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Saturday, 20 January 2018

मडबाउंड : दमन की सच्ची दास्ताँ बताती फिल्म


कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। जो लोग अपने इतिहास से नजर नहीं मिला पाते उनकी आने वाले  पीढ़ियों को भी विरासत में झूठ , नफरत ही मिलनी तय है। नेटफ्लिक्स पर dee rees द्वारा निर्देशित फिल्म मडबाउंड देख कर लगता है कुछ लोग अपने इतिहास  के लिए कितना ईमानदार हैं। विश्व गुरु , स्वर्णिम इतिहास जैसी बातों की बजाय इतिहास की क्रूर सच्चाइयों को सामने रखना बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। फिल्म मदबाउन्ड इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है।  फिल्म की कहानी दूसरे विश्व युद्ध के वक्त अमेरिका के मिसिसिपी के एक  गांव के दो परिवारों की कहानी है। एक परिवार गोरा है, जमींदार है, परिवार का मुखिया हेनरी मैक्लीन अपनी बीवी लौरा मैक्लीन दो बच्चों और रंगभेद की पैरवी करने वाले अपने बाप के साथ गाँव शहर से गाँव आता है।  उसे खेती का जनून है अपना सब कुछ बेचकर वो गांव में दो सौ एकड़ जमीन खरीदता है। उसका छोटा भाई जैमी एयरफोर्स में दूसरे विश्वयुद्ध की लड़ाई में हैं।
 दूसरा परिवार हैप जैक्सन और उसकी पत्नी फ्लोरेंस का है जो अश्वेत हैं और उन खेतों में जुताई करते है जिनका मालिक अब हेनरी मैक्लीन है। जिनका एकमात्र सपना एक दिन अपनी खुद की जमीन पर खेती करने का है। हैप अपनी कहानी शुरू करते वक्त कहता है  

“What good is a deed? My grandfathers and great uncles, grandmothers and great aunts, father and mother, broke, tilled, thawed, planted, plucked, raised, burned, broke again. Worked this land all they life, this land that never would be theirs. They worked until they sweated. They sweated until they bled. They bled until they died. Died with the dirt of this same 200 acres under their fingernails. Died clawing at the hard, brown back that would never be theirs. All their deeds undone. Yet this man, this place, this law... say you need a deed. Not deeds.

 उनका बेटा रोंजिल जैक्सन विश्व युद्ध में अमेरिका की आर्मी में शामिल होकर युद्ध के मैदान पर है।
 साल दर साल ख़राब मौसम की मार दोनों परिवार झेलते हैं। पैदावार ख़राब होती है। बुरे वक्त में जब हेनरी मैक्लीन की लड़कियां बीमार होती है  तो फ्लोरेंस उनकी मदद करती है। जब खेत में काम करते वक्त हैप की टांग टूट जाती है तो लौरा अपने पति को बिना बताये फ्लोरेंस के परिवार की आर्थिक मदद करती है। इसी बीच हेनरी के पिता वक्त बेवक्त जैक्सन परिवार पर रंगभेदी टिप्पणी करने से बाज नहीं आते।
 वक्त आगे बढ़ता है  विश्व युद्ध ख़त्म होता है। जेमी और रोंजिल वापिस गांव आते है। रोंजिल युद्ध से नायक बनकर लौटा है पर गाँव आते ही पाता है कि यहाँ कुछ नहीं बदला है। रंगभेद आज भी वैसे ही है। वहाँ उसे नीग्रों , ब्लैकी कहकर ही बुलाया जाता है। जनरल स्टोर में वो सामने  वाले दरवाजे से आ जा नहीं सकता है। अश्वेतों के लिए पीछे अलग दरवाजा है। उधर जेमी युद्ध का असर साथ लिए वापिस आता है। युद्ध की यादें मिटाने के लिए शराब पीता है। जेमी और रोंजिल दोस्त बन जाते है। जेमी उसे बताता है कि युद्ध के दौरान जब वो मरने वाला था तो एक अश्वेत साथी ने उसकी जान बचाई थी। रोंजिल उसे जैमी को बताता है कि उसे वहां एक जर्मन लड़की से प्यार हुआ वो उस लड़की और उस लड़की से हुए अपने बेटे की तस्वीर भी दिखाता है।
 वो तस्वीर जैमी के पापा के हाथ लगती है जो वहां के गोरे लोगों को उकसाता है रोंजिल को मिक्सड रेस पैदा करने के लिए सजा देने को। भीड़ रोंजिल को पकड़ लेती है। जेमी उसे बचाने के लिए आता है तो उसे भी पीटा जाता है। जैमी के पिता जैमी को ही मजबूर करता है रौंजील  की सजा तय करने को। उसे तीन ऑप्शन दिए जाते है। एक रोंजिल की आँखे , दो उसकी जीभ तीन उसके अंडकोष। जैमी के न बोलने की सूरत में रोंजिल को मार दिया जाना तय है। आखिरकार रोंजिल की जीभ काट दी जाती है।
 रात को अकेले में जैमी अपने पिता की हत्या कर देता है।
  घटना के बाद रोंजिल वापिस यूरोप अपने बीवी बच्चे के पास चला जाता है। जैक्सन परिवार भी उस गांव से अलविदा कर दूसरी जगह बस जाता है उनके पास अपनी जमीन भी हो जाती है।
 शुरू से लेकर आखिर तक फिल्म आपको बांधे रखती है। समाज की सच्चाई को , खेती में काम करने वाले मजदूरों की हालात को , रेसिज्म के कारण पड़ने वाले प्रभावों को जिस सलीके से फिल्म में दिखाया है वो काबिले तारीफ है। कैसे दर्द आपस में बात करते है एक दूसरे का सहारा बनते है। फिल्म बहुत कुछ कह जाती है।  फिल्म के डायलॉग फिल्म की जान है। फिल्म के आखिर में रोंजिल कहता है

 "Should my story end there? Silenced and defeated? Oppression, fear, deformity. It would take an extraordinary man to beat all that. I would have to wean myself off laudanum and self-pity... and travel with a little card in my shirt pocket that said "mute."And then, finally... I would have to cross the Atlantic yet again. This time not for war. But for love." 


  बहुत ही शानदार फिल्म है। जितना महसूस हुआ उसका एक चौथाई भी नहीं लिखा गया। दुर्भाग्य से भारत की फ़िल्में  अभी सच्चे  इतिहास की जगह झूठे गप्पो भरी महिमामंडन वाली फिल्मों तक ही पहुँच पाए है। विदेश के फिल्मकारों की फिल्म देखकर ही हम अपने इतिहास को भी महसूस कर सकते है।

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