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Sunday, 18 June 2017

सलम्बा गाँव का सपना II - सभ्य समाज और लैट्रिन




हां, तो बात सपने की हो रही थी सपने में मैं स्वच्छ भारत अभियान में बाधा पहुँचाने वाले दुश्मनों की हेकड़ी निकालने उनके गांव सलाम्बा पहुंचा तो देखा वहां तस्वीर वैसी नहीं थी जैसी हकीकत में हमें दिखाई गई थी। सपनों की अपनी तासीर होती है। सपनों को हकीकत से ज्यादा मतलब नहीं होता। वहां इस्लाम जी से बात करने के बाद मैं पानी पीने अयूब के घर पहुंचा तो सपना ऐसा कुछ दिखा रहा था जिस पर सपने में भी विश्वास नहीं हो रहा था।

अयूब एक 25 -26 साल का लड़का है। गुड़गांव, सोहना जाकर मजदूरी करता है। बीवी है बच्चे हैं। कहा जाता है, घर ईंट-पत्थरों से नहीं बीवी-बच्चों से बनता है। पर रहने के लिए तो ईंट-पत्थरों के घर की ही जरुरत होती है। जब मैं अयूब के घर गया तो अयूब के पास सब था पर घर नहीं था। तिरपाल से एक छांया-सी बनाई हुई थी, जिसमें वो अपने परिवार के साथ रहता था। बारिश आने पर तिरपाल टपकता है। रहने सोने के घर पर पक्की छत नहीं है, पर घर के कोने में पक्का बना हुआ लैट्रिन दिखाई दे रहा था। कभी देखा है आपने घर में पक्का लैट्रिन हो और रहने के लिए तिरपाल का सहारा हो ? मैंने जब पूछा ये क्या है, तो अयूब ने बताया कि 20000 कर्जा लेकर ये लैट्रिन बनाना पड़ा। उसका ब्याज चुकाने में दिक्कत हो रही है। पानी की भी दिक्कत है। पर क्या करें?

दिमाग़ हिला देने वाली घटना है। रहने को घर नहीं है, पर कर्ज लेकर लैट्रिन बनवानी पड़ रही है। अयूब अपने भाई के घर भी लेकर गया। घर क्या था, सिर्फ इतनी जगह थी कि दो आदमी सो सकते थे। वहां पांच इंसान रहते हैं। अयूब का भाई भी मज़दूरी करता है। मैं गाँव में गुंडे ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था, जो लोगों को लूटते हैं। डाकू ढूंढ रहा था जिसके लिए मेवात बदनाम है। पर मुझे मिल मजदूर रहे थे जिनके पास रहने के लिए उतनी जगह भी नहीं थी जितनी जगह में मिडल क्लास के बाथरूम होते हैं।
ये कौन से भारत का निर्माण हम कर रहे हैं ? जहाँ देश के नागरिकों को टट्टी जाने से रोका जा रहा है। टट्टी जाने को हेकड़ी से जोड़ा जा रहा है। अब बात आजादी की रही ही नहीं है। बात ये है कि इंसान टट्टी कर सकता है या नहीं ?
ऐसा दुनिया में पहले किसी सरकार में हुआ है या नहीं इतिहास के जानकार बताएं। गरीबों को टट्टी जाने में डर लग रहा है, कहाँ करें ?
घर में? घर नहीं है तो ?
क्या करें ? रोटी न भी खाए फिर भी टट्टी पेशाब आ ही जाता है, कहाँ करें ?
हुक्मरान कह रहे हैं जो टट्टी करे उसके पिछवाड़े में डंडा घुसा दो।
मुस्कुराइए आप भारत में हैं।
सपने से बाहर आता हूँ तो हकीकत बहुत अलग दिखती है। बड़ा-सा फ़्लैट है हर कमरे के साथ अटैच्ड लैट्रिन-बाथरूम है। बिलकुल समझ नहीं आता कि जब हरेक कमरे से अटैच्ड बाथरूम है तो कोई क्यों खेतों में शौच के लिए जाएगा। क्यों जाएगा वो आपको उस हकीकत में तो नहीं समझ आ सकता जिस हकीकत में आप जी रहे हैं। आप चाहें तो मैं आपको सपनों की दुनिया में लेकर जा सकता हूँ, जहाँ जाकर आपको समझ आएगा। दिल्ली से ज्यादा दूर भी नहीं है वो दुनिया। 

Saturday, 17 June 2017

भारत माता की जय




कल रविवार है। भारत पाकिस्तान के बीच चैम्पियन ट्राफी का फाइनल मैच है। अभी पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। अब किसी तरह का रिस्क लेना मूर्खता की श्रेणी में आएगी। मैं बताना चाहता हूँ कि मैं तन मन (अगर धन होता तो वो भी लगा देता ) से भारत के साथ हूँ। मैं बचपन से ही भारत को जीतना देखता चाहता था। सेन्स ऑफ़ ह्यूमर , हँसी मजाक , व्यंग्य सब अपनी जगह पर जान है तो जहान है। जहान तो भारत पाकिस्तान भी है।  मैं तो जीजस के आगे भारत की जीत के लिए सुबह नारियल भी फोड़ूंगा। नारियल न फोड़ पाया तो अपना सर फोड़ूँगा। मैं तो चाह रहा हूँ कल भारत एक बार नहीं तीन बार जीत जाए। जान बड़ी चीज है भाई।


सहवाग कुछ भी नहीं है मैं बाप दादा के भी आगे जाना चाहता हूँ। भारत पाकिस्तान का पड़दादा है  बल्कि उससे भी कुछ आगे है। देशभक्ति को लोग आसान चीज समझते है इतनी आसान नहीं है आपको अपना दिमाग पाने घुटने से भी नीचे ले जाना पड़ता है। मैं कल से सोच रहा हूँ। भारत बांग्लादेश का दादा है और हमारी माता है ये तो गड़बड़ मामला हो गया। हमारा और बांग्लादेश का रिश्ता क्या कहलाता है। पर देशभक्ति तर्क के आधार पर नहीं लठ के आधार पर चलती है ,  मूर्खता के आधार पर चलती है। हम भारत माता की जय  भी बोलेंगे भारत को पाकिस्तान का बाप भी बोलेंगे। वैसे भी ये बाप बनने का मोह बड़े बड़े प्रगतिशील पत्रकार नहीं छोड़ पाते ये तो सहवाग है। एक फेमस फिल्म का डायलॉग है

रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते है

ये डायलॉग बहुत फेमस है भारत में। अब मैं इस डायलॉग के पीछे की मानसिकता पर गया तो लोग मुझे अतिवादी बोलने लगेंगे। जाने देते है। देशभक्ति के मौसम में अतिवाद नहीं करना चाहिए। कल फादर्स डे पर पाकिस्तान अपने बाप "जो कि हमारी माँ है" को चैम्पियन ट्राफी का तोहफा देगा। दोबारा फिर बताता हूँ। मैं बचपन से ही भारत को जिताना चाहता था। जब तक भारत की टीम क्रिकेट नहीं खेलती है मैं BCCI नामक क्लब की टीम को भी स्पोर्ट करने को तैयार हूँ। कोई दिक्कत नहीं है। वैसे पकिस्तान में कोई अच्छा दिमाग़ का डॉक्टर है तो कल अपने साथ सहवाग को भी लेकर जा सकते है। टीम  से बाहर होने से उनके दिमागी हालत जो बिगड़ी थी आज तक ठीक नहीं हुई है।

मैं फिर भटक रहा हूँ भारत जीतना चाहिए कल। कोहली को गाली देने का मौका भी मिलना चाहिए। हमारा कप्तान कोहली है बांग्लादेश का कप्तान मुर्तज़ा है जो कहता है वो कोई स्टार वतार नहीं है पैसे मिलने पर नाचने वाले कलाकार है। मज़दूर असली स्टार है। उन्होंने 1971 का जिक्र किया। उससे पहले के क्रिकेटर का जिक्र किया जो बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुआ था। भारतीय क्रिकेटरों से ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। फिर भटक गया।

कल मैं क्लब की टीम का समर्थन करूँगा। जीतने पर विजय माल्या जो पार्टी देगा उसमें भले ही मैं शामिल न हो पाउ पर अपने पैसे किंगफिशर पीकर देशभक्त तो हो ही जाऊँगा। और जान बचेगी वो अलग से। मेरे तो घर में लेट्रीन बाथरूम है तो फ़िलहाल वहाँ भी खतरा नहीं है

बाकी कल जब आप भारत के लिए चीयर करेंगे तो अपने देश के उन नागरिको को भी जरूर याद रखियेगा जिनके लिए शौच एक भारी आफत बना हुआ है। शौच जाती महिलाओ के फोटो खींचे जा रहे है। देश के नागरिक इस बात का विरोध करने पर मारे जा रहे है। और ये सब एक ही देश में एक समय में ही हो रहा है।


जनाब टट्टी कर सकते है क्या

प्रगतिशीलता की क्लास   मैं काफी सालों से क्लास की खिड़की के बाहर खड़ा होकर ले रहा हूँ। कोई अँगूठा माँगने न आ जाए इसलिए दोनों अँगूठे  मैं फेसबुक पर छोड़कर क्लास के बाहर खड़ा होता हूँ। बहुत बार मास्साब ने मेरे अंगूठे लेने की कोशिश की पर भारी नाकामी हासिल हुई। तो गुस्सा में गाली देकर मुझे छोड़ दिया। मैं बदतमीज फिर कान लगाकर खिड़की के बाहर खड़ा हो जाता हूँ।
प्रगतिशीलता की एक क्लास बहुत ज्यादा रोचक थी। उसमें सिखाया गया था कि प्रगतिशील पोस्ट शुरू कैसे की जाए। मासाब बता रहे थे कि अगर सारी फेसबुक किसी मुर्ख नेता के बेवकूफी भरे बयान में उलझी हो तो ये किसी भी प्रगतिशील पोस्ट के लिए एक सुनहरा अवसर है। प्रगतिशील लोगो पर व्यंग्य या ताना मारे बिना शुरू हुई प्रगतिशील पोस्ट उतनी प्रगतिशील नहीं मानी जाती।

आज हर जगह योगी जी की चर्चा है वो लोग जो बहुत सी बातों को व्यर्थ मानते है वो भी उस बयान में व्यंग्य कर रहे है  फ़िलहाल तक ऐसी कोई पोस्ट नजर भी नहीं आयी है जो ये कहती हो कि यहाँ आरएसएस ने फेसबुक को योगी जी के बयान में उलझा दिया वहाँ चोरी छुपे इतना बड़ा काण्ड हो गया। स्टेशन बेच दिए या अलाना फलाना कर दिया गोया सरकार के सबसे बड़ा खतरा फेसबुक ही हो जिसे बरगलाने के लिए उसे षड्यंत्र रचने पड़ते है। गोया योगी अगर हमें इस तरह नहीं बरगलाता तो अब तक तो हमने सरकार की ईंट से ईंट बजा दी होती। खैर अभी तक किसी ने ऐसी पोस्ट नहीं की तो ये श्रेय मुझे मिल जाना चाहिए।

योगी जी को जाने देते है। ठाकुर लोग के मुंह नहीं लगना चाहिए शास्त्रों में लिखा है। हरियाणा में नूंह जिले में डीसी   मणिराम शर्मा स्वच्छ भारत अभियान के पीछे हाथ धो के पड़ गए है। तीन चार दिन पहले सलम्बा गांव के तीन चार लोगो को बाहर शौच करते पकड़ा। डीसी के शब्दों में कहे तो उनकी अकड़ निकाली। जुर्माना किया। डीसी की माने तो सब खाते पीते घर के थे बेवजह खेतो को गन्दा कर रहे थे। मुझे भी गुस्सा आ गया सपने में मैं सालाम्बा गांव पहुँच गया। हरियाणा का वो बदनाम इलाका जहाँ सरकारी लोग जाने से डरते है। गुंडागर्दी है। जान से मार देते है। सपने में जान से जाने का खतरा नहीं रहता तो मैं वहाँ पहुँच गया। मकसद एक ही था  स्वच्छता के दुश्मनो को ललकारना। पर कई बार सपने भी बेकाबू हो जाते है। इससे आगे सपने ने अपनी कहानी खुद गढ़ी।

गाँव के अंदर जाने वाला रास्ता कच्चा है। कीचड़ ही कीचड़। वहाँ कभी सड़क नहीं बनी। अगर जाना है तो कीचड़ में से होकर जाना पड़ेगा। स्वच्छता के दुश्मन इस्लाम नामक बुजुर्ग के घर जाने तक मेरे दोनों पाँव कीचड़  में भर चुके थे। इतना गुस्सा था कि सोचा था अपने पांव उसकी कोठी के कालीन से साफ़ करूँगा। पर जो चीज हकीकत में होती है सपने में नहीं होती। सपने में वहां कोई कोठी नहीं थी। बमुश्किल 30 गज में बना इस्लाम का घर आधा गली की नाली के ऊपर बना था। जैसे ही मैं घर में घुसा घर ख़त्म हो गया। दो छोटे कमरे जिसमे से एक मे तुड़ी रखी थी आदमी बमुश्किल खड़ा हो सके इतना नहानघर , रसोई कही दिखी नही । इतने में 5 परिवार रहते थे । इस्लाम जी खुद उनकी पत्नी और चार शादी शुदा बेटे ।इस्लाम जी बाहर गली में बैठे हुए थे। मैं उनसे स्वच्छता अभियान को गन्दा करने के लिए गालियाँ देने आया था पर उनके  घर तक पहुँचने में मैं खुद गन्दा हो गया था।  मेरी समस्या थी कि खुद कैसे साफ़ होउ। इस्लाम जी से पाँव धोने के लिए पानी  माँगा तो पता चला गांव में पानी की बहुत समस्या है। गांव की गलियों में पानी ज्यादा खड़ा है बनिस्पत घरो के घडो में होने के। बिना पानी स्वच्छ कैसे हो। इस्लाम जी से बात की तो उन्होंने अपना घर दिखा कर हमसे पूछा कि बताओ इसमें कहाँ लेट्रिन बनाये। पुलिस वाली मेडम तो कहती है इस गली वाली नाली के ऊपर बना लो। जो गंदगी खेतों में नहीं कर सकते उसे गांव में अपने घर में कर लो।

मैं सपने में ज्यादा देर रह  नहीं सका। कुछ देर के लिए बाहर आना पड़ा। ये कैसा समय आ गया है सपने से ज्यादा हकीकत में सकून मिलता है। हकीकत में हमने इतने झूठ फरेब भर दिए है कि सपनों को हकीकत दिखाने के लिए मज़बूर होना पड़ा है। सपना मुझे वापिस उस गाँव में लेकर गया जो हरियाणा के उस इलाके में था जहाँ शरीफ लोग जाने से डरते है। जिसमें अधिकतर आबादी मेहनत मजदूरी पर निर्भर थी। जहाँ हरियाणा के किसी भी और गाँव की तरह औरते आदमियों से ज्यादा काम करती थी। एक पोस्ट  में पूरा सपना संभव नहीं है। बाकी सपना अगली पोस्ट में बताता हूँ।

फ़िलहाल डिप्टी जी को फेसबुक पर गरीब मजदूरों की अकड़ निकालंने के लिए बधाई देने जा रहा था पर उन्होंने अपनी पोस्ट डिलीट कर ली। डीसी बहुत बड़ा नाम होता है. हरियाणा में कोई अकड़ता है तो कहा जाता है
"घणा डीसी ना पाके "

उनको पोस्ट डिलीट नहीं करनी चाहिए थी। पोस्ट डिलीट करने से कुछ होता भी नहीं ना। सबके पास स्क्रीन शॉट होते है। अपनी जुबान पर कायम रहना चाहिए। पोस्ट डिलीट करके क्या हासिल होगा

(बाकी अगली पोस्ट में )



Wednesday, 14 June 2017

एक एब्नॉर्मल समाज में नॉर्मल होना अतिवाद है

नॉर्मल शब्द से भारत वालों को फ़िलहाल परहेज रखना चाहिए। अभी उन्हें पता नहीं है नॉर्मल होता क्या है।सामान्य होना किसे कहते है। सामान्य क्या होता है उससे पहले जरा भारत के पिछले इतिहास पर नजर डाल लेते है। ज्यादा पीछे नहीं जायेंगे 
 1947 में भारत देश अंग्रेजो की गिरफ्त से आजाद हुआ उससे पहले 200 साल तक अंग्रेजो ने राज किया। 

औरतों और दलितों के लिए भारत का इतिहास क्या कहता है ?

 पहले औरतो की बात करते है 

1829 में लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा के लिए कानून बनाया। सती प्रथा मतलब पति के मर जाने पर जिन्दा पत्नी को पति की लाश के साथ जला देना। भारत के अपरकास्ट मर्दों को ये बात समझाने के लिए कानून बनाना पड़ा कि ये ग़लत है भाई। ऐसा नहीं होना माँगता 

1848 में सावित्री बाई फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। उससे पहले लड़कियों के लिए स्कूल नहीं था। सावित्री बाई फुले जब स्कूल में जाती थी तो एक एक्स्ट्रा साडी लेकर जाती थी क्योंकि गांव के अपरकास्ट के लोग उसपर गोबर फेंकते थे। क्यों फेंकते थे ? क्योंकि उन्हें लड़कियों को पढ़ाना एब्नॉर्मल लगता था। उन्हें ये बात समझ ही नहीं आती थी कि लड़कियों को क्यों पढ़ना चाहिए। उनका बस चलता  तो आज जितनी लड़कियाँ पढ़ लिख कर अपने पाँव पर खड़ी है वो सब घर के अंदर कैद होती। 

1856 में अंग्रेजो को एक और कानून लाकर भारत के अपरकास्ट मर्दो को बताना पड़ा कि विधवा विवाह नॉर्मल है।  1929 में बाल विवाह पर कानून लाकर बताना पड़ा कि बच्चो की शादी ठीक नहीं है 

भारत आजाद हो गया। भीमराव आंबेडकर हिन्दू कोड बिल लेकर आये। हिन्दू अपरकास्ट मेल संस्थाओ ने विरोध करना शुरू कर दिया।नारे हुए , धरने दिए।  बिल भी पास नहीं हो सका। था क्या उसमे ? महिलाओ  को कुछ नॉर्मल अधिकार दिए थे । महिलाओ को दिए अधिकार हिन्दू धर्म पर हमला थे। 

आज 2017 है मेरा एक दोस्त अमेरिका में रहता है वो बताता है कि वहाँ प्रेग्नेंसी के दौरान ही डॉक्टर बता देते है लड़का होगा या लड़की ताकि पेरेंट्स नाम मनमुताबिक पहले ही तय कर सके। नवजात के आने की तैयारियां उसके कपडे पहले से ही खरीद कर रख सके। भारत में जन्म से पहले जांच कानूनन प्रतिबंधित है। क्यों ? क्योंकि यहाँ लड़की का नाम सुनते ही लोग अबॉर्शन करा लेते है। इसका पढाई लिखाई से कोई लेना देना नहीं है। ये हमारे संस्कार है। 

दलितों पर अत्याचार का लम्बा इतिहास है। जितनी गालियाँ हम देते है वो दलित जातियों के नाम का बिगड़ा स्वरूप है या औरतों के बलात्कार से संबधित है। 1989 में सरकार को कानून बना कर अपर कास्ट मर्दो को बताना पड़ा कि अपने देश के नागरिको को अपमान कर के एक राष्ट्र नहीं बन सकता है। आज भी अपर कास्ट मर्दो को ये नहीं समझाया जा सकता कि गाली क्यों नहीं देनी चाहिए। एक जनाब ने पटना की शान में लिखा है 

" पटना वो जगह है जहाँ ब्राह्मण और दलित एक साथ खैनी खाते है "

ये हाल 2017 का है। ब्राह्मणो का दलितों के साथ खाना खाना 2017 में उदारता , गर्व का विषय है। 

भारत के संस्कार जिस हद तक जड़ है इन्हे लगातार हिलाये बिना , निर्ममता से टोके बिना बात नहीं बनेगी। आज जो नॉर्मल है वो सदियों से लोगो के बिना थके प्रयासों का नतीजा है। बुरा लगना , विरोध करना नयी बात नहीं है। अपरकास्ट मर्दो को अपने अंदर झाँकने की आदत नहीं है ये हमेशा से विरोध ही करते आये है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपने अंदर ना झाँकना इनके फायदे का सौदा है। हमारा समाज बहुत अमानवीय रहा है आज भी बहुत सी अमानवीय संस्कार हमारे अंदर है। कोई बात नॉर्मल होने का ये मापदंड नहीं है कि आसपास वाले सब कर रहे है। इन्ही आसपास वालो के लिए सरकार को लिंग जांच बैन करवानी पड़ी है। हम यहाँ तक आये है उसके पीछे जाने कितने लोगो का संघर्ष है। ये संघर्ष लगातार होना बहुत जरुरी है। अतिवाद जैसा कुछ नहीं है ये अपरकास्ट मेल मेंटेलिटी की उपज है। हम आलरेडी अतिवाद में जी रहे है। अंकुश फिल्म का एक सीन है। कुछ नौजवान एक बुजुर्ग के लालच का मजाक उड़ाते है। बुजुर्ग गुस्सा होकर कहता है कि जब ऊपरवाला तुमसे जवाब मांगेगा तब कहाँ जाओगे। इसके जवाब में सब नौजवान गाना गाते है 

ऊपर वाला क्या माँगेगा हमसे कोई जवाब 
भारी पड़ेगा कहंना सुनना हमसे अरे जनाब 
सवाल तो हम पूछेंगे जवाब तो हम मांगेंगे 

वहाँ बुजुर्ग को भगवान से सवाल पूछना अतिवाद लग सकता है क्योंकि उसने अपनी ज़िन्दगी में ऐसा कोई कॉन्सेप्ट सुना ही नहीं होगा। भगवान् से सवाल कैसे हो सकता है।मैं तो भगवान् के आस्तित्व को नहीं मानता हूँ  तो उससे सवाल का तो सवाल ही नहीं उठता।  अपने आसपास बहुत कुछ है जो अतिवाद है।  उसको दूर करना हमारी जिम्मेदारी है  

Tuesday, 13 June 2017

सरकार हमने आपका नमक खाया है।



रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के लिए महान कवि शैलेन्द्र जी ने कविता लिखी थी हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है। उस कविता को गूगल पर सर्च किया तो उसकी शुरुवाती लाइने पढ़ने को मिली। 

हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है 
मत करो बहाने संकट है , मुद्रा प्रसार इन्फ्लेशन है 
इन बनियों को लूटेरो को क्या सरकारी कंसेशन है ?


एक उर्दू के ग़ज़ब के शायर रहे अकबर इलाहाबादी। अकबर इलाहाबादी जी ने अख़बार का महत्व बताते हुए एक शेर लिखा था 
खींचो न कमानों को ना तलवार निकालो 
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो। 

एक हिंदी की सबसे बड़ी हिट फिल्म का सीन है जब विलेन अपने चमचे से पूछता है कि वो उसे गोली क्यों ना मारे तो चमचा कहता है 

"सरकार हमने आपका नमक खाया है 

आज नमक और अख़बार मिलकर हड़ताल से जंग लड़ रहे है। भारत के सभी अख़बार किसके नमक पर ज़िंदा है ये बात कोई छुपी हुई नहीं है। कुत्तों के बाद नमक का हक़ अदा करने में अख़बार सबसे आगे है। बाकी पालतू जीवों को भी अखबारवालों से प्रेरणा लेनी चाहिए। मुझे अख़बार वालों से कोई शिकायत भी नहीं है। जिसकी खावे बाकली उसके गावे गीत। पर चूँकि अख़बार आम आदमी तक जाता है उसकी बेईमानियों को बताना हमारी मजबूरी बन जाता है। 
कल हरियाणा रोडवेज ने हड़ताल की। सभी अख़बार हड़ताल के नुकसानों और जनता की परेशानियों से भरे पड़े है। कभी  कभी लगता है हड़ताल से जनता से ज्यादा परेशान अखबार वाले होते है। हरियाणा रोडवेज को चाहिए था कि अखबार वालों के लिए एक दो बस चला देते। हड़ताल से होने वाले नुकसान का इतना सटीक आंकलन इतनी जल्दी करने वाले अखबारों पर 8 नवंबर से 31 दिसंबर तक ताले लगे थे। नुकसान की रोजाना आंकलन करने वाली इनकी मशीन को जंग लग गया था। 

हरियाणा सरकार निजी बसों को परमिट दे रही है। हरियाणा रोडवेज की सेवाओं के तो दूसरे प्रदेश वाले भी कायल है। निजी क्षेत्र की बसों की लूट से कौन वाकिफ नहीं है। अगर हरियाणा रोडवेज बंद होती है तो उसी जनता को हर रोज कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा इसका अंदाजा अखबार वाले नहीं लगायेंगे , हरियाणा की जनता को लगाना पड़ेगा। हिसार से दिल्ली कभी से प्राइवेट और सरकारी दोनों बस चलती है। हरियाणा रोडवेज की बसों का इतना प्रभाव है कि लोग इन्तजार कर लेंगे पर जाएंगे हरियाणा रोडवेज की बस में ही। 

अख़बार को उनके नमक का हक़ अदा करने दीजिये। रेलवे के स्टेशन बेचे जा रहे हैं  , रोडवेज बेची जा रही है। और देश बेचना किसे कहते है। जनता को ये बात समझने की जरुरत है हड़ताल जनता के लिए ही की जा रही है। सरकारी कर्मचारी कोई दूध के धुले नहीं है वो भी इसी समाज से आये है पर फिर भी निजी क्षेत्र से वो लाख गुना बढ़िया है। अपनी बस , अपने स्कूल , अपने रेल हमें ही बचानी है। अगर इन अख़बार और टीवी वालो के सहारे रहे तो साहिर का ये गाना ही रहेगा गुनगुनाने को बस 

चीन ओ अरब हमारा , हिन्दोस्तां हमारा 
रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा 

जो लोग किसानो को अराजक बताकर उनकी आलोचना में लगे है उन्हें भी साहिर सुनने की जरूरत है 

जेबें है अपनी खाली , क्यों देता वरना गाली 
वो संतरी हमारा , वो पासबाँ हमारा। 

साहिर सुनने की सलाह मासूम लोगो को दी गयी है  जिन्हे सच्चाई का सच में पता नहीं है।  जो लोग सरकार के दलाल है या मिडल क्लास है और दलाली उनके  स्वभाव में आ गयी है वो अपने मुंह से गोबर करते रहे। भारत वालों को आदत है। स्वच्छ भारत टैक्स लगा हुआ है तो गोबर करना बनता भी है। उनके लिए मैं नमक हलाल का गाना   छोड़े जा रहा हूँ 

आप अंदर से कुछ और , बाहर से कुछ और नजर आते है। 
बर्खुरदार शक्ल से तो आप चोर नजर आते है 

Monday, 12 June 2017

लेखक खड़ा प्राइम टाइम में , मांगे खुद की खैर।

                                   
(लेखक को रात एक सपना आया। सपने में लेखक एक  बड़े टीवी चैनल के कटघरे में खड़ा था। लेखक के सपने को हु ब हू यहाँ पेश किया जा रहा है )
नॉएडा फिल्म सिटी में कहीं एक सेट बनाया गया है जिसमे एक तरफ जंग का माहौल जगाने की कोशिश है जिसमे भारत के सैनिक पकिस्तान के सैनिको को मारते दिखाए है। असल जंग जैसा लगे इसलिए बाकायदा सैनिको के रूप 20 -30 लोग अभिनय कर रहे है। दूसरी तरफ क्रिकेट मैच का माहौल है। भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच हो रहा है दर्शक आनंद ले रहे है। इन दोनों के बीच में  तेज तर्रार एंकर खड़ा था एंकर के साइड में मुजरिम की तरह लेखक खड़ा था। अपनी तरह का ये पहला प्राइम टाइम था जिसमे दर्शको , प्लयेर , फौजियों को मिलकर सौ से ज्यादा लोग अभिनय कर रहे थे। अरे चैनल का नाम बताना तो भूल ही गया। चैनल का नाम D टीवी है । कभी डी कम्पनी का राज था अब माहौल बदल चुका है अब डी से दाऊद नहीं देशभक्ति से जाना जाता है। नौ बजने ही वाले है एंकर कभी भी फट सकता है

एंकर - आप सब का देशभक्त टीवी पर स्वागत है। जैसा कि आप सब जानते है कि आज दुश्मन देश पाकिस्तान अपना चैम्पियन ट्रॉफी का सेमीफाइनल जीत चुका है। कल भारत का बांग्लादेश के साथ मुकाबला है। अगर भारत ये मैच जीतता है तो उसे पाकिस्तान के साथ फाइनल  खेलना पड़ेगा। उस पाकिस्तान के साथ जिससे हमारे जवान दिन रात लोहा ले रहे है। जैसा कि आप मेरी दायीं साइड  में देख सकते है कैसे हमारे जवान पाकिस्तान की सेना के नापाक इरादो का हर रोज जवाब देते है। आप बायीं  साइड देखिये कैसे भारत पाकिस्तान के मैच का दर्शक मजा लेते है। क्या हमारे सैनिको के खून की कोई कीमत नहीं है ? क्या एक चैम्पियन ट्राफी देश से बड़ी है। आज का सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या देश के लिए , देश के फौजियों के लिए भारत को बांग्लादेश से हार नहीं जाना चाहिए ? भारत की हार पाकिस्तान के मुंह पर करारा तमाचा होगी। आप इस सवाल का जवाब sms कीजिये

क्या भारत को बांग्लादेश से अपना मैच हार जाना चाहिए
a )  जरूर हार जाना चाहिए   B ) पक्का हार जाना चाहिए
C ) बहुत बड़े अंतर् से हार जाना चाहिए  D ) बड़े नहीं नजदीकी अंतर् से हारना  चाहिए।


आज जब हम यहाँ इस सवाल पर एकमत है कि भारत को पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच नहीं खेलना चाहिए वहीँ भारत में ही कुछ ऐसे लोग भी है जो पाकिस्तान को क्रिकेट में स्पोर्ट करते है उनको चीयर करते है। ऐसे ही एक देशद्रोही से हम आज बात करेंगे। आप जो सोच रहे है कि वो मुसलमान होगा तो बता दूँ हमारे देश में जयचंदो की कमी नहीं है आइये आपको ऐसे ही एक जयचंद से मिलाते है जो स्वघोषित लेखक भी है।

लेखक अमोल सरोज तुम्हारा इस शो में स्वागत मैं नहीं कर सकता। मुझे अपने पर शर्मिन्दिगी हो रही है मैं तुम जैसे आदमी से बात कर रहा हूँ पर देश को तुम्हारी हकीकत से बताना जरुरी है तो तू बता  तू   पाकिस्तान टीम को स्पोर्ट क्यों करता हैं ?

लेखक ,- हमारे खेत का पड़ोसी है भाई । 😂 लव द नेबर । अंग्रेजी का मास्टर बोला। 
एंकर  - वो हमारे दुश्मन हैं हमारे सैनिकों को मारते हैं । तुम्हें शर्म नहीं आती। 
लेखक  - वो पाकिस्तान की सरकार का मामला है पाकिस्तान की सरकार अपने सैनिक भी उतने ही मरवाती है। और सैनिक ही नही अपने नागरिक भी उतने ही मरवाती है । निजाम कहीं का भी निकम्मा हो सकता है । लखनऊ में सीएम को काला झंडा दिखाने पर विद्यार्थियों को जेल हो गयी है । मप्र में किसानों का हाल देख ही रहे हो । चंडीगढ़ में छात्र पिटे। सरकार तो कहीं की भी निकम्मी हो सकती है । किसी किसी देश की सरकार तो अपने देश के नागरिक  को ही जीप के आगे बांध देती है। 
एंकर  - जिस थाली में रोटी खाते हो उसी में छेद करते हो
लेखक  - देशभक्त बाबू  , पाकिस्तान का स्पोर्ट  करने से थाली में छेद नही होता है । मैं तो उस थाली में गोबर न आये इसकी कोशिश कर रहा हूँ । प्यार महोब्बत करने के सिवाय मेरी कोशिश रहती है मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ कुछ ऐसा करू कि मेरी ही नही सबकी थाली में कुछ न कुछ रोटी बढ़े । मैंने अपनी ज़िंदगी के 32 साल क्रिकेट मैच में पाकिस्तान से नफरत करके देखा मेरी पड़ोसी की थाली की रोटियाँ कम ही होती गयी । कोई फर्क नही पड़ा । फिर अहसास हुआ ये तो मामला ही गड़बड़ है । क्रिकेट मैच से प्यार करने से तो रोटी नही बढ़ेंगी । बैंगलोर  की टीम विजय माल्या की है माल्या गरीबों की रोटी क्या थाली भी लेकर लंदन भाग गया है। भारत का कप्तान उसकी टीम का भी कप्तान है । रोटी का मसला तो वहाँ है । पाकिस्तान वालों की तो खुद की रोटी पर डाका पड़ा है वो हमारी रोटी क्या छीनेंगे फिर एक ऑटो के पीछे लिखा देखा
हमें तो अपनो ने लूटा गैरों में कहाँ दम था
हमारी किस्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था
इस शेर ने आँखे खोल दी भाई । आप भी पाकिस्तान टीम से महोब्बत करो क्योंकि उससे आपके दिल मे नफरत कम होगी । नफरत कम होगी तो हम एक साथ होंगे एक साथ हुए तो रोटी का सवाल भी पूछेंगे । बताओ पूछेंगे कि नही पूछेंगे
एंकर  -  ऐसा ही पाकिस्तान से प्यार है तो पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते। 
लेखक - तकनीकी रूप से ग़लत सवाल है। पूंजीवाद में कोई भी अपनी मर्जी से कहीं नहीं जा सकता। पाकिस्तान एक अलग देश है। वहां जाने के लिए वीजा लगता है। पकिस्तान सरकार मुझे वहाँ क्यों रहने देगी जब मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ वहीँ की सरकार को ऐतराज हो रहा है। पाकिस्तान क्या मैं तो उस इंग्लैंड भी जाने को तैयार हूँ जिन्होंने 200 साल भारत का शोषण किया। पाकिस्तान को तो 70 साल ही हुए है। पर मैं इंग्लैंड भी नहीं जा सकता। विजय माल्या और सुभाष चंद्रा इंग्लैंड और पाकिस्तान दोनों जगह जा सकते है। गरीब कहीं नहीं जा सकता। 
एंकर -मैं जो पूछ रहा हूँ उसका जवाब दो तुम बस तुम्हारा पाकिस्तान से क्या रिश्ता है ? क्या तुम कांग्रेसी हो ? 
लेखक - मेरा पाकिस्तान से  पुराना रिश्ता है। जिस धरती पर मैंने जन्म लिया वो पंजाब का हिस्सा थी आधा पंजाब पाकिस्तान में है। हमारी जुबान भी एक थी आज भी हमारी जुबान एक ही है। दुनिया में एक पाकिस्तानी ही ऐसे है जिनसे बात करने के लिए विदेशी जुबान की जरूरत नहीं पड़ती। हमारा बहुत कुछ सांझा है। रही बात कांग्रेस  की तो मैं तो नहीं आपका मालिक जरूर कांग्रेसी था। अब के राज्य सभा में भी कांगेस के विधायकों की मदद से पहुँचा है। मुझे पाकिस्तान क्रिकेट टीम को स्पोर्ट करने से एक नया पैसा नहीं मिलेगा। पर आपके मालिक ने बाकायदा एक चैनल खोलकर पाकिस्तानी सीरियल दिखा दिखा कर करोड़ों रूपये कमायें है पाकिस्तान अभिनेता की  यहाँ भारत में फैन फॉलोइंग बनवाई है। कांग्रेस में जो नेता और बिजनेसमैन हैं उनकी सेहत पर पिछले 3 सालों में  कोई फर्क नहीं पड़ा है। जिंदल वैसे ही तरक्की कर रहा है। उसके भाई को पाकिस्तान भाईचारा बढ़ाने भेजा  जाता है। आप का ये चैनल भी कोई नया नहीं है। कांग्रेस के वक्त का ही है। 

एंकर - अच्छा अब एक देशद्रोही हमारा मुकाबला करेगा। तुम जानते हो मैं कौन हूँ तुम्हारी औकात  नहीं है मुझसे बात करने की। 
लेखक - जी बिलकुल जानता हूँ आप कौन है। आप एक देशभक्त चैनल के देशभक्त एंकर है। मैं देशद्रोही हूँ। आप भारत क्रिकेट टीम को स्पोर्ट करते है मैं पाकिस्तान को स्पोर्ट करता हूँ । आप 2000 के नोट में चिप डलवाते है। मैं चिप वाला 2000 का नोट फाड़कर चिप निकालने की कोशिश करता हूँ और अपने 2000 के रूपये का नुकसान करता हूँ। आप फर्जी विडिओ बनवाते हैं मैं उन फर्जी विडिओ को वाट्सप्प पर शेयर नहीं करता हूँ । आप जिस चैनल पर प्रोग्रम देते है मैं वो चैनल क्या टीवी ही नहीं देखता हूँ । इसके अलावा एक और फर्क भी है आप में और मुझ में 

एंकर (गुस्से में लाल होते हुए )  -क्या 

लेखक -  मैं  कभी तिहाड़ नहीं गया हुआ। 

एंकर - यही हालत रहे तो जल्दी ही चले जाओगे। तुम पाकिस्तान नहीं जा सकते तो इस देश में जी क्यों रहे हो फाँसी तो खा सकते हो 

लेखक  - रस्सी महंगी है
एंकर   - ट्रेन से कट जाओ
लेखक  - स्टेशन बेच दिए प्राइवेट वाले नही कटने देते । पैसे मांगते है
एंकर  - कुए में पड़ जाओ
लेखक - कुए सरकार ने नही छोड़े सब का पानी खराब कर दिया है
एंकर  - गो टू  हेल
लेखक - जी सरकार की पूरी कोशिश है नरक यही बन जाये मैं आलसी हूँ सरकार पर भरोसा करके बैठा हूँ कि कहीं जाना न ही पड़े।


 एंकर  - ये प्रोग्राम बंद करो। कौन लेकर आया इस लेखक को यहाँ। ये वीडियो लेकर जाओ और इसके साथ छेड़छाड़ करके इसे देखने लायक बनाओ और इस लेखक को तिहाड़ भेजने का बंदोबस्त करो।

(तिहाड़ का नाम आते ही लेखक की आँखें खुल गयी और शुक्र  बनाया कि ये सब सपने में हुआ। वैसे शुक्र क्या है ये सब सपने में ही सम्भव है। असलियत में लेखक की इतनी औकात कहाँ है। लेखक परेशान होकर गाना सुनने लगता है।

अपना तो खून पानी , जीना मरना बेमानी
वक्त की हर अदा है अपनी देखी भाली

आपका क्या होगा जनाबे आली।  आपका क्या होगा  )

Saturday, 10 June 2017

सब माया है


आत्मा अजर है अमर है
न कोई मरता है न कोई मारता है
सब माया है
ना जमीन किसी के नाम है
ना किसी के पास काम है
ना कोई खास है न आम है
राजा खामखाह बदनाम है
मुल्क में चैन है आराम है
आगे तो राम का नाम है
ना कोई रोटी खाता है
ना कोई गोली खाता है
ना कोई पेरिस जाता है
ना कोई फाँसी खाता है
जो आता है वो जाता है
कोई भारत भाग्य विधाता है
किसान का बेटा सिपाही है
गोली उसी ने चलाई है
अखबार में खबर आई है
बाप उसका बलवाई है
सरकार ने नरमी दिखाई है
शर्म उनको मगर नही आई है
सब मक़तूल हैं  सब कातिल हैं
सब फर्जी हैं  सब बातिल हैं
भूखे हैं  जो भी नाकाबिल हैं
देशद्रोह में वो ही शामिल हैं
मेरिट में हैं  जो काबिल हैं
काबिल को सब कुछ हासिल है

सब माया है

प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 07





विजय फ़्लैशबैक में गुम था। उस दिन लक्ष्मी के जाने के बाद विजय कितनी देर जनकपुरी मेट्रो स्टेशन पर बैठा रहा था। बाहर जाने के सारे रास्ते उस दिन जैसे उसके लिए बंद हो गए थे। तभी एकाएक उसे अजमेरी गेट के पास उस एसटीडी बूथ पर बैठने वाले बूढ़े आदमी की याद आई. जहाँ से विजय रोज़ लक्ष्मी के ऑफिस में कॉल करता था। लक्ष्मी ऑफिस से रोज़ 6 बजे या उसके बाद ही आती थी पर विजय साढ़े चार बजे वहाँ पहुँच जाता था। और हर दस-पंद्रह मिनट में लक्ष्मी के ऑफिस में फ़ोन मिलाता था। पूरे एक साल हफ़्ते में छह दिन विजय का ये ही शेड्यूल था। 6 बजेदिल्ली गेट से सीधी पीरागढ़ी की बस में बैठते थे डेढ़ घण्टे का वो ब्लू लाइन बस का सफ़र जन्नत जैसा लगता था। पिछले महीने जब विजय लक्ष्मी को फ़ोन करके बूथ वाले अंकल को पैसे देने लगा। तो अंकल ने बड़ी मुश्किल से विजय को कहा

"
मेरे लिए एक समोसा और जलेबी ला दोगे ?"

अंकल शायद पैरालाइज़ थे। हाथ काँपते थे। बोला भी ठीक से नहीं जाता था। चलने की भी शक्ति नहीं थी। विजय को समझ नहीं आया कि अगर उसने समोसे ला भी दिए तो अंकल खाएँगे कैसे ?फिर भी विजय अंकल के लिए समोसे और जलेबी ले आया। समोसे और जलेबी देख कर अंकल ने इशारे से उन्हें सामने रखी प्लेट में रखने को कहा। विजय ने समोसे और जलेबी उस प्लेट में रख दी। अंकल के हाथ इतने काँप रहे थे कि उन हाथों से वो समोसे और जलेबी खाना लगभग असम्भव था। यहाँ जाकर विजय को अंकल की मंशा समझ आयी। अंकल चाहते थे कि वो समोसा विजय उन्हें अपने हाथों से खिला दे। विजय को एक बार अजीब लगा फिर उसके सामने लक्ष्मी का चेहरा घूम गया। बचपन से एक भजन हमेशा सुना हुआ था

तुलसी इस संसार में सबसे मिलिए धाय
ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाए

विजय को वो अंकल नारायण का रूप लगने लगे थे,वो वैसे भगवान् में विश्वास नहीं रखता था पर यहाँ उसने रिस्क लेना ज़रूरी नहीं समझा। उसने अंकल को अपने हाथों से समोसा और जलेबी खिलाया । उसके बाद जब जाने लगा तो अंकल ने रोककर वो प्लेट धोकर साफ़ करने की गुज़ारिश की । नारायण कलयुग के हिसाब से कुछ ज़्यादा डिमांड कर रहे थे पर प्रेम में लोगों ने पहाड़ काटा हुआ है । विजय ने वो प्लेट बिलकुल साफ़ करके वहीं रख दी । 


फिर तो ये रोज़ का काम हो गया । अंकल  ने उसे बताया कि उसके घरवालों को पता नहीं लगना चाहिए । उसके बेटे और बहू उसे खाने नहीं देते हैं । पिछले कितने सालों से वो सिर्फ़ दाल और सूखी रोटी पर ही निर्भर है । विजय को अब लगने लगा था कि उसकी और लक्ष्मी की शादी अब महज़ वक़्त की बात है नारायण ख़ुद आशीर्वाद देंगे ।

लक्ष्मी के जाने के बाद विजय को उस अंकल की याद आई । पिछले चार-पांच दिनों से वो अंकल को समोसे नहीं खिला पाया था । वहाँ जाना ही नहीं हुआ था । उसने जनकपुरी से सीधे अजमेरी गेट का ऑटो पकड़ा । नारायण तो उदार हैं परीक्षा ले रहे हैं ।  जैसे ही वो एसटीडी बूथ पर पहुँचा तो देखा कि बूथ बंद है । पास वाली दुकान पर पूछा तो पता चला कि अंकल हॉस्पिटल में है तीन दिन से। साथ वाली दुकान वाला कहने लगा

"
बूढ़े को शुगर थी,BP था,पैरेलाइज़ था । चटपटा और मीठा खाना मना था पर वो मानता नहीं था । अब तीन दिन से सारे घरवाले दुखी हैं । यहाँ भी जाने कैसे बदजात लोग है जो उस बूढ़े को अपने हाथ से समोसे जलेबी खिला जाते थे।


Friday, 9 June 2017

प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 06






अभी  कॉफी हाउस में बैठा विजय सोच रहा था पार्क में इन बच्चों को पीटने वाले कहाँ जाएंगे जब ये बच्चे अपने माँ-बाप से खुली बग़ावत करके सड़कों पर आ जाएँगे। पुलिस को भले ही अपनी वर्दी का वहम हो पर बच्चों के लिए सबसे बड़ी मोरल पुलिस उनके घरवाले ही हैं जिस दिन उनका डर निकल गया कोई भी एंटी रोमियो स्क्वॉड उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। एक दिन ऐसा आएगा। क्या विजय वो दिन देखने के लिए ज़िंदा है या वो इस बात की सांत्वना में ज़िंदा है कि यहाँ वो अकेला नहीं है जो एंटी रोमियो स्क्वॉड का शिकार हुआ है। इस बात का फ़ैसला विजय नहीं कर पाया है

विजय ने अख़बार हटाकर फिर उस लड़की की तरफ देखना चाहा पर अब वहाँ एक खाली कुर्सी थी। लड़की शायद जा चुकी थी। ठीक ऐसे ही एक दिन लक्ष्मी उसकी ज़िन्दगी से चली गयी थी। उसी दिन जिस दिन वो सीए बना था। जिस दिन उसे सबसे ज़्यादा खुश होना था उसी दिन वो सबसे ज़्यादा दुखी था। बहुत से दोस्तों की नज़र में उसका दुःख फ़िल्मी था। विजय लक्ष्मी से शादी करना चाहता था जो सम्भव नहीं था और ऐसी कोई ख़ास बात भी नहीं थी जिसके दुःख में इतना पागल हुआ जाए। पर ये सारी बातें विजय को समझ नहीं आ रही थी। पिछले एक डेढ़ साल में उसने अपनी ज़िन्दगी लक्ष्मी के आसपास ही समेट ली थी। वो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि एक दिन लक्ष्मी उसकी ज़िन्दगी से इतनी दूर चली जाएगी। उस दिन जब लक्ष्मी ने बताया कि उसके पापा ने उसकी शादी तय कर दी है तो विजय को एक बार के लिए ये बात मज़ाक लगी। मज़ाक में भी ये बात उसे पसंद नहीं आयी।

"
यार ऐसे मज़ाक मत किया करो सच हो जाती है कई बार मज़ाक में कही बात। "

"
विजय मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ। मैं पापा को तुम्हारे लिए कन्विंस नहीं कर सकी। मेरी सगाई की डेट फिक्स हुई है दो हफ़्ते बाद। "

"
तू बंद करेगी ये सब। अभी मेरा मूड नहीं है मज़ाक करने का "

काश विजय देख सकता लक्ष्मी की आँखों के वो आँसू जो निकलने के लिए आतुर थे। पर विजय को दूसरों के आँसू देखने की आदत नहीं थी। उसके पास अपने ही बहुत थे। पानी से भरी उसकी आँखें अब कुछ भी देखने से मना कर रही थी।

"
ये क्या लक्ष्मी। तुमने हाँ क्यों की ? तुम ने मेरे बारे में नहीं सोचा। मैं कैसे रहूँगा तुम्हारे बिना। अगर पापा की ही बेटी बनना था तो मुझसे मिलने की क्या ज़रूरत थी ? मेरी ज़िन्दगी ख़राब करने की क्या ज़रूरत थी ? शादी के लिये घरवाले ठीक हैं प्यार के लिए विजय ठीक है। तुम इतने वक़्त से टाइम पास कर रही थी मेरे साथ। "

विजय क्या बोल रहा था क्यों बोल रहा था ये सब उसे ख़ुद भी नहीं पता था। शायद लड़कियों के लिए जो कुछ वो बचपन से सुनता आया था सब बोल गया। इतना सब सुनने के बाद लक्ष्मी के आँसू बिना आए ही सूख गए थे। पर विजय ने बोलना बंद नहीं किया था।

"
तुम्हारे पापा तो कम्युनिस्ट है। मेरी बात कराओ उनसे। वो मान जाएँगे। "

"
तुम भी तो कामरेड विचारधारा को ही मानते हो अभी तुमने जो कुछ कहा उसे सुनना तुम दोबारा याद करके। पापा भी कामरेड हैं वो अपने बेटी की शादी अपनी जाति के ही लड़के से करना चाहते हैं। मेरे सामने भी एक कामरेड बैठा है जो उस लड़की को पिछले दस मिनट से भला-बुरा कह रहा है जिसके साथ वो सारी ज़िन्दगी बिताने के सपने देखता है। बिना ये ख़याल किए कि उस लड़की ने किस हालात में ये फ़ैसला किया होगा। "मैं " के अलावा तुम्हारी ज़िन्दगी में और कुछ है भी या नहीं ? मेरे पापा ने समाजवाद की हर किताब पढ़ी है। मुझे भी आजादी दी। पर मम्मी को समाजवाद से दूर रखा। शायद मेरी शादी अपनी जाति में कराने के लिए ही। मैं मेरी माँ की आँखों में आँसू नहीं देख सकती बचपन की कमज़ोरी है मेरी। पापा के दोस्तों की महफ़िलों में वेटर की तरह खाना सर्व करती मेरी माँ के पास अगर कुछ है तो मैं हूँ। सुबह 5 बजे से रात दस बजे तक काम करते मैंने देखा है मेरी माँ को। पापा तो बैठक में भाषण देने में मशगूल रहते थे। उन्हें हर आधे घंटे में चाय की दरकार होती थी। सर्वहारा सामंतवाद बुर्जुआ और जाने क्या-क्या जानते थे। दुनिया के हर मेहनतकश की आज़ादी की पैरवी करते थे पर शायद मेरी माँ उन मज़दूरों में नहीं आती थी। मैं पहले दिन से जानती थी पापा हमारी शादी के लिए कभी नहीं मानेंगे। फिर भी मैंने तुमसे प्यार किया क्योंकि तुम्हारी आँखें देख कर मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई। मुझे लगा ये इन्सान भी मेरी तरह दुनिया में अकेला है। शायद मुझे इतने आगे नहीं आना चाहिए था। ग़ुलाम को  अपनी हद का पता होना चाहिए। मुझे ख़ुद कहाँ पता था तुमसे  मिलने के बाद मैं किसी हद में नहीं रहूँगी। टाइमपास शब्द बोलते हुए तुमने एक पल के लिए भी पिछले डेढ़ सालों को याद नहीं किया। तुमसे मिलकर मुझे लगता था मैं दुनिया की सबसे ख़ुशक़िस्मत लड़की हूँ जिसे विजय मिला,जो शायद इस पूरी दुनिया से अलग है जो रिश्तों को पैसे की तराजू पर नहीं तोलता है। पर शायद मैं ग़लत थी तुम में और मेरे पापा में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है। मैं तुम्हारे लिए भी जीत और हार का ही विषय हूँ। आज मेरी शादी किसी और से हो गई तो तुम मुझे हार गए। पता है आज मैं तुम्हारे साथ रोने आयी थी। मुझे लगा था हम मिलकर बहुत रोएँगे । कुछ बोलेंगे नहीं। पर अब मेरी आँखों में आँसू आ ही नहीं रहे। शायद मेरे आँसुओं को भी ख़ुद की कद्र है वो तुम्हारे सामने नहीं निकलना चाहते। तुम्हें अभी बेवफ़ाई वाली शायरी भी करनी होगी मेरी आँखों के आँसू शायद तुम्हारी शायरी में भी खलल डालेंगे। बेवफ़ा कहाँ रोती  है। वो टाइमपास करती है वो तो उस आदमी का सबकुछ लूटकर ले जाती हैं जिसके पास उसका कुछ था ही नहीं। मैं जा रही हूँ। तुम रोओ शायरी करो। पुराने किले की दीवार पर लिख आना "लक्ष्मी भट्टाचार्य बेवफा है "हो सकता है कोई प्रगतिशील नारीवादी लेखक उस दीवार पर लिखे मेरा नाम लिखा देखे और एक नॉवल लिख दे "लक्ष्मी भट्टाचार्य बेवफा नहीं है "। मेरे हक़ में कोई दुआ कर सकते हो तो इतनी करना कि मेरे होने वाला हमसफ़र प्रोग्रेसिव ना हो। "

विजय सब सर झुकाए सुन रहा था। जब उसने सर उठा कर देखा तो लक्ष्मी वहाँ नहीं थी। विजय क्या करे अब ? उसे घर भी जाना था। अपने घर वालों को सीए पास होने की ख़बर भी देनी थी। वो दिन भी सन्डे ही था। उसकी ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल सन्डे। जब सब उसकी सफलता पर ख़ुश थे। बहुत ख़ुश थे। पर वो ख़ुश होना तो दूर की बात है ख़ुश होने का नाटक भी नहीं कर पा रहा था।

Thursday, 8 June 2017

तुम एक गोरखधंधा हो



कॉमरेड जब अपने परिजनों के दाह सँस्कार के लिए गंजा होता है। अपने माता पिता की चिता को अग्नि देता है।  पिंड दान करता है हरिद्वार अस्थि विसर्जन करता है तो वो उनकी इच्छा का पालन करता है। जबकि कॉमरेड को अच्छे से पता है कि मरने के बाद कोई इच्छा विछा नहीं होती है। जिन्दा इंसानो को   ही डेमोक्रेसी मिल जाये ये ही बहुत है। मरने से पहले आखिरी इच्छा जैसा ब्राह्मणवादी कॉन्सेप्ट को कॉमरेड अपनी ढाल बना लेता है। जब वो खुद मरता है तो उसके हाथ में वैसे ही कुछ नहीं रहता ना वो जीते जी ऐसा कोई उदारहण पेश कर के जाता है जिससे घर वालों को लगे ये अपने उसूलों के लिए पक्का था। फिर घर वाले अपनी इच्छा से उसका अंतिम संस्कार कर देते है। कॉमरेड 70 साल का भी हो जाता है तो भी घर वालों को ये ही लगता है कि एक खिलौना है जिससे खेल रहा है। कोई सीरियस बात नहीं है।

यही हाल शादी ब्याह के लिए होता है। जब खुद की होती है तो घरवालों की चाह ,इज़्ज़त और भावना अहम् होती है। घरवालों को दुखी नहीं करना। एक तो लव मैरिज कर ही रहे है शादी घर वालों की ख़ुशी से कर लेते है। या एक ही बार की बात है। दहेज़ भी ले लेते है। लड़की के पापा का दिल नहीं दुखाना। 24 कैरेट कुछ नहीं होता। आंधी में तना हुआ पेड़ सबसे पहले गिरता है। लचीलापन होना चाहिए। समाज में सारे काम करने पड़ते है दुसरो की ख़ुशी बहुत अहम् है। यही कॉमरेड जब अपनी बच्चो की शादी करता है तो डेमोक्रेट और लिबरल बन जाता है। बच्चों पर अपने असूल नहीं थोपने। बच्चे अगर धूम धाम से शादी करना चाह रहे है तो उनका लोकतान्त्रिक अधिकार है। अगर उनकी लड़की चाहती है कि कॉमरेड  कन्यादान के लिए खड़ा हो जाता। बीवी चाहती है तो कॉमरेड छलनी के सामने खड़ा हो जाता है।

इतनी क्यूटनेस अच्छी नहीं होती। कितना मुश्किल है अपना स्टैंड घर वालों को समझाना। घर वाले आराम से समझ जाते है अगर थोड़ी सी विल पावर हो। अपने पापा को ये बात कहनी कितनी मुश्किल है कि

"देखो ड्यूड मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ मैं कभी नहीं चाहूँगा कि आप कभी मरो पर चूँकि जीना और मरना कोई गीता ज्ञान नहीं है विज्ञान है  बॉडी एक्सपायरी डेट लिए आती है तो जब भी ऐसी स्थिति  आएगी तो मुझ से अंतिम संस्कार की उम्मीद मत रखना। दाह सँस्कार तुम्हारा  निजी विश्वास है मुझे नहीं लगता उसके करने से आपका कोई भला होगा। मैं अपने आप से झूठ नहीं बोल सकता। आप देख लेना अपना जुगाड़। "

बोल नहीं सकते तो लिख सकते हो। और कॉमरेड कोई श्रवण कुमार हो या घर के लिए इतना समर्पित हो ऐसा भी तो नहीं है। घरवाले तो बहुत चाहते है कॉमरेड शराब सिगरेट न पिए। बीवी तो बहुत चाहती है कॉमरेड अपनीं बेटी की उम्र  की लड़की से अफेयर न करे। पर वहाँ हम बहुत क्रन्तिकारी है। सारी क्रन्तिकारी ब्राह्मणवाद को टच करने पर ख़त्म हो जाती है।

और जो ये मेरे जैसे भाई है जो फेसबुक ने क्रांतिकारी बनाये है। उन्हें भी ये बात समझनी चाहिए कि समाज के भले की बात करना कोई गीता का ज्ञान देने जैसा नहीं है जैसे ही आप यहाँ आते हो। गरीब के समाज के भले की एक भी बात कहते हो आपकी जवाब देही भी शुरू हो जाती है। आप सवालों से बच नहीं सकते। आप नारी सम्मान की बात करते हो और हनी सिंह के गानो पर डांस करके उसकी विडिओ भी फेसबुक पर डालते हो और ये अपेक्षा भी करते हो कि आपके मनोरंजन पर सवाल नहीं उठेंगे ? अपनीं हर छोटी से आलोचना  पर "24 कैरेट 24 कैरेट " बोलकर व्यंग्य मजाक करने वालो को कब ये अहसास होगा कि भाई ये तो दशमलव जीरो एक प्रतिशत कैरेट भी नहीं है। आप अपने अश्लील मनोरंजन का विडिओ डालने के लोभ से भी मुक्त नहीं हो सकते तो 24 कैरेट का सवाल अभी कहाँ है ? अपनी कमजोरी अपनी हार तो माननी पड़ेगी। कम से कम ये ही परम्परा दे दीजिये आने वाली पीढ़ी को। अपनी हर सुविधा को तर्क और विचारधारा का जामा पहनना जरुरी नहीं है। ओके लव मैरिज की बढ़िया है आगे हमने ग़लती की या विपक्षी जायदा ताकतवर थे हम ज्यादा सुविधाभोगी। हमने हार मान ली। आगे फिर से कोशिश करेंगे। जब जागो तभी सवेरा है। शादी कर ली दहेज़ ले लिया। ज़िन्दगी ख़त्म थोड़ी हुई है। अपनी हार और कमजोरी को स्वीकार करो।  जितनी बार सवाल उठे उतनी बार बहानेबाजी और तर्कों की बजाय ईमानदारी से स्वीकार करो और आगे कोशिश करो।

और ये जो समाज से कटने का , बहिष्कार का तर्क है बहुत वाहियात है। समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता आप किसी की मय्यत में , शादी में जाते हो या नहीं। समाज को आपके काम से मतलब है। आप खाली वक्त में बच्चो को पढ़ाते हो जिससे मिलते हो हंस के मिलते हो हर किसी को भाषण नहीं पिलाते। तो वो सब आपसे खूब मिलेंगे। किसी के मरने पर उसके घर खाली पिली 18 कप चाय पीने से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट ये है कि आप उनके घरवालों के कुछ काम आये या नहीं।

ये सब छोटी छोटी बाते है पता नहीं क्या कन्फ्यूजन है इसमें। मुझे तो लिखते हुए भी शर्म आ रही है। सिम्पल सी बात है अपने आसपास वालो को अपनी विचारधारा समझाओ। अगर उसे सही समझते हो तो उस पर बने रहो। जीते जी ब्राह्मणवादी कर्म काण्ड में शामिल मत हो। मरने के बाद पुख्ता इंतजाम कर के जाओ कि ब्राह्मणवादी कर्मकांड न हो सके। अगर अब भी कन्फ्यूजन है तो एक गाने की दो लाइन लिखता हूँ उन्हें अपने जीवन में उतार लीजिये जीवन सफल हो जायेगा



छोटी सी ज़िन्दगी गहरी सी जेब है
बाकी तो जानेमन बातों के सेब है।

क्यों फ़ालतू टेंशन में पड़े हो।



प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 05



विजय अख़बार में एंटी रोमियो स्क्वॉड की खबरें पढ़ रहा था। उसे अचरज था कि भारत जैसे देश में जहाँ इतनी सारी बंदिशे पहले से हैं वहाँ प्यार का इतना खौफ़ है कि पुलिस में अलग डिपार्टमेंट बनाने की नौबत आ गई। बलात्कार , मर्डर , चोरी डकैती को रोकने में असफल पुलिस अब बच्चों को प्यार करने से रोकेगी जो पहले ही घरवालों से छुप-छुप कर मिलते थे। मानसिक और शारीरिक कितनी पाबंदियाँ हैं बच्चों पर उन सब को पार करके जो मिलने के रास्ते ढूँढ लेते हैं उनके लिए पुलिस तैनात कर दी है। विजय सोचने लगा वो और लक्ष्मी तो दिल्ली में रहते थे अपने घर वालों से दूर। दिल्ली में एंटी रोमियो स्क्वॉड भी नहीं था,तो वो कौन सी बंदिश थी जो उन्हें उस दिन पुराना किला जाने से रोक रही थी। 


ग़ज़ब दिन था वो भी। शायद विजय की ज़िन्दगी का सबसे प्यारा दिन। दोनों ने उस दिन ऑफिस और कोचिंग से बंक मारकर दिल्ली घूमने का निर्णय ले लिया था। सुबह 7 बजे वो सीपी से निकल तो लिए थे पर सवाल था जाएँ कहाँ। दिल्ली घूमने में दोनों का इंटरेस्ट नहीं था। दोनों किसी पार्क में ऐसी जगह जाना चाहते थे जहाँ कोई उन्हें न देख सके। पर ऐसी जगह जाने की बात कहेगा कौन ये मसला पेचीदा था। दोनों बिना कहे पुराना किला जाने वाली बस में बैठ गए। विजय की ख़्वाहिश थी ऐसी जगह पर वो सारा दिन बिता दे जहाँ उन्हें कोई न देख सके। वो लक्ष्मी के गले लगकर रो सके। सारा दिन एक दूसरे के पास।  किसी भी प्रेमी युगल की शायद ये सबसे बड़ी चाहत होगी। पर समाज को उनकी ये ख़्वाहिश हमेशा नाक़ाबिले बर्दाश्त रही है। बाक़ी चाहने वालों की तरह  दुनिया भर के आदर्श , आत्मग्लानि उनके पाँव की भी बेड़ियाँ बने हुए थे। वो दोनों जानते थे कि ऐसी जगह पर बैठने वालों को समाज,ये दुनिया क्या कहती है कैसी नज़र से देखती है। अगर किसी ने देख लिया तो ? विजय अपने पापा के पैसे से दिल्ली पढ़ने आया है। क्या उसे प्यार करने की अनुमति है ? लक्ष्मी तो साथ में लड़की भी है। उसके पापा ने दिल्ली भेजा है। वो क्या कर रही है पुराना किला में। जाने उनके मन में ऐसे कितने एंटी रोमियो स्क्वॉड थे जो उनके क़दम रोकने की भरपूर कोशिश कर रहे थे। विजय और लक्ष्मी ने पुराने किले के गेट पहुँचने तक एक दूसरे से नज़र नहीं मिलायी थी। गेट तक पहुँचते-पहुँचते उनकी हिम्मत जवाब दे गई थी। एंटी रोमियो स्क्वॉड जीत गया था। वो दोनों गेट से ही वापिस हो चुके थे। प्यार में डर और बगावत के ख़याल साथ-साथ चलते हैं। जब तक वो वापिस बस स्टैंड पर आते हल्की-हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। लक्ष्मी बोली - चल पैदल चलते हैं थोड़ी दूर। और बिना जवाब सुने विजय को जबरन धकेलते हुए इंडिया गेट की ओर ले गई। बारिश तेज़ शुरू हो चुकी थी लक्ष्मी और विजय एक दूसरे से बिलकुल चिपके हुए भीगे जा रहे थे। कितनी कमाल की बात थी,वो दोनों थोड़ी देर पहले ही पार्क के किसी कोने में जाने से डर रहे थे कि कोई देख न ले और अब सरे राह सारी दुनिया को चुनौती देते हुई बेफ़िक्र भीग रहे थे। उनके मन के सारे एंटी रोमियो स्क्वॉड के पुलिसवाले कहीं कोने में छुप गए थे,इंडिया गेट आते-आते दोनों पूरी तरह से भीग चुके थे। इंडिया गेट के बेंच पर पूरी दुनिया से बेफ़िक्र वो वैसे ही एक दूसरे से सटे हुए बैठे थे जिसकी तमन्ना वो पुराने किले के किसी कोने में कर रहे थे और जिसे वो किसी के देखने के डर से रिजेक्ट कर चुके थे। उस बारिश में भीगने के बाद विजय को समझ आ गया था कि उनके घर में हर रोज़ चिकन बनेगा। लक्ष्मी के साथ रहने के लिए खाना तो बहुत छोटी बात थी। वो मम्मी को मना लेगा। उसके हाथों में उसे सारी दुनिया दिखाई देनी लगी थी। उसे लगा केदारनाथ अग्रवाल ने ये लाइन उसी के लिए लिखी है 

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.


बाकी सारा दिन इंडिया गेट पर बिताने के बाद अलग होना कितना मुश्किल काम था जबकि सुबह उन्हें फिर मिलना था। किसी से ऐसे ज़िन्दगी भर के लिए जुदा होना पड़े तो ? ये सोच कर ही विजय को कंपकंपी आ जाती थी। नहीं मैं लक्ष्मी के बिना नहीं रह पाऊँगा।रहना ही नहीं है। जनकपुर मेट्रो स्टेशन पर लक्ष्मी को छोड़कर विजय वापिस करोल बाग़  के लिए मेट्रो पकड़ रहा था। FM पर शहरयार की ग़ज़ल आ रही थी


हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है

अब तो हर बार यही बात सताती है हमें।


कैसे कोई विजय के मन की हर बात काग़ज़ पर लिख गया है ये सोच कर विजय बहुत हैरान होता था। ये बात किस कदर उसे सताती थी इसको वो शायद किसी  को बता भी नहीं सकता था। ये प्यार था। विजय को अहसास नहीं था कि ये अहसास कितना क़ीमती होता है।

Wednesday, 7 June 2017

ये ऊँचे महल चौबारे सब कांग्रेस राज के है



मेरे दादा जी कमाल के कैरेक्टर थे। अंग्रेजो के वक्त अंग्रेजो की इंडियन आर्मी में अर्दली थे। अंग्रेज गए तो दादा जी को एक गाडी दे गए। कहानी बहुत कुछ फ़िल्मी टाइप है। उस गाडी में दादाजी भिवानी बहल रोड पर बर्फ ढोते थे। वहीँ आते जाते गोलागढ़ गाँव के बंसी लाल  मुलाकात हुई तो उसका कुरता छोड़ा ही नहीं। घर के हाल खस्ता थे। आमदनी कुछ नहीं थी तो रायपुर तक रोजी रोटी की तलाश में चले गए। मूडी ऐसे कि   वहां सब बसा बसाया छोड़कर एक दिन वापिस गाँव भी आ गये। खुद पढ़े लिखे नहीं थे पर दो बातों का पता था एक पढाई की कीमत उस वक़्त घर के हर बच्चे को पढ़ाया। 1990 में जब मेरी बहन का एड्मिसन सरकारी स्कूल में हेडमास्टर ने सिर्फ इसलिए करने से मना कर दिया कि लड़की क्या करेगी लड़को के साथ पढ़के। तो दादाजी ही थे जिन्होंने बताया कि ये तो मेरी पोती है। मेरी बेटी ने बीएड की हुई है।

दूसरा दादा जी  की राजनीती की मामूली सी समझ। उन्हें इतना पता था कि नेताओ के आसपास रहने से बात बन जाती है। जब तक जिए बंसीलाल के साथ रहे। अपने अधिकतर बेटे बेटियों  नौकरी लगवाई। आज हमारे घर में सब ठीकठाक जगह सेट है। हमेशा ऐसा नहीं था। आज चाचा  फेसबुक पर रविश को कांग्रेसी कुत्ता और जाने क्या क्या लिख रहे है। उनसे ये पूछना ठीक नहीं रहेगा कि कोई दादा जी को कॉंग्रेसी  कुत्ता कहे तो कैसा लगेगा। इस देश की मिडल क्लास जनता को ज्यादा सीरियस नहीं लेना चाहिए।  वो सब एक नंबर के भोले और भुलक्क़ड हैं।  इन लोगों से किसी हवा तवा का बीच अंदाजा नहीं लगाना चाहिए। ये वोट डालते वक्त कॉंग्रेसी हो सकते है।

अब फेसबुक पर कहना आसान है। दूसरे को कहना आसान है। रविश को मैं जितनी आसानी से कह सकता हूँ उतनी आसानी से अपने चाचा को नहीं कह सकता। जितनी सहजता और आक्रामकता से मैं पापा की उम्र के और लोगो से बात  करता हूँ। उतनी पापा से नहीं कर पाउँगा। सारा प्रयास इसी सहजता को लाने का है। अपने चाचा को टोक सकते हो या नहीं ये अहम् बात है। रविश को टोकना भी उतना सरल नहीं है फिर भी अपने चाचा की अपेक्षा आसान है।

आज जितने लोग कांग्रेस को खान्ग्रेस , पप्पू , वगरैह लिख रहे है उनके खानदान की हिस्ट्री निकलवा लो।  सब कांग्रेस राज में मलाई खाये हुए मिलेंगे। व्यापारी , सरकारी अफसर , मिल्ट्री ऑफिसर सारे देशभक्त सब मिले हुए है जी। सुभाष चंद्रा  से लेकर मेरे चाचा , मामा  तक सब का उत्थान कांग्रेस के समय ही हुआ। तो इनकी बातों का ज्यादा बुरा नहीं मानना चाहिए।

जिन लोगों का कांग्रेस ने बुरा किया बहुत बुरा किया वो आज भी कांग्रेस को ही वोट देते है। उनकी समझ और हैसियत आज भी कांग्रेस विरोध की नहीं है।

एक तो आप और हम जो भला कर सकते है वो ये कर सकते है कि जनता पर अहसान  करना बंद कर सकते है। कोई अहसान वास्तव में है भी नहीं और अगर .000001 परसेंट है भी तो जनता को इस बात का अहसास नहीं होने का। अगर आपका अपना दिल खुश होता  तो लिखिए , अपना दिल खुश होता है तो और काम कीजिये। बस समाज और देश के लिए कुछ मत कीजिये। जिन्होंने आज तक किया है जनता को  उनका ही लिया दिया नहीं सिमट रहा है। जनता को जब अपना खुद का भला ही नहीं दिख रहा आपका अहसान कहाँ से  दिखेगा। ये अहसान वाले मोड़ से बाहर निकलना सबसे पहले जरुरी है। बाकी अपनी धुन में लगे रहिये। हम जो करते है अपने लिए करते है। अपने लिए ही करना चाहिए। मन मार कर की गयी भलाई किसी काम नहीं आती। मन कर रहा है बिजनेस करने का , फंसे हुए है समाज की सेवा में। तो दिन रात इसी बात का खटका लगा रहेगा कि वहाँ रहता तो इतना कमा जाते यहाँ समाज सेवा में तो इज़्ज़त भी नहीं मिल रही क्या फायदा हुआ। ज़िन्दगी बहुत बड़ी है। पहले फायदे वाला काम  कर लो ये समाज कहीं भागा थोड़ी जा रहा है ये तो सेवा करवाने के लिए यही खड़ा मिलेगा। कभी कर लेना। हमारे मोदी जी से सीखो पहले दुनिया के देशों को ही निबटा रहे है। सब निबट जायेंगे तो अपने पूरे मन से अपने देश की चौकीदारी ही करनी है देश कहीं भागा थोड़ी जा रहा है। समाज सबको सेवा का मौका दे देगा। समाज के पास पेशंस बहुत है







प्रेम कहानी : एंटी रोमियो स्क्वायड Chapter 04




हर सन्डे विजय किसी लड़की के चेहरे में लक्ष्मी ढूँढने की कोशिश करता और दोपहर तक लक्ष्मी से जुड़ी सारी यादों को मन ही मन दोहरा लेता । जब वो लक्ष्मी के साथ होता था तो सब बहुत नॉर्मल लगता था आसान लगता था । लक्ष्मी के साथ शादी जैसे सबसे आसान काम था दोनों एक दूसरे को पसन्द करते थे । बंगाल हरियाणा से क्या फ़र्क़ पड़ता है जाति से भी क्या फ़र्क़ पड़ता है । दोनों सीए पास करके दिल्ली में ऑफिस खोलेंगे अपना ख़ुद का । साथ ही काम करेंगे साथ ही ऑफिस आया-जाया करेंगे। दोनों के माँ-बाप को साथ रखेंगे । बुढ़ापे तक की सब प्लानिंग कर ली थी पर मामला सारा खाने पर अटक गया था। 


कॉफी हाउस में खाना खाते खाते हुई बहस ने एक गंभीर मुकद्दमा खड़ा कर दिया था जो एक हफ़्ते में जाकर सॉल्व हुआ।
लक्ष्मी ने खाना खाते हुए कहा," दिल्ली में रहने का सबसे बड़ा नुकसान है मैं मछली मिस करती हूँ कलकत्ते की  "
विजय ने हँसते हुए कहा ," हमारे घर नॉन वेज नहीं बनता"
लक्ष्मी ने कहा ,"मैं बना कर खिलाऊंगी तुम्हे चिकन मटन मस्त देखना तुम "
"
पर हमारे घर नॉन वेज नहीं बनता । मम्मी बनाने नहीं देगी । मैं तुम्हें बाहर खिला लाया करूँगा "
"
मेरे खाने से तुम्हारे घरवालों को क्या दिक़्क़त है । उनके लिये सब्ज़ी भी बनाएंगे डरो मत " लक्ष्मी फिर हँसी
"
अगर घर में नॉन वेज बना तो मम्मी साथ नहीं रहेगी "
"
सीरियस्ली ? खाना इतना बड़ा इशू है ? कैसे बनेगी बात । मैं बिना नॉन वेज नहीं रह सकती । और बिना किसी कारण तो बिलकुल नहीं "
"
तुम तो ब्राह्मण हो ना "
लक्ष्मी फिर जोर से हँसी ," अरे हम आदमी खाने वाले ब्राह्मण हैं,नॉन वेज से ही काम चला लेते हैं "
विजय ने बहुत हल्की आवाज़ में पूछा ," तुम मेरे लिये नॉन वेज नहीं छोड़ सकती "
लक्ष्मी ने जल्दी से बात को सीरियस लेना नहीं सीखा था ," बिलकुल नहीं तुम्हें मैं कितने दिन खाऊँगी । उसके बाद फिर नॉन वेज शुरू करना पड़ेगा "
बसे बसाए सपनों के महल की नींव खाने के सवाल ने हिला दी थी। विजय ने बात टालने की कोशिश की
"
बाद की बाद में देखेंगे "
"
मैं तुमसे अपने खाने के लिये तुम्हारे माँ-बाप को छोड़ने के लिए नहीं कहूँगी क्योंकि दोनों की कोई तुलना ही नहीं है । तुम्हारे लिए खाना छोड़ने की बात बेवकूफ़ी की बात है दोबारा मत कहना । जब तुम्हारे घरवाले मुझे अपनाएँगे तो मेरा खाना भी अपना लेंगे । चिंता ना करो तुम "

ये बात इतने आत्मविश्वास से लक्ष्मी ने कही कि और कोई बात कहने की विजय की हिम्मत नहीं हुई ।
यादों से तंग आकर विजय ने अख़बार पढ़ना चाहा । पहले ही पेज पर बीफ़ खाने के शक में एक आदमी के मारे जाने की ख़बर थी । नई सरकार ने अवैध मीट की दुकान बंद करने के आदेश दिए हैं । बूचड़खाने बन्द हो रहे हैं । मानवीयता के नाम पर आदमी के मुँह से खाना छीना जा रहा है । विजय एक बार सोचने को मजबूर हो गया सभ्यता से अश्लील शब्द और कोई है क्या ? कोई इंसान खाना खाता बर्दाश्त नहीं होता प्यार करता बर्दाश्त नहीं होता। और ये लोग अपने को सबसे संवेदनशील कौम होने का दावा करते है । विजय का सर दर्द से फटा जा रहा था तभी उसकी नज़र फिर उस लड़की पर गई जो बिलकुल लक्ष्मी की तरह हँस रही थी पर उसके साथ लड़का कोई और था। 6 साल बाद भी विजय इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि कोई लक्ष्मी जैसी दिखने वाली लड़की किसी लड़के से हँस कर बात करे। ये कैसा प्यार था कैसा जाल था जिसमें विजय फँस गया था और बाहर निकलना भी नहीं चाह रहा था।

मार्क्सवाद , कटटरवाद और पांडेवाद



अज्ञानता के अपने सुख दुःख है। गूगल सर्च किया तो पता लगा मैनेजर पांडे जी तो हिंदी के बहुत बड़े विद्वान् है। पांच से किताब आ चुकी है। हिंदी के आलोचक है मतलब हिंदी किताबो के समीक्षक है। उम्रदराज है। सुना है सारी उम्र मार्क्स की समीक्षा करते हुए गुजारी है। खैर मैंने प्रण लिया है अगले तीन महीने तक 50 से ऊपर के लोगो का दिल नहीं दुखाऊंगा। मैनेजर पाण्डे पर बात नहीं करते है। उसके बहुत से कारण है एक तो ये है मैंने हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा हुआ दूसरा मैंने कार्ल मार्क्स भी ज्यादा नहीं पढ़ा हुआ। पहले भी बताया है बिना ज्यादा पढ़े बोलने से लोग बीजेपी का नेता समझने लगते है। मैनेजर पांडे जी को जाने देते है परसाई को याद करते है। परसाई ने संस्कारो और शास्त्रों की लड़ाई में लिखा है वो पढ़ते है

"मेरे एक और दोस्त है। मुझसे ज्यादा वैज्ञानिक दॄष्टि  संपन्न , विचार और कर्म दोनों से क्रन्तिकारी है। मैं ही उनसे ज्ञान और प्रेरणा लेता रहा हूँ। एक दिन मैंने उन्हें धोती पहने , पालथी मारे सत्यनारायण की कथा पर बैठे , रंगे हाथो पकड़ लिया।
मुझे लगा , जैसे एम्बुलेंस की गाडी ने ही मुझे कुचल दिया हो।
मैंने दूसरे दिन उनसे पूछा ," झूठ नारायण , यह तुम्हारी हरकत है ? उसने कहा , " यार 'मदर इन लॉ ' ने बहुत ज़ोर डाला था। "
खैर परसाई जी को भी जाने देते है। पाण्डे जी को भी जाने देते है। मुझे दो  बातें कहनी थी। दोनों ही ऐसी नॉर्मल बातें है कि कहते हुए भी संकोच हो रहा है पर कहनी जरुरी है। 

पहली बात डेमोक्रेसी के लिए। अधिकतर दोस्त डेमोक्रेसी का मतलब जानते है मैं उनके लिए बोलना चाहता हूँ जिन्हे थोड़ा बहुत असमंजस है। ख़ास कर उन लोगो के लिए जो नए नए पेरेंट्स बने है। पुराने वाले भी पढ़ ले तो हर्ज नहीं है। डेमोक्रेसी के कॉन्सेप्ट में ज्यादा उलझन नहीं है। आप वहाँ तक हाथ हिला सकते हो जहाँ तक किसी का गाल न आ जाए। घर बाहर डेमोक्रेसी का यही नियम है। आप पूजा करना चाहते है दूसरा बन्दा सोना चाहता है दोनों काम साथ साथ हो सकते है। आपकी भावना का ख्याल आप रखो। दूसरे की भावना का ख्याल रखना डेमोक्रेसी में नहीं आता। भारत के घर हद से ज्यादा तानाशाही होते है। थोड़ा सा डेमोक्रेसी की तरफ जाइये सबको रिलीज मिलेगा। साथ रहना और साथ डेमोक्रेसी के साथ रहना दो अलग बातें है। दूसरी बात बहुत खूबसूरत है। 


दूसरी बात मार्क्सवाद के लचीलेपन के लिए। जहाँ तहाँ  कमेंट आता है कि मार्क्सवाद फेल है क्योंकि इसमें लचीलापन नहीं है। शुद्धतावादी अप्रोच नहीं चलती। 24 कैरेट का कुछ नहीं होता।  ज़िन्दगी में बहुत से काम करने पड़ते है। किताबों से ज़िन्दगी नहीं चलती। एक कमाल बात बताऊ  मार्क्स वाद को हमने अपनाया ही नहीं है ऊपर कमीज या साडी की तरह पहना हुआ है। मैं आपको बताता हूँ क्या चीज है जो बिना लचीले हुए खूब चल रही है। खाना। शाकाहारी खाने वालो के लिए कभी ये कहते सुना है कि ये शुद्धतावादी है। चल नहीं पायेंगे। ऐसा क्या कि बीफ नहीं ही खाना। पार्टी में गए है तो खा लिया क्या हो गया ? पर क्या कभी किसी शाकाहारी को मीट खाते देखा है ? क्या किसी उदार हिन्दू को बीफ खाते देखा है ? नहीं देखा होगा पर एक मार्क्सवादी पंडित को पूजा करते देख सकते है। फेरे लेते देख सकते है। सत्य नारायण की कथा बांचते देख सकते है। एक साइंटिस्ट को सूरज को पानी पिलाते देख सकते है। और बात करते है शुद्धता वाद का। 

कपडे। क्या किसी मुस्लिम या उदार हिन्दू घर में कभी निक्कर ब्रा में लड़की घूमते देख सकते है ? कभी ये कहते सुना है ये तो कटटरता है हर वक्त पूरे कपडे , बुरका। ये शुद्धतावाद कही चलता है पर कपड़ो में कटटरता चल रही है। धड्ड्ले से चल रही है। बिना नागा सारी ज़िन्दगी गुजार देते है। मजाल है किसी की रिक्वेस्ट पर हम नंगे हो जाए। पर रिक्वेस्ट करने पर हम पूजा कर सकते है क्योंकि दुनिया में सारे काम करने पड़ते है। 

और सुनिए सेक्स। सेक्स का जो बंधा ढांचा है। क्या हम तोड़ते है ? सेक्स का नियम कोई कुदरत ने नहीं बनाया। कानून कहता है दो इंसान सहमति से सेक्स कर सकते है पर क्या हम करते है ? 

आप कहोगे कि क्या बकवास कर रहे हो। बकवास नहीं है भाई जो नियम ब्राह्मणवाद के बनाये है पूंजीवाद के बनाये है वो हम अक्षरश पालन करते है ज़िन्दगी भर। एक इंच नहीं हिलते। बहुत सी लड़कियों ने  तो नहाते वक्त भी अपना पूरा शरीर नहीं देखा होगा। 

पर मार्क्सवाद की बात आती है तो लचीलेपन की मांग होती है। विज्ञान की बात आती है तो "कुछ तो है" की बात होती है। बात पता है क्या है। बात नीयत की है आपकी और हमारी नीयत में खोट है। और पता है क्यों खोट है ? क्योंकि हम जहाँ है वहाँ हमें ज्यादा तकलीफ नहीं है। बल्कि मजे में है। ब्राह्मणवाद या मर्दवाद को हम उतना ही कोसते है जितने में हमें दिक्कत न आये। जो दुखी है , पीड़ित है उन्हें पता ही नहीं है। मार्क्सवाद फेल नहीं है भाई। फेल मैनेजर पांडे है। फेल आप और हम हैं और हम  लोग प्रगतिशीलता का झंडा उठाये है उससे कहीं बेहतर है हम गौ माता को बचाने का झंडा उठा ले क्योंकि हम वही हैं। आत्मा वही है कपडे नारीवाद , मार्क्सवाद , और जाने कितने वादों के ओढ़े हुए है हर रोज बदलते रहते है। आखिर में मैं  सौ बातो की एक बात कहता हूँ 

भारत में गर रहना होगा 
जय माता दी कहना होगा। 

कसम राम की खायेंगे 
मंदिर वही मनायेंगे। 

जिसको कसम खाने में दिक्कत आ रही हो वो गोली भी खा सकता है।