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Tuesday, 30 January 2018

बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी की तैसी

                                 


पिछले दो महीनो में संयोगवश ही तीन चार ऐसी फिल्म देखने का मौका मिला जिनमें अमेरिका के इतिहास का दर्शन था। 1962 में बनी " ूto killing a mocking bird"  हो या 2007 की फिल्म " great debatators " हो या " 12 years a slave"  हो या 2013 की " 12 years a slave " हो या 2017 की " mudbound" सभी फिल्मों में अमेरिकी इतिहास के क्रूर सच्चाई को पूरी ईमानदारी से पेश किया गया है।  किलिंग ऐ मॉकिंग बर्ड में दिखाया है कि अदालत में नायक बिलकुल साफ़ साफ़ साबित कर देता है कि रॉबिन्सन बिलकुल निर्दोष है। फिर भी जूरी के सभी सदस्य उसे दोषी करार दे देते है क्यूंकि रॉबिन्सन काला था और जूरी के सभी सदस्य गोरे थे। 12 years a slave में दिखाया गया है किस कदर अमानवीय तरीकों से उस समय काले लोगों के साथ व्यवहार होता था और सभी उसे सही भी मानते थे। वो सब कुछ नॉर्मल था। फिल्म के कुछ दृश्य तो हिला देने वाले है। मडबाउंड फिल्म में बावजूद इसके कि नायक एक वार हीरो है नायक की जीभ सिर्फ इस अपराध के लिए काट दी जाती है कि उसने एक गोरी लड़की से शादी की और उससे मिक्स्ड रेस का बच्चा हुआ। फिक्शन फिल्म "DJANGO" तो लाजवाब है। गोरों के महल को उड़ाकर नायिका के साथ शान से जाता है। ये सारी ऐतिहासिक फ़िल्में है और इन फिल्मो में इतिहास शोषितों  की नजर से दिखाया गया है ना की  अत्याचारियों और शोषकों की नजर से। 

भारत में मसला बिलकुल विपरीत है। यहाँ शोषितों का कोई इतिहास ही नहीं है।  यहाँ भी फिल्मों का इतिहास नया नहीं है पर हम तब से लेकर आज तक " जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा " से आगे नहीं बढ़ पाए है। हमारे सारे नायक भयंकर अत्याचारी , सामंती किरदार है। सब फिल्मों में उनकी जयजयकार है। उसपे  तुर्रा ये कि इन सब इतिहास भी बताया जाता है।  सती प्रथा से लेकर जोहर तक , दलितों के अमानवीय शोषण से लेकर ज्योतिबा फुले और भीमराव अम्बेडकर की संघर्ष और विजय गाथा तक सब पर एक से बढ़कर एक कहानी बन सकती है। जबरदस्त फ़िल्में बन सकती है।  पर हमें बचपन से ही इतनी कुंठित शिक्षा और कंडीशनिंग मिली है कि हम हमारे नायक बलात्कारियों और अत्याचारियों में ही  ढूंढ़ते है।  सबसे कमाल बात है कि इसको इतिहास के नाम पर न्यायसंगत भी ठहराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। मानसिक रोगियों के इलावा बहुत से समझदार भी जौहर की पैरवी कर रहे है ये हमारी नारियों के प्रति आज की समझ को दर्शाता है।  दरअसल असंवेदनशीलता हमें विरासत में मिली है। " कूद पड़ी हजारों पद्मिनियाँ अंगारों पर " सुन सुनके हम जवाँ हुए है।  पूंजीवाद पर कठोर प्रहार करने वाले समाजवाद के लिए सब कुछ न्योछावर करने के आह्वान करने वाले हमारे कवि बहुत उदास हो जाते है जब उन्हें पूंछ उठाने पर सब मादा निकलते है। समाजवाद को नारी का एकमात्र मुक्ति का नारा देने वाले कॉमरेड अपनी कीमती कीमती किताबों में , लेखो में " विधवा विलाप " और " रंडी रोना "  जैसे मुहावरों का इस्तेमाल करते हुए मिलते है। इस बात में दो राय नहीं है कि समाजवाद ही सबसे आदर्श स्थिति है पर सवाल ये है कि समाजवाद की सब किताबें पढ़कर भी आप इतनी संवेदना इतनी समझ क्यों नहीं बना पाए कि ये मुहावरे नारी विरोधी है। इन्हे बहुत पहले दफ़न हो जाना चाहिए था। हमारी पीढ़ी तक नहीं आना चाहिए था। ये तो बहुत बेसिक सी बातें है जिन्हे आज पुराने समय की दुहाई देकर अतिवाद करार कर दिया जाता है। 

कुछ महीने पहले हिसार में राहुल ढोलकिया  एक फिल्म फेस्टिवल में आये हुए थे। राहुल ढोलकिया  परजानिया जैसी संवेदनशील फिल्म के निर्देशक है। फिल्म के बाद हुए सवाल जवाब के सेशन में एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि आजकल हर बात का इशू बन जाता है पहले ऐसे नहीं था। इसका उदारहण देते हुए उन्होंने अपनी फिल्म " रईस " की बात करते हुए कहा कि जावेद अख्तर ने फिल्म का डायलॉग " बनियो का दिमाग " डायलॉग हटाने के लिए सोचने को कहा था। राहुल ढोलकिया जी आगे कह रहे थे कि ये बात बहुत शॉकिंग लगी उन्हें क्यूंकि ये तो वो बचपन से सुनते आये हैं। ये स्टेटमेंट तो जातिवादी नहीं है अब उन्हें कैसे समझाए कि आप एक शोषक जाति की तारीफ कर रहे हो। क्या शोषण करना ही दिमाग की निशानी होती है ? हम जाने अनजाने शोषकों के पक्ष में इस कदर खड़े होते है कि हमें खुद भी इस का अहसास नहीं होता। मैंने बनियो को बेईमानी से लिंक करती एक पोस्ट लिखी तो एक दोस्त बहुत आहत हुए।  उन्हें ये सबको एक पलड़े में रखना लगा। सब के सब कैसे बेईमान हो सकते है। इस तरह के तर्क आये। जब शोषकों पर ऊँगली उठती है तो हमारी तर्क शक्ति कितनी सही और सटीक काम करती है।  जब  राजपूत को वीर बहादुर कहा जाता है। ब्राह्मण को पंडित  जी कहा जाता है बनियों को दिमाग वाला कहा जाता है तब ये बात हमारे समझ में बिलकुल नहीं आती। तब ये ओके है। राहुल  जी को सच्चा डायलॉग लिखना था तो " बनियो सी बेईमानी " लिखते। पर अभी  हम सब अपनी जाति पहचान से इतना चिपके रहना चाहते है कि इंसान होने की बजाय आज भी उन जातियों का होने में ज्यादा गर्व महसूस करते है जिनका इतिहास क्रूरता से भरा हुआ है। जो शर्म के प्रतीक होने चाहिए थे उन्हें हम गर्व मानकर सीने से चिपकाए हुए है इसका नतीजा ये है कि अपने को तर्कशील और समझदार मानने वाले लोग आज इस बात पर बहस कर रहे है कि हजारो लड़कियों को आग में धकेल देना ही एकमात्र रास्ता था। वो  सब इस बात को भी मानते है कि हजारों औरते अपनी मर्जी से आग में कूद  गयी थी जो कि ख़ुदकुशी का सबसे भयावय तरीका है। सती होने वाली लड़की कई बार आग में जलने के  बाद भी जिन्दा बच जाती थी। दरअसल जाति एक  जादू है जो सर  चढ़कर बोलता है। अपनी जाति को न्यायसंगत ठहराने के लिए आदमी बड़े शौक से बेवकूफ कहलाना पसंद  कर लेता है। 



 अब भी वक्त है अत्याचारियों , शोषकों को नायक बनाने की बजाय उन्हें लताड़ना शुरू कर दो जब सब का दर्द महसूस होगा तो  सब साथ भी होंगे। सभी जातिवादी , मर्दवादी प्रतीकों को जोर से कहने की जरुरत है 

बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी की तैसी 

काहे के महान तुम्हारी ऐसी तैसी 

सिर्फ विश्वास करने की बात  है यकीन मानिये हम सब बाई डिफ़ॉल्ट इंसान ही है। जरा सी कोशिश करने पर बन सकते है। 


Saturday, 20 January 2018

जाहिद शराब पीने दे। कहीं पीने दे भले ही

                                जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर 
                                 या वो जगह बता जहाँ पे खुदा न हो। 

ये लोकप्रिय और क्रन्तिकारी  शेर किसने लिखा है इसका मुझे पक्का पता नहीं है पर ये पक्का है कि लिखा किसी आदमी ने ही है। दरअसल क्रांति करने की सुविधा भी हर किसी के पास एक जैसी नहीं होती। जिसने भी शेर लिखा उसे शराब नॉर्मली पीने की मनाही नहीं ही रही होगी तभी उसने मस्जिद में बैठकर पीने की जिद की। (अगर आजाद भारत में पैदा होता तो गुजरात में पीने की जिद करता वैसे आजाद भारत उतना कटटर नहीं है थोड़े से ज्यादा पैसो में गुजरात में भी पीने की इजाजत दे देता है। ) दूसरा उसे मस्जिद में जाने की मनाही नहीं थी बस वहां बैठकर दारु नहीं पी सकता था जिसे ये दो प्राइविलेज मिले हो तो वो ये शेर भी लिख सकता है हालाँकि ये शेर लिखना भी अपनी जान जोखिम में डालने से कम नहीं है पर औरतों को अपनी मर्जी से अपनी जान जोखिम में डालने का हक़ भी नहीं है। जिसके लिए मस्जिद के दरवाजे ही बंद होंगे वो तो अंदर जाने में ही गंगा नहाया मान लेगा। जिसके लिए शराब का नाम लेना ही मुसीबतों को बुलावा देना है वो मस्जिद में बैठकर  पीने की जिद नहीं कर सकता। उसके लिए तो घर के किसी कोने में भी पीने को मिल जाए वो भला है। तो ये पक्का है कि ये शेर किसी औरत ने नहीं लिखा। दरअसल मर्द को हर जगह इतना प्राइविलेज मिला हुआ है कि वो हर  जगह औरतों से कहीं आगे है।  बेवकूफी में भी आदमी औरत का कोई मुकाबला नहीं है। बेवकूफी करने के जितने भी मौके आदमियों को मिलते है वो इतनी जल्दी से वो मौका लपक बेवकूफी करते है मानों उनको डर लगा हो कि कहीं औरत उनसे बेवकूफी करने में आगे न चली जाए। 

खैर बात शराब की चल रही थी। शराब हमारे समाज में औरतें नहीं पीती। अपनी मर्जी से नहीं पीती ऑफकोर्स। हमारे समाज में मर्द शराब पीते है। कुछ नहीं भी पीते। कुछ पीकर दंगे भी करते है। कुछ नहीं भी करते। लोकतान्त्रिक देश है जो करते है अपनी मर्जी  से करते है। इसके बावजूद इस देश की जो  सबसे खूबसूरत बात है वो ये है कि यहाँ हर के आदमी के पास  हर विषय पर एक राय है और औरत के विषय में सब एक राय हैं  कि भगवान् ने उन्हें कमतर पैदा किया है और  उन्हें सलाह और आदेश देना मर्दों का विशेष अधिकार है। कुछ जो बेवकूफ होते है वो डंके की चोट पर बोल देते है कि नारी जो है वो ताडन की अधिकारी है। कुछ जो थोड़े समझदार होते है वो ताडन की भाषाई विशेषता बता उसका मतलब पालन कर देते है जैसे पशु पालते वैसे औरत भी पालते। जो सबसे  समझदार होते हैं वो औरत की प्रजनन के विज्ञान को ले आते है। (वैसे कुछ प्राइविलेज हो मर्द की शातिरता पर कई बार तारीफ करने का दिल करता है। मन्ने आदमी बच्चे पैदा नहीं कर सकता ये मुख्यत उसकी एक बहुत कमी है और उसने किस तरह औरत की प्रजजन क्षमता जो कि उसकी एक बहुत बड़ी खूबी है को ही  उसकी कमजोरी के रूप में प्रचलित कर दिया )


औरत के मामले में हम बहुत विशेषज्ञ है। औरत हमारे लिए खरबूजा है जिसके कटने पर सब में बंट जाना चाहिए।  एक दोस्त ने अपने एक प्रगतिशील दोस्त से हुई बातचीत के बारे में मुझे बताया था। दरअसल  एक लड़की से जुड़ा ही मसला था। किसी गाँव में एक लड़का शहर से एक लड़की पेड सेक्स के लिए ले आया था जहाँ बाद में उस लड़की को पैसे भी नहीं दिए और उस लड़के के दोस्तों ने भी जबरन सेक्स किया। जब मेरा दोस्त उस लड़की के लिए इन्साफ की गुहार लगाने अपने उस प्रगतिशील दोस्त के पास गया तो उसने बहुत ग़ज़ब की थेओरी दी कि जब तवा गरम हो दो रोटी फालतू सींक जाए तो क्या फर्क पड़ता है। दरअसल औरतों के लिए हमारे पास इतनी थेओरी है कि अगर इस में अगर नोबल होता तो  हर साल हमें ही मिलता। गांव की चौपाल से लेकर सुप्रीम खाप की पंचायत तक औरत के सेक्स प्रवृति को लेकर जो स्टेटमेंट है वो फिक्शन की सब हदों को पार करते है  

हमारे समाज में औरत होने के अपराध को तो हम फिर भी माफ़ कर सकते है एक समझदार इंटेलिजेंट औरत होना वो अपराध है जिसकी कोई माफ़ी नहीं है। वो नाकाबिले माफ़ी है। मेरी एक दोस्त हैं जो पेशे से वकील है उन्होंने कोर्ट के एक जजमेंट से सम्बंधित शराब को लेकर एक पोस्ट डाली। दोस्त सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती है। उस पोस्ट पर एक प्रगतिशील सज्जन उन्हें जज और वकील का फर्क समझा रहे थे। लड़की होकर शराब पीने की बात सुनकर एक गांधीवादी इतने आहत हो गए कि उन्हें देश में मोदी राज लाने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। ये कोई इकलौता किस्सा नहीं है। फेसबुक पर ये बहुत आम है। बहुत सी बहसों को लब्बोलुहाब ये ही निकलता है कि औरत होकर हमसे बहस करती हो। कई बार सब तर्क जब ख़त्म हो जाते हैं तो कुछ खिसिया कर तारीफ भी कर देते हैं  " इंस्पाइट ऑफ़ बीइंग वुमन यू आर वेरी इंटेलेक्चुअल। " उनसे वो फेमस सवाल पूछने का दिल करता है 

"भाई साहब आपने गाय का मूत पीना बंद कर दिया क्या ?"

सबसे बड़ा खतरा जेंडर इक्वलिटी से है। जहाँ जेंडर इक्वल्टी की बात आएगी वहां हमारी नैतिकता सबसे पहले जागेगी।  एक लड़की के शराब का स्टेटस डालने के कारण भारत में फासीवाद आ  गया। भले ही  लड़का शराब की खाली बोतलों से भरी छत की फोटो को अपना कवर पिक ले वो कुलपना है। वो फोटो राम राज में सहायक है। जेंडर इक्वल्टी की बात आते ही हमें इतने पेंच याद आ जाते है कि अगला कह उठे भाई ग़लती हो गयी। सब मस्त है कोई ग़लती नहीं है। 

जाते जाते हमारे मुख्यमंत्री जी का बयान भी सुना दूँ जो कह रहे है बलात्कार के लिए पिछले सरकारें जिम्मेदार है। वैसे बलात्कार और औरतों पर अगर माननीयो के स्टेटमेंट  पर बात होने लगी तो सिवाय जनाब शौक बहराइची के इस शेर के और कुछ भी कहना बेमानी है 

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी था 
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा। 



गुलिस्ताँ का अंजाम हमारे सामने ही है 

मडबाउंड : दमन की सच्ची दास्ताँ बताती फिल्म


कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। जो लोग अपने इतिहास से नजर नहीं मिला पाते उनकी आने वाले  पीढ़ियों को भी विरासत में झूठ , नफरत ही मिलनी तय है। नेटफ्लिक्स पर dee rees द्वारा निर्देशित फिल्म मडबाउंड देख कर लगता है कुछ लोग अपने इतिहास  के लिए कितना ईमानदार हैं। विश्व गुरु , स्वर्णिम इतिहास जैसी बातों की बजाय इतिहास की क्रूर सच्चाइयों को सामने रखना बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। फिल्म मदबाउन्ड इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है।  फिल्म की कहानी दूसरे विश्व युद्ध के वक्त अमेरिका के मिसिसिपी के एक  गांव के दो परिवारों की कहानी है। एक परिवार गोरा है, जमींदार है, परिवार का मुखिया हेनरी मैक्लीन अपनी बीवी लौरा मैक्लीन दो बच्चों और रंगभेद की पैरवी करने वाले अपने बाप के साथ गाँव शहर से गाँव आता है।  उसे खेती का जनून है अपना सब कुछ बेचकर वो गांव में दो सौ एकड़ जमीन खरीदता है। उसका छोटा भाई जैमी एयरफोर्स में दूसरे विश्वयुद्ध की लड़ाई में हैं।
 दूसरा परिवार हैप जैक्सन और उसकी पत्नी फ्लोरेंस का है जो अश्वेत हैं और उन खेतों में जुताई करते है जिनका मालिक अब हेनरी मैक्लीन है। जिनका एकमात्र सपना एक दिन अपनी खुद की जमीन पर खेती करने का है। हैप अपनी कहानी शुरू करते वक्त कहता है  

“What good is a deed? My grandfathers and great uncles, grandmothers and great aunts, father and mother, broke, tilled, thawed, planted, plucked, raised, burned, broke again. Worked this land all they life, this land that never would be theirs. They worked until they sweated. They sweated until they bled. They bled until they died. Died with the dirt of this same 200 acres under their fingernails. Died clawing at the hard, brown back that would never be theirs. All their deeds undone. Yet this man, this place, this law... say you need a deed. Not deeds.

 उनका बेटा रोंजिल जैक्सन विश्व युद्ध में अमेरिका की आर्मी में शामिल होकर युद्ध के मैदान पर है।
 साल दर साल ख़राब मौसम की मार दोनों परिवार झेलते हैं। पैदावार ख़राब होती है। बुरे वक्त में जब हेनरी मैक्लीन की लड़कियां बीमार होती है  तो फ्लोरेंस उनकी मदद करती है। जब खेत में काम करते वक्त हैप की टांग टूट जाती है तो लौरा अपने पति को बिना बताये फ्लोरेंस के परिवार की आर्थिक मदद करती है। इसी बीच हेनरी के पिता वक्त बेवक्त जैक्सन परिवार पर रंगभेदी टिप्पणी करने से बाज नहीं आते।
 वक्त आगे बढ़ता है  विश्व युद्ध ख़त्म होता है। जेमी और रोंजिल वापिस गांव आते है। रोंजिल युद्ध से नायक बनकर लौटा है पर गाँव आते ही पाता है कि यहाँ कुछ नहीं बदला है। रंगभेद आज भी वैसे ही है। वहाँ उसे नीग्रों , ब्लैकी कहकर ही बुलाया जाता है। जनरल स्टोर में वो सामने  वाले दरवाजे से आ जा नहीं सकता है। अश्वेतों के लिए पीछे अलग दरवाजा है। उधर जेमी युद्ध का असर साथ लिए वापिस आता है। युद्ध की यादें मिटाने के लिए शराब पीता है। जेमी और रोंजिल दोस्त बन जाते है। जेमी उसे बताता है कि युद्ध के दौरान जब वो मरने वाला था तो एक अश्वेत साथी ने उसकी जान बचाई थी। रोंजिल उसे जैमी को बताता है कि उसे वहां एक जर्मन लड़की से प्यार हुआ वो उस लड़की और उस लड़की से हुए अपने बेटे की तस्वीर भी दिखाता है।
 वो तस्वीर जैमी के पापा के हाथ लगती है जो वहां के गोरे लोगों को उकसाता है रोंजिल को मिक्सड रेस पैदा करने के लिए सजा देने को। भीड़ रोंजिल को पकड़ लेती है। जेमी उसे बचाने के लिए आता है तो उसे भी पीटा जाता है। जैमी के पिता जैमी को ही मजबूर करता है रौंजील  की सजा तय करने को। उसे तीन ऑप्शन दिए जाते है। एक रोंजिल की आँखे , दो उसकी जीभ तीन उसके अंडकोष। जैमी के न बोलने की सूरत में रोंजिल को मार दिया जाना तय है। आखिरकार रोंजिल की जीभ काट दी जाती है।
 रात को अकेले में जैमी अपने पिता की हत्या कर देता है।
  घटना के बाद रोंजिल वापिस यूरोप अपने बीवी बच्चे के पास चला जाता है। जैक्सन परिवार भी उस गांव से अलविदा कर दूसरी जगह बस जाता है उनके पास अपनी जमीन भी हो जाती है।
 शुरू से लेकर आखिर तक फिल्म आपको बांधे रखती है। समाज की सच्चाई को , खेती में काम करने वाले मजदूरों की हालात को , रेसिज्म के कारण पड़ने वाले प्रभावों को जिस सलीके से फिल्म में दिखाया है वो काबिले तारीफ है। कैसे दर्द आपस में बात करते है एक दूसरे का सहारा बनते है। फिल्म बहुत कुछ कह जाती है।  फिल्म के डायलॉग फिल्म की जान है। फिल्म के आखिर में रोंजिल कहता है

 "Should my story end there? Silenced and defeated? Oppression, fear, deformity. It would take an extraordinary man to beat all that. I would have to wean myself off laudanum and self-pity... and travel with a little card in my shirt pocket that said "mute."And then, finally... I would have to cross the Atlantic yet again. This time not for war. But for love." 


  बहुत ही शानदार फिल्म है। जितना महसूस हुआ उसका एक चौथाई भी नहीं लिखा गया। दुर्भाग्य से भारत की फ़िल्में  अभी सच्चे  इतिहास की जगह झूठे गप्पो भरी महिमामंडन वाली फिल्मों तक ही पहुँच पाए है। विदेश के फिल्मकारों की फिल्म देखकर ही हम अपने इतिहास को भी महसूस कर सकते है।

Tuesday, 9 January 2018

कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ

क्या मैं मुसलमानों से नफरत करता हूँ ? या क्या मुझे मुसलमानों से नफरत करनी चाहिए ?

ये सवाल पहली बार जब दिमाग में आया तब मैं शायद 19 या 20 साल का रहा होऊंगा। अटल बिहारी वाजपेयी मेरे पसंदीदा नेता हुआ करते थे। बीजेपी मेरी पसंदीदा पार्टी। जहाँ रहता था वहां आसपास मुसलमान नहीं रहते थे। जो एक दो रहते भी थे उनके नाम हिन्दुओ जैसे ही थे मुझे तब तक उनके मुसलमान होने का पता भी नहीं था। जहाँ रहता था वहाँ कभी किसी से संघ या आरएसएस का नाम भी नहीं सुना था पर मुसलमानों के लिए ढेरों बातें जरूर सुन  रखी थी। जैसे वो बहुत कटटर होते है। एक बार रेल में एक भाई मिला वो कह रहा था सच्चा मुसलमान कभी भी तुम्हारे हाथ से ली हुई चीज नहीं खायेगा। फेंक देगा। और भी बहुत सी बातें थी जो बचपन से सुनता आ रहा था। यानी हरियाणा में संघ के लिए जमीन कभी से तैयार ही थी। एक रात ये सवाल अपने आप मेरे पास आ गया कि क्या मुझे मुसलमानों से नफरत करनी चाहिए। 

 जो पहला चेहरा मेरे सामने आया वो मोहम्मद रफ़ी का था। जिसके गाने बचपन से सुनते  आ रहा था वो मुसलमान था। फिर जावेद अख्तर याद आया जिसके लिखे गाने सुनकर हमेशा लगता था कि काश कोई ऐसा जरिया होता कि जावेद अख्तर कोई ये बात बता सकता कि उसके लिखे गाने सुनकर बहुत मजा आता है। फिर साहिर याद आया साहिर की वो नज़्म याद आयी जिस नज़्म की कतरने मैं जहाँ मौका मिले लिखता रहता था। 


लेकिन इन तल्ख मुबाहिस से भला क्या हासिल?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

उस वक्त जितनी तर्क शक्ति थी उसके आधार पर उसी रात मैंने इस सवाल को कूड़े के डब्बे में फेंक दिया था। ये तो बिलकुल बेवकूफाना सवाल है। बाद के अनुभवों ने मेरे उस निर्णय को सही भी साबित किया और ज्यादा तर्क भी दिए। पर अफ़सोस ये है कि हकीकत यही है कि ये सवाल हमारे अंदर इतने अंदर तक घुस चुका है कि जवाब पता भले ही हो पर दिल से मानता कोई नहीं। जो भी प्रगतिशील लोग नरेंद्र भाई मोदी को पसंद करते है उनके पास उन्हें पसंद करने का सिर्फ एक ही कारण है कि वो मुसलमानो से नफरत करते है। बाकी तो जन्नत की हकीकत सबको पता है। भ्रष्टाचार ब्ला ब्ला ब्ला। फेसबुक पर ही कितने लोग है जो चाहकर भी इस बात को नहीं छुपा पाते है कि वो मुसलमानो से, दलितों से, औरतो से नफरत करते है। बाकी ट्रांसजेंडर और थर्ड जेंडर तो वैसे ही किसी की गिनती में नहीं आते। हमारे दिल में कितनी नफरत है इसका अंदाजा लगाना शायद फ़िलहाल सम्भव नहीं है क्यूंकि अभी तो हमने ये मानना भी शुरू नहीं किया है कि जो हमारे दिल में है उसे नफरत कहते है। हाल ये है कि अगर किसी को उस नफरत या असंवेदनशीलता के लिए टोक दो तो वो खुद को " पीड़ित " " पीड़ित " कह कर चिल्लाना शुरू कर देता है। अपनी भावना और इमोशंस के लिए इतने संवेदनशील लोगों को ताजिंदगी पता ही नहीं चलता कि उनकी भाषा और वो खुद दूसरो के लिए कितने असंवेदनशील है। जब से कानून बना है कि शोषित जातियों के नाम से बनी गालियाँ देना क़ानूनी अपराध है तब से अपर कास्ट इतना हर्ट हुआ घूम रहा है मानो उससे मौलिक अधिकार छीन लिए गए हो।  लड़कियों से जुडी गालियों पर अभी शायद सजा का प्रावधान नहीं है पर कमोबेश सभी मर्दों के हाल वही है। एक दोस्त ने तो बाकायदा थेओरी पेश की है कि अगर फेसबुक  पर कोई गाली लिखता है पर उसकी भावना गाली देने की नहीं होती है तो उसे टोका नहीं जाना चाहिए उसे टोकना उसे प्रताड़ित करना है। हाल इस कदर बुरा है कि मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित लोगो का विचारो का दास कहकर मजाक उड़ाया जाता है माने बिना विचारों के भी लिखा जा सकता है। ये सब संवेदनशील लोगों की कहानी है। ऐसे कितने लोगों को मैं जानता हूँ जो "आई लव मुस्लिम " पोस्ट को दिल देकर आएंगे और साथ ही भयंकर मानव विरोधी आदमी की पोस्ट पर भी "आह " कर आएंगे।  एक आदमी जो भयंकर नफरत से लबरेज मुस्लिम विरोधी पोस्ट लिख रहा है उससे भी ऐतराज नहीं है और " आई लव मुस्लिम " पर दिल भी है। कहाँ से आएं है आप लोग। मैंने एक बार ऐसे ही पूछ लिया कि ये आदमी कितना जहर भरी नफरत वाली पोस्ट लिखता है तो दोस्त कहने लगा यार मैं विचार नहीं देखता मैं तो लिखाई देखता हूँ देख कितनी प्यारी लिखाई है। मोती पिरो कर लिखा हुआ है "मुसलमानो को मार दो"। विचार ही सब कुछ थोड़ी होता है। आप लोगों को सुंदरता से चिढ है देखो कितना सुंदर लिखा हुआ है। अब कोई बताये ऐसी सुंदरता का कोई क्या करे अपनी संवेदना को छोड़कर हम किस कदर असंवेदनशील है इसका अहसास जब तलक हमें नहीं होगा तब तक हालात ऐसे ही रहने है बाकी सब तो जो है वो रिएक्शनरी है। वो बोलेंगे आई हेट मुस्लिम हम कह देंगे आई लव मुस्लिम। एक बार पीछे तो कमाल ही हो गया बल्कि ये कमाल दो बार लगातार हुआ। एक बार तो मुहीम चली आई सपोर्ट लव जिहाद। मेरे आस पास सब दीवारों पहले ही चिल्ला उठी कि नहीं हमसे टकरा के सर फोड़ने की कोई जरूरत नहीं है  दोबारा अभी क्रिसमिस पर हुआ कि हम बनाएंगे क्रिसमिस। क्यों ? क्योंकि वो विरोध कर रहे है। आगे कभी ऐसा दिन न देखने को मिल जाए कि जब संघ कहे कि  हम मंदिर नहीं बनाएंगे और हम ईंट गारा लेकर वहाँ पहुँच जाए कि ऐसा कैसे जी मंदिर तो वहीँ बनायेंगे।  हमारी 90 फीसदी मुहीम वो ही तय कर रहे है। वो तो ये ही चाहते है कि इस बात पर डिबेट हो कि मुसलमान प्यार करने लायक है या नहीं ? इस बात पर वो अगले सौ साल तक बहस कर सकते है। बहस का या विरोध का मुद्दा उनकी गुंडागर्दी होना चाहिए था। कैसे कोई किसी को धमका सकता है ? मुद्दा लड़की की आजादी का होना चाहिए। क्योंकर आजाद से आजाद ख्याल घरानो में भी लड़कियों को अपने धर्म अपनी जाति में ही शादी करना पसंद है ?  उस लड़की ने तो एक बहस में बस इतना लिखा कि वो मुस्लिम को पसंद करती है और उसे आत्महत्या करनी पड़ गयी। उस समाज में लड़कियों की कैद कितनी गहरी है क्या इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम है ? इस मुद्दे पर कितना कुछ लिखने को है क्या कुछ लिखा जा सकता है। फ़िलहाल साहिर की वो नज्म ही लिख रहा हूँ जो जाने कितने सालों से मेरे दिल में घर बनाये हुए है। उस लड़की की तरफ से उन गुंडों को , हर दमित शोषित आवाज की तरफ से शोषकों को उनके तरफ़दारों को 


नेक मादाम ! बहुत जल्द वो दौर आयेगा
जब हमें ज़ीस्त के अदवार परखने होंगे
अपनी ज़िल्लत की क़सम, आपकी अज़मत की क़सम
हमको ताज़ीम के मे'आर परखने होंगे

हम ने हर दौर में तज़लील सही है लेकिन
हम ने हर दौर के चेहरे को ज़िआ बक़्शी है
हम ने हर दौर में मेहनत के सितम झेले हैं
हम ने हर दौर के हाथों को हिना बक़्शी है

लेकिन इन तल्ख मुबाहिस से भला क्या हासिल?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

वजह बेरंगी-ए-गुलज़ार कहूँ या न कहूँ
कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ