Followers

Sunday, 3 September 2017

ये हो क्या रिया है


इस साल मई में मेट्रो के किराये में इजाफा हुआ। अच्छा ख़ासा इजाफा हुआ। देश की पढ़ी लिखी आबादी ने इसका भी स्वागत किया।  इस साल अप्रैल में 8 .25 करोड़ लोगों ने दिल्ली की मेट्रो रेल में सफर किया था जो जून में घटकर 7.71 करोड़ रह गए। यानी महीने में 54 लाख लोगों ने कम सफर किया। ऐसा नहीं हुआ होगा कि इन लोगों ने दिल्ली में आना बंद कर दिया होगा। बस इन लोगों की ज़िन्दगी थोड़ी और मुश्किल हो गयी होगी। मेट्रो जिस तरह से वक़्त की पाबंद है हमारीं सड़के नहीं है। इन 54 लाख लोगों का बोझ भी सड़क ने ही बर्दाश्त किया होगा। अभी एक और खबर आजके अख़बार में है कि नोटबंदी के सारे नोट वापिस आ गए। खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोडा 12 आना वाला हाल है। 


अब सवाल ये है कि इस तरह किरायों में बेहताशा बढ़ोतरी से क्या हासिल होगा ? आम जनता के साथ जिस तरह से खुली लूट हो रही है , सुविधाएं कम से कमतर हो रही है वहीँ किराये आसमान छू रहे है। रेलवे में हादसे रुकने का नाम नहीं ले रहे है और भारत सरकार देश की आम जनता से बिना रेलवे में पाँव रखे ही करोड़ों रूपये कैंसिलेशन के नाम की ऐंठ रही है। जिनको ट्वीटर मंत्रालय दिया जाना चाहिए था उन्हें रेलवे की कमान सौंपी हुई है। सबसे खतरनाक है कि सब कुछ बिना किसी विरोध के स्वीकार किया जा रहा है। दिल्ली के प्रदूषण का स्तर किसी से छुपा हुआ नहीं है। जरुरत तो थी मेट्रो को और ज्यादा यात्रियों के काबिल बनाने की , यहाँ जो है उन्हें खदेड़ा जा रहा है। जैसे लोगों को मेट्रो की जगह बस या ऑटो में सफर करना पड़ रहा है वो ना देश के लिए लाभदायक है ना देश के नागरिकों के लिए। ये नोटबंदी मॉड्यूल है जिसमें आना जाना कुछ नहीं है 12 आने का गिलास टूटता है वो अलग से। 

कुलमिलाकर देश में ग़ज़ब का अर्थशास्त्र चल रहा है। जीएसटी को लागू किये अभी दो महीने भी नहीं हुए है अर्थशास्त्रियों को पता लगा है कि महँगी गाड़ियाँ जीएसटी की वजह से सस्ती हो गयी है इसलिए उन पर सेस लगा देना चाहिए। जीएसटी के बाद से ही ऑटो मार्केट की सेल्स फिगर ने उछाल आया है। जब सबको पता था कि देश पर्यावरण के लिए कार सस्ती करना बहुत हानिकारक है। क्या ये बात उस वक़्त गौर नहीं की गयी थी कि इससे कार सस्ती हो जाएंगी ? इस मूर्खतपूर्ण ( या शातिराना ? ) ग़लती के कारण टैक्स का जो नुकसान हुआ उसका जिम्मेदार कौन है ? क्या ये सोची समझी चाल थी कार निर्माताओं को फायदा पहुंचाने की ? 

ये देश जो भी चला रहे है उनसे गुजारिश है जो भी करे एक बार में कर ले। सुबह उठते है तो पता नहीं होता कौनसा नया सेस लगेगा। प्रधानमंत्री जी के इतने सपने हो गए है कि सुबह अघने से लेकर शाम को मूत्रविसर्जन तक आम आदमी जो भी करता है उसे लगता है वो  प्रधानमंत्री के सपने को ही  पूरा कर रहे है। 25 घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री जी से अपील है कि सपने थोड़ा कम देखे। अभी पहले वाले ही हम पूरे नहीं कर पाए है। डिजिटल इंडिया का सपना हम चाहकर भी पूरा नहीं कर सकते। साल में आधे दिन तो कोई न कोई बाबा जी हमारा नेट पैक बंद करवाए रहते हैं। वेबसाइटों को हाल ना ही पूछो तो बेहतर है। दुनिया में सबसे महँगा इंटरनेट हम इस्तेमाल कर रहे है। ऑनलाइन बैंकिंग की तरफ जाते डर लगता है।  इतने चार्जिज लगे हुए है कि महीने में सबसे ज्यादा ट्रांजेक्शन बैंक चार्जिज की ही होती है। हमारे पैसे निकालने पर चार्ज है , ट्रांसफर पर चार्ज है , और तो और जमा  करवाने पर चार्ज है। ऊपर से दुनियाभर की एप है उनके चार्ज अलग से। ये न्यू इंडिया चार्जिज चुकाने में ही खत्म हो जाना है। सुबह पेट्रोल भरवाने जाते है तो वहाँ प्रधानमंत्री जी का अलग सपना बड़े बड़े पोस्टर में झलकता है। आजकल पेट्रोल के रेट पर भी निगाह करना छोड़ दिया है। भाई कहता है कि ज़ीरो देख लो दिल करता है कहने को कि भाई जीरो ही बची हुई है देखने को। सारा दिन उसे ही देखते है। पेट्रोल के दाम बढ़ने पर फेमस जोक भी अब खतरे में है। सौ रूपये का तेल डलवाने वालों को अब डर लगने लगा है कि पता नहीं ऑफिस तक पहुंचे कि नहीं। 


मेट्रो , रेल , पेट्रोल हर कहीं की लूट से कहीं बेहतर है कि जनता से सीधे ही कह दिया जाए कि अपने अपने घरों में रहो। ना कुछ खाओ न कुछ पियो। सब समस्यायेँ कुछ दिनों में दूर हो जानी है। 

No comments:

Post a Comment