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Tuesday, 9 January 2018

कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ

क्या मैं मुसलमानों से नफरत करता हूँ ? या क्या मुझे मुसलमानों से नफरत करनी चाहिए ?

ये सवाल पहली बार जब दिमाग में आया तब मैं शायद 19 या 20 साल का रहा होऊंगा। अटल बिहारी वाजपेयी मेरे पसंदीदा नेता हुआ करते थे। बीजेपी मेरी पसंदीदा पार्टी। जहाँ रहता था वहां आसपास मुसलमान नहीं रहते थे। जो एक दो रहते भी थे उनके नाम हिन्दुओ जैसे ही थे मुझे तब तक उनके मुसलमान होने का पता भी नहीं था। जहाँ रहता था वहाँ कभी किसी से संघ या आरएसएस का नाम भी नहीं सुना था पर मुसलमानों के लिए ढेरों बातें जरूर सुन  रखी थी। जैसे वो बहुत कटटर होते है। एक बार रेल में एक भाई मिला वो कह रहा था सच्चा मुसलमान कभी भी तुम्हारे हाथ से ली हुई चीज नहीं खायेगा। फेंक देगा। और भी बहुत सी बातें थी जो बचपन से सुनता आ रहा था। यानी हरियाणा में संघ के लिए जमीन कभी से तैयार ही थी। एक रात ये सवाल अपने आप मेरे पास आ गया कि क्या मुझे मुसलमानों से नफरत करनी चाहिए। 

 जो पहला चेहरा मेरे सामने आया वो मोहम्मद रफ़ी का था। जिसके गाने बचपन से सुनते  आ रहा था वो मुसलमान था। फिर जावेद अख्तर याद आया जिसके लिखे गाने सुनकर हमेशा लगता था कि काश कोई ऐसा जरिया होता कि जावेद अख्तर कोई ये बात बता सकता कि उसके लिखे गाने सुनकर बहुत मजा आता है। फिर साहिर याद आया साहिर की वो नज़्म याद आयी जिस नज़्म की कतरने मैं जहाँ मौका मिले लिखता रहता था। 


लेकिन इन तल्ख मुबाहिस से भला क्या हासिल?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

उस वक्त जितनी तर्क शक्ति थी उसके आधार पर उसी रात मैंने इस सवाल को कूड़े के डब्बे में फेंक दिया था। ये तो बिलकुल बेवकूफाना सवाल है। बाद के अनुभवों ने मेरे उस निर्णय को सही भी साबित किया और ज्यादा तर्क भी दिए। पर अफ़सोस ये है कि हकीकत यही है कि ये सवाल हमारे अंदर इतने अंदर तक घुस चुका है कि जवाब पता भले ही हो पर दिल से मानता कोई नहीं। जो भी प्रगतिशील लोग नरेंद्र भाई मोदी को पसंद करते है उनके पास उन्हें पसंद करने का सिर्फ एक ही कारण है कि वो मुसलमानो से नफरत करते है। बाकी तो जन्नत की हकीकत सबको पता है। भ्रष्टाचार ब्ला ब्ला ब्ला। फेसबुक पर ही कितने लोग है जो चाहकर भी इस बात को नहीं छुपा पाते है कि वो मुसलमानो से, दलितों से, औरतो से नफरत करते है। बाकी ट्रांसजेंडर और थर्ड जेंडर तो वैसे ही किसी की गिनती में नहीं आते। हमारे दिल में कितनी नफरत है इसका अंदाजा लगाना शायद फ़िलहाल सम्भव नहीं है क्यूंकि अभी तो हमने ये मानना भी शुरू नहीं किया है कि जो हमारे दिल में है उसे नफरत कहते है। हाल ये है कि अगर किसी को उस नफरत या असंवेदनशीलता के लिए टोक दो तो वो खुद को " पीड़ित " " पीड़ित " कह कर चिल्लाना शुरू कर देता है। अपनी भावना और इमोशंस के लिए इतने संवेदनशील लोगों को ताजिंदगी पता ही नहीं चलता कि उनकी भाषा और वो खुद दूसरो के लिए कितने असंवेदनशील है। जब से कानून बना है कि शोषित जातियों के नाम से बनी गालियाँ देना क़ानूनी अपराध है तब से अपर कास्ट इतना हर्ट हुआ घूम रहा है मानो उससे मौलिक अधिकार छीन लिए गए हो।  लड़कियों से जुडी गालियों पर अभी शायद सजा का प्रावधान नहीं है पर कमोबेश सभी मर्दों के हाल वही है। एक दोस्त ने तो बाकायदा थेओरी पेश की है कि अगर फेसबुक  पर कोई गाली लिखता है पर उसकी भावना गाली देने की नहीं होती है तो उसे टोका नहीं जाना चाहिए उसे टोकना उसे प्रताड़ित करना है। हाल इस कदर बुरा है कि मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित लोगो का विचारो का दास कहकर मजाक उड़ाया जाता है माने बिना विचारों के भी लिखा जा सकता है। ये सब संवेदनशील लोगों की कहानी है। ऐसे कितने लोगों को मैं जानता हूँ जो "आई लव मुस्लिम " पोस्ट को दिल देकर आएंगे और साथ ही भयंकर मानव विरोधी आदमी की पोस्ट पर भी "आह " कर आएंगे।  एक आदमी जो भयंकर नफरत से लबरेज मुस्लिम विरोधी पोस्ट लिख रहा है उससे भी ऐतराज नहीं है और " आई लव मुस्लिम " पर दिल भी है। कहाँ से आएं है आप लोग। मैंने एक बार ऐसे ही पूछ लिया कि ये आदमी कितना जहर भरी नफरत वाली पोस्ट लिखता है तो दोस्त कहने लगा यार मैं विचार नहीं देखता मैं तो लिखाई देखता हूँ देख कितनी प्यारी लिखाई है। मोती पिरो कर लिखा हुआ है "मुसलमानो को मार दो"। विचार ही सब कुछ थोड़ी होता है। आप लोगों को सुंदरता से चिढ है देखो कितना सुंदर लिखा हुआ है। अब कोई बताये ऐसी सुंदरता का कोई क्या करे अपनी संवेदना को छोड़कर हम किस कदर असंवेदनशील है इसका अहसास जब तलक हमें नहीं होगा तब तक हालात ऐसे ही रहने है बाकी सब तो जो है वो रिएक्शनरी है। वो बोलेंगे आई हेट मुस्लिम हम कह देंगे आई लव मुस्लिम। एक बार पीछे तो कमाल ही हो गया बल्कि ये कमाल दो बार लगातार हुआ। एक बार तो मुहीम चली आई सपोर्ट लव जिहाद। मेरे आस पास सब दीवारों पहले ही चिल्ला उठी कि नहीं हमसे टकरा के सर फोड़ने की कोई जरूरत नहीं है  दोबारा अभी क्रिसमिस पर हुआ कि हम बनाएंगे क्रिसमिस। क्यों ? क्योंकि वो विरोध कर रहे है। आगे कभी ऐसा दिन न देखने को मिल जाए कि जब संघ कहे कि  हम मंदिर नहीं बनाएंगे और हम ईंट गारा लेकर वहाँ पहुँच जाए कि ऐसा कैसे जी मंदिर तो वहीँ बनायेंगे।  हमारी 90 फीसदी मुहीम वो ही तय कर रहे है। वो तो ये ही चाहते है कि इस बात पर डिबेट हो कि मुसलमान प्यार करने लायक है या नहीं ? इस बात पर वो अगले सौ साल तक बहस कर सकते है। बहस का या विरोध का मुद्दा उनकी गुंडागर्दी होना चाहिए था। कैसे कोई किसी को धमका सकता है ? मुद्दा लड़की की आजादी का होना चाहिए। क्योंकर आजाद से आजाद ख्याल घरानो में भी लड़कियों को अपने धर्म अपनी जाति में ही शादी करना पसंद है ?  उस लड़की ने तो एक बहस में बस इतना लिखा कि वो मुस्लिम को पसंद करती है और उसे आत्महत्या करनी पड़ गयी। उस समाज में लड़कियों की कैद कितनी गहरी है क्या इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम है ? इस मुद्दे पर कितना कुछ लिखने को है क्या कुछ लिखा जा सकता है। फ़िलहाल साहिर की वो नज्म ही लिख रहा हूँ जो जाने कितने सालों से मेरे दिल में घर बनाये हुए है। उस लड़की की तरफ से उन गुंडों को , हर दमित शोषित आवाज की तरफ से शोषकों को उनके तरफ़दारों को 


नेक मादाम ! बहुत जल्द वो दौर आयेगा
जब हमें ज़ीस्त के अदवार परखने होंगे
अपनी ज़िल्लत की क़सम, आपकी अज़मत की क़सम
हमको ताज़ीम के मे'आर परखने होंगे

हम ने हर दौर में तज़लील सही है लेकिन
हम ने हर दौर के चेहरे को ज़िआ बक़्शी है
हम ने हर दौर में मेहनत के सितम झेले हैं
हम ने हर दौर के हाथों को हिना बक़्शी है

लेकिन इन तल्ख मुबाहिस से भला क्या हासिल?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

वजह बेरंगी-ए-गुलज़ार कहूँ या न कहूँ
कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ





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