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Saturday, 30 December 2017

गुड मॉर्निंग का दर्द


आख़िरकार साल 2017 भी ख़त्म होने को है। नोटबंदी की समाप्ति पर शुरू हुआ साल प्रधानमंत्री के गुड मॉर्निंग का जवाब न दिए जाने के खफा होने से ख़त्म हुआ। खैर साल का हिसाब करने वाले बहुत है। मुझे प्रधानमंत्री के लिए बहुत अफ़सोस हो रहा है। उससे भी ज्यादा मुझे उन सांसदों के लिए सहानुभूति हुई जिन्हे प्रधानमंत्री के गुड मॉर्निंग का जवाब देना पड़ता है। दरअसल गुड मॉर्निंग मेरी वो  रग है जो बचपन से लगातार दुःख रही है। मेरे साथ भी समस्या यही थी गुड मॉर्निंग नहीं कहा जाता था। कॉलोनी में एक अंकल थे उन्हें गुड मॉर्निंग कहने से बचने के लिए दो किलोमीटर की फेर खा कर घर आता था। ऑफिस में तो एक सीनियर ने बाकायदा मीटिंग बुलाकर शिकायत की थी कि अमोल गुड मॉर्निंग नहीं बोलता। वैसे ऐसे लोग हर मुहल्ले में होते होंगे जो बच्चो के गुड मॉर्निंग न बोलने की शिकायत उनके घर कर आते है। पर गुड मॉर्निंग का जवाब न देने की समस्या तो और ज्यादा गंभीर है। मुझे लगा कि सांसदों से पूछा जाना चाहिए कि गुड मॉर्निंग का जवाब देने में उन्हें क्या परेशानी है।  मैं अप्रोच लगा कर संसद पहुँच गया। सबसे पहले एक राष्ट्रवादी पार्टी के सांसद को मिलने का इत्तेफाक हुआ। उनसे पूछा कि मोदी जी आपको गुड मॉर्निंग बोलते है आप जवाब नहीं देते। ऐसा जुल्म क्यों  किया जा रहा है। सांसद के पास तलवार नहीं थी वरना उन्होंने निकाल ली होती। गुस्से में कहने लगे ," प्रधानमंत्री जी  गुड मॉर्निंग की बात करते है हम तो राम राम का भी जवाब नहीं देते। हम " जय श्री राम " बोलते है। प्रधानमंत्री जी विदेश में जाकर गीता की तारीफ करते है कांग्रेस पर छद्म सेक्युलरजिम पर कटाक्ष करते है और देश के सबसे बड़े मंदिर में गुड मॉर्निंग बोलते है। हम आज ही संसद में प्रस्ताव लाने वाले है कि संसद में सब जय श्री राम से ही अभिवादन करे।  मुझे लगा यहाँ ज्यादा देर खड़ा रहना खतरे से खाली नहीं है उन्हें जय श्री राम कहकर मैं आगे निकला तो मुझे कांग्रेस अध्यक्ष नजर आ गए उनसे जब पूछा कि उनकी पार्टी के सदस्य  प्रधानमंत्री को गुड मॉर्निंग का जवाब क्यों नहीं देते।
राहुल जी उदास होकर कहने लगे ," ये बहुत ही  ग़लत बात है। वैसे ही संसद में  हमारी पार्टी के सांसद इतने कम है मेरी जी हुजूरी को ही आदमी कम है। उनके पर काम का पहले ही ओवर बर्डन है ऊपर से प्रधानमंत्री जी उनसे ही गुड मॉर्निंग बुलवाने का काम भी लेना चाहते है ये उनकी सरासर ज्यादती है। और फिर हमें तो और भी डर लगा रहता है हम उन्हें गुड मॉर्निंग का जवाब दे और वो रैली में कहने लगे
" मितरो ये कांग्रेस वाले मुझे गुड मॉर्निंग कहते है मित्रो अंग्रेज चले गए कोंग्रेसी छोड़ गए। मैं आप सब से पूछना चाहता हूँ भाइयो भैनो क्या भारत महान देश के प्रधानमंत्री को गुड मॉर्निंग बोलना चाहिए ? भाइयों भैनो सबको पता है मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ ये कहते हैं कि मेरी सरकार सूट बूट की सरकार है और गुड मॉर्निंग ये लोग खुद बोलते हैं। ये कांग्रेस वाले देश की अनपढ़ जनता का मजाक उड़ा रहे है भाइयो भैनो। "
मैंने पूछा कि पर प्रधानमंत्री जी तो खुद भी तो गुड मॉर्निंग बोलते है।
राहुल बोले कि खुद तो पाकिस्तान बिरयानी भी खा आते है। नवाज शरीफ से गले भी मिल लेते है। कश्मीर में अलगाव वादियों के साथ सरकार भी बना लेते है। उन्हें दिक्कत नहीं है। वो लोग तो गोवा में बीफ भी बेच लेते है और दिल्ली में बीफ पर हंगामा भी कर लेते है।उनके पास तो झोला है सब उस झोले में मिक्स कर देते है। हस क्या करें ?
राहुल की उदासी से दिल उदास हो गया।
राहुल से मिलकर हटा तो हेगड़े साहब मिल गए सोचा चलते चलते इनसे भी पूछता ही चलूँ कि इन्हे संविधान से क्या दिक्कत है। हेगड़े साहब कहने लगे अमोल मुझे सब ग़लत समझ रहे है। ये संविधान सच में ठीक नहीं है। जिस संविधान में मैं 6 बार जीतकर आ सकता हूँ उसमें पक्का कुछ गड़बड़ है। मुझे हेगड़े साहब से सहमत होना पड़ा
मैं वही से वापिस चला आया। सबके अपने दुःख है। प्रधानमंत्री को ये दुःख है कि गुड मॉर्निंग का जवाब नहीं मिलता। विपक्ष वालों को अलग दर्द है। उन्हें एक ऐसे इंसान के साथ रु ब रु होना पड़ रहा है कि गुड मॉर्निंग का जवाब देते हुए भी सोचना पड़ता है कि जवाब दे या चुप रहे। 2018 आने वाला है लोगों के सामने नए साल के संकल्प लेने की भी समस्या है। अधिकतर के 2010 वाले पूरे नहीं हुए। फिर कुछ क्रिएटिव भी होने चाहिए। मैंने 2018 में नए झूठ न बोलने का प्रण लिया तो धीरेश भाई का रात को फोन आ गया। कहने लगे अमोल तूने तो झूठ न बोलने का प्रण लिया पर जिनका कारोबार ही झूठ पर चलता है वो नए साल के क्या प्रण लेते होंगे। ये समस्या भी कम विकट नहीं है। सच बोलने का प्रण तो लिया जा सकता है पर जिन्होंने सारे साल बोलना ही झूठ है वो क्या प्रण लेंगे ? इस साल झूठ के सब रिकॉर्ड तोड़ डालने है। ये भी नहीं ले सकते 2019 भी आने वाला है। ये वाला प्रण तो 2019 के लिए बचाकर रखना है। या वो नेता जो अपने गिरने का हर साल नया स्तर बना रहे है वो क्या प्रण लेंगे। जिस नेता ने इस साल कहा था कि "अगस्त में बच्चे मरते ही है" वो अगले साल के लिए  क्या रिजोल्यूसन ले रहा होगा आईटी सेल वालों ने नए साल के लिए क्या टारगेट रखे होंगे सपाट जीवन किसी का नहीं है सबकी अपनी समस्याएँ है बस ये भूख से मरते आदमी को लगता है कि ये सब लोग ऐश कर रहे होंगे। ऐसा नहीं है ।जीवन में सकारात्मक होने की जरुरत है। भले ही आपके 16 साल के बच्चे को आपको ईद के लिए सामान खरीदने के लिए देश की राजधानी में भेजने से डर लगता हो। भले ही विकृत लोग देश के नायक बन रहे हो। एक विकृत मानसिकता के इंसान के लिए देश की अदालत तक पर भगवा झंडा फहरा दिया जाता है। भले बच्चे के बीमार होने पर आपको बीमारी से ज्यादा डर अस्पतालों से लगता हो। भले ही सरकार बेरोजगारी होने के बावजूद फीस के नाम पर आप को लूट रही हो इतना कुछ होने पर भी निराश होने की जरुरत नहीं है। नया साल आने वाला है। आप के जीवन को और बुरे हाल में लाने के लिए भी तो लोग दिन रात लगे हुए है और कुछ नहीं तो उनकी मेहनत की तारीफ तो कर ही सकते है