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Tuesday, 6 June 2017

चित भी मेरी पट भी मेरी बिकॉज़ इट इज माय गेम माय रूल


रविश जी का स्टेटस पढ़कर निराशा ज्यादा होने लगी है आजकल। पहले बॉलीवुड की फिल्म देख कर लगता था कि कहाँ से कॉपी कर के लाते है ये लोग ऐसी फिल्मे। कभी सोचा नहीं था कि बॉलीवुड की फिल्मो की कॉपी हुआ करेंगी। नायक फिल्म की कॉपी कर के केजरीवाल जी आ गए। अब रविश जी 1980 के सलीम जावेद के डायलॉग दोहरा रहे है। कम से कम इससे तो ज्यादा गंभीरता की उम्मीद थी। ये क्या बचपना है 

"मिटाने की इतनी ही खुशी हैं तो हुजूर किसी दिन कुर्सी पर आमने सामने हो जाइयेगा। हम होंगे , आप होंगे और कैमरा लाइव होगा ।" 

किसे बुला रहे है ? सरकार को ? प्रधानमंत्री को ?   अभी मध्य प्रदेश में पाँच किसानो को गोली मारी है। हर रोज विद्यार्थियों को कहीं ना कहीं लठ पड़ रहे है। आप तो गंभीर पत्रकार है ये बातें तो आपको शोभा नहीं देती । या आपने भी मोदी जी की तरह समझ लिया है कि वही बात बोलने में फायदा है जो सुनने में सुहावनी लगे। भले ही कोई मतलब हो या न हो। "जा पीटर अब मैं ये ताला तेरी जेब से चाभी निकाल कर ही खोलूँगा " 
समझदारी तो इसी में है कि सरकार से ना टकराया जाए। मतलब संबित पात्रा अगर बोल रहा था तो क्या दिक्कत थी। उसके घर वाले भी तो सारा दिन सुनते ही है नहीं मतलब मैं अपनी बता रहा हूँ। मेरे पास दो ऑप्शन हो सीबीआई रेड या संबित पात्रा। मैं तो सारा दिन सुन लूँ संबित पात्रा को। क्या दिक्कत है। बाकी प्रणव राय चार्टर्ड अकाउंटेंट है। आ जाएंगे बरी मुझे यकीन है। 

बाकी मैं फ़िलहाल NDTV के साथ हूँ। इस मामले में मैं थोड़ा कमजोर हूँ। मेरे साथी दोस्त कह रहे है कि ndtv का साथ देना चाहिए तो दे देता हूँ मुझे क्या जाता है। वो कह रहे है कि सर्वहारा का कर्तव्य है फ़िलहाल ndtv का साथ दे। वो किताब में पढ़कर आये है। मैं आलसी हूँ। जब 20 आदमी किताब पढ़कर एक ही बात कह रहे है कि ndtv का साथ देना चाहिए तो मैं कौन सी अलग किताब पढ़ूँगा। पहले मैं थोड़ा बहुत ऊपर नीचे सोच लिया करता था। अब नहीं सोचूँगा। मेहनत का दुरूपयोग है। जब सोचने के लिए वो बैठे है तो उन्ही की मान क्यों ना ली जाए। उन्होंने सारी किताबें भी पढ़ रखी है। कमाल बात है वो जब सोचते है लिखते है बिलकुल एक जैसा सोचते लिखते है मानो कार्बन कॉपी। खैर वो अलग मुद्दा है फ़िलहाल मैं ndtv के साथ हूँ। पर फिर भी रविश जी को कहना चाहूँगा ऐसे डायलॉग में कुछ नहीं रखा। माना की गुस्सा आ जाता है एक बार पहले भी आपने " छेनू आया था " वाला डायलॉग बोला था।  आप की पीढ़ी ने जो फिल्मे देख रखी है आजकल वाले वो नहीं देखते। आजकल अनुराग कश्यप देखते है रामगोपाल वर्मा देखते है। जनरेशन गैप आ गया है। आजकल बात कम करते है गाली ज्यादा देते है। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर आज की कल्ट फिल्म है। क्यों बेवजह फिल्मो सी डायलॉग बाजी करनी जब बिना किये काम चल सकता है। 


अब ndtv की फिल्म चल रही हो और पिक्चर में दिलीप  मंडल जी  ना आये ऐसा कैसे हो सकता है। मुझे फेसबुक पर सबसे दिलचस्प आदमी दिलीप मंडल जी लगते है। उनके गेम के अपने नियम है अपना सिस्टम है। वो चैनल खोलना चाहते है। अपना बहुजन मिडिया बनाना चाहते है। ब्राह्मणवाद से तो लड़ ही रहे है। ndtv के बारे में बहुत बातें कही। TRP  कम है। चैनल कोई देखता नहीं है। घाटे में चल रहा है। चल कैसे रहा है। उनकी याद्दाश्त भी बहुत स्ट्रांग है। NDTV का आडवाणी को 2008 में कोई अवार्ड देना उन्हें याद है। ये भी याद है उस वक़्त आडवाणी को कोई अवार्ड नहीं देता था। जब कि 2008 में आडवाणी को पीएम इन वेटिंग कहलाते हुए दस साल पूरे होने को थे। देश का होम मिनिस्टर रह चुके थे। मोदी जी उसके बाद में प्रधानमंत्री भी बन गए। भूलते मंडल जी कुछ भी नहीं है। उन्हें ये भी याद है कि कॅरियर की शुरुवात में वो जनसत्ता में आरक्षण विरोधी लेख लिखा करते थे पत्रकारिता में पाँव ज़माने की खातिर। मंडल जी से सीखना चाहिए। इससे पहले कोई दूसरा ढूँढ कर लाये खुद ही बता दो। खुद ही ने बताया खुद ही ने जस्टिफाय कर दिया कि कैरियर के लिए ठीक है। कोई दिक्कत नहीं है। उस वक्त जब समर्थन की जरूरत थी तब आप आरक्षण विरोधी लेख लिख रहे थे। बीच बीच में ये भी बता देते है उन्हें सपोर्ट भी बहुत था। वो पढ़ते भी बहुत थे। बड़ी लायब्रेरी थी। इतना सपोर्ट होने के बाद भी आरक्षण विरोधी लेख लिखने पड़े। अब कॅरियर में दिक्कत नहीं है तो समर्थन में है। बीच बीच में ॐ सुधा जैसे क्रांतिकारियों के मौन समर्थन में भी आ जाते है।  उसमें तो खैर सभी एक है। कोई किसी के पक्ष में है कोई किसी के पक्ष में है।  

दिलीप जी की याद्दाश्त बहुत तेज है ये एक दिक्कत है। मेरी याद्दाश्त बहुत कमजोर है ये उससे बड़ी दिक्कत है। 
मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। लिखना कहाँ से शुरू करता हूँ कहाँ पहुँच जाता हूँ फिर बंद करना याद नहीं रहता। क्यों लिख रहा था ये याद नहीं रहता। अभी कुछ याद नहीं आ रहा है मैं बंद करता हूँ लिखना। कहीं कोई मुझे ही चैलेंज न कर दे। मैं हिंदी फिल्मो का इतना बड़ा शौक़ीन नहीं हूँ भाई। मैं भाग जाऊँगा आगे हो के। बाकी वो डायलॉग मस्त था सच में। 



मिटाने की इतनी ही खुशी हैं तो हुजूर किसी दिन कुर्सी पर आमने सामने हो जाइयेगा।

2 comments:

  1. आहा .....अरसे बाद ऐसा लेखक आया है। इस तेज तरार लेखनी को सलाम। मैं न्यूज चेनल नहीं देखता पर अब इन केरेक्टरों को सच में देखना पड़ेगा।

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  2. फ़िल्मों से कितना कुछ सीखते हैं हम।फ़िल्में समाज का आइना नहीं रह गई अब फ़िल्मों से समाज सीखने लगा है

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