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Thursday, 14 September 2017

बुलेट ट्रैन हमारी अँखियों से गोली मारे



जापान के प्रधानमंत्री   बुलेट ट्रैन के लिए पहला पत्थर रखने भारत आये हुए है । अब भारत में भी रेल गोली की रफ़्तार से  दौड़ेगी। बुलेट ट्रैन का सपना अब पूरा होने वाला है। भारत में अब विकास के साथ साथ प्रगति भी आएगी। आनी भी चाहिए। बुलेट ट्रैन के साथ तो पटरी में टूट फुट से भी देर होने का खतरा नहीं है। बुलेट ट्रैन इतनी तेज चलती है कि पटरी टूट भी गयी तो पांच सौ हजार किलोमीटर तो घिसट घिसट कर पहुँच जायेगी। पर अहम् सवाल ये है कि क्या बुलेट ट्रैन हम भारतीयों की फेंकने की जो स्पीड है उसका मुकाबला कर पाएगी ? मुझे गाँव की एक पुरानी महफ़िल याद आ रही है जहाँ एक रात तेज चलने वाली ट्रैन पर बात हो रही थी। सभी बोलने वाले एक से बढ़कर एक थे। ट्रैन का नाम  नाम सुना था। उस वक़्त गूगल भी नहीं था तो अपनी स्वप्न शक्ति का ही इस्तेमाल करना पड़ता था। एक दोस्त ने कहा कि विदेश में तो ट्रैन हजार किलोमीटर प्रति घंटा तो आम चलती है । वैसी महफ़िलों में प्रतिवाद के लिए जगह नहीं होती थी। दूसरे दोस्त ने कहा कि वो ट्रैन रूकती नहीं कभी भी कहीं भी। स्टेशन पर एक डब्बे में जिन यात्रियों को चढ़ना होता है वो बिठा दिए जाते है। जिनको उतरना हो वो ट्रैन के पिछले डब्बे में आ जाते है स्टेशन पर अगला डब्बा ट्रैन के आगे अटैच हो जाता है और पिछला डब्बा ट्रैन से अलग हो जाता है। ट्रैन की रिपेयर मेंटेनेंस सब वो ट्रैन के चलते चलते ही करते है। एक और दोस्त कहता है सालों साल ट्रैन बिना रुके चलती है तभी तो वो लोग हमसे इतने आगे है। ये सब गंभीर डिस्कसन थी जिसमें आधे से ज्यादा तो मैं भूल गया। खैर जो धन्य लोग पहली बार बुलेट ट्रैन में सफर करेंगे उनकी महागाथा सुनने के लिए भी हमें तैयार रहना पड़ेगा। 

फ़िलहाल भारतीय रेलवे की हकीकत किसी से छुपी हुई नहीं है। जिन देशों में बुलेट ट्रैन चल रही है उनकी रेलवे से भारत की रेल सुविधाओं की तुलना करोगे तो भारत कहीं भी नहीं होगा उस तुलना में। जापान में ट्रैन का औसत देरी का वक्त सेकेंड्स में है। पांच मिनट देर होने पर माफ़ी मांगी जाती है। एक दो घंटे देर होने पर अख़बार में खबर आ जाती है। यहाँ चार पांच घंटो को हम नॉर्मल लेकर चलते है। पैसेंजर पांच घंटे बाद थोड़ी थोड़ी गाली निकालना शुरू करता है। एक आध दिन लेट होने पर कोई बड़ा इशू नहीं होता। अभी ट्वीट रेल मंत्री तो चले गए है पर रेल को इतना महँगा कर गए है कि मैं पिछले तीन महीने से irctc की साइट पर नहीं गया हूँ। डर लगता है कि साइट पर जाते ही कोई चार्ज न काट ले प्रभु जी। दुर्घटनाओं की तो बात ना ही करे। 

ट्रैन के सामान्य डब्बे का जो हाल है वो ये है कि सामान्य डब्बे में बैठकर कोई प्रभु को ट्वीट कर दे तो मैं ट्वीटर छोड़ने को तैयार हूँ। ट्वीट तो दूर की बात है सामान्य डब्बे में से कोई अपना फोन जेब से निकाल कर ही दिखा दे। लोग दो दो दिन सामान्य डब्बे में यात्रा कर लेते है न्यूनतम से भी कम सुविधाओं के साथ। फ़िलहाल प्लेटफॉर्म टिकट 20 रूपये की है। जनरल डब्बे की टिकट का ट्रैन की सीटों के साथ कोई कनेक्शन नहीं है। भले ही ट्रैन में एक ही जनरल डब्बा हो टिकट कितनी भी काटी जा सकती है। और जितनी टिकट कटती है उसे ज्यादा ही लोग उस जनरल डब्बे में सफर करते है। कैसे वो उसमे आते है ये एक रिसर्च का विषय है। देश की अधिकतर आबादी ने अभी राजधानी और बाकी डिलिक्स रेलों की झलक नहीं देखी है। उस देश में अब बुलेट ट्रैन आ रही है। 

वैसे बुलेट ट्रैन की अश्लीलता के लिए बीजेपी सरकार को दोष देना ठीक नहीं है। कांग्रेस ने 2009 में  बुलेट ट्रैन के बारे में सोचना शुरू कर दिया था 2013 में रिसर्च शुरू हो गयी थी। अगर कांग्रेस और बीजेपी के काम काज में अंतर् की बात करोगे तो बस अंतर् ये है कि कांग्रेस की देशभक्ति थोड़ी आउटडेटिड हो गयी थी। देश के युवा को नयी देशभक्ति चाहिए थी। वरना तो काम तो ये सब ही कांग्रेस ने भी करने थे। कांग्रेस ने किये भी। देश का बेशर्म मिड्ल क्लास से लेकर कांग्रेस बीजेपी तक सब निजीकरण के कटटर समर्थक है  नीति  आयोग के उस  भाई का नाम याद नहीं आ रहा जो कह रहा था कि सरकार का काम स्कूल अस्पताल चलाना नहीं है। भारतीय रेलवे को भी बेचने की तैयारी हो रही है। कोई सरकार से पूछने वाला हो जो आपके पास है वो तो आपसे संभल नहीं रहा है उसे तो आप औने पौने भाव में बेचने पर तुले हो तो नए में अपने पाँव क्यों फँसा रहे हो। जैसे मुंबई में मेट्रो अम्बानी भइआ ने बनाई ऐसे ही कोई सेठ बुलेट ट्रैन भी बना लेगा। जनता के पैसे से चाँद अमीरों के लिए बुलेट ट्रैन क्यों बनाई जा रही है जब सरकार से लेकर विपक्ष तक सब ये मानते है कि सरकार का काम तो या है ही नहीं। बात साफ़ है सरकार जो जनता का खून चूस रही है उससे अमीरों के मौज मेले का बंदोबस्त हो रहा है। अगर इतना ही पैसा देश की बुनियादी रेल सुविधाओं को बढ़ाने में लगाया जाता तो आम जनता जिसका की वास्तव में वो पैसा है उसे सुविधा मिलती। उसका सफर थोड़ा आराम दायक होता। पर जनता के लिए जब ये गर्व ही काफी है कि उनके देश में बुलेट ट्रैन है तो उन्हें सुविधा देने की जरुरत भी क्या है। 

खैर ये दौर बेशर्मी का है। बुलेट ट्रैन एक और बेशर्मी है। पर माईबाप फिर भी जब सब आपको बेचना है तो नया  क्यों बना रहे है। इतनी जहमत क्यों उठानी। सेठों को पैसा भी सीधे दे ही सकते है आपके ही बैंक है। अगर अस्पताल स्कूल चलाना सरकार का काम नहीं है तो बुलेट ट्रैन चलाना कैसे सरकार का काम है ये बात समझ से बाहर है। क्योंकि अमीरों का मामला है इस बात की तसल्ली है कि कम से कम बुलेट ट्रैन का एक्सीडेंट तो नहीं ही होगा। पेट्रोल और डीजल की तरह हर रोज दाम भी नहीं बढ़ेंगे। 

वैसे तो हम विश्व गुरु है।  जापान वाले बुलेट ट्रैन बनाना हमारे ही वेदों से सीखकर गए है। एक बार दस बीस साल हो जाए फिर हम व्हटसअप पर बता भी देंगे कि दुनिया में पहली बुलेट ट्रैन भारत में मोदी जी ने चलवाई थी। उसका नाम तीव्र विद्युत प्राण घातक लौहपथगामिनी था जिसे हम प्यार से तीविप्राघालौगा बुलाते थे ये अंग्रेजो ने चोरी कर के बुलेट ट्रैन रख लिया। जो भी हो बुलेट ट्रैन का पत्थर पड़ चुका है। देश अब बुलेट ट्रैन के आगे आने के लिए बेताब है   

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