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Saturday, 14 October 2017

जातिवाद और प्रगतिशीलता

जाति खालिस भारत  वालों का वायरस है। ऐसा वायरस जिसका कोई तोड़ कोई एंटी वायरस आजतक नहीं बना। ये वायरस पैदा होते ही हमारे शरीर में दाखिल हो जाता है हमारे दिमाग के अच्छे खासे हिस्से पर कब्ज़ा जमा लेता है। आप कितनी ही पढाई कर लो , कितनी ही कोशिश कर लो जाति नहीं जाती। बाज लोग अपनी सारी पढ़ाई जातिवाद को डिफेंड करने में ही लगा देते है। ये ज्यादा समझदार होते है। जातिवाद के खिलाफ लिखे हुए को भी जातिवाद के पक्ष में लिखने का हुनर इन्हें आता है। अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी भी एक शिक्षक और अध्येता है इन्होने एक कथित जातिवादी लोककथा को समाजवाद के ढांचे में डालने की नायब कोशिश की है।  उस कहानी में नफरत और जातिवाद कूट कूट कर भरा हुआ है।   भारत की खास बात यही रही है समय समय पर बाल गंगाधर तिलक से लेकर भारत रत्न महामना जैसे पढ़े लिखे रत्न हुए है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी सिर्फ इस बात में लगा दी कि जातिवाद ऐसे ही फलफुलता रहे। इसलिए आजतक वो पूजे भी जाते है। अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी जी 2017 में है तो उनके तरीके थोड़े अलग है। पर बोलते वो भी रोटी को चोची ही है।  

लोक कथाएं और उनका इतिहास
 लोक कथा जैसा फैंसी  नाम देने से अमरेंद्र त्रिपाठी को लगा होगा कि उनकी कहानी को बल मिलेगा। अमरेंद्र त्रिपाठी और वेबसाइट का थिंक टैंक ने उस लोक कथा को न्यायसंगत बताने के लिए प्रेमचंद से लेकर गोरख पांडे तक सबका इस्तेमाल कर लिया। जब से प्रेमचंद और गोरख पांडे को इस बात का पता चला है दोनों डिप्रेसन में है कि उन्होंने ऐसे संवेदनहीन समाज को जगाने के लिए लिखा जिसे सोने में ज्यादा मजा आता है। खैर जातिवादी लोक कथाये और चुटकले कोई नयी बात नहीं है पूरे हिन्दू समाज में फैले हुए है। हर जाति को नीचा दिखाती कहानियाँ और चुटकले मिल जाएंगे। उनके पीछे का मनोविज्ञान भी। पर एक शिक्षक , एक अध्येता का फर्ज क्या है ? उसका फर्ज है कि उन गन्दी जातिवादी कहानियों को न्यायसंगत बताने के लिए अपनी पूरी पढ़ाई जी जान से लगा दे। अगर जातिवाद को न्यायसंगत नहीं बता पाए तो इतनी पढाई किस काम की ? क्योंकि त्रिपाठी और उनके साथ बहुत पढ़े लिखे है  उनके लिए मैं उदय प्रकाश की किताब " पीली छतरी वाली लड़की " का कुछ अंश लगा रहा हूँ
 "शालिगराम जाति से कोरी था। वह बताता था कि सवर्णो ने, और खासतौर पर ब्राह्मणो ने ऐसी कहावतें  और किस्से गढ़ रखे थे , जो कोरियो  की मूर्खता और उनकी बुद्धिहीनता को कोरी जाति का अनिवार्य सहजात चरित्र सिद्ध करने के लिए गढ़े जाते है। " 
कोई न कोई त्रिपाठी उन सब किस्सों को समाजवादी बना देगा।  कथित लोक कथा का आधार  जो सत्य नारायण की कथा अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने सुनाई उसके दो ही आधार है एक अज्ञानता , दूसरी नफरत।  जिसने भी कहानी लिखी उसने शायद अपनी ज़िन्दगी में खेत नहीं देखे होंगे। जातिवाद मेहनत नहीं माँगता। जो खेती करते है उन्हें पता है बगुला कभी ज्वार नहीं खाता। पर लिखने वाले के दो ही टारगेट थे
 एक विशेष जाति
 दूसरा मांसाहार।
  
वैसे भी ब्राह्मणो द्वारा रची अधिकतर कहानियां ऐसी ही होती है जिनका सच्चाई से दूर दूर तक लेना देना नहीं होता है। त्रिपाठी  की कहानी में बगुला जाट के खेत में ज्वार खाने जाता है। जाट उसे मारकर खा जाता है। बगुला उसके पेट में बोलता रहता है और आखिर में मल द्वार से भाग जाता है। ऐसी अद्भुत कल्पना के लिए भी अगर नोबल नहीं मिले तो दुःख होना लाजिमी है। बगुला खेत के कीड़े खाता है फसल नहीं। दूसरों के खाने से ऐसा  नफरत सवर्णो को बचपन में ही भर दी जाती है ऐसा उदारहण दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा। संजय लीला भंसाली ने अपने फिल्म के खलनायक को क्रूर दिखाने के लिए मांस खाता दिखाया है। इस कहानी के बीच में भी मांस खाते हुए इंसान की फोटो लगाई हुई है। शाकाहार पर इस कदर गर्व  करने वाले ये भूल जाते है कि ये शाकाहार भी उन तक तभी पहुँचता है जब किसान अपना खून मिटटी में मिला देता है। पर जिस जमीन से फसले उगती है उसके बारे में भी इन शाकाहारियों को इतना ही पता है कि बगुला खेत में ज्वार खा जाता है।   क्या सिवाय अफ़सोस के कुछ किया जा सकता है।  इस कहानी के पक्ष में कई अजीज और समझदार दोस्त भी है। ये सबसे ज्यादा अफ़सोस की बात है। जुल्म , फासीवाद , अन्धविश्वास से लड़ाई करते दोस्तों को ये बेसिक सी बात समझ नहीं आती तो बाकी लोगों से क्या उम्मीद रखें। प्रेमचंद ने ठाकुर का कुआ और सद्गति में अपने समाज की क्रूर हकीकत को सबके सामने रखा था। उन्हें थोड़ी सी भी शर्म नहीं आयी इस जातिवादी कहानी को न्यायसंगत ठहराने के लिए उनका इस्तेमाल  करते हुए। कितना मुश्किल है ये समझना कि जातिवादी लिखने में और जातिवाद के खिलाफ लिखने में दोनों में जाति का नाम लिखा जाएगा पर दोनों परस्पर विरोधी बातें है । जाट एक जाति है अगर इसकी सामंती जातिवादी अहंकार को चोट पहुंचाते हुए लिखोगे , तो वो जातिवाद के खिलाफ लिखा कहा जायेगा । दूसरी तरफ इसका नाम लेकर तुम इसे मूर्ख , क्रूर साबित करती , ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती स्टीरियो टाइप पोस्ट लिखोगे तो उसे जातिवादी पोस्ट कहा जायेगा। ज्यादा मुश्किल नही है पता लगाना थोड़ी सी संवदेनशीलता की जरूरत है । मुझे 11 वीं क्लास में  समझदार लोगों का ये कहना कि 16 दूनी आठ वाले जाट कब से कॉमर्स पढ़ने लगे एक जातिवादी कमेंट था एक 16 साल के बच्चे का मनोबल तोड़ने वाला कमेंट था । वहीं एक जाट का किसी अपने साथी को, अपने साथ काम करने वाले को जाति का नाम देकर गाली देना , उनके घर जला देना किसी की जाति के नाम को गाली की तरह इस्तेमाल करना बहुत घृणित जातिवाद का नमूना है। ये आपको देखना है आपको किस पर चोट करनी है और किसे सहलाना है आपका चरित्र उसी से तय होगा। मेरे स्टेटस में सत्येंद्र जी का कमेंट है क“ यह सामान्य बात है लेकिन जातीय दम्भ में बीमार मनोरोगियों को समझने में दिक्कत होती है।
  इस मनोरोग से हम सब पीड़ित है। इसका इलाज क्या है। एक इलाज सही शिक्षा है। दूसरा इलाज मेहनत है। मुझे लगता है बुद्धिजीवियों को भी खेत में जाकर मेहनत करनी चाहिए इससे दो फायदे होंगे।  एक तो दिमाग तंदरुस्त होगा दूसरा ये भी पता चल जाएगा कि बगुला ज्वार नहीं खाता है।  चूँकि अमरेंद्र त्रिपाठी एक शिक्षक है उन्हें देहात से और लोक कथाओ से प्यार है उनके  लिए शौक़ बहराइची का  एक शेर लिख रहा हूँ जो भारत में लोक कथाओ से भी ज्यादा फेमस है और बच्चे बच्चे की जुबान है 
 हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलिस्ताँ क्या होगा बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक उल्लू ही काफी था ।  

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