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Wednesday, 7 June 2017

प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 04




हर सन्डे विजय किसी लड़की के चेहरे में लक्ष्मी ढूँढने की कोशिश करता और दोपहर तक लक्ष्मी से जुड़ी सारी यादों को मन ही मन दोहरा लेता । जब वो लक्ष्मी के साथ होता था तो सब बहुत नॉर्मल लगता था आसान लगता था । लक्ष्मी के साथ शादी जैसे सबसे आसान काम था दोनों एक दूसरे को पसन्द करते थे । बंगाल हरियाणा से क्या फ़र्क़ पड़ता है जाति से भी क्या फ़र्क़ पड़ता है । दोनों सीए पास करके दिल्ली में ऑफिस खोलेंगे अपना ख़ुद का । साथ ही काम करेंगे साथ ही ऑफिस आया-जाया करेंगे। दोनों के माँ-बाप को साथ रखेंगे । बुढ़ापे तक की सब प्लानिंग कर ली थी पर मामला सारा खाने पर अटक गया था। 


कॉफी हाउस में खाना खाते खाते हुई बहस ने एक गंभीर मुकद्दमा खड़ा कर दिया था जो एक हफ़्ते में जाकर सॉल्व हुआ।
लक्ष्मी ने खाना खाते हुए कहा," दिल्ली में रहने का सबसे बड़ा नुकसान है मैं मछली मिस करती हूँ कलकत्ते की  "
विजय ने हँसते हुए कहा ," हमारे घर नॉन वेज नहीं बनता"
लक्ष्मी ने कहा ,"मैं बना कर खिलाऊंगी तुम्हे चिकन मटन मस्त देखना तुम "
"
पर हमारे घर नॉन वेज नहीं बनता । मम्मी बनाने नहीं देगी । मैं तुम्हें बाहर खिला लाया करूँगा "
"
मेरे खाने से तुम्हारे घरवालों को क्या दिक़्क़त है । उनके लिये सब्ज़ी भी बनाएंगे डरो मत " लक्ष्मी फिर हँसी
"
अगर घर में नॉन वेज बना तो मम्मी साथ नहीं रहेगी "
"
सीरियस्ली ? खाना इतना बड़ा इशू है ? कैसे बनेगी बात । मैं बिना नॉन वेज नहीं रह सकती । और बिना किसी कारण तो बिलकुल नहीं "
"
तुम तो ब्राह्मण हो ना "
लक्ष्मी फिर जोर से हँसी ," अरे हम आदमी खाने वाले ब्राह्मण हैं,नॉन वेज से ही काम चला लेते हैं "
विजय ने बहुत हल्की आवाज़ में पूछा ," तुम मेरे लिये नॉन वेज नहीं छोड़ सकती "
लक्ष्मी ने जल्दी से बात को सीरियस लेना नहीं सीखा था ," बिलकुल नहीं तुम्हें मैं कितने दिन खाऊँगी । उसके बाद फिर नॉन वेज शुरू करना पड़ेगा "
बसे बसाए सपनों के महल की नींव खाने के सवाल ने हिला दी थी। विजय ने बात टालने की कोशिश की
"
बाद की बाद में देखेंगे "
"
मैं तुमसे अपने खाने के लिये तुम्हारे माँ-बाप को छोड़ने के लिए नहीं कहूँगी क्योंकि दोनों की कोई तुलना ही नहीं है । तुम्हारे लिए खाना छोड़ने की बात बेवकूफ़ी की बात है दोबारा मत कहना । जब तुम्हारे घरवाले मुझे अपनाएँगे तो मेरा खाना भी अपना लेंगे । चिंता ना करो तुम "

ये बात इतने आत्मविश्वास से लक्ष्मी ने कही कि और कोई बात कहने की विजय की हिम्मत नहीं हुई ।
यादों से तंग आकर विजय ने अख़बार पढ़ना चाहा । पहले ही पेज पर बीफ़ खाने के शक में एक आदमी के मारे जाने की ख़बर थी । नई सरकार ने अवैध मीट की दुकान बंद करने के आदेश दिए हैं । बूचड़खाने बन्द हो रहे हैं । मानवीयता के नाम पर आदमी के मुँह से खाना छीना जा रहा है । विजय एक बार सोचने को मजबूर हो गया सभ्यता से अश्लील शब्द और कोई है क्या ? कोई इंसान खाना खाता बर्दाश्त नहीं होता प्यार करता बर्दाश्त नहीं होता। और ये लोग अपने को सबसे संवेदनशील कौम होने का दावा करते है । विजय का सर दर्द से फटा जा रहा था तभी उसकी नज़र फिर उस लड़की पर गई जो बिलकुल लक्ष्मी की तरह हँस रही थी पर उसके साथ लड़का कोई और था। 6 साल बाद भी विजय इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि कोई लक्ष्मी जैसी दिखने वाली लड़की किसी लड़के से हँस कर बात करे। ये कैसा प्यार था कैसा जाल था जिसमें विजय फँस गया था और बाहर निकलना भी नहीं चाह रहा था।

1 comment:

  1. विजय की कहानी दिलचस्प होती जा रही है

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