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Tuesday, 6 June 2017

हलवा बनाने में इस्तेमाल होने वाली सूजी को गाली बनाने वाले लोग कौन है

                                                                 
अख़बार का आखिरी पन्ना सबसे सही होता है अख़बार पढ़ना शुरू करने के लिए। आखिरी पन्ने पर खबर थी NDTV के सर्वेसर्वा प्रणव राय के घर सीबीआई रेड की। प्रणव राय इंग्लैण्ड से चार्टर्ड अकाउंटेंसी का कोर्स किये है। पत्रकार भी है। मामला पढ़ा तो अजीब सा था। एक प्रायवेट बैंक से कुछ मामला चल रहा था। सीबीआई ने रेड डाल दी। कुछ दिन पहले NDTV की एक संवाददाता ने बीजेपी के एक नेता को अपने शो से बाहर कर दिया था। सीबीआई रेड को सब उससे जोड़कर देख रहे है। फिलहाल उस पर मेरा अलग से पोस्ट करने का मन है। यहाँ मसला जरा दूसरा है।

रविश कुमार ने अभी अभी फेसबुक पर दोबारा एंट्री ली है। इस बार पेज बनाकर। पेज पर उन्होंने अपने इनबॉक्स के दो स्क्रीन शॉट डाले हुए थे जिसमें एक बीजेपी समर्थक ने दो बातें पूछी हुई थी दोनों अश्लील थी। पहली उन्होंने पूछी थी कि सूजी है ? दूसरी बात पहली की डिटेल व्याख्या थी। रविश कुमार ने उस आदमी की भाषा पर सवाल उठाते हुए पोस्ट डाली थी। मुझे गालियों पर रविश कुमार का स्टैंड पसंद है। खासकर जब खुद को दी हुई हो। मैं बिलकुल इस बात के समर्थन  में हूँ कि कोई भी सोशल मिडिया जैसे पब्लिक प्लेस में ग़लत भाषा का प्रयोग करे उसे न केवल सख्ती से टोकना चाहिए बल्कि उसके आसपास उसके दोस्तों को भी बताना चाहिए कि देखिये ये क्या बोल रहा है। पर अफ़सोस सभी ऐसा नहीं सोचते। मुझे कुछ बातें याद आ रही है।

"सूजी है " शब्द मैंने पहली बार फेसबुक पर संघियो या बीजेपी समर्थको के मुंह से नहीं सुना। मैंने अपने दोस्तों के मुंह से सुना। जब रविश ने "बागो में बहार है " प्रोग्राम दिया। अगल दिन मेरे समेत बहुत दोस्तों ने इस प्रोग्राम की तारीफ की। उनमें से अधिकतर ने बीजेपी समर्थित लोगो से मजाक के लहजे में  पब्लिक पोस्ट पर  पूछा था

"सूजी है ?"

मैं इस मुहावरे की डिटेल में नहीं जाऊंगा। मुझे डिटेल पता है जिनको नहीं पता वो रविश की पोस्ट  पढ़ ले। उसकी डिटेल बिलकुल वही है जो उस भाई ने एक्सप्लेन की।  अब रविश की पोस्ट के बाद जिस जिस दोस्त ने ये  मुहावरा इस्तेमाल किया है उसे सोचने की जरूरत है। बिलकुल संभव है कभी मैंने ही पोस्ट कर दिया हो।

सवाल मेरा एक महीने पहले भी यही था अब भी यही है जिस आक्रामकता के साथ हम बीजेपी समर्थको के अपशब्दों का विरोध करते है क्या वो आक्रमकता अपने दोस्तों , अपने आसपास के लिए रहती है।  वहाँ सबूतों की जरूरत होती है। वहाँ गालियों का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आधार मिल जाता है। जिसको हम नहीं जानते उसको थू थू करना कितना आसान है। ग़लत को ग़लत , सही को सही कहना कितना मुश्किल है ? हमने कोई रॉकेट साइंस की बात नहीं की थी।  बहुत सीधी सी बात थी एक ऐसे आदमी जिसको बोलने के लिए ndtv का प्लेटफॉर्म तक मिल चुका था। दिलीप मंडल से लेकर बाकी तमाम बड़े बड़े प्रगतिशील लोग जिसके  दोस्त थे। एक ऐसे आदमी के बारे में इतना ही पूछा था कि इस आदमी की इतनी हिम्मत कैसे है कि वो सबके सामने किसी औरत को गालियाँ दे सकता है। किसी को चप्पल से पीटने की बात कर सकता है। क्या इतने बड़े लोगो की पास की नजरें ख़राब है ? वो पोस्ट वो घटना जो शीशे की तरह साफ़ मामला था। बुद्धिजीवी दोस्तों ने अपने तर्कों से घुमा घुमा कर इतना जलेबी कर दिया कि आखिर तक आते आते मैं खुद ही अपराध बोध से ग्रसित हो गया। ब्लॉक करने की सलाह से लेकर इग्नोर करने की सलाह तक , फ़िज़ूल के मुद्दे में उलझने से लेकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान की सलाह तक और आखिरी वाली " लड़की की ग़लती है " टाइप सलाह तक देने वालो दोस्तों से सिम्पल सा स्टैंड नहीं लिया गया। परेश रावल ने अरुंधति के लिए एक ट्वीट किया। उस पर बीस स्टेटस महत्वपूर्ण मुद्दा है। एक लड़की की पिटाई की धमकी फ़िज़ूल की बहस है जबकि वो बहस थी ही नहीं। मोदी ट्रम्प  पर लिखने वालो से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनके ऐसे दोस्त क्यों है। रविश कुमार जी को गालियों पर पंकज मिश्रा जी की वो पोस्ट पढ़नी चाहिए जिसमें पाद और गालियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। फिर शायद उन्हें गालियाँ इतनी बुरी ना लगे।

 मेरा भले ही इस मुद्दे पर बहुत मजाक उड़ा हो मेरा अब भी मानना है नारी विरोधी और दलित विरोधी गालियों के लिए स्पेस नहीं होना चाहिए। ये मामला पाद जैसा सरल नहीं है। हमें एक दूसरे को टोकना चाहिए। जो गाली देता हो उसके दोस्तों को भी टोकना चाहिए। सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। जो बड़ी बड़ी लड़ाइयों के अगुवाई कर रहे है उनकी जिम्मेदारी ज्यादा है। टोकने पर बुरा नहीं मानना चाहिए। और अपने आस पास कोई क्रिमिनल माइंड का आदमी है तो उससे दूर होना चाहिए। बाकी तर्को का ऐसा है ये सब तर्क सबके पास है और गिनती के ही है।



6 comments:

  1. सहमत...मेरा अब भी कहना है कि रवीश का जवाब भी बेहूदा ही था

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  3. बढ़िया लिखा आपने। हालांकि इस मसले पर रवीश प्रकरण मुझे नहीं पता है।

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  4. एक अच्छी तरह से कही हुई बात,इग्नोर करने,अनफ़्रेंड करने की सलाह देने वालों की भी कोई तो सोच होती होगी।वैसे गालियाँ गालियाँ ही हैं चाहे किसी को भी दी जाए और किसी भी तरह दी जाए,स्टैंड लेने वालों को हार जगह एक ही तरह का नज़रिया रखना चाहिए ये बात सही है

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