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Tuesday, 3 October 2017

ये दुनिया एक पागल खाना है



आजकल हर जगह मानसिक रोग छाया हुआ है एक पत्रकार ने दूसरे सीनियर पत्रकार को बाकायदा पत्र लिख कर बीमार कहा। बीमारी के लक्षण भी बताये। इलाज करवाने के लिए भी कहा। ऐसे भले लोग कहाँ मिलते है आजकल जमाने में। डॉक्टर को दिखाने की फीस भी बचा ली। उन्होंने ही बता दिया बीमार हैं। अभी उनका खत पढ़ ही रहा था कि दो तीन जवाबी खत भी आ गए कि सीनियर पत्रकार को बीमार लिखने वाला पत्रकार खुद बीमार है उन्होंने भी बाक़ायदा लक्षण बताये। फेसबुक ने इतने मनोवैज्ञानिक पैदा कर दिए है कि अब मनोविज्ञान को विषय अब हटा देना चाहिए। अब बाकी सब बीमारी दूर हो चुकी है अब सिर्फ एक ही बीमारी बची है कि सब लोग अपने को डॉक्टर समझने लगे है। ये ज्यादा बुरी बीमारी नहीं है। बहुत से लोग अपने को अमिताभ बच्चन समझते है। कितने लोग अपने को हिटलर समझते है। अब इससे तो अच्छा है कि खुद को डॉक्टर ही समझ लिया जाए। समझने में कोई दिक्कत नहीं है बस प्रेक्टिस शुरू ना कर दे।  खैर मुझे एक चुटकुला याद आ रहा है। एक आदमी मॉर्निंग वाक् पर निकले तो पार्क की एक दीवार पर लिखा देखा 

" पढ़ने वाला पागल है "

सुबह सुबह दिमाग ख़राब हो गया। साहब को बड़ा गुस्सा आया। भागकर घर से मार्कर लेकर आया और उस दीवार पर नीचे लिख दिया 

" लिखने वाला पागल है। "

पागलपन पर चुटकुलों का तो कोई अंत नहीं है। एक और मशहूर चुटकुला है। एक पागल अपने डॉक्टर को कहता है कि कल मैंने ताजमहल को खरीद लिया। इतने में दूसरा पागल कहता है कि ये झूठ बोल रहा है ये ताजमहल खरीद ही नहीं सकता। डॉक्टर को दूसरे मरीज से थोड़ी उम्मीद बंधती है। उससे पूछता है कि क्यों नहीं खरीद सकता ये ताजमहल ? तो दूसरा पागल जवाब देता है कि मैं बेचूँगा ही नहीं तो खरीदेगा कैसे। हम सब का यही हाल है। ताजमहल से याद आया कि ताजमहल को टूरिस्ट स्पॉट से हटा दिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने। मुख्यमंत्रियों को ये काम शोभा देते है। वैसे भी आगरा पागलखाने के लिए मशहूर रहा है। अभी बात पागलपन पर ही रहने देते है। मंत्रियो की बात चली तो पागलखाने से कही आगे पहुँच जायेगी। हरियाणा के मुख्यमंत्री सरस्वती को ढूंढ़ने पर उतारू हैं जो कहीं नहीं है। यूपी के मुख्यमंत्री पूरी दुनिया में पर्यटन के लिए मशहूर ताज महल को मिटाने के मिशन पर है। सही है जो नहीं है उसको बताओ है जो है उसको बताओ नहीं है। अगर ये लोग मुख्यमंत्री न होते तो कोई डॉक्टर इन्हे पागल बता सकता था पर पागलपन के मानक मंत्रीयों के लिए दूसरे होते है , पत्रकारों के लिए दूसरे , अपने लिए दूसरे , दुसरो के लिए दूसरे 



 मोटा मोटी बात जो मुझको समझ आयी है वो ये  है कि हम जिस लेवल के पागल है सभ्य लोग उसी लेवल पे पाये जाते है। हमारे लेवल का पागलपन ही सभ्यता कहलाती है। हमारे से ऊपर के लेवल के पागल अंधविश्वासी , ढोंगी और मुर्ख है और हमारे से नीचे लेवल के पागल 'पेसिमिस्टिक', दुसरो की खुशी न बर्दाश्त करने वाले मानसिक रूप से बीमार ,अति वादी है। जो तर्क हम अपने से ऊपर के पागलो पर लगाते हैं वो तर्क हमारे से नीचे के पागलो को हम पर लगाने का अधिकार नहीं है। एक दोस्त के पास दस लाख रूपये वाली गाडी थी। वो उससे नीचे वाली गाड़ियों के लिए कहता था इनसे अच्छा तो गाडी ना ही खरीदो। और अपने वाली गाडी से महँगी वाली गाड़ियों के लिए कहता था कि इतनी महंगी गाडी खरीदने का क्या फायदा  ? पहिये तो इनके भी चार है। चलना तो इन्हे भी सड़क पर ही है। हरियाणा में एक कहावत है अपना पाद सबको स्वाद लगता है। हालाँकि पाद कोई खाने की चीज नहीं है पर कहावत हरियाणा की है तो अच्छी है क्यूंकि मैं हरियाणा में पैदा हुआ हूँ। शिव जी के लिंग की पूजा करने वाले राम रहीम को  पूजने वाले को पागल कहते हैं। राम रहीम वाले निर्मल बाबा वालों  को पागल कहते हैं। अभी दिवाली आने वाली है। फसल की पराली जलाने के लिए किसानो को कोसने वाले लोग  गाडी भर भर पटाके जलाएंगें। सांस लेना मुश्किल हो जाएगा।  आतिशबाजी के पक्ष में (कु)तर्क दिया जाएगा  कि आतिशबाजी तो सारे संसार में होती है। उनके लिए आप कुछ नहीं बोलते। 'पहले उस आदमी के साइन लेके आओ ' की तर्ज पे दिए कुतर्को का क्या कोई जवाब दिया जा सकता है? (वैसे सलीम जावेद के इस डायलॉग ने हमारी मुश्किलो में जितना इज़ाफ़ा किया है उसके लिए मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा। हम तो निरुपमा रॉय की तरह ये भी नहीं कह सकते कि बाकी जो आतिश बाजी कर रहे है वो मेरे कौन है?) क्या सारे संसार में जो हो रहा है उसे मानक मानकर अपनी बेवकूफियों को , गलतियों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है ? संसार में तो हिंसा भी बड़े चाव से देखी जा रही है। मरियल से मरियल आदमी भी सपने में दस को मार के सोता है। तो क्या हिंसा को सही मान लिया जाए ? संसार में तो और भी बहुत कुछ हो रहा है। मजदूरो , गरीबो का जबरदस्त शोषण हो रहा है तो क्या बेगार को फिर से मान्यता दे दी जाए? हम पीछे से आगे जाए या आगे से पीछे ? असभ्य तरीके से आतिशबाजी , लाउड स्पीकर पे बेसुरे माता के भजन को श्रद्धा ख़ुशी बता रहे हो पर इसके पीछे कोई तर्क तो है नहीं तो श्रद्धा का नाम दे दिया। दरअसल श्रद्धा और हिंसा तर्क से दूर भागने का ही नाम है।  खैर मुझे गर्व तो नहीं पर ख़ुशी जरूर है कि मैं एक लेवल नीचे का पागल हूँ और सुधरने के रस्ते खुले रखे हुए है। आप से हमदर्दी भी है क्यूंकि जहां आप आज हो कल मैं भी वहीँ था। और आज इन्तजार कर रहा हूँ आपके आने का मेरे पास ताकि हम मिलकर और आगे जा सके

5 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. जी बहुत शुक्रिया

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  2. बढ़िया लिखा है।
    शुभकामनाएं।

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