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Friday, 2 June 2017

सॉरी



एक प्रेम कहानी में एक लड़का होता है एक लड़की होती है। कभी दोनों हँसते है कभी दोनों रोते है। आनंद बख़्शी का लिखा हुआ ये टायटल ट्रैक फिल्म प्रेम कहानी का है। प्रेम कहानियों का सार इन दो लाइनों में कवि ने बता दिया है। प्रेम कहानी लिखनी हो तो इन दो लाइनों को ध्यान में रखकर बनाई जा सकती है। लेखक के पास भी कल्पना सागर से उठाई हुई एक कहानी है जिसमें एक लड़का है एक लड़की है और प्यार भी है। अमरीश पूरी ने एक फिल्म में इसी गीत को गुनगुनाते हुए कहा था कि प्रेम कहानी में एक लड़का होता है आतंकवादी नहीं होता। आतंकवादी की कोई प्रेम कहानी नहीं होती। लेखक की कहानी में जो लड़का है वो आतंकवादी भी नहीं है। लड़का लड़की आपस में प्यार भी करते है पर चूँकि कहानी है तो कहानी में ट्विस्ट और टर्न डालने ज़रूरी होते है इसलिए लेखक ने अपनी कल्पना शीलता का प्रयोग करते हुए मिलन , जुदाई , खलनायक सब डालने की कोशिश की है। ऐसा असली की ज़िन्दगी में नहीं होता। वहाँ प्यार बहुत सहज , सामान्य प्रक्रिया है पर लेखक को कहानी में कहानी का भरम बनाये रखने के लिए कुछ ऐसी बातें डालनी पड़ती है जो समाज में कहीं नहीं है पर कहानी के लिए ज़रूरी है। तो चलिए लेखक की कहानी के लड़का लड़की से मिलते है।

लड़की सोलह साल की है लड़का भी सोलह साल का है लड़की से एक महीने छोटा। दोनों एक ही स्कूल में एक ही क्लास में पढ़ते हैं।  लड़का क्लास में सबसे होशियार है। लड़की ठीक ठाक है। पढ़ाई में ज्यादा दिल नहीं लगता। पढ़ाई से ज्यादा दिल उसका लड़के में लगता है। दिल करता है कि लड़के को देखती ही जाए। लड़की दसवी की पढ़ाई में दिन रात इसीलिए जुटी हुई है कि लड़का अगर क्लास में फर्स्ट आये तो लड़की सेकिंड आ जाये । दोनों का नाम एक साथ स्टेज पर लिया  जाये। लड़का फूटबाल का अच्छा प्लेयर है लड़की उसके खेल में जीतने पर तालियाँ बजाती है। एक दिन लड़का बेध्यानी में चला आ रहा था और लड़की से टकरा गया। लड़के ने "सॉरी " बोला। अब लड़के के मुंह से "सॉरी" सुनना लड़की की ज़िन्दगी के सबसे अहम काम हो गया। गाहे बगाहे अनजान बनकर लड़के से टकरा जाना और लड़के का "सॉरी " बोलना। 

दसवी का रिजल्ट आया। लड़का फर्स्ट आया लड़की सेकेण्ड। लड़की को मुंहमांगी मुराद मिल गयी। प्लस वन फिर प्लस टू में लड़का लड़की एक क्लास में रहे। लड़का क्लास में फर्स्ट आता लड़की सेकेण्ड। कॉलेज में भी लड़की ने उसी कॉलेज में उसी क्लास में दाखिला लिया जिसमे लड़के ने लिया। लड़का कॉलेज की फूटबाल टीम में सलेक्ट हो गया। लड़की के लिए तो सारे खेल , सारी दुनिया लड़का ही था। ऐसे ही एक दूसरे को देखते, सॉरी बोलते लड़का लड़की ग्रेजुएशन के आखिरी साल में आ गए। अब लड़की ने अपने प्यार का इजहार करने का पूरा मन बना लिया। वो बात, जिसे सारा कॉलेज जानता था , खत में लिखी , एक आई लव यू का ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदा उसके अंदर खत को डाला। लिफाफे को लड़के की मांगी हुई किताब में रखा और किताब लड़के को वापिस दे दी। कॉलेज की दस दिन की छुट्टियां थी। लड़की खत लड़के को देकर घर चली गयी। लड़की के चेहरे  की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी। लड़की के घरवाले बहुत मॉडर्न थे। वहाँ लड़की और लड़के में बिलकुल फर्क नहीं किया जाता। अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए शहर कॉलेज में भेजा। सभी रिश्तेदार , आस पड़ोस वाले मना कर रहे थे। लड़की को बाहर हॉस्टल में रखना अक्लमंदी नहीं है। पर लड़की के पापा ने किसी की नहीं सुनी। वो अपनी बेटी को बेटा कह कर बुलाते थे। अपनी बेटी पर उन्हें खुद से ज्यादा भरोसा था। शाम को जब सारा परिवार साथ बैठा।  लड़की के साथ छेड़ छाड़ शुरू हुई। लड़की की शादी की बात शुरू हुई। पापा ने कहा ," हम तो वही शादी करेंगे जहाँ हमारा बेटा कहेगा " लड़की बहुत खुश थी। तभी लड़की के मौसा ने कहा ," हाँ हाँ हमें तो दूसरी कास्ट में भी कोई दिक्कत नहीं है बस शेड्यूल कास्ट  ना हो। " पापा ने भी हाँ में हाँ भरी ," शेड्यूल कास्ट को छोड़ हमें कोई दिक्क्त नहीं है। " पापा ने नहीं देखा कि उनकी हँसती खिलखिलाती लड़की का चेहरा सफ़ेद हो चुका था। लड़की चाय बनाने के बहाने रसोई में गयी। लड़की के गुस्से का शिकार सबसे पहले वो कप बना बना जो काम करने वाली के लिये अलग से रख रखा था। फिर उस रेडियो को फ्रिज से नीचे पटक दिया जिसमे प्रेम कहानी फिल्म का गाना आ रहा था। 

एक प्रेम कहानी में एक लड़का होता है एक लड़की होती है। 

कहानी में वो मोड़ आ चुका था जिसके लिए लेखक ने अपनी कल्पना  के घोड़े दौड़ाने पड़े थे। लड़की के घर वालों को स्थिति का पता चल गया था। उनकी सारी प्रगतिशीलता एक झटके में हवा हो गयी। रिश्तेदारों ने बाप को कोसा। माँ ने लड़की को गालियाँ दी। पापा समझदार थे उन्होंने अपने बेटे को अलग कमरे में ले जाकर समझाया

" देखो बेटा तुम्हारे ऊपर बहुत ज्यादा जिम्मेदारी है। तुम आदर्श हो आसपास। तुम्हारी देखा देखी कितने लोगों ने अपनी लड़कियों को बाहर पढ़ाने भेजा है। तुम्हारे एक ग़लत कदम से सब लड़कियाँ अपने घर वापिस बुला ली जायेंगी। हमें समाज की तरफ देखने की ज़रूरत है। लड़कियों को अभी प्यार की बजाय पढ़ने की ज़रूरत है। सारी लड़कियाँ तुमसे अपनी पढ़ाई माँग रही है। क्या तुम सबको निराश करोगी। "

जाने क्या क्या पापा ने कहा क्या उनके बेटे ने सुना। वो रात लड़की पर बहुत भारी गुज़री। उसने पापा को वादा किया वो प्यार नहीं करेगी। पर पापा को अपनी बेटी की बात पर भरोसा नहीं था। दस दिन की छुट्टियों के बाद जब लड़की कॉलेज गई तो उसके साथ उसकी शादी का कार्ड भी था। पापा ने बहुत अच्छा रिश्ता ढूँढा था अपने बेटे के लिए। दामाद जी सरकारी नौकरी में थे लड़की से पाँच साल बड़े थे और अपनी जाति के थे। अरेंज मैरिज करनी है तो अपनी जाति में लायक लड़को की क्या कमी थी। पापा ने बेटे से वादा किया कि वो उसे उसकी ग्रेजुएशन पूरी करने देंगे। लड़के वाले शादी के लिए जल्दी कर रहे थे पर पापा अड़ गए। शादी अभी कर देंगे पर लड़की की विदाई लड़की की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही होगी।  लड़की बेची थोड़ी है। हम कोई लड़के वालो से दबते है। लड़की जब कॉलेज में लड़के से मिली तो लड़का इतना ज्यादा खुश था मानो उसका भारत  की फूटबाल टीम में सेलेक्शन हो गया हो। जिस लड़की के सपने वो बचपन से देख रहा था। जिससे बात करने तक की हिम्मत उसमें नहीं थी उस लड़की ने आगे बढ़कर उसे प्रेम पत्र लिखा है। लड़के ने लड़की के लिए अंगूठी खरीदी थी। दोस्तों से पैसे उधार लिए थे। एक गुलाब का फूल भी ख़रीदा था। लड़के ने लड़की को अँगूठी दी , गुलाब दिया। लड़की ने लड़के को अपनी शादी का कार्ड दिया जिस पर बड़े बड़े शब्दों में लिखा था 

                                                               सॉरी 

उसके बाद लड़का लड़की में कोई बात नहीं हुयी। तीसरे साल लड़की सेकेण्ड भी नहीं आयी। पेपर खत्म होते ही लड़की "अपने " घर चली गयी।  लड़का  नौकरी की तलाश में लग गया। 

छह महीनों में लड़के की सरकारी नौकरी लग गयी। लड़के ने जानबूझकर घर अपने शहर से दूर पोस्टिंग ली। धीरे धीरे सात साल बीत गए। लड़के की ट्रांसफर दिल्ली हो गयी। लड़के के लिए दिल्ली , कानपुर चंडीगढ़ सब एक जैसे थे। सब जगह एक जैसे ही लोग थे। लड़के को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। वो ज्यादा ध्यान भी नहीं देता था। दिल्ली ऑफिस में उसके पास वाली सीट पर सांगवान साहब बैठते थे।  जातीय दम्भ और मूर्खता से लबरेज सांगवान साहब को देखते हुए कई बार लगता था उनकी मूंछो में उनके शरीर से ज्यादा बोझ था। उनका शरीर उनकी मूंछो के  बोझ  के नीचे दबा जा रहा था। आरक्षण के घोर विरोधी सांगवान साहब अपनी मेरिट और अपनी जाति की बहादुरी के जोश जोश में दिन में कितनी ही बार ऐसी बातें बोल जाते थे जिसकी वजह से लड़का चाहता तो वो जेल जा सकते थे पर लड़का ज्यादा ध्यान नहीं देता था। सारा दिन सांगवान साहब का टारगेट आरक्षण और वो लड़का रहता था। लड़के के लिए कोई नयी बात नही थी। सरनेम बदल जाते थे। जिस भी ऑफिस में गया कोई न कोई सांगवान साहब मिल ही  जाता था। सरकारी कॉलोनी में घर मिल गया था। शाम को जाकर गाने सुनना , खाना बनाना , फिल्म देखना ,किताबे पढ़ना लड़के की रूटीन लाइफ थी। लड़के को कोई शिकायत नहीं थी ना  ही किसी से लड़ने का मूड था। ऐसी कोई बात भी जो जिसके लिए लड़ा जाये। लड़के की समझ में आ गया था वो जहाँ रहता है वो मानसिक रूप से बीमार लोगों का समाज है और वो पागलो का डॉक्टर नहीं है।
फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि लड़के को लड़ाई की वजह मिल गयी। लड़का कुछ सामान लाने कॉलोनी की मार्किट में  गया था तो उसके सामने चलती लड़की को एक दम चक्कर आ गया। लड़के ने उस लड़की को सहारा दिया तो पता लगा  ये  तो वही थी उसकी प्रेम कहानी वाली लड़की। लड़की के चेहरे पर मार के निशान थे। लड़की का पेट बता रहा था कि वो कुछ ही महीनो में माँ बनने वाली है। लड़की ने लड़के को , लड़के  ने लड़की को देखा। लड़के ने लड़की को पास वाले बेंच पर सहारा देकर बिठाया। दोनों को समझ नहीं आ रहा था क्या बात करें। बात करने को था भी क्या। बेंच पर बैठे लड़का लड़की दोनों अपने अपने ख़यालों में खो गये। लड़की सोचने लगी काश मैंने अपने पापा की बात न मानी होती। लड़के को सॉरी कहने की बजाय पापा को सॉरी बोल दिया होता तो आज मेरी ज़िन्दगी कुछ और होती। लड़का भी इसी तरह के ख़यालो में खोया था काश मैंने आगे  बढ़कर उस वक़्त लड़की को रोक लिया होता। दोनों इसी तरह की "काश " में खोये हुए थे कि सांगवान साहब अपनी बुलेट पर वहाँ से गुज़रे तो उनकी नजर लड़का लड़की पर पड़ी। उनके तो गुस्से का कोई छोर ना रहा। उनकी बीवी सरेआम किसी से इश्क फरमा रही है। वो भी उस लड़के से। ये तो दोहरी चोट थी। सांगवान साहब गुस्से में लड़का लड़की की तरफ आये और उनके पास आते ही लड़के को गालियाँ देनी शुरू कर दी। " साले नीच की औलाद तेरी इतनी हिम्मत। बहुत  पर निकल आये तुम लोगो के। अभी बताता हूँ मैं " सांगवान साहब गालियाँ दिये जा रहे थे कि जाने लड़की को क्या सूझी। एक थप्पड़ दिया सांगवान साहब की गाल पर। लड़की खुद हैरान थी इतना जलील होने पर , दिन रात पिटाई होने के बावजूद उसने कभी अपने पति परमेश्वर पर हाथ नहीं उठाया। आज इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी। कहीं ये उस न पूरे होने वाले " काश " का फल तो नहीं था। प्यार में बहुत ताकत होती है ऐसा सुना था। थप्पड़ मारने के बाद लड़की कई सालो बाद अच्छा अच्छा फील कर रही थी और सोच रही थी कि ये थप्पड़ उसने पहले क्यों नहीं मारा। इधर सांगवान साहब को थप्पड़ से उभरने में दो तीन मिनट लगे। जैसे ही उसे मामला समझ आया वो लड़की की तरफ गालियाँ देते हुए भागे ," साली रांड मुझे तो पता ही था जाने किस किस का पाप पेट में लिये घूम रही है। तुझे मैं नंगा " सांगवान साहब को अपनी जुबान को बीच में ही  रोकना पड़ा। लड़के का एक झनाटेदार झापड़ उनके मुँह पर पड़ा और उनका सर , उनका मर्दवाद और जातिवाद तीनो एक साथ पास खड़े खम्भे के जा टकराये। खम्बा तीनो के टकराने के बाद भी सीधा खड़ा था और सांगवान साहब अपने सर को पकडे खम्बे के पास बैठे थे। इतनी देर में लड़की का 6 साल का बेटा अपनी माँ को ढूँढता हुआ मार्केट आ गया था। उसके हाथ में हिंदी की किताब थी। एक मुहावरे का मतलब उसे समझ नहीं आ रहा था। माँ को देखते ही बोला ," मम्मी इस का क्या मतलब होता है  

" लातों के भूत बातों से नहीं मानते। "

लड़के ने बेटे को गोदी में उठाया और कहा ," घर चलकर बताते है। "

शाम को लड़का लड़की और उनका बेटा लड़की  का बर्थडे मना रहे थे। लड़की अभी 28 की ही हुयी थी। लड़के को अगले महीने 28 का होना था।

लेखक अपने घर पर बैठा रेडियो पर वही गाना सुन रहा है

एक प्रेम कहानी में एक लड़का होता है  एक लड़की होती है
कभी दोनों हँसते है कभी दोनों रोते है।

चांदनी रातों में एक दीपक होता है
एक बाती होती है
कभी दोनों जलते है
कभी दोनों बुझते है।

7 comments:

  1. बहुत अच्छी कहानी

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  2. बहुत अच्छी कहानी..सारी बातें आसपास देखी हुई-सी..बस अंत इसे कहानी बनाता है क्यूँकि ज़्यादातर कहानियों में ही ऐसा होता है।

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  3. बहुत प्यारी कहानी

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  4. प्यारी कहानी। ऐसी ही लिखा करो, बस आनंद बक्षी से थोड़ा कम प्यार करो।

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