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Sunday, 17 September 2017

भूख से नहीं लोग तकनीकी कारणों से मर रहे है



केंद्रीय मंत्री का कहना है कि पेट्रोल वाले भूखे नहीं मर रहे है। कमाल देश है भूखा मरना बेंच मार्क बन रहा है। वैसे केंद्रीय मंत्री किसी भी पार्टी का हो , मूर्खता उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इनका दोष नहीं है। शायद केंद्रीय मंत्री होने की ये आधारभूत शर्त है।  मंत्री जी की माने तो जो भी भूखे नहीं मर रहे है उन्हें तब तक लूटा जाना चाहिए जब तक वो भूखे न मरने लग जाए। 

वैसे तो भारत के निज़ाम जो भी चला रहा है या जैसे भी ये चल रहा है उन सब की पूरी कोशिश है कि कोई भूख से न मरने पाये। रेल हादसे नया रिकॉर्ड बना रही है। देश सफाई के पीछे लगा हुआ है। सफाई करने वाले सीवर में सुरक्षा उपकरणों के अभाव में अपनी जान दे रहे है। पशु पालक बेचारे गौ गुंडों के आतंक से डरे हुए है।  पशुओ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए माउंटेन ड्यू पीने की जरुरत पड़ती है। गाय माता और सांड पिता का सड़को पर इस कदर राज है कि सड़क दुर्घटनाओं में दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है। किसानों की आत्महत्या जैसे ट्रेडिशनल तरीके भी चल ही रहे है। जब मरने के लिए इतने सारे विकल्प तैयार किये जा रहे है तो ऐसा कौन सा देश द्रोही होगा जो भूख से मरना चाहेगा। 

ऊपर वाले तरीके अगर पसंद न आये हो तो सीधे गोली खाने का भी ऑप्शन है। पिछले  दिनों गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। उनपर लिखने का आरोप था। गौरी लंकेश से पहले नरेंद्र दंभोलकर  गोविन्द  पंसारे जैसे लेखक भी लिखने की सजा में जान गँवा चुके है। खैर गौरी लंकेश की मौत पर अख़बारों में हर तरह के सम्पादिकीय पढ़े। एक भाई कह रहा था  पत्रकार तो मरते रहते है। पहले भी मरते रहते थे। उस भाई ने बहुत से नाम गिना रखे  थे।  उसे इस बात का गिला भी था कि गौरी लंकेश वाम विचारधारा से प्रभावित क्यों थी। पत्रकार की कोई विचारधारा नहीं होनी चाहिए। कोई वाम विचारधारा से प्रभावित हो तो उसके मरने का विरोध नहीं होना चाहिए। कोई लवलीन सिंह जी है उन्हें भी कथित सेक्युलरों से दिक्कत थी।  जिस तरह के तर्क अपने यहाँ के बुद्धिजीवी कर रहे है भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।किसी की  गोली मार कर हत्या  कर दी गयी पर विरोध करना मना है। तब कहाँ थे , उस वक़्त क्यों नहीं बोला पहले भी लोग मरे है। जब ये तर्क है तो इसके आगे तो गीता का ज्ञान ही दिया जा सकता है जो आया है वो जाएगा भी। क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओगे। सब माया है। एक आरोप और भी आया है मार्किट में कि सब लिखने वालों को गोली नहीं लग रही है। फेसबुक पर सब कितना तार्किक निर्मम और मारक लिख रहे है पर सबको गोली नहीं लग रही। जिनको गोली नहीं लगी वो बेकार लिख रहे है। खैर फेसबुक की तमाम अच्छी बातों के साथ साथ एक जो थोड़ा सा नेगेटिव पॉइंट है वो ये है कि ये 24 घंटे अवेलेबल है। बाज लोग इसे एक जिम्मेदारी मान लेते है मतलब लिखना तो है ही चाहे कुछ लिखने को हो या न हो। शेर नहीं लिखा जा रहा तो गधा लिख दो अगर कुछ भी नहीं लिखा तो क्रांति आधी  रह जायेगी। कुछ दोस्त तो बाकायदा सदमे में है कि इतना लिखने के  बाद भी उन्हें गोली क्यों नहीं मारी गई। कुछ क्रन्तिकारी ऐसे भी है जो खुद को डिएक्टिवेट कर के ही संतोष कर लेते है। गोली नहीं लगी तो क्या हुआ जुकरबर्ग ने आईडी बंद कर दी एक दिन के लिए ये क्या कम बलिदान है। जब डीपी काली करके , अकाउंट डिएक्टिवेट करके भी शहीद बना जा सकता है तो गोली खाने में समझदारी नहीं है। 

 बाकी गोली नहीं खाने के लिए कुछ सलाह मेरे पास भी है। जितना  हो सके दूर का लिखो। जितनी दूर का लिखोगे उतना गोली खाने के चांस कम है। हिन्दुओ का इलाके में  रहते हो मुसलमानो के खिलाफ लिखो। मुसलमानो के देश में रहते हो तो हिन्दुओ और बाकी धर्मो के खिलाफ लिखोगे तो खतरा नहीं है। भारत में रहकर अमेरिका के खिलाफ लिखने में खतरा नहीं है। यहाँ तक की मोदी के खिलाफ भी लिखने में खतरा नहीं है बशर्ते कि लोकल गुंडों से न उलझ जाओ। आपकी फेसबुक पर अगर आपके शहर के लोग कम है तो मामला सेफ है। फिर सरकार किसकी है हवा किसकी है इसका ख्याल रखना जरुरी है। आज एमरजेंसी पर किताब लिख दो , फिल्म बना दो कोई खतरा नहीं है। अभी बाबा राम रहीम पर मजाक उड़ाने से व्यंग्य लिखने तक सब किया जा सकता है। पर ये काम 6 महीने पहले तक करना खतरे का काम था। पत्रकार छत्रपति ने जो 2002 में किया उसके बदले में उनकी जान चली गयी। अभी मिडिया में सब टूट कर पड़े हुए है। ये सब लोग कुछ महीने पहले तक राम रहीम के आगे डॉक्टर लगाते थे और पीछे जी। ये सब समझदार लोग है। मैं खुद बहुत समझदार हूँ। मजाल है राम रहीम  के बारे में कोई व्यंग्य किया हो। हिसार में रहता हूँ कुछ भी हो सकता था। अब बाबा जी जेल में है। अब डर की बात नहीं है। अपने इलाके के  एम् एल ऐ  एमपी , पार्षद और अपने इलाके के थानेदार से बचके रहो बाकी इतनी दिक्कत नहीं है। 

अभी ज्यादा हो रहा है। यहाँ हाल चाल ठीक ठाक है। पेट्रोल खरीदने वाले भूखे नहीं मर रहे है। बच्चे ऑक्सजीन की कमी से मर रहे है। स्कूल में गला रेतने से मर रहे है। रेल यात्री रेल बिना पटरी के चलने से मर रहे है। किसान , पशु पालक पशुओ को लाने लेजाने के कारण मर रहे है। कुछ लोग तकनीकी कारणों से मर रहे है। पर भूख से कोई नहीं मर रहा है। अगर मर भी रहा है तो भी कोई नयी बात नहीं है पहले भी तो मरते थे। 

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