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Sunday, 8 October 2017

आंकड़ों का जादुई खेल


खबरें एक बहुत बड़ा बाजार है। ये तब और बड़ा हो गया है जब सबको अपने मतलब की खबरें चाहिए होती है। ख़बरों का एक मतलब होता है और एक मतलब की खबरे होती है। यानी हमने पहले से तय कर लिया है हमें कौन सा सच सुनना है या कौन सा पक्ष सुनना है। पूंजीवाद ने हमें ये सुविधा भी दे ही दी है कि हम जो अपने पसंद का सच सुन सकते है। अख़बार के लिए मार्क ट्वेन का एक कोट है कि अगर आप अख़बार नहीं पढ़ते तो आप बेखबर हो अनभिज्ञ हो और यदि अख़बार पढ़ते हो तो ग़लत जानकारी के मालिक हो जाते हो।
 

खैर आज एक क्रन्तिकारी रिपोर्ट वायर ने जारी की जिसने लोकप्रियता के सभी आयाम तोड़ दिए। सभी प्रगतिशील दोस्तों ने वो रिपोर्ट को शेयर किया। खबर का शीर्षक था
जय अमित शाह का जादुई या सुनहरा स्पर्श।
मैंने वो रिपोर्ट पढ़ी तो लगा कि अपनी थोड़ी बहुत जानकारी रिपोर्ट की लेखिका को और रिपोर्ट को शेयर करने वाले दोस्तों को दे दी जानी चाहिए। बड़े बुजुर्ग कह गए है ज्ञान बांटने से बढ़ता है। वैसे भी पत्रकारों को तकनीकी ज्ञान कम होता है ये ज्ञान तब और भी कम हो जाता है जब खबर अपने मतलब की हो। 

सबसे पहले मैं तुलना करने के आधारभूत  सिद्धांत के बारे में आप सब को बताना चाहूँगा। तुलना ,जिसे अंग्रेजी में कम्पेरिजन कहा जाता है का कोई आधार होता है। तुलना हमेशा समान आधार वाली चीजों की ही होती है। आप बेर और तरबूज की तुलना नहीं कर सकते। उस रिपोर्ट की पहले पैराग्राफ में जो गड़बड़झाला है वो ये है कि आपने तीन सालों का प्रॉफिट दिखाकर चौथे साल का टर्नओवर दिखा दिया। अब प्रॉफिट और टर्नओवर में क्या फर्क है वही जो बेर और तरबूज में है। जिनको टर्नओवर का मतलब नहीं पता उन्हें बता देता हूँ टर्नओवर का मतलब बॉल टर्न कराने वाले स्पिनर का ओवर नहीं होता है। टर्नओवर का मतलब साल की कुल बिक्री होता है । उस बिक्री में से सारे साल के खर्चे निकाल कर जो बचता है उसे प्रॉफिट कहते है यानी लाभ। लेखिका ने एक जगह टर्नओवर शब्द का इस्तेमाल किया है नीचे रेवेन्यू शब्द का इस्तेमाल किया है दोनों का मतलब कुल बिक्री ही होता है। लेखिका मासूम है और दोस्त तकनीक के जानकार नहीं है। जाने कितने दोस्तों ने टर्नओवर को जय शाह की इनकम बताया। खैर ऐसा नहीं करना चाहिए। लेखिका को तुलना करनी थी तो चौथे साल का प्रॉफिट या लॉस दिखाना था ऐसा बिलकुल सम्भव है 80 करोड़ की बिक्री में 2 करोड़ का लॉस निकल आये। 

फिर रेवेन्यू को आधार बनाकर 16000  गुना बढ़ोतरी बताई गयी जो बिलकुल सही है। पहले साल 50000 की सेल थी जो अगले साल 80 करोड़ की हो गयी यानी 16000 गुना।  लेखिका का 16000 गुना से पेट नहीं भरा तो बाद में उसे 16 लाख  परसेंट बढ़ोतरी  बता दिया जो भी ग़लत नहीं है। दो  गुना का मतलब दो सौ परसेंट होता है। एक चीज को अलग अलग तरह बताने से शायद इम्पेक्ट ज्यादा  पड़ता हो। 

फिर किसी दूर के रिश्ते से 15 करोड़ का लोन दिखा दिया। जो बिजनेस करते है वो जानते है कि ना तो 80 करोड़ का टर्नओवर कोई ऐसी बड़ी बात है न 15 करोड़ का लोन। हर कम्पनी के फाइनल अकाउंट्स का ऑडिट होता है उसके बाद वो roc में फाइल होते है।  अब अमित शाह बीजेपी पार्टी से है तो उनके सब दोस्त भी उसी पार्टी में होंगे। जिससे उधार लेंगे वो भी नॉर्मली दोस्त ही होंगे। 

पूरी रिपोर्ट ही ऐसे आंकड़े इकट्ठी कर के बनाई हुई है कि जिसमे निकलना कुछ नहीं है फजीहत होनी है वो अलग से। ऐसी खबरों पर जान निसार करते क्रांतिकारियों को देख कर अम्बानी अडानी शायद हँसते ही होंगे। 

आप सब काबिल लोग हो फिर भी ये बताना मेरा फर्ज बनता है कि टर्नओवर इनकम नहीं होती है। ये बताना भी मेरा फर्ज बनता है कि इस तरह की घटनाये विश्वनीयता  कम करती है और ये सोचने पर मजबूर करती है कि फेसबुक पर हम सब अपना दिल बहलाने के लिए ही है। वायर हो या उस पोस्ट को शेयर करने वाले दोस्त उनको एक बार जरूर सोचना चाहिए कि तर्क के नाम पर हम क्या शेयर कर रहे है या यही तर्क यही आंकड़े जब हमारे किसी प्रिय के खिलाफ इस्तेमाल होंगे तो हमारे तर्क क्या होंगे। आज कल जो कुछ भी हो रहा है हमें आकंड़ो का ऐसा खेल खेलने की जरूरत क्या है जिसमे हम ही फंस जाए। खबर में जिस कदर बातों को छुपाया गया है और जो बताने की कोशिश की गयी है उससे अमित शाह की छवि एक बेहद ईमानदार नेता की निकलती है जो इतने साल गुजरात में मंत्री रहने के बावजूद भी अपने बेटे की कम्पनी नहीं चलवा सका और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कम्पनी की बिक्री केवल 80 करोड़ तक ही पहुंचा पाया। ये तो ईमानदारी की हद ही हो गयी। पर ऐसा नहीं है। हकीकत इससे बहुत अलग है। 80 करोड़ के टर्नओवर और फिर सौ  करोड़ की मानहानि के खबर से अगर फायदा किसी को हुआ है तो वो या तो वायर को हुआ है या फिर जय शाह को। कल तक उनका नाम नहीं जानते थे आज सब जानते है। इतनी पब्लिसिटी के लिए बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है यहाँ बिना पैसे दिए ही काम हो गया। खैर लिखने को बहुत कुछ है पर अभी ज्यादा लिखना फासिज्म की लड़ाई को कमजोर करेगा। मेरे इतने लिखने से फासिज्म की लड़ाई में जो नुकसान हुआ है उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ। बहरहाल परसाई जी का लिखा हुआ  छोड़े जा रहा हूँ। शुभ रात्रि 




इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.

1 comment:

  1. बहुत अच्छी जानकारी...अधूरा ज्ञान ख़तरनाक होता है और आजकल तो विरोध करने वालों को ये भी नहीं पता होता कि वो विरोध कर रहे हैं या समर्थन...आँख-कान और दिमाग़ खुला रखना बहुत ज़रूरी है।

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