Followers

Thursday, 28 September 2017

लड़कियों की आजादी से बड़ा देशद्रोह दूसरा नहीं है



काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के त्रिपाठी का कहना है कि वो बी.एच.यू को जे.एन.यू नहीं बनने देंगे। मुझे जे.एन.यू याद आ गयी। जे.एन.यू  में कुल मिलाकर 5-6 बार जाना हुआ है। हर बार यही लगता है कि भारत में कहीं जन्नत है तो यही है। बी.एच.यू में लड़कियों की छेड़छाड़ की शिकायत की जाती है तो जवाब आता है कि कैम्पस से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने दिया जाएगा। जे.एन.यू को राष्ट्रद्रोही यूनिवर्सिटी का तमगा मिला हुआ है। मुझे जे.एन.यू कैंपस में बिताई मेरी पिछली रात याद आ रही है। अगर दोनों यूनिवर्सिटी की लड़कियों की आजादी के सन्दर्भ में राष्ट्रवाद को परिभाषित किया जाए तो शायद महिला उत्पीड़न और महिला ग़ुलामी को ही राष्ट्रवाद कहा जाएगा। बी.एच.यू नहीं गया कभी पर जे.एन.यू की जो भी संक्षिप्त सी यादें है उन में से आखिरी वाली सबसे बेहतरीन है। 
शायद एक दो महीने पहले की बात है। मैंने और वर्षा ने जे.एन.यू घूम के आने का प्लान किया। वर्षा और मुझे में जो कुछ कॉमन है वो ये है कि हम दोनों हिसार से सम्बन्ध रखते हैं। वर्षा से पहली मुलाकात 8-9 साल पहले हुई थी  मैंने तब लिखना शुरू ही किया था नयी नयी फेसबुक मिली थी  वर्षा शायद पहले से लिखती थी। दोनों के लिखने में फेसबुक का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सात आठ सालों में हम शायद 7-8 बार भी नहीं मिले। जब वर्षा हिसार रहती थी तो मैं गुड़गांव रहता था मैं हिसार आया तो वर्षा दिल्ली में कविता , नज़्म लिखने लग गयी। ये सब बताना इसलिए जरुरी है कि जिसको पता न हो उसे दो बातों का पता लग जाए एक कि मैं भी लिखता हूँ दूसरा सिर्फ लिखता ही नहीं हूँ वर्षा का दोस्त भी हूँ जो दिल्ली में आये दिन किसी न किसी प्रोग्राम में हिस्सा लेती रहती है। बड़े बड़े कार्टूनिस्ट जिनसे हम मिलने की तमन्ना रखते है वो वर्षा के दोस्त हैं। हम  दोनों के ही घर परिवार या आसपास के वातावरण में कुछ लिखने या सोचने के अनुकूल माहौल नहीं था। हरियाणा में कोर्स की किताबों के अलावा और कुछ पढ़ना बेवकूफी माना जाता है। कोर्स की किताब पढ़ना भी यहाँ बहुत से लोग बेवकूफी ही मानते हैं। हरियाणा की तारीफ फिर कभी करेंगे। अभी तारीफ सिर्फ जे.एन.यू की करनी है। 
हम दोनों शाम 6 बजे क्नॉट प्लेस से जे.एन.यू की तरफ रवाना हुए। वर्षा जे.एन.यू में बहुत लोगों को जानती थी जिसमें से एक मशहूर कार्टूनिस्ट गोपाल शून्य जी भी है, जिनसे मिलना मेरे वहाँ जाने का एक मकसद था। मैं वहाँ सिर्फ ऋतु  को जानता था। उससे से भी मुलाक़ात फेसबुक के जरिये ही हुए थी। बाद में पता लगा वो भी हिसार के एक गांव की रहने वाली है। उसे देख कर मुझे मेरी छोटी बहन याद आ जाती है हर बार। वो जिस तरह से मुझे भाई कहकर बुलाती है, वो लहजा मेरी बहन से काफी मिलता है। अब बात लड़कियों की ही है तो थोड़ी तारीफ ऋतु की भी कर ली जाए। ऋतु अभी हाल ही में लंदन जाकर आयी है एक सेमीनार में। जेएनयू में पी.एच.डी कर रही है। साथ ही दिल्ली युनिवर्सिटी के कालेज  में बच्चों को  पढ़ा भी रही है। हरियाणा में लड़कियों की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है। हरियाणा के समाज की संकीर्णता को लात मारकर इतनी आगे तक जाना बहुत काबिले तारीफ है। पर ये काबिले तारीफ किसके लिए है ? कम से कम त्रिपाठी जैसे लोगों के लिए तो नहीं जो लड़कियों को शाम 6 बजे पिंजरे में बंद कर देना चाहते है जो लाइब्रेरी बंद कर देना चाहते है। उनका ये डर ही बताता है कि लड़कियों की योग्यताओं से हिन्दू शेर किस कदर भयभीत है। 
हिन्दू शेरों की बात भी फिर कभी। मैं जितनी बार  जे.एन.यू गया, मेरे अंदर आने का गेट पास ऋतु ही थी। उसका ये उलाहना हर बार रहता था कि मैं जेएनयू के एंट्री गेट पर उसे याद करता हूँ। जेएनयू के अंदर आने के बाद ढंग से मिलता भी नहीं। हर बार ऐसा ही हुआ। इस बार मैं ठान के आया था कि उससे जी भर के बात करनी है। हम जेएनयू साढ़े सात बजे के आसपास पहुँचे। सबसे पहले गोपाल शून्य से मिले। कमाल के कार्टूनिस्ट है। देश के हुकुमरान पर जिस तरह का तीखा व्यंग्य वो अपने कार्टून में उतारते है वो बस देखते ही बनता है  फिर धीरे धीरे उनके दस पन्द्रह दोस्तों का जमावड़ा हो गया। अब जे.एन.यू का वातावरण वैसा तो नहीं रहा था, जैसा उस रात था जब मैं पहली बार योगेश के साथ आया था। पर फिर भी जे.एन.यू के अंदर जाकर ऐसा लगता है मानो सच में आजाद हवा में साँस ले रहे हो। हम सब एक जगह बैठकर बात करने लगे। सबका आपस में परिचय हुआ। सब अलग अलग जगह से थे। बात बातों में दस बजे गए। मैं और ऋतु पानी पीने के लिए उनसे अलग हुए तो जेएनयू की  पहाड़ियों पर बैठकर गप्पे मारने का तय हुआ। रात के दस साढ़े दस बजे जेएनयू में सब  लड़के लड़कियाँ इतनी आराम से घूम रहे थे  कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। ऋतु पूरी जेएनयू दिखाते हुए मुझे जेएनयू की फेमस पहाड़ियों तक ले आयी। वहाँ भी किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं थी। थोड़ी चढ़ाई के बाद जिस पहाड़ी के पत्थर पर हमने बैठने  का प्लान किया, उसी के पास अगले पत्थर पर दो लड़के और एक लड़की पहले से बैठे हुए थे और राजनीति पर डिस्कस कर रहे थे। ये है वो जेएनयू का कल्चर जिसे अपने प्रांगण में दाखिल  न होने देने की कसम कुलपति त्रिपाठी खाये हुए है। बताओ  रात में दो लड़के एक लड़की बैठकर पोलटिक्स पर डिस्कस कर रहे है। हद नहीं है। भारतीय संस्कृति में तो भाई बहन को भी अकेले में साथ बैठने की मनाही है। यहाँ लड़के का फर्ज है कि लड़की की जींस में हाथ डालकर भाग जाए और लड़की शाम 5 बजे पिंजरे में बंद हो जाए। ऐसे मूल्यों की रक्षा करने वाले कुलपति बी.एच.यू को जे.एन.यू कैसे बनने दे सकते हैं। वहाँ बैठकर हमने एक डेढ़ घंटा बात की। ऋतु ने अपनी पढाई की, अपने  स्ट्रगल की बात बताई। कैसे बावजूद हर क्लास में टॉप करने के , ऋतु को पोस्ट ग्रेजुएशन में डिस्टेंस में दाखिला लेना पड़ा और कैसे हर क्लास की टॉपर को महान कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी ने फेल डिक्लेयर कर दिया। ऐसे काम यहाँ होते रहते है। एक बार की बात बताता हूँ। मेरे पांच काबिल दोस्तों का पोस्ट ग्रेजुएट के एक विषय का पेपर था। उन पांचों में सिर्फ एक दोस्त उस पेपर में पास हुआ और विडंबना ये कि सिर्फ एक उसी दोस्त ने वो पेपर नहीं दिया था। रिजल्ट आने के बाद बाकी दोस्तों को भी अफ़सोस हुआ कि काश वो भी पेपर नहीं देते। खैर डिस्टेंस पोस्ट ग्रेजुएट के पहले साल में फेल घोषित होने के बाद ऋतु ने जामिया मिलिया युनिवर्सिटी में एंट्रेंस पास किया।  जामिया मिलिया के एंट्रेंस की तैयारी के वक्त ऋतु जेनयू में रही जहाँ उसे पढ़ने का, आगे बढ़ने का माहौल मिला और उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज ऋतु ने दो विषय में नेट JRF उत्तीर्ण किया हुआ है अभी लंदन जाकर सेमिनार में पेपर प्रैजेण्ट करके आयी है और नवम्बर में स्पेन जा रही है। 
साढ़े बारह बजे हल्की हल्की बारिश शुरू होने लगी तो हम पहाड़ियों से वापिस आ गए। वहाँ से चाय की तलाश में जेएनयू की लाइब्रेरी आ गए। किसी भी तरह का कोई डर कोई फ़िक्र कुछ नहीं। चाय तक पहुंचे तो बारिश तेज शुरू हो चुकी थी हमसे आगे चार पांच लड़कियां चाय के लिए लाइन में लगी थी। चाय पीकर लाइब्रेरी पहुंचे तो  देखा वहाँ सब पढ़ रहे थे। एक बजे से ऊपर का वक्त था और विद्यार्थी चुपचाप लाइब्रेरी में पढ़ रहे थे। ऋतु ने बताया कि यहाँ सारी रात पढ़ते रहते हैं। एक डेढ़ साल पहले तक रात में खाना खाने की कोई दिक्कत नहीं होती थी पर अब रात को खाना नहीं मिलता। अगर आपको भूख लगी है तो सुबह का इन्तज़ार करने के सिवाय कोई ऑप्शन  नहीं है। बीएचयू भले ही जेनएयू न बन पाए पर जेएनयू को बीएचयू बनाने की पुरजोर कोशिशें है। एम फ़िल्, पी.एच.डी. की सीट 90 फीसदी तक कम कर दी गयी हैं। ऋतु के सब्जेक्ट में सीटें 60 से घटा कर 1 कर दी गयी है। जिन ऋतुओं को भूले भटके पढ़ने का मौका मिल गया है, अब पूरी कोशिश है कि आगे ऐसा नहीं होने दिया जाए। 
दो  बजे वर्षा का फोन आया वो सब किसी हॉस्टल में जा रहे थे सोने के लिए। जबकि हमें जेएनयू घूमने में ज्यादा मजे आ रहे थे। उसके बाद हमने एक हॉस्टल में कैरम बोर्ड खेला। सुबह चार बजे मैं जेएनयू से रवाना हुआ।  लोग मॉर्निंग वाक् के लिए आ रहे थे। 
ये है जेएनयू का कल्चर जिससे सारे देश के अनपढ़ खफा है। क्यों खफा है ? क्यूंकि यहाँ उन फूलों को खिलने का मौका मिलता है जिन्हे बाहर बेरहमी से पैरों के नीचे कुचल दिया जाता है। बीएचयू में लड़कियों ने जो किया वो शायद भारतीय शिक्षा के ठेकेदारों की उम्मीद के परे था पर अब इन्हें रोकना मुमकिन नहीं है। 
वर्षा के लिखने में , ऋतु की सफलता को जेएनयू से उनके सबंध से नहीं जोड़ा जा सकता। पर जे.एन.यू ऐसी जगह जरूर है जहाँ आकर लड़कियाँ आजादी की सांस ले सकती है। अपने पंख फैला सकती है। कौन भाई ऐसा नहीं चाहेगा कि उनकी बहनों को ऐसा कल्चर मिले ऐसी जगह मिले जहाँ उनको साँस लेने की आजादी हो।  खुले आसमान में उड़ने की आजादी हो। जेएनयू में भी कोई एलियन नहीं रहते है। वही लोग है पर वहाँ का कल्चर ऐसा बनाया है जो सबको लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ जीने की आजादी देता है। ऐसा कब तक रहेगा ये कहना मुश्किल है पर अब तक भारत में लड़कियों के लिए जेएनयू सबसे बेहतरीन शिक्षा संस्थान है 


2 comments:

  1. देश में अब भी दो तरह की व्यवस्था चल रही है। एक संविधान के अनुसार दूसरी समाज के अपने बनाये हुए क़ानून (?) जोकि आजकल टकराव की वजह बनते हैं। स्वतंत्रता और स्वेच्छाचारिता में अंतर है। कॉलेज़ की ज़िन्दगी शुरू होते ही माँ -बाप अपने बच्चों को अनेकानेक प्रतिबंधों से मुक्त कर देते हैं यह समझकर कि वे अब अपना भला-बुरा ख़ुद समझ सकते हैं साथ ही संस्कारों की एक पोटली भी उनके सर पर रख देते हैं कि जीवन में चरित्र को सर्वोपरि रखना ही हमारी संस्कृति है जिसे युवा अपनी समझ और क्षमतानुसार आत्मसात करता है।
    श्रेष्ठता का भाव उससे श्रेष्ठतम परिणाम के लिए बेहतर कराता जाता है। इसके उलट जब पतन का रास्ता कोई अपना लेता है तो फिर गर्त में ही जाना होता है। प्रतिबंध किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि समझदारी विकसित करना और मूल्यों को समृद्ध करना ही स्वच्छंदता का सकारात्मक पहलू है।
    अतः मेरा भी मत है की जेएनयू की बदनामी का मक़सद ज्ञान और तर्क को परे रखकर संकीर्ण ,परम्परावादी, भेदभावपूर्ण सोच का भीड़ तंत्र विकसित करना है जिसे अपने मक़सद के लिए मनचाही दिशा में हांका जा सके। दुनिया के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने के लिए खोखली सांस्कृतिक बेड़ियों के बंधन अवांछित हैं। बीएचयू की घटना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है ऊपर से कुलपति महोदय की राजनैतिक कुंठित सोच ने आग में घी का कार्य किया है।
    अच्छा लगा आपका लेख।

    ReplyDelete
  2. जी बहुत शुक्रिया

    ReplyDelete