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Sunday, 4 June 2017

प्रेम कहानी - एंटी रोमियो सक़्वायड CHAPTER -I



सन्डे विजय के लिये पिछले कई सालों से एक परेशानी का कारण रहा है । लखनऊ जब से आया है तब से ये परेशानी और बढ़ गई है  । बाक़ी दिन सारे काम उसके चाहते न चाहते अपने आप हो ही जाते हैं । ऑफिस जाना होता है,तो सुबह उठना पड़ता है । ऑफिस में 8 घण्टे बिताने हैं,तो बॉस की डाँट भी अपने आप सुनी जाती है । छोटी-छोटी बातों और बड़ी-बड़ी ऑफिस पॉलिटिक्स , ऑफिस में काम करती फ़ीमेल इम्पलॉइज़ पर मर्दों की टपकती लार , मज़दूरों का शोषण सब देख सुनकर इग्नोर करना,एक आध सिगरेट ज़्यादा पी लेना,रात को घर आना बियर पीना सो जानासब ऑटोमैटिक होता जाता है। हफ़्ते के साढ़े पाँच दिन उसे ज़्यादा दिक़्क़त नहीं देते पर शनिवार के लंच के बाद का हिस्सा उसका दिमाग़ भारी कर देता है कि कल फिर सन्डे आ रहा है कल का दिन अपने आप नहीं जाएगा । उसे बिताना पड़ेगा । बाक़ि दिन अलार्म लगाकर सोना पड़ता है सन्डे को सुबह 5 बजे अपने आप जाग जाता है जैसे सन्डे ख़ुद एक अलार्म हो । 


सन्डे,सुबह होते ही पूछने लगता है आज क्या करोगे ? सुसाइड कर सकते हो । सन्डे विजय को सुसाइड का कोई दूत लगता है कभी-कभी । सुबह नौ बजे तक विजय अपनी पिछली ज़िन्दगी में मिली असफलताओं के बारे में इतना सोच चुका होता है कि घर से घबराकर बाहर निकलने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं बचता । एक तो नाम घर वालों ने उसका ऐसा रखा कि हर बात पर जीत-हार देखने की उसे आदत लग गई थी और जीत तो उससे हमेशा कोसों दूर रहती थी । 


आज भी सन्डे था और विजय  अख़बार और एक फिक्शन नॉवल के सहारे सन्डे से आर-पार की लड़ाई करने के मूड में बैठा हुआ था । अभी दस बजे थे लिहाज़ा लड़ाई लंबी चलनी थी अभी । नॉवल भी विजय ऐसा लेकर आया था कि उसकी हार तय लग रही थी । नॉवल के हीरो का नाम जीत सिंह था और नॉवल की टैग लाइन थी
"
जो ज़िन्दगी में कभी नहीं जीता उसका नाम उसकी मां ने रखा जीत सिंह " 

घर में रखी दुनिया भर की किताबों में से विजय सन्डे को जीत सिंह सीरीज़ की किताब उठाता है पढ़ने को और सिवाय उस टैग लाइन के कुछ नहीं पढ़ता । अवसाद का अपना रस होता है शायद वो रस विजय को कुछ ज़्यादा पसन्द आ गया था । लेखक ने जीत सिंह का चरित्र ऐसा बनाया हुआ था कि पढ़ने वाले को जीत सिंह से सहानुभूति होती है,दया आती है । पर विजय साहब जीत सिंह से भी कॉम्पीटिशन करते थे और अंत में उससे भी ख़ुद को हारा हुआ घोषित कर देते थे । जीत सिंह के पास एक हुनर तो था वो मशहूर ताला तोड़ था विजय के पास क्या हुनर था ? कुछ भी नहीं । नॉवल के  पोस्टर पर जीत सिंह की एक हाथ में पिस्तौल लिए हुए तस्वीर थी,जो विजय को और जलाती थी विजय के पास तो पिस्तौल उठाने की भी हिम्मत नहीं थी । ख़ुदा की मार जीत सिंह एक बार ख़ुदकुशी की कोशिश भी कर चुका था विजय से वो भी नहीं हुई । कितने रोज़ वो रेल की पटरी के पास घण्टों बैठकर लौटा चुका है । जीत सिंह तो उससे बहुत बेहतर है ।


 नॉवल साइड में रख अख़बार पढ़ना शुरू किया ।अखबार एंटी रोमियो स्क्वाड की ख़बरों से भरा हुआ था । कैसे एक दिन ने प्रेमी युगल की ज़िंदगी बदल दी । विजय सोचने लगा उसकी ज़िंदगी भी तो एक ही दिन में बदल गई थी । एंटी रोमियो स्क्वॉड कितना अच्छा नाम है। विजय फिर सोचने लगा आज के प्रेमी कितने लकी है उनके पास कम से कम दुश्मन का एक नाम तो है और कितना अच्छा नाम है । विजय के लिये तो सारी दुनिया ही एंटी रोमियो स्क्वॉड थी वो भी बिना नाम की । अख़बार से भी दिल भर गया तो कॉफी हाउस में बैठे लोगों को देखने लगा । उसके सामने बैठी लड़की की शक्ल लक्ष्मी से कितनी मिलती है  । 


हर सन्डे उसे कोई न कोई लड़की मिल ही जाती है जिसकी शक्ल लक्ष्मी से मिलती होती है । फिर उसे साल 2010 का वो मनहूस दिन याद आता है किसी 11 मार्च या 16  मई की तरह वो दिन भी विजय को अच्छे से याद था 19 जुलाई जिस दिन वो बेसब्री से लक्ष्मी का इंतज़ार कर रहा था पहली बार उसे ज़िन्दगी में जीत मिली थी जिसे वो लक्ष्मी के साथ दिल खोलकर सेलिब्रेट करना चाहता था । पर वो कहाँ जानता था कि एक जीत के बाद अगली लड़ाई शुरू हो जाती है । यहाँ शायद ज़िंदगी ने उसके साथ नाइंसाफी की कि उसे अपनी ज़िंदगी की पहली और आख़िरी जीत की ख़ुशियाँ मनाने के लिए आधे घण्टे का समय भी नहीं दिया । आधे घण्टे पहले उसने अपना रिज़ल्ट देखा था सीए फाइनल पास करने के लिये जितने नम्बरों की दरकार थी उससे एक नम्बर फ़ालतू लिया था विजय ने । और इस फ़ालतू एक नम्बर पर विजय इतना खुश हुआ था कि सायबर कैफ़े वाले को दो सौ रूपए मिठाई दे के आया था कुल ढाई सौ रूपए उसकी जेब में थे । रूपए तो लक्ष्मी से ले लेगा । अब बस लक्ष्मी के आने का इंतज़ार था उसे गले लगाने का । दुनिया भर की प्लानिंग करने का । लक्ष्मी आयी और आते ही सबसे पहले बिना किसी भूमिका के अपनी शादी पक्की होने की बात बतायी बिलकुल वैसे ही जैसे बिना किसी भूमिका के उसने प्रपोज़ किया था कभी । आधे घण्टे पहले सारी दुनिया जीता हुआ विजय अभी अपनी सारी ज़िंदगी हारकर बैठा था।

1 comment:

  1. बहुत अच्छी शुरुआत..आगे के चैप्टर का इंतज़ार

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