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Wednesday, 14 June 2017

एक एब्नॉर्मल समाज में नॉर्मल होना अतिवाद है

नॉर्मल शब्द से भारत वालों को फ़िलहाल परहेज रखना चाहिए। अभी उन्हें पता नहीं है नॉर्मल होता क्या है।सामान्य होना किसे कहते है। सामान्य क्या होता है उससे पहले जरा भारत के पिछले इतिहास पर नजर डाल लेते है। ज्यादा पीछे नहीं जायेंगे 
 1947 में भारत देश अंग्रेजो की गिरफ्त से आजाद हुआ उससे पहले 200 साल तक अंग्रेजो ने राज किया। 

औरतों और दलितों के लिए भारत का इतिहास क्या कहता है ?

 पहले औरतो की बात करते है 

1829 में लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा के लिए कानून बनाया। सती प्रथा मतलब पति के मर जाने पर जिन्दा पत्नी को पति की लाश के साथ जला देना। भारत के अपरकास्ट मर्दों को ये बात समझाने के लिए कानून बनाना पड़ा कि ये ग़लत है भाई। ऐसा नहीं होना माँगता 

1848 में सावित्री बाई फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। उससे पहले लड़कियों के लिए स्कूल नहीं था। सावित्री बाई फुले जब स्कूल में जाती थी तो एक एक्स्ट्रा साडी लेकर जाती थी क्योंकि गांव के अपरकास्ट के लोग उसपर गोबर फेंकते थे। क्यों फेंकते थे ? क्योंकि उन्हें लड़कियों को पढ़ाना एब्नॉर्मल लगता था। उन्हें ये बात समझ ही नहीं आती थी कि लड़कियों को क्यों पढ़ना चाहिए। उनका बस चलता  तो आज जितनी लड़कियाँ पढ़ लिख कर अपने पाँव पर खड़ी है वो सब घर के अंदर कैद होती। 

1856 में अंग्रेजो को एक और कानून लाकर भारत के अपरकास्ट मर्दो को बताना पड़ा कि विधवा विवाह नॉर्मल है।  1929 में बाल विवाह पर कानून लाकर बताना पड़ा कि बच्चो की शादी ठीक नहीं है 

भारत आजाद हो गया। भीमराव आंबेडकर हिन्दू कोड बिल लेकर आये। हिन्दू अपरकास्ट मेल संस्थाओ ने विरोध करना शुरू कर दिया।नारे हुए , धरने दिए।  बिल भी पास नहीं हो सका। था क्या उसमे ? महिलाओ  को कुछ नॉर्मल अधिकार दिए थे । महिलाओ को दिए अधिकार हिन्दू धर्म पर हमला थे। 

आज 2017 है मेरा एक दोस्त अमेरिका में रहता है वो बताता है कि वहाँ प्रेग्नेंसी के दौरान ही डॉक्टर बता देते है लड़का होगा या लड़की ताकि पेरेंट्स नाम मनमुताबिक पहले ही तय कर सके। नवजात के आने की तैयारियां उसके कपडे पहले से ही खरीद कर रख सके। भारत में जन्म से पहले जांच कानूनन प्रतिबंधित है। क्यों ? क्योंकि यहाँ लड़की का नाम सुनते ही लोग अबॉर्शन करा लेते है। इसका पढाई लिखाई से कोई लेना देना नहीं है। ये हमारे संस्कार है। 

दलितों पर अत्याचार का लम्बा इतिहास है। जितनी गालियाँ हम देते है वो दलित जातियों के नाम का बिगड़ा स्वरूप है या औरतों के बलात्कार से संबधित है। 1989 में सरकार को कानून बना कर अपर कास्ट मर्दो को बताना पड़ा कि अपने देश के नागरिको को अपमान कर के एक राष्ट्र नहीं बन सकता है। आज भी अपर कास्ट मर्दो को ये नहीं समझाया जा सकता कि गाली क्यों नहीं देनी चाहिए। एक जनाब ने पटना की शान में लिखा है 

" पटना वो जगह है जहाँ ब्राह्मण और दलित एक साथ खैनी खाते है "

ये हाल 2017 का है। ब्राह्मणो का दलितों के साथ खाना खाना 2017 में उदारता , गर्व का विषय है। 

भारत के संस्कार जिस हद तक जड़ है इन्हे लगातार हिलाये बिना , निर्ममता से टोके बिना बात नहीं बनेगी। आज जो नॉर्मल है वो सदियों से लोगो के बिना थके प्रयासों का नतीजा है। बुरा लगना , विरोध करना नयी बात नहीं है। अपरकास्ट मर्दो को अपने अंदर झाँकने की आदत नहीं है ये हमेशा से विरोध ही करते आये है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपने अंदर ना झाँकना इनके फायदे का सौदा है। हमारा समाज बहुत अमानवीय रहा है आज भी बहुत सी अमानवीय संस्कार हमारे अंदर है। कोई बात नॉर्मल होने का ये मापदंड नहीं है कि आसपास वाले सब कर रहे है। इन्ही आसपास वालो के लिए सरकार को लिंग जांच बैन करवानी पड़ी है। हम यहाँ तक आये है उसके पीछे जाने कितने लोगो का संघर्ष है। ये संघर्ष लगातार होना बहुत जरुरी है। अतिवाद जैसा कुछ नहीं है ये अपरकास्ट मेल मेंटेलिटी की उपज है। हम आलरेडी अतिवाद में जी रहे है। अंकुश फिल्म का एक सीन है। कुछ नौजवान एक बुजुर्ग के लालच का मजाक उड़ाते है। बुजुर्ग गुस्सा होकर कहता है कि जब ऊपरवाला तुमसे जवाब मांगेगा तब कहाँ जाओगे। इसके जवाब में सब नौजवान गाना गाते है 

ऊपर वाला क्या माँगेगा हमसे कोई जवाब 
भारी पड़ेगा कहंना सुनना हमसे अरे जनाब 
सवाल तो हम पूछेंगे जवाब तो हम मांगेंगे 

वहाँ बुजुर्ग को भगवान से सवाल पूछना अतिवाद लग सकता है क्योंकि उसने अपनी ज़िन्दगी में ऐसा कोई कॉन्सेप्ट सुना ही नहीं होगा। भगवान् से सवाल कैसे हो सकता है।मैं तो भगवान् के आस्तित्व को नहीं मानता हूँ  तो उससे सवाल का तो सवाल ही नहीं उठता।  अपने आसपास बहुत कुछ है जो अतिवाद है।  उसको दूर करना हमारी जिम्मेदारी है  

5 comments:

  1. जियो लेखक👍🏻

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  2. कमाल भाई 👌👌👌👌

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  3. जन जागृति की मुहीम में एक सराहनीय और समयानुकूल प्रयास .

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