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Thursday, 8 June 2017

प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 05



विजय अख़बार में एंटी रोमियो स्क्वॉड की खबरें पढ़ रहा था। उसे अचरज था कि भारत जैसे देश में जहाँ इतनी सारी बंदिशे पहले से हैं वहाँ प्यार का इतना खौफ़ है कि पुलिस में अलग डिपार्टमेंट बनाने की नौबत आ गई। बलात्कार , मर्डर , चोरी डकैती को रोकने में असफल पुलिस अब बच्चों को प्यार करने से रोकेगी जो पहले ही घरवालों से छुप-छुप कर मिलते थे। मानसिक और शारीरिक कितनी पाबंदियाँ हैं बच्चों पर उन सब को पार करके जो मिलने के रास्ते ढूँढ लेते हैं उनके लिए पुलिस तैनात कर दी है। विजय सोचने लगा वो और लक्ष्मी तो दिल्ली में रहते थे अपने घर वालों से दूर। दिल्ली में एंटी रोमियो स्क्वॉड भी नहीं था,तो वो कौन सी बंदिश थी जो उन्हें उस दिन पुराना किला जाने से रोक रही थी। 


ग़ज़ब दिन था वो भी। शायद विजय की ज़िन्दगी का सबसे प्यारा दिन। दोनों ने उस दिन ऑफिस और कोचिंग से बंक मारकर दिल्ली घूमने का निर्णय ले लिया था। सुबह 7 बजे वो सीपी से निकल तो लिए थे पर सवाल था जाएँ कहाँ। दिल्ली घूमने में दोनों का इंटरेस्ट नहीं था। दोनों किसी पार्क में ऐसी जगह जाना चाहते थे जहाँ कोई उन्हें न देख सके। पर ऐसी जगह जाने की बात कहेगा कौन ये मसला पेचीदा था। दोनों बिना कहे पुराना किला जाने वाली बस में बैठ गए। विजय की ख़्वाहिश थी ऐसी जगह पर वो सारा दिन बिता दे जहाँ उन्हें कोई न देख सके। वो लक्ष्मी के गले लगकर रो सके। सारा दिन एक दूसरे के पास।  किसी भी प्रेमी युगल की शायद ये सबसे बड़ी चाहत होगी। पर समाज को उनकी ये ख़्वाहिश हमेशा नाक़ाबिले बर्दाश्त रही है। बाक़ी चाहने वालों की तरह  दुनिया भर के आदर्श , आत्मग्लानि उनके पाँव की भी बेड़ियाँ बने हुए थे। वो दोनों जानते थे कि ऐसी जगह पर बैठने वालों को समाज,ये दुनिया क्या कहती है कैसी नज़र से देखती है। अगर किसी ने देख लिया तो ? विजय अपने पापा के पैसे से दिल्ली पढ़ने आया है। क्या उसे प्यार करने की अनुमति है ? लक्ष्मी तो साथ में लड़की भी है। उसके पापा ने दिल्ली भेजा है। वो क्या कर रही है पुराना किला में। जाने उनके मन में ऐसे कितने एंटी रोमियो स्क्वॉड थे जो उनके क़दम रोकने की भरपूर कोशिश कर रहे थे। विजय और लक्ष्मी ने पुराने किले के गेट पहुँचने तक एक दूसरे से नज़र नहीं मिलायी थी। गेट तक पहुँचते-पहुँचते उनकी हिम्मत जवाब दे गई थी। एंटी रोमियो स्क्वॉड जीत गया था। वो दोनों गेट से ही वापिस हो चुके थे। प्यार में डर और बगावत के ख़याल साथ-साथ चलते हैं। जब तक वो वापिस बस स्टैंड पर आते हल्की-हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। लक्ष्मी बोली - चल पैदल चलते हैं थोड़ी दूर। और बिना जवाब सुने विजय को जबरन धकेलते हुए इंडिया गेट की ओर ले गई। बारिश तेज़ शुरू हो चुकी थी लक्ष्मी और विजय एक दूसरे से बिलकुल चिपके हुए भीगे जा रहे थे। कितनी कमाल की बात थी,वो दोनों थोड़ी देर पहले ही पार्क के किसी कोने में जाने से डर रहे थे कि कोई देख न ले और अब सरे राह सारी दुनिया को चुनौती देते हुई बेफ़िक्र भीग रहे थे। उनके मन के सारे एंटी रोमियो स्क्वॉड के पुलिसवाले कहीं कोने में छुप गए थे,इंडिया गेट आते-आते दोनों पूरी तरह से भीग चुके थे। इंडिया गेट के बेंच पर पूरी दुनिया से बेफ़िक्र वो वैसे ही एक दूसरे से सटे हुए बैठे थे जिसकी तमन्ना वो पुराने किले के किसी कोने में कर रहे थे और जिसे वो किसी के देखने के डर से रिजेक्ट कर चुके थे। उस बारिश में भीगने के बाद विजय को समझ आ गया था कि उनके घर में हर रोज़ चिकन बनेगा। लक्ष्मी के साथ रहने के लिए खाना तो बहुत छोटी बात थी। वो मम्मी को मना लेगा। उसके हाथों में उसे सारी दुनिया दिखाई देनी लगी थी। उसे लगा केदारनाथ अग्रवाल ने ये लाइन उसी के लिए लिखी है 

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.


बाकी सारा दिन इंडिया गेट पर बिताने के बाद अलग होना कितना मुश्किल काम था जबकि सुबह उन्हें फिर मिलना था। किसी से ऐसे ज़िन्दगी भर के लिए जुदा होना पड़े तो ? ये सोच कर ही विजय को कंपकंपी आ जाती थी। नहीं मैं लक्ष्मी के बिना नहीं रह पाऊँगा।रहना ही नहीं है। जनकपुर मेट्रो स्टेशन पर लक्ष्मी को छोड़कर विजय वापिस करोल बाग़  के लिए मेट्रो पकड़ रहा था। FM पर शहरयार की ग़ज़ल आ रही थी


हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है

अब तो हर बार यही बात सताती है हमें।


कैसे कोई विजय के मन की हर बात काग़ज़ पर लिख गया है ये सोच कर विजय बहुत हैरान होता था। ये बात किस कदर उसे सताती थी इसको वो शायद किसी  को बता भी नहीं सकता था। ये प्यार था। विजय को अहसास नहीं था कि ये अहसास कितना क़ीमती होता है।

1 comment:

  1. अक्सर ऐसा लगता है जैसे कोई हमारे एहसास बहुत अच्छी तरह से पहले ही लिख गया है,वो लाइन पढ़कर ऐसी कई घटनाएँ याद आयीं जब ऐसा लगा है।

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