अत्याचारियों और शोषकों की नजर से। 

भारत में मसला बिलकुल विपरीत है। यहाँ शोषितों का कोई इतिहास ही नहीं है।  यहाँ भी फिल्मों का इतिहास नया नहीं है पर हम तब से लेकर आज तक " जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा " से आगे नहीं बढ़ पाए है। हमारे सारे नायक भयंकर अत्याचारी , सामंती किरदार है। सब फिल्मों में उनकी जयजयकार है। उसपे  तुर्रा ये कि इन सब इतिहास भी बताया जाता है।  सती प्रथा से लेकर जोहर तक , दलितों के अमानवीय शोषण से लेकर ज्योतिबा फुले और भीमराव अम्बेडकर की संघर्ष और विजय गाथा तक सब पर एक से बढ़कर एक कहानी बन सकती है। जबरदस्त फ़िल्में बन सकती है।  पर हमें बचपन से ही इतनी कुंठित शिक्षा और कंडीशनिंग मिली है कि हम हमारे नायक बलात्कारियों और अत्याचारियों में ही  ढूंढ़ते है।  सबसे कमाल बात है कि इसको इतिहास के नाम पर न्यायसंगत भी ठहराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। मानसिक रोगियों के इलावा बहुत से समझदार भी जौहर की पैरवी कर रहे है ये हमारी नारियों के प्रति आज की समझ को दर्शाता है।  दरअसल असंवेदनशीलता हमें विरासत में मिली है। " कूद पड़ी हजारों पद्मिनियाँ अंगारों पर " सुन सुनके हम जवाँ हुए है।  पूंजीवाद पर कठोर प्रहार करने वाले समाजवाद के लिए सब कुछ न्योछावर करने के आह्वान करने वाले हमारे कवि बहुत उदास हो जाते है जब उन्हें पूंछ उठाने पर सब मादा निकलते है। समाजवाद को नारी का एकमात्र मुक्ति का नारा देने वाले कॉमरेड अपनी कीमती कीमती किताबों में , लेखो में " विधवा विलाप " और " रंडी रोना "  जैसे मुहावरों का इस्तेमाल करते हुए मिलते है। इस बात में दो राय नहीं है कि समाजवाद ही सबसे आदर्श स्थिति है पर सवाल ये है कि समाजवाद की सब किताबें पढ़कर भी आप इतनी संवेदना इतनी समझ क्यों नहीं बना पाए कि ये मुहावरे नारी विरोधी है। इन्हे बहुत पहले दफ़न हो जाना चाहिए था। हमारी पीढ़ी तक नहीं आना चाहिए था। ये तो बहुत बेसिक सी बातें है जिन्हे आज पुराने समय की दुहाई देकर अतिवाद करार कर दिया जाता है। 

कुछ महीने पहले हिसार में राहुल ढोलकिया  एक फिल्म फेस्टिवल में आये हुए थे। राहुल ढोलकिया  परजानिया जैसी संवेदनशील फिल्म के निर्देशक है। फिल्म के बाद हुए सवाल जवाब के सेशन में एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि आजकल हर बात का इशू बन जाता है पहले ऐसे नहीं था। इसका उदारहण देते हुए उन्होंने अपनी फिल्म " रईस " की बात करते हुए कहा कि जावेद अख्तर ने फिल्म का डायलॉग " बनियो का दिमाग " डायलॉग हटाने के लिए सोचने को कहा था। राहुल ढोलकिया जी आगे कह रहे थे कि ये बात बहुत शॉकिंग लगी उन्हें क्यूंकि ये तो वो बचपन से सुनते आये हैं। ये स्टेटमेंट तो जातिवादी नहीं है अब उन्हें कैसे समझाए कि आप एक शोषक जाति की तारीफ कर रहे हो। क्या शोषण करना ही दिमाग की निशानी होती है ? हम जाने अनजाने शोषकों के पक्ष में इस कदर खड़े होते है कि हमें खुद भी इस का अहसास नहीं होता। मैंने बनियो को बेईमानी से लिंक करती एक पोस्ट लिखी तो एक दोस्त बहुत आहत हुए।  उन्हें ये सबको एक पलड़े में रखना लगा। सब के सब कैसे बेईमान हो सकते है। इस तरह के तर्क आये। जब शोषकों पर ऊँगली उठती है तो हमारी तर्क शक्ति कितनी सही और सटीक काम करती है।  जब  राजपूत को वीर बहादुर कहा जाता है। ब्राह्मण को पंडित  जी कहा जाता है बनियों को दिमाग वाला कहा जाता है तब ये बात हमारे समझ में बिलकुल नहीं आती। तब ये ओके है। राहुल  जी को सच्चा डायलॉग लिखना था तो " बनियो सी बेईमानी " लिखते। पर अभी  हम सब अपनी जाति पहचान से इतना चिपके रहना चाहते है कि इंसान होने की बजाय आज भी उन जातियों का होने में ज्यादा गर्व महसूस करते है जिनका इतिहास क्रूरता से भरा हुआ है। जो शर्म के प्रतीक होने चाहिए थे उन्हें हम गर्व मानकर सीने से चिपकाए हुए है इसका नतीजा ये है कि अपने को तर्कशील और समझदार मानने वाले लोग आज इस बात पर बहस कर रहे है कि हजारो लड़कियों को आग में धकेल देना ही एकमात्र रास्ता था। वो  सब इस बात को भी मानते है कि हजारों औरते अपनी मर्जी से आग में कूद  गयी थी जो कि ख़ुदकुशी का सबसे भयावय तरीका है। सती होने वाली लड़की कई बार आग में जलने के  बाद भी जिन्दा बच जाती थी। दरअसल जाति एक  जादू है जो सर  चढ़कर बोलता है। अपनी जाति को न्यायसंगत ठहराने के लिए आदमी बड़े शौक से बेवकूफ कहलाना पसंद  कर लेता है। 



 अब भी वक्त है अत्याचारियों , शोषकों को नायक बनाने की बजाय उन्हें लताड़ना शुरू कर दो जब सब का दर्द महसूस होगा तो  सब साथ भी होंगे। सभी जातिवादी , मर्दवादी प्रतीकों को जोर से कहने की जरुरत है 

बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी की तैसी 

काहे के महान तुम्हारी ऐसी तैसी 

सिर्फ विश्वास करने की बात  है यकीन मानिये हम सब बाई डिफ़ॉल्ट इंसान ही है। जरा सी कोशिश करने पर बन सकते है। 


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