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Friday, 2 June 2017

जातिवाद और नारीवाद : तौबा तौबा इतना अतिवाद

फेसबुक पर मेरे दोस्त बहुत दुखी हैं कि मैं हर बात जातिवाद और नारीवाद पर ले आता हूँ। ये बेहद ही ग़लत बात है । मुझे खुद लगता है दुनिया में अतिवाद नहीं होना चाहिए। अतिवाद से समस्या और बढ़ती ही है बजाय कम होने के। ये क्या छोटी छोटी चीजों में जातिवाद , मर्दवाद ढूँढने  बैठ जाते हैं । और कोई काम नहीं है क्या ? गालियाँ निकल जाती हैं  कमजोरी में। मैंने देखा है गालियाँ देने वाले मासूम लोग होते हैं  अक्सर। इसलिए अब मैंने अख़बार बाँचने का धंधा कर लिया है। इसमें अतिवादी होने से बचा जा सकता है क्योंकि न तो वहाँ जातिवाद का मसला है ना नारीवाद का। खबर तो खबर है। अभी आपको दो खबरें बताता हूँ आज के ही अख़बार में आयी  हुई हैं ।  

-एक पति ने अपनी पत्नी को कुल्हाड़ी से काटकर जला दिया। कारण मत पूछिए। कुछ कारण रहा ही होगा। कुछ ग़लती होगी ही पत्नी की वरना ऐसे कौन कुल्हाड़ी से काटता है।
- आंध्र प्रदेश के टीडीपी के एक नेता की बेटी ने दलित के बेटे से प्रेम विवाह कर लिया। मुंबई में रहने लगे। नेताजी ने दोनों को अपने घर बुलवाया और बेरहमी से क़त्ल कर दिया। वैसे तो ये जो ऑनर किलिंग है वो हरियाणा में होती है ज्यादा। पर आंध्र प्रदेश वालों  के पास भी अपनी इज़्ज़त तो है ही। जातिवाद अब नहीं है तो अतिवादी नहीं होना चाहिए।  

ये दो घटनाएँ  बताने के लिए काफी है कि भारत में जातिवाद और मर्दवाद खत्म हो चुका है।  ये इक्का दुक्का घटनाएँ जो होती है वो शहरों  में नहीं होती। हमारे घरो में नहीं होती। हर घर में अब तो हर जाति के लोग रहते हैं । लड़कियाँ भी शोषक हैं। वो लड़को को सेक्स के लिए मना कर देती हैं । पति पर रेप का केस लगा देती हैं । तलाक की माँग करती हैं । रात को बाहर घूमने की बात करती हैं । लड़को जैसे हॉस्टल की माँग करती हैं । रात को लाइब्रेरी में पढ़ने की जिद करती हैं । बताओ भला दलित घोड़े पर चढ़ कर बारात निकालने लग गए हैं । ये शोषण अब एक तरफ़ा नहीं रह गया है। सब की बात बोलनी चाहिए। अब अगर मैं बोलता हूँ कि ठाकुरों ने पीने के पानी के कुँए में अगर डीजल मिला दिया तो ये भी बताना चाहिए कि दलित भी तो अपनी बेटी की शादी में बैंड बाजा बजा रहे थे। कम तो कोई भी नहीं है। जाटों ने अगर दलितों के घर फूँक दिए तो क्या ये बताने का फर्ज नहीं है कि दलितों की गली में कुत्ता जाटों पर भौंका था। 

 ना दलित कम है ना औरतें। सब शोषक हैं  सब शोषित हैं । दुनिया है तो शोषण लाजिमी है।  कभी कोई शोषक बन जाता है कभी कोई शोषित। चक्र है चलता रहता है। पर अतिवाद तब होता है जब आप कहने लगो कि सब अपरकास्ट मर्दों की ही बदमाशी है। अब बेचारे गाली भी नहीं दे सकते है। केस लग जाता है। कौन शोषित हुआ ? 99 फीसदी दहेज़ के केस झूठे होते हैं । औरत की भारत में औकात है सच्चे केस कर सके ? कौन शोषित हुआ ? पहले वक्त तो औरत को देवर जेठ सब पीट दिया करते थे कोई कुछ नहीं कहता था। अब पति भी हाथ लगाए तो पंचायत खड़ी हो जाती है। कौन शोषित हुआ ? तुलसीराम जी कहते है 

शूद्र गँवार  ढोल और नारी 
ये सब ताड़न के अधिकारी 

ताड़न  का मतलब पुचकारना होता है। पालना होता है। जैसे बच्चे पालते हैं  वैसे ही औरत  और शूद्र भी पालते हैं । अब पालते वक्त एक आध हाथ लग भी जाता है।  बाहुबली वाले राजमौली की बात मुझे बहुत अच्छी लगी। ब्राह्मण वो होता है जो पहले खुद सीखता है फिर दूसरों  को सिखाता है। शर्मा जी ने इतनी मेहनत से सीखा कि मोर सेक्स नहीं करता है। अब  सबको सिखा रहे है तो सब मजाक उड़ा रहे हैं । कलयुग के कारण है। सतयुग में तो श्राप दे देते , आँखों से भस्म कर देते।  कलयुग में क्या करें  ? सिर्फ मानहानि का दावा कर सकते हैं । वहाँ भी साबित करना पड़ता है कि कोई मान है। सतयुग में तो अंडरस्टुड था कि ब्राह्मण है तो मान भी होगा ही। दिख नहीं रहा तो छुपा रखा होगा। पर अब ऐसा कोई सीन नहीं है। 

फिलहाल बात ये है कि आज से मैं ना तो जातिवाद पर बात करूँगा ना नारीवाद पर। जब सब शोषित है तो अलग अलग क्यों पहचान करनी ? उस आदमी ने अपनी बेटी और दामाद को मार दिया  तो बेटी और दामाद ने भी ठीक तो नहीं किया ना। किताबी बातें हैं । आपकी बेटी किसी दलित से शादी करे तब पता चलेगा। क्या कहा आप खुद दलित हो ? ये एक और समस्या है कलयुग में। सब पढ़ने लिखने लग गए हैं । दलित  भी पढ़ने लगे हैं  लड़कियाँ भी पढ़ने लग गई हैं । अब कहाँ कहाँ किस किस से बहस करनी पड़ रही है। पहले वक्त में सब वैज्ञानिक था। हम ही पढ़ते थे हम ही बहस करते थे। 

सरकार क़ानून बोलता है सबको पढ़ाई  लिखाई का  अवसर मिलने चाहिए। इस बात का  साइड इफेक्ट किसी को नहीं दिख रहा  है। ये लोग पढ़ लिख कर गालियों पर सवाल करने लगते हैं । ये पूछने लगे  है कि जातिवाद ख़त्म हो गया तो आपके घर में एक ही जाति के लोग क्यों हैं  ? अब मजाक में गाली भी ना दे। किसी के तोतलेपन पर मजाक भी न उड़ाए। रंग पर मजाक न करे। तो हँसना ही बंद कर दे। इसी को अतिवाद कहते है। कोई अपने घर में अपनी बीवी को पीट रहा है , अपनी बेटी को मार रहा है तो इसमें मर्दवाद जातिवाद कहाँ से आ गया ? कुदरत  का नियम है ताकतवर कमजोर को पीटता ही है। 


हम सब को मिलजुल कर रहना है। अतिवाद से बात बिगड़ेगी ही। हर बात में जातिवाद , नारीवाद लाना ठीक नहीं है। चलिए गाना गाते हैं  

सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा 
हम बुलबुले है इसकी  ये गुलिश्ताँ 

कुछ बात तो है हस्ती मिटती नहीं हमारी 
सदियों रहा है दुश्मन दौर ऐ जहाँ हमारा 

जल्दी गाओ नहीं तो कुल्हाड़ी तैयार हो रही है। 

1 comment:

  1. गम्भीर से गम्भीर मुद्दे को सामने लाने का आपका तरीक़ा बहुत अच्छा है..काश इसी तरह इन मुद्दों को सुलझाने के प्रयास भी किए जाते।

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