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Wednesday, 7 June 2017

मार्क्सवाद , कटटरवाद और पांडेवाद



अज्ञानता के अपने सुख दुःख है। गूगल सर्च किया तो पता लगा मैनेजर पांडे जी तो हिंदी के बहुत बड़े विद्वान् है। पांच से किताब आ चुकी है। हिंदी के आलोचक है मतलब हिंदी किताबो के समीक्षक है। उम्रदराज है। सुना है सारी उम्र मार्क्स की समीक्षा करते हुए गुजारी है। खैर मैंने प्रण लिया है अगले तीन महीने तक 50 से ऊपर के लोगो का दिल नहीं दुखाऊंगा। मैनेजर पाण्डे पर बात नहीं करते है। उसके बहुत से कारण है एक तो ये है मैंने हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा हुआ दूसरा मैंने कार्ल मार्क्स भी ज्यादा नहीं पढ़ा हुआ। पहले भी बताया है बिना ज्यादा पढ़े बोलने से लोग बीजेपी का नेता समझने लगते है। मैनेजर पांडे जी को जाने देते है परसाई को याद करते है। परसाई ने संस्कारो और शास्त्रों की लड़ाई में लिखा है वो पढ़ते है

"मेरे एक और दोस्त है। मुझसे ज्यादा वैज्ञानिक दॄष्टि  संपन्न , विचार और कर्म दोनों से क्रन्तिकारी है। मैं ही उनसे ज्ञान और प्रेरणा लेता रहा हूँ। एक दिन मैंने उन्हें धोती पहने , पालथी मारे सत्यनारायण की कथा पर बैठे , रंगे हाथो पकड़ लिया।
मुझे लगा , जैसे एम्बुलेंस की गाडी ने ही मुझे कुचल दिया हो।
मैंने दूसरे दिन उनसे पूछा ," झूठ नारायण , यह तुम्हारी हरकत है ? उसने कहा , " यार 'मदर इन लॉ ' ने बहुत ज़ोर डाला था। "
खैर परसाई जी को भी जाने देते है। पाण्डे जी को भी जाने देते है। मुझे दो  बातें कहनी थी। दोनों ही ऐसी नॉर्मल बातें है कि कहते हुए भी संकोच हो रहा है पर कहनी जरुरी है। 

पहली बात डेमोक्रेसी के लिए। अधिकतर दोस्त डेमोक्रेसी का मतलब जानते है मैं उनके लिए बोलना चाहता हूँ जिन्हे थोड़ा बहुत असमंजस है। ख़ास कर उन लोगो के लिए जो नए नए पेरेंट्स बने है। पुराने वाले भी पढ़ ले तो हर्ज नहीं है। डेमोक्रेसी के कॉन्सेप्ट में ज्यादा उलझन नहीं है। आप वहाँ तक हाथ हिला सकते हो जहाँ तक किसी का गाल न आ जाए। घर बाहर डेमोक्रेसी का यही नियम है। आप पूजा करना चाहते है दूसरा बन्दा सोना चाहता है दोनों काम साथ साथ हो सकते है। आपकी भावना का ख्याल आप रखो। दूसरे की भावना का ख्याल रखना डेमोक्रेसी में नहीं आता। भारत के घर हद से ज्यादा तानाशाही होते है। थोड़ा सा डेमोक्रेसी की तरफ जाइये सबको रिलीज मिलेगा। साथ रहना और साथ डेमोक्रेसी के साथ रहना दो अलग बातें है। दूसरी बात बहुत खूबसूरत है। 


दूसरी बात मार्क्सवाद के लचीलेपन के लिए। जहाँ तहाँ  कमेंट आता है कि मार्क्सवाद फेल है क्योंकि इसमें लचीलापन नहीं है। शुद्धतावादी अप्रोच नहीं चलती। 24 कैरेट का कुछ नहीं होता।  ज़िन्दगी में बहुत से काम करने पड़ते है। किताबों से ज़िन्दगी नहीं चलती। एक कमाल बात बताऊ  मार्क्स वाद को हमने अपनाया ही नहीं है ऊपर कमीज या साडी की तरह पहना हुआ है। मैं आपको बताता हूँ क्या चीज है जो बिना लचीले हुए खूब चल रही है। खाना। शाकाहारी खाने वालो के लिए कभी ये कहते सुना है कि ये शुद्धतावादी है। चल नहीं पायेंगे। ऐसा क्या कि बीफ नहीं ही खाना। पार्टी में गए है तो खा लिया क्या हो गया ? पर क्या कभी किसी शाकाहारी को मीट खाते देखा है ? क्या किसी उदार हिन्दू को बीफ खाते देखा है ? नहीं देखा होगा पर एक मार्क्सवादी पंडित को पूजा करते देख सकते है। फेरे लेते देख सकते है। सत्य नारायण की कथा बांचते देख सकते है। एक साइंटिस्ट को सूरज को पानी पिलाते देख सकते है। और बात करते है शुद्धता वाद का। 

कपडे। क्या किसी मुस्लिम या उदार हिन्दू घर में कभी निक्कर ब्रा में लड़की घूमते देख सकते है ? कभी ये कहते सुना है ये तो कटटरता है हर वक्त पूरे कपडे , बुरका। ये शुद्धतावाद कही चलता है पर कपड़ो में कटटरता चल रही है। धड्ड्ले से चल रही है। बिना नागा सारी ज़िन्दगी गुजार देते है। मजाल है किसी की रिक्वेस्ट पर हम नंगे हो जाए। पर रिक्वेस्ट करने पर हम पूजा कर सकते है क्योंकि दुनिया में सारे काम करने पड़ते है। 

और सुनिए सेक्स। सेक्स का जो बंधा ढांचा है। क्या हम तोड़ते है ? सेक्स का नियम कोई कुदरत ने नहीं बनाया। कानून कहता है दो इंसान सहमति से सेक्स कर सकते है पर क्या हम करते है ? 

आप कहोगे कि क्या बकवास कर रहे हो। बकवास नहीं है भाई जो नियम ब्राह्मणवाद के बनाये है पूंजीवाद के बनाये है वो हम अक्षरश पालन करते है ज़िन्दगी भर। एक इंच नहीं हिलते। बहुत सी लड़कियों ने  तो नहाते वक्त भी अपना पूरा शरीर नहीं देखा होगा। 

पर मार्क्सवाद की बात आती है तो लचीलेपन की मांग होती है। विज्ञान की बात आती है तो "कुछ तो है" की बात होती है। बात पता है क्या है। बात नीयत की है आपकी और हमारी नीयत में खोट है। और पता है क्यों खोट है ? क्योंकि हम जहाँ है वहाँ हमें ज्यादा तकलीफ नहीं है। बल्कि मजे में है। ब्राह्मणवाद या मर्दवाद को हम उतना ही कोसते है जितने में हमें दिक्कत न आये। जो दुखी है , पीड़ित है उन्हें पता ही नहीं है। मार्क्सवाद फेल नहीं है भाई। फेल मैनेजर पांडे है। फेल आप और हम हैं और हम  लोग प्रगतिशीलता का झंडा उठाये है उससे कहीं बेहतर है हम गौ माता को बचाने का झंडा उठा ले क्योंकि हम वही हैं। आत्मा वही है कपडे नारीवाद , मार्क्सवाद , और जाने कितने वादों के ओढ़े हुए है हर रोज बदलते रहते है। आखिर में मैं  सौ बातो की एक बात कहता हूँ 

भारत में गर रहना होगा 
जय माता दी कहना होगा। 

कसम राम की खायेंगे 
मंदिर वही मनायेंगे। 

जिसको कसम खाने में दिक्कत आ रही हो वो गोली भी खा सकता है।




1 comment:

  1. अपनी सुविधा के हिसाब से सारे वाद,सारे धर्म बदलते देखे हैं,बिलकुल सही बात कही आपने।गर ख़ुद को कोई काम अच्छा लग रहा हो तो वो ज़रूर किसी ना किसी बहाने लाया अपना लिया जाता है और जो पसंद ना आए उसके लिए दुहाई देने को धर्म,आस्था,रीति-रिवाज जैसी कई चीज़ें हैं

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