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Thursday, 28 September 2017

लड़कियों की आजादी से बड़ा देशद्रोह दूसरा नहीं है



काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के त्रिपाठी का कहना है कि वो बी.एच.यू को जे.एन.यू नहीं बनने देंगे। मुझे जे.एन.यू याद आ गयी। जे.एन.यू  में कुल मिलाकर 5-6 बार जाना हुआ है। हर बार यही लगता है कि भारत में कहीं जन्नत है तो यही है। बी.एच.यू में लड़कियों की छेड़छाड़ की शिकायत की जाती है तो जवाब आता है कि कैम्पस से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने दिया जाएगा। जे.एन.यू को राष्ट्रद्रोही यूनिवर्सिटी का तमगा मिला हुआ है। मुझे जे.एन.यू कैंपस में बिताई मेरी पिछली रात याद आ रही है। अगर दोनों यूनिवर्सिटी की लड़कियों की आजादी के सन्दर्भ में राष्ट्रवाद को परिभाषित किया जाए तो शायद महिला उत्पीड़न और महिला ग़ुलामी को ही राष्ट्रवाद कहा जाएगा। बी.एच.यू नहीं गया कभी पर जे.एन.यू की जो भी संक्षिप्त सी यादें है उन में से आखिरी वाली सबसे बेहतरीन है। 
शायद एक दो महीने पहले की बात है। मैंने और वर्षा ने जे.एन.यू घूम के आने का प्लान किया। वर्षा और मुझे में जो कुछ कॉमन है वो ये है कि हम दोनों हिसार से सम्बन्ध रखते हैं। वर्षा से पहली मुलाकात 8-9 साल पहले हुई थी  मैंने तब लिखना शुरू ही किया था नयी नयी फेसबुक मिली थी  वर्षा शायद पहले से लिखती थी। दोनों के लिखने में फेसबुक का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सात आठ सालों में हम शायद 7-8 बार भी नहीं मिले। जब वर्षा हिसार रहती थी तो मैं गुड़गांव रहता था मैं हिसार आया तो वर्षा दिल्ली में कविता , नज़्म लिखने लग गयी। ये सब बताना इसलिए जरुरी है कि जिसको पता न हो उसे दो बातों का पता लग जाए एक कि मैं भी लिखता हूँ दूसरा सिर्फ लिखता ही नहीं हूँ वर्षा का दोस्त भी हूँ जो दिल्ली में आये दिन किसी न किसी प्रोग्राम में हिस्सा लेती रहती है। बड़े बड़े कार्टूनिस्ट जिनसे हम मिलने की तमन्ना रखते है वो वर्षा के दोस्त हैं। हम  दोनों के ही घर परिवार या आसपास के वातावरण में कुछ लिखने या सोचने के अनुकूल माहौल नहीं था। हरियाणा में कोर्स की किताबों के अलावा और कुछ पढ़ना बेवकूफी माना जाता है। कोर्स की किताब पढ़ना भी यहाँ बहुत से लोग बेवकूफी ही मानते हैं। हरियाणा की तारीफ फिर कभी करेंगे। अभी तारीफ सिर्फ जे.एन.यू की करनी है। 
हम दोनों शाम 6 बजे क्नॉट प्लेस से जे.एन.यू की तरफ रवाना हुए। वर्षा जे.एन.यू में बहुत लोगों को जानती थी जिसमें से एक मशहूर कार्टूनिस्ट गोपाल शून्य जी भी है, जिनसे मिलना मेरे वहाँ जाने का एक मकसद था। मैं वहाँ सिर्फ ऋतु  को जानता था। उससे से भी मुलाक़ात फेसबुक के जरिये ही हुए थी। बाद में पता लगा वो भी हिसार के एक गांव की रहने वाली है। उसे देख कर मुझे मेरी छोटी बहन याद आ जाती है हर बार। वो जिस तरह से मुझे भाई कहकर बुलाती है, वो लहजा मेरी बहन से काफी मिलता है। अब बात लड़कियों की ही है तो थोड़ी तारीफ ऋतु की भी कर ली जाए। ऋतु अभी हाल ही में लंदन जाकर आयी है एक सेमीनार में। जेएनयू में पी.एच.डी कर रही है। साथ ही दिल्ली युनिवर्सिटी के कालेज  में बच्चों को  पढ़ा भी रही है। हरियाणा में लड़कियों की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है। हरियाणा के समाज की संकीर्णता को लात मारकर इतनी आगे तक जाना बहुत काबिले तारीफ है। पर ये काबिले तारीफ किसके लिए है ? कम से कम त्रिपाठी जैसे लोगों के लिए तो नहीं जो लड़कियों को शाम 6 बजे पिंजरे में बंद कर देना चाहते है जो लाइब्रेरी बंद कर देना चाहते है। उनका ये डर ही बताता है कि लड़कियों की योग्यताओं से हिन्दू शेर किस कदर भयभीत है। 
हिन्दू शेरों की बात भी फिर कभी। मैं जितनी बार  जे.एन.यू गया, मेरे अंदर आने का गेट पास ऋतु ही थी। उसका ये उलाहना हर बार रहता था कि मैं जेएनयू के एंट्री गेट पर उसे याद करता हूँ। जेएनयू के अंदर आने के बाद ढंग से मिलता भी नहीं। हर बार ऐसा ही हुआ। इस बार मैं ठान के आया था कि उससे जी भर के बात करनी है। हम जेएनयू साढ़े सात बजे के आसपास पहुँचे। सबसे पहले गोपाल शून्य से मिले। कमाल के कार्टूनिस्ट है। देश के हुकुमरान पर जिस तरह का तीखा व्यंग्य वो अपने कार्टून में उतारते है वो बस देखते ही बनता है  फिर धीरे धीरे उनके दस पन्द्रह दोस्तों का जमावड़ा हो गया। अब जे.एन.यू का वातावरण वैसा तो नहीं रहा था, जैसा उस रात था जब मैं पहली बार योगेश के साथ आया था। पर फिर भी जे.एन.यू के अंदर जाकर ऐसा लगता है मानो सच में आजाद हवा में साँस ले रहे हो। हम सब एक जगह बैठकर बात करने लगे। सबका आपस में परिचय हुआ। सब अलग अलग जगह से थे। बात बातों में दस बजे गए। मैं और ऋतु पानी पीने के लिए उनसे अलग हुए तो जेएनयू की  पहाड़ियों पर बैठकर गप्पे मारने का तय हुआ। रात के दस साढ़े दस बजे जेएनयू में सब  लड़के लड़कियाँ इतनी आराम से घूम रहे थे  कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। ऋतु पूरी जेएनयू दिखाते हुए मुझे जेएनयू की फेमस पहाड़ियों तक ले आयी। वहाँ भी किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं थी। थोड़ी चढ़ाई के बाद जिस पहाड़ी के पत्थर पर हमने बैठने  का प्लान किया, उसी के पास अगले पत्थर पर दो लड़के और एक लड़की पहले से बैठे हुए थे और राजनीति पर डिस्कस कर रहे थे। ये है वो जेएनयू का कल्चर जिसे अपने प्रांगण में दाखिल  न होने देने की कसम कुलपति त्रिपाठी खाये हुए है। बताओ  रात में दो लड़के एक लड़की बैठकर पोलटिक्स पर डिस्कस कर रहे है। हद नहीं है। भारतीय संस्कृति में तो भाई बहन को भी अकेले में साथ बैठने की मनाही है। यहाँ लड़के का फर्ज है कि लड़की की जींस में हाथ डालकर भाग जाए और लड़की शाम 5 बजे पिंजरे में बंद हो जाए। ऐसे मूल्यों की रक्षा करने वाले कुलपति बी.एच.यू को जे.एन.यू कैसे बनने दे सकते हैं। वहाँ बैठकर हमने एक डेढ़ घंटा बात की। ऋतु ने अपनी पढाई की, अपने  स्ट्रगल की बात बताई। कैसे बावजूद हर क्लास में टॉप करने के , ऋतु को पोस्ट ग्रेजुएशन में डिस्टेंस में दाखिला लेना पड़ा और कैसे हर क्लास की टॉपर को महान कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी ने फेल डिक्लेयर कर दिया। ऐसे काम यहाँ होते रहते है। एक बार की बात बताता हूँ। मेरे पांच काबिल दोस्तों का पोस्ट ग्रेजुएट के एक विषय का पेपर था। उन पांचों में सिर्फ एक दोस्त उस पेपर में पास हुआ और विडंबना ये कि सिर्फ एक उसी दोस्त ने वो पेपर नहीं दिया था। रिजल्ट आने के बाद बाकी दोस्तों को भी अफ़सोस हुआ कि काश वो भी पेपर नहीं देते। खैर डिस्टेंस पोस्ट ग्रेजुएट के पहले साल में फेल घोषित होने के बाद ऋतु ने जामिया मिलिया युनिवर्सिटी में एंट्रेंस पास किया।  जामिया मिलिया के एंट्रेंस की तैयारी के वक्त ऋतु जेनयू में रही जहाँ उसे पढ़ने का, आगे बढ़ने का माहौल मिला और उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज ऋतु ने दो विषय में नेट JRF उत्तीर्ण किया हुआ है अभी लंदन जाकर सेमिनार में पेपर प्रैजेण्ट करके आयी है और नवम्बर में स्पेन जा रही है। 
साढ़े बारह बजे हल्की हल्की बारिश शुरू होने लगी तो हम पहाड़ियों से वापिस आ गए। वहाँ से चाय की तलाश में जेएनयू की लाइब्रेरी आ गए। किसी भी तरह का कोई डर कोई फ़िक्र कुछ नहीं। चाय तक पहुंचे तो बारिश तेज शुरू हो चुकी थी हमसे आगे चार पांच लड़कियां चाय के लिए लाइन में लगी थी। चाय पीकर लाइब्रेरी पहुंचे तो  देखा वहाँ सब पढ़ रहे थे। एक बजे से ऊपर का वक्त था और विद्यार्थी चुपचाप लाइब्रेरी में पढ़ रहे थे। ऋतु ने बताया कि यहाँ सारी रात पढ़ते रहते हैं। एक डेढ़ साल पहले तक रात में खाना खाने की कोई दिक्कत नहीं होती थी पर अब रात को खाना नहीं मिलता। अगर आपको भूख लगी है तो सुबह का इन्तज़ार करने के सिवाय कोई ऑप्शन  नहीं है। बीएचयू भले ही जेनएयू न बन पाए पर जेएनयू को बीएचयू बनाने की पुरजोर कोशिशें है। एम फ़िल्, पी.एच.डी. की सीट 90 फीसदी तक कम कर दी गयी हैं। ऋतु के सब्जेक्ट में सीटें 60 से घटा कर 1 कर दी गयी है। जिन ऋतुओं को भूले भटके पढ़ने का मौका मिल गया है, अब पूरी कोशिश है कि आगे ऐसा नहीं होने दिया जाए। 
दो  बजे वर्षा का फोन आया वो सब किसी हॉस्टल में जा रहे थे सोने के लिए। जबकि हमें जेएनयू घूमने में ज्यादा मजे आ रहे थे। उसके बाद हमने एक हॉस्टल में कैरम बोर्ड खेला। सुबह चार बजे मैं जेएनयू से रवाना हुआ।  लोग मॉर्निंग वाक् के लिए आ रहे थे। 
ये है जेएनयू का कल्चर जिससे सारे देश के अनपढ़ खफा है। क्यों खफा है ? क्यूंकि यहाँ उन फूलों को खिलने का मौका मिलता है जिन्हे बाहर बेरहमी से पैरों के नीचे कुचल दिया जाता है। बीएचयू में लड़कियों ने जो किया वो शायद भारतीय शिक्षा के ठेकेदारों की उम्मीद के परे था पर अब इन्हें रोकना मुमकिन नहीं है। 
वर्षा के लिखने में , ऋतु की सफलता को जेएनयू से उनके सबंध से नहीं जोड़ा जा सकता। पर जे.एन.यू ऐसी जगह जरूर है जहाँ आकर लड़कियाँ आजादी की सांस ले सकती है। अपने पंख फैला सकती है। कौन भाई ऐसा नहीं चाहेगा कि उनकी बहनों को ऐसा कल्चर मिले ऐसी जगह मिले जहाँ उनको साँस लेने की आजादी हो।  खुले आसमान में उड़ने की आजादी हो। जेएनयू में भी कोई एलियन नहीं रहते है। वही लोग है पर वहाँ का कल्चर ऐसा बनाया है जो सबको लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ जीने की आजादी देता है। ऐसा कब तक रहेगा ये कहना मुश्किल है पर अब तक भारत में लड़कियों के लिए जेएनयू सबसे बेहतरीन शिक्षा संस्थान है 


Tuesday, 26 September 2017

हिन्दू , लड़कियाँ और कुल का पति



मैं चूँकि कभी बनारस नहीं गया तो जाहिर है कभी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के दर्शन भी नहीं हो पाए। वैसे तो हिन्दू यूनिवर्सिटी है तो इसे बनारस नहीं वाराणसी होना चाहिए था पर वो दूसरा मुद्दा है। हिन्दू पर बात आयी तो फिर यूनिवर्सिटी पर बात नहीं हो पाएगी। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के बारे में कहा जाता है कि एक कोई मदन मोहन मालवीय नाम के भाई थे उन्होंने बड़े जतन से ये यूनिवर्सिटी बनाई थी कि इसमें हिन्दू पढ़ सके। उनके हिन्दू का क्राइटेरिया ये था कि कोई दलित उनको छू जाता था तो कपड़ो समेत गंगा स्नान करते थे। विदेश जाते थे तो बाल्टी भर भर गंगा का पानी अपने साथ लेकर जाते थे। ऐसे भारत रत्न ने यूनिवर्सिटी बनाई जिसमें  आजादी के बाद तक एड्मिसन लेते वक़्त पूछा जाता था कि भाई ब्राह्मण हो या ऐंवे ही कोई भी हो। 
लेखक तुलसीराम जी ने अपनी आत्मकथा "मणि कर्णिका " में इस बात का जिक्र किया है कि जब वो बी.एच.यू नाम की इस यूनिवर्सिटी में जब पढ़ने के लिए गए तो एड्मिसन फॉर्म में साफ़ साफ़ एक कॉलम  था 

" R YOU BRAHMIN OR NON BRAHMIN” 

 शुक्र है 21वीं सदी में कम से कम ये तो नहीं पूछा जाता। 

अभी जो कुछ बी हिन्दू यू में हुआ वो अविस्मरणीय है। लड़कियाँ छेड़छाड़ रोकने के लिए शिकायत लेकर गयी तो वाइस चांसलर साहब कहने लगे कि कॉलेज परिसर में से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने दिया जायेगा। ऐसे स्पष्टवादी इंसान को तो नोबल मिलना चाहिए। ये तो त्रिपाठी जी है जो ऐसा कह सकते है वरना और कोई ये कह दे कि लड़की छेड़ना राष्ट्रवाद है तो उसे पाकिस्तान के अफगानिस्तान बॉर्डर से पहले कहीं सर छुपाने को जगह न मिले। 

वैसे त्रिपाठी  दिलचस्प आदमी लग रहे है। वीसी वैसे होते ही दिलचस्प है। वाइस चांसलर का हिंदी अनुवाद करने वाले ने कुलपति किया है। जिसने भी हिंदी में ऐसे शब्दों का ईजाद किया होगा उस भाई की शादी की फ़ाइल शायद कही अटक गयी होगी। पति बनने की प्रबल इच्छा में राष्ट्र से लेकर कॉलेज तक हर जगह पति बिठा दिए। सेना पति , राष्ट्र पति , अब कुल पति।  खैर जो भी हो कुलपति अपने पति होने की भूमिका बरोबर निभा रहे है।  अनपढ़ के हाथ में कलम आने का ये नुकसान है अनाप शनाप बकने लगता है। मेरे मन में एक और ख्याल आया है कि शायद वाइस चांसलर को हिंदी में इसलिए कुलपति कहा जाता है कि जैसे पति होने के लिए भारत में कोई खास योग्यता  नहीं होती सिवाय मर्द होने के,  वैसे ही कुलपति के लिए भी सवर्ण होने के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए होता। जैसे घर में पति कुछ नहीं करता वैसे ही कुलपति के पास भी करने को कुछ नहीं होता। जैसे सच झूठ बोलकर भारत में शादी हो जाती है वैसे ही चमचागिरी करके कुलपति बन जाते है। 

हरिशंकर परसाई जी ने अपने लेख " लंका विजय के बाद " में कुलपति की कितनी मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत की है। लंका विजय के बाद जब सब बंदर कुछ न कुछ पद लेने को आतुर थे तो एक बंदर से उसकी पत्नी ने पूछा कि तुम कौन सा पद लोगे 

"" वानर ने कहा ,' प्रिय , मैं कुलपति बनूगा। बचपन से  ही शिक्षा से बड़ा प्रेम है। मैं ऋषियों  आश्रम आसपास ही मंडराया करता था। मैं विधार्थियो की चोटी खींचकर भागता था , हवन सामग्री झपट लेता था। एक बार ऋषि का कमंडल ही ले भागा था। इसी से तुम मेरे विद्या प्रेम का अनुमान कर सकती हो। मैं तो कुलपति ही बनूँगा "

कुलपति बनने के लिए बेसिक  नीड्स तो यही है जो परसाई जी ने बताई। चाहे कुछ हो ये वाले कुलपति स्पष्टवादी है ये तो मानना पड़ेगा। एक अंग्रेज ने कहा था कि राष्ट्रवाद गुंडों की आखिरी पनाहगार है। हमारे वीसी साहब भी कह रहे है कि लड़कियों से छेड़छाड़ पर रोक लगाने से कॉलेज में राष्ट्रवाद को खतरा है। 


फिर बात अकेले कुलपति की भी नहीं है। हम क्यों भूल जाते है भारत  विश्व गुरु है। यहाँ पर प्रजनन पूर्व लिंग जांच पर सरकार ने पाबन्दी लगाई हुई है। यहाँ सरकार बाकायदा " बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ " का स्लोगन चलाती है। इस बात पर अब तक कन्फ्यूजन है बेटी बचानी  किस से है ? यहाँ पर त्योहारों पर लड़कियों को खाना भी खिलाया जाता है। अब बताओ वीसी क्या करे ? ये सिर्फ बनारस का ही हाल थोड़ी है। एक आध अपवाद को छोड़ दे तो हर कॉलेज , यूनिवर्सिटी में गर्ल हॉस्टल के गेट छह बजे बंद हो जाते है। कमाल बात है हर यूनिवर्सिटी में 24 घंटे लाइब्रेरी खुली रहती है पर लड़कियों के हॉस्टल 6 बजे बंद हो जाते है। लाइब्रेरी किसके के लिए खुली रहती है ? हर यूनिवर्सिटी में लड़को के हॉस्टल चारो तरफ से खुले होते है और लड़कियों के जेल की तरह बंद। 2017 में लड़कियों को पढाई एक मजबूरी की तरह दी जा रही है। इतनी सुंदर सुंदर यूनिवर्सिटी में लड़कियों को शाम को कैद कर  दिया जाता है। छोटे शहरो में और बुरा हाल है।  बनारस का ये आंदोलन सिर्फ बनारस तक का ही नहीं है। लड़कियों की मांग का किसी पोलटिकल पार्टी से भी कोई लेना देना नहीं है। बनारस में पुलिस की लाठियों के सामने निडर कड़ी लड़कियाँ वो मिसाल है जो इस मर्दवादी समाज की नीव उखाड़ सकती है। लड़कियों ने बहुत सीधे सामान्य शब्दों में पूछा है कि लड़को को छूट क्यों मिली हुई है। उनको भी 6 बजे बाद जेल में बंद करो। 

इस आंदोलन का आगे जो भी हो पर इस आंदोलन ने जो कुछ अब तक दिया है एक मील का पत्थर है। लड़कियों की लड़ाई अब दो कदम आगे बढ़कर ही लड़ी जानी है। 


बनारस की उन सभी लड़कियों के ज़ज्बे को दिल से सलाम। ये आंदोलन देश भर में होना चाहिए। शिक्षा हमारा बुनियादी अधिकार है।  ये कोई अहसान नहीं है। यौन अपराध को छेड़छाड़ कहना भी अब बंद होना चाहिए। 

Sunday, 17 September 2017

भूख से नहीं लोग तकनीकी कारणों से मर रहे है



केंद्रीय मंत्री का कहना है कि पेट्रोल वाले भूखे नहीं मर रहे है। कमाल देश है भूखा मरना बेंच मार्क बन रहा है। वैसे केंद्रीय मंत्री किसी भी पार्टी का हो , मूर्खता उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इनका दोष नहीं है। शायद केंद्रीय मंत्री होने की ये आधारभूत शर्त है।  मंत्री जी की माने तो जो भी भूखे नहीं मर रहे है उन्हें तब तक लूटा जाना चाहिए जब तक वो भूखे न मरने लग जाए। 

वैसे तो भारत के निज़ाम जो भी चला रहा है या जैसे भी ये चल रहा है उन सब की पूरी कोशिश है कि कोई भूख से न मरने पाये। रेल हादसे नया रिकॉर्ड बना रही है। देश सफाई के पीछे लगा हुआ है। सफाई करने वाले सीवर में सुरक्षा उपकरणों के अभाव में अपनी जान दे रहे है। पशु पालक बेचारे गौ गुंडों के आतंक से डरे हुए है।  पशुओ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए माउंटेन ड्यू पीने की जरुरत पड़ती है। गाय माता और सांड पिता का सड़को पर इस कदर राज है कि सड़क दुर्घटनाओं में दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है। किसानों की आत्महत्या जैसे ट्रेडिशनल तरीके भी चल ही रहे है। जब मरने के लिए इतने सारे विकल्प तैयार किये जा रहे है तो ऐसा कौन सा देश द्रोही होगा जो भूख से मरना चाहेगा। 

ऊपर वाले तरीके अगर पसंद न आये हो तो सीधे गोली खाने का भी ऑप्शन है। पिछले  दिनों गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। उनपर लिखने का आरोप था। गौरी लंकेश से पहले नरेंद्र दंभोलकर  गोविन्द  पंसारे जैसे लेखक भी लिखने की सजा में जान गँवा चुके है। खैर गौरी लंकेश की मौत पर अख़बारों में हर तरह के सम्पादिकीय पढ़े। एक भाई कह रहा था  पत्रकार तो मरते रहते है। पहले भी मरते रहते थे। उस भाई ने बहुत से नाम गिना रखे  थे।  उसे इस बात का गिला भी था कि गौरी लंकेश वाम विचारधारा से प्रभावित क्यों थी। पत्रकार की कोई विचारधारा नहीं होनी चाहिए। कोई वाम विचारधारा से प्रभावित हो तो उसके मरने का विरोध नहीं होना चाहिए। कोई लवलीन सिंह जी है उन्हें भी कथित सेक्युलरों से दिक्कत थी।  जिस तरह के तर्क अपने यहाँ के बुद्धिजीवी कर रहे है भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।किसी की  गोली मार कर हत्या  कर दी गयी पर विरोध करना मना है। तब कहाँ थे , उस वक़्त क्यों नहीं बोला पहले भी लोग मरे है। जब ये तर्क है तो इसके आगे तो गीता का ज्ञान ही दिया जा सकता है जो आया है वो जाएगा भी। क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओगे। सब माया है। एक आरोप और भी आया है मार्किट में कि सब लिखने वालों को गोली नहीं लग रही है। फेसबुक पर सब कितना तार्किक निर्मम और मारक लिख रहे है पर सबको गोली नहीं लग रही। जिनको गोली नहीं लगी वो बेकार लिख रहे है। खैर फेसबुक की तमाम अच्छी बातों के साथ साथ एक जो थोड़ा सा नेगेटिव पॉइंट है वो ये है कि ये 24 घंटे अवेलेबल है। बाज लोग इसे एक जिम्मेदारी मान लेते है मतलब लिखना तो है ही चाहे कुछ लिखने को हो या न हो। शेर नहीं लिखा जा रहा तो गधा लिख दो अगर कुछ भी नहीं लिखा तो क्रांति आधी  रह जायेगी। कुछ दोस्त तो बाकायदा सदमे में है कि इतना लिखने के  बाद भी उन्हें गोली क्यों नहीं मारी गई। कुछ क्रन्तिकारी ऐसे भी है जो खुद को डिएक्टिवेट कर के ही संतोष कर लेते है। गोली नहीं लगी तो क्या हुआ जुकरबर्ग ने आईडी बंद कर दी एक दिन के लिए ये क्या कम बलिदान है। जब डीपी काली करके , अकाउंट डिएक्टिवेट करके भी शहीद बना जा सकता है तो गोली खाने में समझदारी नहीं है। 

 बाकी गोली नहीं खाने के लिए कुछ सलाह मेरे पास भी है। जितना  हो सके दूर का लिखो। जितनी दूर का लिखोगे उतना गोली खाने के चांस कम है। हिन्दुओ का इलाके में  रहते हो मुसलमानो के खिलाफ लिखो। मुसलमानो के देश में रहते हो तो हिन्दुओ और बाकी धर्मो के खिलाफ लिखोगे तो खतरा नहीं है। भारत में रहकर अमेरिका के खिलाफ लिखने में खतरा नहीं है। यहाँ तक की मोदी के खिलाफ भी लिखने में खतरा नहीं है बशर्ते कि लोकल गुंडों से न उलझ जाओ। आपकी फेसबुक पर अगर आपके शहर के लोग कम है तो मामला सेफ है। फिर सरकार किसकी है हवा किसकी है इसका ख्याल रखना जरुरी है। आज एमरजेंसी पर किताब लिख दो , फिल्म बना दो कोई खतरा नहीं है। अभी बाबा राम रहीम पर मजाक उड़ाने से व्यंग्य लिखने तक सब किया जा सकता है। पर ये काम 6 महीने पहले तक करना खतरे का काम था। पत्रकार छत्रपति ने जो 2002 में किया उसके बदले में उनकी जान चली गयी। अभी मिडिया में सब टूट कर पड़े हुए है। ये सब लोग कुछ महीने पहले तक राम रहीम के आगे डॉक्टर लगाते थे और पीछे जी। ये सब समझदार लोग है। मैं खुद बहुत समझदार हूँ। मजाल है राम रहीम  के बारे में कोई व्यंग्य किया हो। हिसार में रहता हूँ कुछ भी हो सकता था। अब बाबा जी जेल में है। अब डर की बात नहीं है। अपने इलाके के  एम् एल ऐ  एमपी , पार्षद और अपने इलाके के थानेदार से बचके रहो बाकी इतनी दिक्कत नहीं है। 

अभी ज्यादा हो रहा है। यहाँ हाल चाल ठीक ठाक है। पेट्रोल खरीदने वाले भूखे नहीं मर रहे है। बच्चे ऑक्सजीन की कमी से मर रहे है। स्कूल में गला रेतने से मर रहे है। रेल यात्री रेल बिना पटरी के चलने से मर रहे है। किसान , पशु पालक पशुओ को लाने लेजाने के कारण मर रहे है। कुछ लोग तकनीकी कारणों से मर रहे है। पर भूख से कोई नहीं मर रहा है। अगर मर भी रहा है तो भी कोई नयी बात नहीं है पहले भी तो मरते थे। 

Thursday, 14 September 2017

बुलेट ट्रैन हमारी अँखियों से गोली मारे



जापान के प्रधानमंत्री   बुलेट ट्रैन के लिए पहला पत्थर रखने भारत आये हुए है । अब भारत में भी रेल गोली की रफ़्तार से  दौड़ेगी। बुलेट ट्रैन का सपना अब पूरा होने वाला है। भारत में अब विकास के साथ साथ प्रगति भी आएगी। आनी भी चाहिए। बुलेट ट्रैन के साथ तो पटरी में टूट फुट से भी देर होने का खतरा नहीं है। बुलेट ट्रैन इतनी तेज चलती है कि पटरी टूट भी गयी तो पांच सौ हजार किलोमीटर तो घिसट घिसट कर पहुँच जायेगी। पर अहम् सवाल ये है कि क्या बुलेट ट्रैन हम भारतीयों की फेंकने की जो स्पीड है उसका मुकाबला कर पाएगी ? मुझे गाँव की एक पुरानी महफ़िल याद आ रही है जहाँ एक रात तेज चलने वाली ट्रैन पर बात हो रही थी। सभी बोलने वाले एक से बढ़कर एक थे। ट्रैन का नाम  नाम सुना था। उस वक़्त गूगल भी नहीं था तो अपनी स्वप्न शक्ति का ही इस्तेमाल करना पड़ता था। एक दोस्त ने कहा कि विदेश में तो ट्रैन हजार किलोमीटर प्रति घंटा तो आम चलती है । वैसी महफ़िलों में प्रतिवाद के लिए जगह नहीं होती थी। दूसरे दोस्त ने कहा कि वो ट्रैन रूकती नहीं कभी भी कहीं भी। स्टेशन पर एक डब्बे में जिन यात्रियों को चढ़ना होता है वो बिठा दिए जाते है। जिनको उतरना हो वो ट्रैन के पिछले डब्बे में आ जाते है स्टेशन पर अगला डब्बा ट्रैन के आगे अटैच हो जाता है और पिछला डब्बा ट्रैन से अलग हो जाता है। ट्रैन की रिपेयर मेंटेनेंस सब वो ट्रैन के चलते चलते ही करते है। एक और दोस्त कहता है सालों साल ट्रैन बिना रुके चलती है तभी तो वो लोग हमसे इतने आगे है। ये सब गंभीर डिस्कसन थी जिसमें आधे से ज्यादा तो मैं भूल गया। खैर जो धन्य लोग पहली बार बुलेट ट्रैन में सफर करेंगे उनकी महागाथा सुनने के लिए भी हमें तैयार रहना पड़ेगा। 

फ़िलहाल भारतीय रेलवे की हकीकत किसी से छुपी हुई नहीं है। जिन देशों में बुलेट ट्रैन चल रही है उनकी रेलवे से भारत की रेल सुविधाओं की तुलना करोगे तो भारत कहीं भी नहीं होगा उस तुलना में। जापान में ट्रैन का औसत देरी का वक्त सेकेंड्स में है। पांच मिनट देर होने पर माफ़ी मांगी जाती है। एक दो घंटे देर होने पर अख़बार में खबर आ जाती है। यहाँ चार पांच घंटो को हम नॉर्मल लेकर चलते है। पैसेंजर पांच घंटे बाद थोड़ी थोड़ी गाली निकालना शुरू करता है। एक आध दिन लेट होने पर कोई बड़ा इशू नहीं होता। अभी ट्वीट रेल मंत्री तो चले गए है पर रेल को इतना महँगा कर गए है कि मैं पिछले तीन महीने से irctc की साइट पर नहीं गया हूँ। डर लगता है कि साइट पर जाते ही कोई चार्ज न काट ले प्रभु जी। दुर्घटनाओं की तो बात ना ही करे। 

ट्रैन के सामान्य डब्बे का जो हाल है वो ये है कि सामान्य डब्बे में बैठकर कोई प्रभु को ट्वीट कर दे तो मैं ट्वीटर छोड़ने को तैयार हूँ। ट्वीट तो दूर की बात है सामान्य डब्बे में से कोई अपना फोन जेब से निकाल कर ही दिखा दे। लोग दो दो दिन सामान्य डब्बे में यात्रा कर लेते है न्यूनतम से भी कम सुविधाओं के साथ। फ़िलहाल प्लेटफॉर्म टिकट 20 रूपये की है। जनरल डब्बे की टिकट का ट्रैन की सीटों के साथ कोई कनेक्शन नहीं है। भले ही ट्रैन में एक ही जनरल डब्बा हो टिकट कितनी भी काटी जा सकती है। और जितनी टिकट कटती है उसे ज्यादा ही लोग उस जनरल डब्बे में सफर करते है। कैसे वो उसमे आते है ये एक रिसर्च का विषय है। देश की अधिकतर आबादी ने अभी राजधानी और बाकी डिलिक्स रेलों की झलक नहीं देखी है। उस देश में अब बुलेट ट्रैन आ रही है। 

वैसे बुलेट ट्रैन की अश्लीलता के लिए बीजेपी सरकार को दोष देना ठीक नहीं है। कांग्रेस ने 2009 में  बुलेट ट्रैन के बारे में सोचना शुरू कर दिया था 2013 में रिसर्च शुरू हो गयी थी। अगर कांग्रेस और बीजेपी के काम काज में अंतर् की बात करोगे तो बस अंतर् ये है कि कांग्रेस की देशभक्ति थोड़ी आउटडेटिड हो गयी थी। देश के युवा को नयी देशभक्ति चाहिए थी। वरना तो काम तो ये सब ही कांग्रेस ने भी करने थे। कांग्रेस ने किये भी। देश का बेशर्म मिड्ल क्लास से लेकर कांग्रेस बीजेपी तक सब निजीकरण के कटटर समर्थक है  नीति  आयोग के उस  भाई का नाम याद नहीं आ रहा जो कह रहा था कि सरकार का काम स्कूल अस्पताल चलाना नहीं है। भारतीय रेलवे को भी बेचने की तैयारी हो रही है। कोई सरकार से पूछने वाला हो जो आपके पास है वो तो आपसे संभल नहीं रहा है उसे तो आप औने पौने भाव में बेचने पर तुले हो तो नए में अपने पाँव क्यों फँसा रहे हो। जैसे मुंबई में मेट्रो अम्बानी भइआ ने बनाई ऐसे ही कोई सेठ बुलेट ट्रैन भी बना लेगा। जनता के पैसे से चाँद अमीरों के लिए बुलेट ट्रैन क्यों बनाई जा रही है जब सरकार से लेकर विपक्ष तक सब ये मानते है कि सरकार का काम तो या है ही नहीं। बात साफ़ है सरकार जो जनता का खून चूस रही है उससे अमीरों के मौज मेले का बंदोबस्त हो रहा है। अगर इतना ही पैसा देश की बुनियादी रेल सुविधाओं को बढ़ाने में लगाया जाता तो आम जनता जिसका की वास्तव में वो पैसा है उसे सुविधा मिलती। उसका सफर थोड़ा आराम दायक होता। पर जनता के लिए जब ये गर्व ही काफी है कि उनके देश में बुलेट ट्रैन है तो उन्हें सुविधा देने की जरुरत भी क्या है। 

खैर ये दौर बेशर्मी का है। बुलेट ट्रैन एक और बेशर्मी है। पर माईबाप फिर भी जब सब आपको बेचना है तो नया  क्यों बना रहे है। इतनी जहमत क्यों उठानी। सेठों को पैसा भी सीधे दे ही सकते है आपके ही बैंक है। अगर अस्पताल स्कूल चलाना सरकार का काम नहीं है तो बुलेट ट्रैन चलाना कैसे सरकार का काम है ये बात समझ से बाहर है। क्योंकि अमीरों का मामला है इस बात की तसल्ली है कि कम से कम बुलेट ट्रैन का एक्सीडेंट तो नहीं ही होगा। पेट्रोल और डीजल की तरह हर रोज दाम भी नहीं बढ़ेंगे। 

वैसे तो हम विश्व गुरु है।  जापान वाले बुलेट ट्रैन बनाना हमारे ही वेदों से सीखकर गए है। एक बार दस बीस साल हो जाए फिर हम व्हटसअप पर बता भी देंगे कि दुनिया में पहली बुलेट ट्रैन भारत में मोदी जी ने चलवाई थी। उसका नाम तीव्र विद्युत प्राण घातक लौहपथगामिनी था जिसे हम प्यार से तीविप्राघालौगा बुलाते थे ये अंग्रेजो ने चोरी कर के बुलेट ट्रैन रख लिया। जो भी हो बुलेट ट्रैन का पत्थर पड़ चुका है। देश अब बुलेट ट्रैन के आगे आने के लिए बेताब है   

Sunday, 3 September 2017

ये हो क्या रिया है


इस साल मई में मेट्रो के किराये में इजाफा हुआ। अच्छा ख़ासा इजाफा हुआ। देश की पढ़ी लिखी आबादी ने इसका भी स्वागत किया।  इस साल अप्रैल में 8 .25 करोड़ लोगों ने दिल्ली की मेट्रो रेल में सफर किया था जो जून में घटकर 7.71 करोड़ रह गए। यानी महीने में 54 लाख लोगों ने कम सफर किया। ऐसा नहीं हुआ होगा कि इन लोगों ने दिल्ली में आना बंद कर दिया होगा। बस इन लोगों की ज़िन्दगी थोड़ी और मुश्किल हो गयी होगी। मेट्रो जिस तरह से वक़्त की पाबंद है हमारीं सड़के नहीं है। इन 54 लाख लोगों का बोझ भी सड़क ने ही बर्दाश्त किया होगा। अभी एक और खबर आजके अख़बार में है कि नोटबंदी के सारे नोट वापिस आ गए। खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोडा 12 आना वाला हाल है। 


अब सवाल ये है कि इस तरह किरायों में बेहताशा बढ़ोतरी से क्या हासिल होगा ? आम जनता के साथ जिस तरह से खुली लूट हो रही है , सुविधाएं कम से कमतर हो रही है वहीँ किराये आसमान छू रहे है। रेलवे में हादसे रुकने का नाम नहीं ले रहे है और भारत सरकार देश की आम जनता से बिना रेलवे में पाँव रखे ही करोड़ों रूपये कैंसिलेशन के नाम की ऐंठ रही है। जिनको ट्वीटर मंत्रालय दिया जाना चाहिए था उन्हें रेलवे की कमान सौंपी हुई है। सबसे खतरनाक है कि सब कुछ बिना किसी विरोध के स्वीकार किया जा रहा है। दिल्ली के प्रदूषण का स्तर किसी से छुपा हुआ नहीं है। जरुरत तो थी मेट्रो को और ज्यादा यात्रियों के काबिल बनाने की , यहाँ जो है उन्हें खदेड़ा जा रहा है। जैसे लोगों को मेट्रो की जगह बस या ऑटो में सफर करना पड़ रहा है वो ना देश के लिए लाभदायक है ना देश के नागरिकों के लिए। ये नोटबंदी मॉड्यूल है जिसमें आना जाना कुछ नहीं है 12 आने का गिलास टूटता है वो अलग से। 

कुलमिलाकर देश में ग़ज़ब का अर्थशास्त्र चल रहा है। जीएसटी को लागू किये अभी दो महीने भी नहीं हुए है अर्थशास्त्रियों को पता लगा है कि महँगी गाड़ियाँ जीएसटी की वजह से सस्ती हो गयी है इसलिए उन पर सेस लगा देना चाहिए। जीएसटी के बाद से ही ऑटो मार्केट की सेल्स फिगर ने उछाल आया है। जब सबको पता था कि देश पर्यावरण के लिए कार सस्ती करना बहुत हानिकारक है। क्या ये बात उस वक़्त गौर नहीं की गयी थी कि इससे कार सस्ती हो जाएंगी ? इस मूर्खतपूर्ण ( या शातिराना ? ) ग़लती के कारण टैक्स का जो नुकसान हुआ उसका जिम्मेदार कौन है ? क्या ये सोची समझी चाल थी कार निर्माताओं को फायदा पहुंचाने की ? 

ये देश जो भी चला रहे है उनसे गुजारिश है जो भी करे एक बार में कर ले। सुबह उठते है तो पता नहीं होता कौनसा नया सेस लगेगा। प्रधानमंत्री जी के इतने सपने हो गए है कि सुबह अघने से लेकर शाम को मूत्रविसर्जन तक आम आदमी जो भी करता है उसे लगता है वो  प्रधानमंत्री के सपने को ही  पूरा कर रहे है। 25 घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री जी से अपील है कि सपने थोड़ा कम देखे। अभी पहले वाले ही हम पूरे नहीं कर पाए है। डिजिटल इंडिया का सपना हम चाहकर भी पूरा नहीं कर सकते। साल में आधे दिन तो कोई न कोई बाबा जी हमारा नेट पैक बंद करवाए रहते हैं। वेबसाइटों को हाल ना ही पूछो तो बेहतर है। दुनिया में सबसे महँगा इंटरनेट हम इस्तेमाल कर रहे है। ऑनलाइन बैंकिंग की तरफ जाते डर लगता है।  इतने चार्जिज लगे हुए है कि महीने में सबसे ज्यादा ट्रांजेक्शन बैंक चार्जिज की ही होती है। हमारे पैसे निकालने पर चार्ज है , ट्रांसफर पर चार्ज है , और तो और जमा  करवाने पर चार्ज है। ऊपर से दुनियाभर की एप है उनके चार्ज अलग से। ये न्यू इंडिया चार्जिज चुकाने में ही खत्म हो जाना है। सुबह पेट्रोल भरवाने जाते है तो वहाँ प्रधानमंत्री जी का अलग सपना बड़े बड़े पोस्टर में झलकता है। आजकल पेट्रोल के रेट पर भी निगाह करना छोड़ दिया है। भाई कहता है कि ज़ीरो देख लो दिल करता है कहने को कि भाई जीरो ही बची हुई है देखने को। सारा दिन उसे ही देखते है। पेट्रोल के दाम बढ़ने पर फेमस जोक भी अब खतरे में है। सौ रूपये का तेल डलवाने वालों को अब डर लगने लगा है कि पता नहीं ऑफिस तक पहुंचे कि नहीं। 


मेट्रो , रेल , पेट्रोल हर कहीं की लूट से कहीं बेहतर है कि जनता से सीधे ही कह दिया जाए कि अपने अपने घरों में रहो। ना कुछ खाओ न कुछ पियो। सब समस्यायेँ कुछ दिनों में दूर हो जानी है।