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Friday, 9 June 2017

प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 06






अभी  कॉफी हाउस में बैठा विजय सोच रहा था पार्क में इन बच्चों को पीटने वाले कहाँ जाएंगे जब ये बच्चे अपने माँ-बाप से खुली बग़ावत करके सड़कों पर आ जाएँगे। पुलिस को भले ही अपनी वर्दी का वहम हो पर बच्चों के लिए सबसे बड़ी मोरल पुलिस उनके घरवाले ही हैं जिस दिन उनका डर निकल गया कोई भी एंटी रोमियो स्क्वॉड उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। एक दिन ऐसा आएगा। क्या विजय वो दिन देखने के लिए ज़िंदा है या वो इस बात की सांत्वना में ज़िंदा है कि यहाँ वो अकेला नहीं है जो एंटी रोमियो स्क्वॉड का शिकार हुआ है। इस बात का फ़ैसला विजय नहीं कर पाया है

विजय ने अख़बार हटाकर फिर उस लड़की की तरफ देखना चाहा पर अब वहाँ एक खाली कुर्सी थी। लड़की शायद जा चुकी थी। ठीक ऐसे ही एक दिन लक्ष्मी उसकी ज़िन्दगी से चली गयी थी। उसी दिन जिस दिन वो सीए बना था। जिस दिन उसे सबसे ज़्यादा खुश होना था उसी दिन वो सबसे ज़्यादा दुखी था। बहुत से दोस्तों की नज़र में उसका दुःख फ़िल्मी था। विजय लक्ष्मी से शादी करना चाहता था जो सम्भव नहीं था और ऐसी कोई ख़ास बात भी नहीं थी जिसके दुःख में इतना पागल हुआ जाए। पर ये सारी बातें विजय को समझ नहीं आ रही थी। पिछले एक डेढ़ साल में उसने अपनी ज़िन्दगी लक्ष्मी के आसपास ही समेट ली थी। वो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि एक दिन लक्ष्मी उसकी ज़िन्दगी से इतनी दूर चली जाएगी। उस दिन जब लक्ष्मी ने बताया कि उसके पापा ने उसकी शादी तय कर दी है तो विजय को एक बार के लिए ये बात मज़ाक लगी। मज़ाक में भी ये बात उसे पसंद नहीं आयी।

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यार ऐसे मज़ाक मत किया करो सच हो जाती है कई बार मज़ाक में कही बात। "

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विजय मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ। मैं पापा को तुम्हारे लिए कन्विंस नहीं कर सकी। मेरी सगाई की डेट फिक्स हुई है दो हफ़्ते बाद। "

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तू बंद करेगी ये सब। अभी मेरा मूड नहीं है मज़ाक करने का "

काश विजय देख सकता लक्ष्मी की आँखों के वो आँसू जो निकलने के लिए आतुर थे। पर विजय को दूसरों के आँसू देखने की आदत नहीं थी। उसके पास अपने ही बहुत थे। पानी से भरी उसकी आँखें अब कुछ भी देखने से मना कर रही थी।

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ये क्या लक्ष्मी। तुमने हाँ क्यों की ? तुम ने मेरे बारे में नहीं सोचा। मैं कैसे रहूँगा तुम्हारे बिना। अगर पापा की ही बेटी बनना था तो मुझसे मिलने की क्या ज़रूरत थी ? मेरी ज़िन्दगी ख़राब करने की क्या ज़रूरत थी ? शादी के लिये घरवाले ठीक हैं प्यार के लिए विजय ठीक है। तुम इतने वक़्त से टाइम पास कर रही थी मेरे साथ। "

विजय क्या बोल रहा था क्यों बोल रहा था ये सब उसे ख़ुद भी नहीं पता था। शायद लड़कियों के लिए जो कुछ वो बचपन से सुनता आया था सब बोल गया। इतना सब सुनने के बाद लक्ष्मी के आँसू बिना आए ही सूख गए थे। पर विजय ने बोलना बंद नहीं किया था।

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तुम्हारे पापा तो कम्युनिस्ट है। मेरी बात कराओ उनसे। वो मान जाएँगे। "

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तुम भी तो कामरेड विचारधारा को ही मानते हो अभी तुमने जो कुछ कहा उसे सुनना तुम दोबारा याद करके। पापा भी कामरेड हैं वो अपने बेटी की शादी अपनी जाति के ही लड़के से करना चाहते हैं। मेरे सामने भी एक कामरेड बैठा है जो उस लड़की को पिछले दस मिनट से भला-बुरा कह रहा है जिसके साथ वो सारी ज़िन्दगी बिताने के सपने देखता है। बिना ये ख़याल किए कि उस लड़की ने किस हालात में ये फ़ैसला किया होगा। "मैं " के अलावा तुम्हारी ज़िन्दगी में और कुछ है भी या नहीं ? मेरे पापा ने समाजवाद की हर किताब पढ़ी है। मुझे भी आजादी दी। पर मम्मी को समाजवाद से दूर रखा। शायद मेरी शादी अपनी जाति में कराने के लिए ही। मैं मेरी माँ की आँखों में आँसू नहीं देख सकती बचपन की कमज़ोरी है मेरी। पापा के दोस्तों की महफ़िलों में वेटर की तरह खाना सर्व करती मेरी माँ के पास अगर कुछ है तो मैं हूँ। सुबह 5 बजे से रात दस बजे तक काम करते मैंने देखा है मेरी माँ को। पापा तो बैठक में भाषण देने में मशगूल रहते थे। उन्हें हर आधे घंटे में चाय की दरकार होती थी। सर्वहारा सामंतवाद बुर्जुआ और जाने क्या-क्या जानते थे। दुनिया के हर मेहनतकश की आज़ादी की पैरवी करते थे पर शायद मेरी माँ उन मज़दूरों में नहीं आती थी। मैं पहले दिन से जानती थी पापा हमारी शादी के लिए कभी नहीं मानेंगे। फिर भी मैंने तुमसे प्यार किया क्योंकि तुम्हारी आँखें देख कर मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई। मुझे लगा ये इन्सान भी मेरी तरह दुनिया में अकेला है। शायद मुझे इतने आगे नहीं आना चाहिए था। ग़ुलाम को  अपनी हद का पता होना चाहिए। मुझे ख़ुद कहाँ पता था तुमसे  मिलने के बाद मैं किसी हद में नहीं रहूँगी। टाइमपास शब्द बोलते हुए तुमने एक पल के लिए भी पिछले डेढ़ सालों को याद नहीं किया। तुमसे मिलकर मुझे लगता था मैं दुनिया की सबसे ख़ुशक़िस्मत लड़की हूँ जिसे विजय मिला,जो शायद इस पूरी दुनिया से अलग है जो रिश्तों को पैसे की तराजू पर नहीं तोलता है। पर शायद मैं ग़लत थी तुम में और मेरे पापा में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है। मैं तुम्हारे लिए भी जीत और हार का ही विषय हूँ। आज मेरी शादी किसी और से हो गई तो तुम मुझे हार गए। पता है आज मैं तुम्हारे साथ रोने आयी थी। मुझे लगा था हम मिलकर बहुत रोएँगे । कुछ बोलेंगे नहीं। पर अब मेरी आँखों में आँसू आ ही नहीं रहे। शायद मेरे आँसुओं को भी ख़ुद की कद्र है वो तुम्हारे सामने नहीं निकलना चाहते। तुम्हें अभी बेवफ़ाई वाली शायरी भी करनी होगी मेरी आँखों के आँसू शायद तुम्हारी शायरी में भी खलल डालेंगे। बेवफ़ा कहाँ रोती  है। वो टाइमपास करती है वो तो उस आदमी का सबकुछ लूटकर ले जाती हैं जिसके पास उसका कुछ था ही नहीं। मैं जा रही हूँ। तुम रोओ शायरी करो। पुराने किले की दीवार पर लिख आना "लक्ष्मी भट्टाचार्य बेवफा है "हो सकता है कोई प्रगतिशील नारीवादी लेखक उस दीवार पर लिखे मेरा नाम लिखा देखे और एक नॉवल लिख दे "लक्ष्मी भट्टाचार्य बेवफा नहीं है "। मेरे हक़ में कोई दुआ कर सकते हो तो इतनी करना कि मेरे होने वाला हमसफ़र प्रोग्रेसिव ना हो। "

विजय सब सर झुकाए सुन रहा था। जब उसने सर उठा कर देखा तो लक्ष्मी वहाँ नहीं थी। विजय क्या करे अब ? उसे घर भी जाना था। अपने घर वालों को सीए पास होने की ख़बर भी देनी थी। वो दिन भी सन्डे ही था। उसकी ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल सन्डे। जब सब उसकी सफलता पर ख़ुश थे। बहुत ख़ुश थे। पर वो ख़ुश होना तो दूर की बात है ख़ुश होने का नाटक भी नहीं कर पा रहा था।

1 comment:

  1. विजय और उसका संडे अच्छा लग रहा है,कल संडे को ही ये कहानी पूरी होने वाली है या एक और संडे तक चलेगी।एक बार पूरी हो जाए तो फिर से एक बार एक साथ पढ़ी जाएगी।

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