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Monday, 5 June 2017

प्रेम कहानी - एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 02



विजय का सर अभी से भारी हो चुका था । उसने अख़बार हटाकर नॉवल में दिल लगाने की कोशिश की । जीत सिंह जो कभी नहीं जीता वो जीत सिंह । तालातोड़ । प्यार के हाथों मज़बूर । लड़की की बेवफ़ाई का मारा । अगर लड़की बेवफ़ाई नहीं करती तो कितने नायकों से महरूम रह जाता हिंदुस्तान । जीत सिंह में कुछ ख़ास बात थी जो विजय को खींचती थी । शायद यही कि वो भी विजय की तरह कुछ नहीं जीता था पर जीत सिंह को ताले तोड़ने आते थे विजय को क्या आता था नॉवल ने विजय को मुंबई याद दिला दिया । जिस को अवसाद में ही रहना हो उसे कुछ न कुछ याद आ ही जाता है । 


लक्ष्मी से अलगाव के बाद दिल्ली काटने को दौडती थी। दिल्ली से खफा हो कर मुंबई पहुँचा था विजय।जहाँ उसने ज़िन्दगी के अगले चार साल बिताए । ज़िन्दगी के सबसे नीरस चार साल । ज़िन्दगी के सबसे तनहा सन्डे। मुंबई को सब सपनों का शहर कहते हैं वो शहर विजय के लिए कंक्रीट का शहर था जहाँ सिर्फ़ मशीन थी हर जगह मशीन । विजय शायद अपनी सारी ज़िंदगी मुंबई में काट देता अगर नेहा उसके ऑफिस में उसकी जूनियर बनकर नहीं आई होती । साढ़े तीन साल काम करने के बाद विजय को एक असिस्टेंट नसीब हुई  । नेहा उससे 12 साल छोटी थी पर नेहा को देख विजय को अपनी बड़ी बहन याद आती थी । जिस शहर में साढ़े तीन साल विजय का कोई दोस्त नहीं बना था , नेहा से ऑफिस आने के पहले एक घण्टे में ही उसकी ऐसी दोस्ती हो गई मानो बचपन से साथ रहते हों ।एक डेढ़ हफ़्ते में ही नेहा और विजय में ऐसी बॉन्डिंग हो गई थी जो सगे भाई-बहनों में भी कम देखने को मिलती है । विजय को बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। आँखों के इशारे से फ़ाइल उसकी मेज पर होती थी । साढ़े तीन साल का तनहापन एक झटके में ख़त्म हो गया था । विजय फिर से गाने सुनने लगा था । गाने गाने लगा था । विजय और नेहा भी सारी बातें गूगल चैट पर करते थे। उन्हें लगता था कि उन दोनों के सिवाय ऑफिस में कोई नहीं था । एक और एक ग्यारह होते हैं ये सुना था पहले । अब देख लिया था । ऑफिस का सारा काम वो दोनों एक घण्टे में खत्म कर देते थे फिर  गूगल पर चैट शुरू हो जाती थी

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विजय सर वो ठरकी गोपाल फिर मेरे को घूर रहा है ।
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अरे इग्नोर कर । ऑफिस में इन्हें इग्नोर नहीं करेगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा । वैसे भी ये बीमार लोग हैं और हम डॉक्टर थोड़े ही हैं । और हाँ तू चैट पर मुझे सर मत कहा कर भाई बोला कर। 

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भाई तो मुंबई में गुंडों को बोलते है विजय सर "

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मैं मुंबई से नहीं हूँ हरियाणा में भाई भाई को ही बोलते है।
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फिर तो मैं आपको तुम भी बोल सकती हूँ । तुम सच के भाई बनके इन ऑफिस के सब गुंडों की पिटाई नहीं कर सकते । कई बार तो दिल करता है इन सब की आँखे फोड़ दूँ । "

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तू फिर वही शुरू हो गई । इग्नोर कर सबको । अपने योगेश सर अच्छे है और क्या चाहिए अपनी रिपोर्टिंग उन्हीं को है । बाक़ियों से क्या लेना है "

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भाई तुम कहाँ इस ऑफिस ऑफिस के चक्कर में पड़ गए तुम्हारे बस की बात नहीं है । कितनी पॉलिटिक्स करते हैं ये लोग तुझे पता भी है । पानी पिलाने वाले से लेकर इस गोपाल तक सब अपने बारे में अफ़वाह उड़ाते हैं "

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 नेहा ये बीमार लोग और कर क्या सकते हैं । ज़िन्दगी में कभी प्यार नहीं किया । बहन के पास दस मिनट बैठे नहीं । इनकी ज़िन्दगी में अफ़वाह के सिवा है भी क्या ? तुम भगवान् यीशु की तरह सबको माफ़ करो,ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं "

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काहे की माफ़ी..तुम जानते नहीं  हो,ये सब श्याणे लोग हैं..एेड़ा बन के पेड़ा खाते हैं। और इस गोपाल के तो मैं कान के नीचे रैपटा बजा के जाऊंगी"

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अच्छा छोड़ ये बता खाने में क्या लायी है "

नेहा विजय का भी खाना लेकर आती थी लंच में सारा स्टॉफ अलग खाना खाते थे नेहा विजय अलग खाते थे विजय को अभी समूह की नेगेटिविटी का असर पता नहीं था। उसे ये भी नहीं पता था सारा स्टॉफ खाना खाते वक़्त क्या बात करता था । वो दोनों खाना खाने के बाद फिर चैट पर लग जाते थे।

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विजय भाई कल सन्डे है । सन्डे का क्या सीन होता है तुम्हारा"

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ये मत पूछो मुझे सन्डे से डर लगता है । "

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अरे सन्डे तो मस्त होता है सन्डे में डरने वाली क्या बात है। अपन फिल्म देख कर आयें कल पीके लगी है। भगवानों की बुराई की हुई है तुमको पसन्द आएगी फ़िल्म  "

फ़िल्म आख़िरी कब देखी थी ? लक्ष्मी के साथ देखी थी लव आजकल । जिस फ़िल्म के बाद विजय को और यकीन हो गया था कि उसकी और लक्ष्मी की शादी होना अब महज़ वक़्त की बात है

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मैं फ़िल्म नहीं देखता । तीन घण्टे कौन अँधेरे में रहे "

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मैं देखती हूँ दो टिकट ली मैंने । अपन चलेंगे कल बरोबर। तुम बांद्रा स्टेशन पर मिलना 11 बजेऔर ये अपुन का ऑर्डर है "

विजय की बड़ी बहन भी उसे ऐसे ही ऑर्डर देती थी। उसके बाद किसी अगर मगर की गुंजाइश नहीं रहती थी।

लक्ष्मी जब उसे छोड़कर गई थी उसके बाद ये पहला सन्डे था जब विजय बहुत खुश था । और खुश होना विजय की ज़िंदगी में कभी शुभ संकेत नहीं रहा । वो और नेहा फ़िल्म देखकर जुहू बीच गए । बच्चों के साथ खेला। खूब दिल खोलकर हँसे । चार सालों में पहली बार विजय चैन की नींद सोया उसे क्या पता था ये मुंबई में उसकी आख़िरी रात थी।

अगली सुबह योगेश सर ने नेहा को अपने केबिन में बुलाया। आधे घण्टे बाद जब नेहा बाहर आई तो उसका मुँह उतरा हुआ था । योगेश सर नॉर्मली डाँटते नहीं हैं । विजय सोचने लगा ऐसी क्या ग़लती हुई होगी । नेहा अपनी सीट पर आकर बैठ गई । एक मिनट बाद गूगल चैट पर मैसेज आया

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कल योगेश सर भी उसी हॉल में फ़िल्म देख रहे थे "
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अच्छा हमें तो नहीं दिखे । हमें बोला क्यों नहीं उन्होंने "
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योगेश कह रहा है सारे ऑफिस में चर्चा है कि हम दोनों का अफ़ेयर है "
इतनी तल्ख़ लहजे में तो नेहा कभी गिरधारी के लिये भी बात नहीं करती है । विजय को समझ नहीं आया क्या रिप्लाई दे। उसके बिना रिप्लाई दिए ही नेहा टाइप किए जा रही थी
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वो कह रहा था विजय की लाइफ़ तो पहले ही बर्बाद है मुझे तुम्हारी चिंता है । तुम उसके झाँसे में मत आओ । फिर ऑफिस में रिश्ते नहीं बनाने चाहिए। काम पर असर पड़ता है । ऑफिस का इन्वायरमेंट ख़राब होता है । "

आगे विजय पढ़ नहीं पाया।वो वहां से सीधा वॉशरूम गया और रोने लगा वो चिल्लाना चाहता था पर गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी । उसके पास उस दिन डायनामाइट होता तो सारे ऑफिस को जला दिया होता। उसे अफ़सोस हो रहा था उसके पास पिस्तौल क्यों नहीं है । जब रोने से उकता गया तो वापिस आया एक पेपर पर एक शब्द लिखा और वो योगेश सर को दे आया । वो शायद अब तक का सबसे छोटा रिज़ाइनिंग लैटर होगा । उस पर सिर्फ़ एक ही शब्द लिखा था

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रिज़ाइन"

अगले एक घण्टे में विजय लखनऊ जाने वाली ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठा था पहले प्लेटफॉर्म पर वही ट्रेन थी।

नेहा को याद करके विजय का सर और ज़्यादा भारी हो गया था। एंटी रोमियो स्क्वॉड वाले देश में भाई-बहन को साथ घूमने की इजाज़त थी क्या ? ऑफिस,घर,सिनेमा हर जगह इतने सारे एंटी रोमियो एंटी ब्रदर स्क्वॉड कब से घूम रहे थे ये अलग से भी बनाने की ज़रूरत पड़ गई ।क्या होगा अगर एक भाई-बहन पार्क में बैठकर आइसक्रीम खा रहे हों। या सिनेमाहॉल में फ़िल्म देख रहे हों शायद आधार कार्ड दिखाना पड़े। अगर बाप का नाम सेम है तो शायद बच जाएँ वरना कोई सूरत नहीं है । मेज पर कोई गीता प्रेस की किताब छोड़ गया था जो पन्ना खुला हुआ था उस पर लिखा था
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लड़की को अपने भाई-पिता के साथ भी अकेले नहीं बैठना चाहिए । अकेले में बड़े-बड़े ऋषि मुनियों का तप भंग हो जाता है "

सामने टीवी चल रहा था राजकपूर की फ़िल्म आ रही थी ज़ी क्लासिक पर
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जिस देश में गंगा बहती है "



नेहा से बिछड़ने का सदमा विजय को लक्ष्मी से भी ज़्यादा लगा था । उसके बाद उसने अपनी जिंदगी के सारे दरवाज़े बाहर वालों के लिए बंद कर दिए थे

1 comment:

  1. कहानी का पहला भाग जितना रोचक था,दूसरा उससे ज़्यादा ट्विस्ट वाला है..अब तीसरे भाग का इंतज़ार है।

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