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Wednesday, 31 May 2017

बात बलात्कार की नहीं समाज के रवैये की है

                           

हरियाणा के  अलग अलग सूबे की चार खबरें है 

एक लड़की अपने घर से भाग गई क्यूंकि उसका बाप उसका बलात्कार करना चाहता था। लड़की की उम्र 17 साल है। वो जिस बन्दे को रेलवे स्टेशन पर मिली उसने बलात्कार का एक रैकेट बना दिया। लड़की को रेप करने वालो में 20 साल से लेकर 60 से ऊपर वाले मर्द शामिल है। एक तो बाप बेटे का जोड़ा ही है। 

ईंट के भट्टे पर काम करने वाली दम्पति की 5 साल की लड़की का घर में घुसकर उस वक्त रेप कर दिया जब लड़की के माँ बाप तथाकथित सभ्य समाज के घरों के लिए ईंट बना रहे थे। 

एक सौतेले बाप ने 7 साल की लड़की का बलात्कार किया 

दो नाबालिगों का बलात्कार हुआ घर में ही। 

पसीने से , आँसू से बच्चे पैदा करने वाले देश की हकीकत यही है। और हम इसी हकीकत से मुंह फेर कर हर रोज सो जाते है। फेसबुक आया है तो रो भी लेते है। पर मोटामोटी हमें ज्यादा फर्क नहीं  पड़ता। मुलायम ने कहा था लड़के है ग़लती हो जाती है। इसकी आलोचना बहुत लोगों ने की पर इस देश का सच तो यही है। बलात्कार या ऐसे ही किसी अपराध के लिए हमारे दो रूप है दो स्टैंड है और दोनों बहुत क्लियर है। अगर बलात्कार करने वाले से हमारा कोई लेना देना नहीं है तो हमारा गुस्सा देखते ही बनता है। लिंग से लेकर सर तक काटने की हिमायत करते है। हमारा रिएक्शन इतना एक्सट्रीम होता है कि लगने लगता है इस देश में जहाँ इतने संवेदनशील लोग रहते है वहाँ ये बाते कैसे हो जाती है। 
पर अभी तस्वीर का दूसरा पहलु भी है। भारत भले ही देव भूमि हो पर यहाँ भी सब कुछ वैसे ही वैज्ञानिक रूप से ही होता है जैसा दूसरे देशो में होता है। बलात्कार करने वाले ना तो धरती फाड़कर पातळ में से निकलते है न ही पुष्पक विमान में बैठकर इंद्र की सभा में से आते है। ये हम सब लोगो में से ही है। बल्कि हम ही लोग है। हम हर रोज बलात्कार को बढ़ावा देने वाली हरकतें करते है। किसी को जबरन शारीरिक चोट पहुँचाने की मानसिकता कोई एक दिन में नहीं आ जाती। लड़कियों के लिए हमारा रवैया इतना ज्यादा ढुल मुल और पक्षपातपूर्ण है कि बलात्कार करते वक्त ज्यादा सोचना नहीं पड़ता। कॉलेज में सड़को पर लड़कियों को छेड़छाड़ इग्नोर की जाती है। हर गाली बलात्कार का प्रतीक है हम हर रोज अपनी बोली से जाने कितनी बार बलात्कार करते है। गाली तक छोड़ने के लिए हम तैयार नहीं है बल्कि प्रगतिशील लोगो के पास तर्क है। गालियों से शुरू हुआ सिलसिला बलात्कार पर जाकर रुकता है ये समझना कितना मुश्किल है ? ऊपर लिखी चार घटनाये घरो में ही हुई है। क्या और किसी घर में ये घटना नहीं होती होंगी ? सजा , केस , जेल तो जाने दीजिये, विश्व गुरुओ के देश में किसी में इतनी हिम्मत नहीं होती कि उस आदमी का व्यक्तिगत रूप से ही बहिष्कार कर दे। दस साल की उम्र में लड़की का बलात्कार करने वाले चाचा ताऊ फूफा लड़की की शादी में उसे आशीर्वाद देते मिलते है मान लेते मिलते है। जब बात अपने घर की आती है तो सबके पास एक ही तर्क  होता है 

"ग़लती हो जाती है "

पिछले दिनों एक बहुत बड़े प्रगतिशील भाई ने अपनी प्रेमिका की फोटो उसके घरवालों को भेज दी थी। चूँकि बात प्रगतिशीलता और दोस्ती की थी तो ग़लती हो जाती है। अपराध ग़लती बन जाता है। मैं उस प्रगतिशील युवक का स्पेशल अध्ययन करना चाहूँगा जिसके दिल में ये ख्याल आया होगा कि प्रेमिका के साथ अंतरंग फोटो उसकी माँ या पापा को भेजी जा सकती है। और फिर सॉरी बोलकर काम चल सकता है। मैं उस स्कूल का नाम भी जानना चाहूँगा जहाँ वो पढ़ा होगा। मेरी इच्छा उसकी कास्ट जानने की भी है। मेरे दोस्तों को वाजिब शिकायत है कि मैं हर बात में कास्ट की ले आता हूँ। हर बात पर नहीं लाता। मैं सिर्फ जातीय अहंकार से बीमार लोगो को उनकी जाति के सही आंकड़े इकट्ठे करने में मदद कर रहा हूँ। राजदीप सरदेसाई जिन्हे प्रगतिशील और नए विचारो का कहा जाता है। उनमे इतनी हिम्मत आ जाती है कि सारी प्रगतिशीलता भूलकर विपक्षी खेमे के सुरेश प्रभु , मनोहर परिकर के मंत्री बनने पर बैंड बजाने पहुँच जाते है सिर्फ इसलिए कि वो उनकी कास्ट के है तो  हमें भी उनके हर कारनामे पर उनकी कास्ट बतानी पड़ेगी। पर लोगो को ऐतराज है इसलिए आगे से मैं कास्ट कास्ट नहीं करूँगा सिर्फ सरनेम से काम चला लूँगा। 

बात बलात्कार समर्थित विचारधारा की हो रही थी जिसके हम सब पोषक है। फेसबुक के बौद्धिक लोगो में जगह बनाया एक गुण्डा  सरे आम लड़की को गालियाँ दे सकता है क्यूंकि उसे पता है ये सब बिना रीढ़ की हड्डी के लोग है। इनके पास विचार ही विचार है धारा कोई नहीं है। उन विचारो को ये कहीं भी फिट कर सकते है। बीजेपी समर्थको की गालियों पर रोने वाले गालियों की प्रशंसा में वीर रस के गीत लिख सकते है। बहुत से तो ऐसे प्रगतिशील है जिनकी ज़िन्दगी का एक ही नियम है एक ही धारा है कि जिस से हमारी लड़ाई हुई है वो किस तरफ है वो अगर गालियों के पक्ष में है तो हम खिलाफ हो जायेंगे। वो अगर बलात्कार के खिलाफ है तो हम पक्ष में हो जाएंगे। वैसे ये तरीका ज्यादा बुरा नहीं है क्यूंकि इसमें दिमाग़ पर जोर डालने की जरूरत ही नहीं है। तर्क ? तर्क तो वही दस है उन्हें किसी भी बहस में पक्ष या विपक्ष में बड़े आराम से पेश किया जा सकता है। जो मुलायम ने कहा वही किसी प्रगतिशील ने कहना होगा तो वो तीन पेज लम्बा आर्टिकल लिख देगा उसमे दुनिया भर से कोट डाल देगा। मतलब वही होगा 

लड़को से ग़लती हो जाती है। 

जो शातिर धूर्त लोग है उनसे बात करना बेकार है। लातो के मर्द बातों से नहीं मानते। पर जो सच में संवेदनशील है जिनकी आँखों में आँसू है उनसे इतनी अर्जी की ही जा सकती है। गालियाँ मत दीजिये जहाँ हो सके रोकिये , टोकिये। जहाँ लड़कियाँ नहीं होती वहाँ गालियाँ ज्यादा दी जाती है। गालियों के मनोविज्ञान की बजाय उनकी राजनीति और उनका प्रभाव समझिये। किसी के लिंग काटने से बलात्कार नहीं रुकने वाले , वो हमारी मानसिकता में बदलाव से रुकेंगे। लड़कियों की हर जगह भागीदारी से रुकेंगे। उनकी आजादी से रुकेंगे। और जो हमारी महान संस्कृति की बात करता है उन सब को ये अख़बार ये घटनाएं हर रोज दिखाने की जरुरत है। उन्हें साहिर सुनवाने की जरुरत है 

"जरा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ 
ये कूचे ये गलियां ये मंजर दिखाओ 
जिन्हे नाज है हिन्द पर उनको लाओ "

5 comments:

  1. बहुत बढ़िया लिखा है

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  2. शोषण ज़्यादातर परिवार के लोगों और बेहद क़रीबी लोगों के बीच होता है इस बात पर पूरी तरह सहमत हूँ और ज़्यादातर टालने का प्रयास ही किया जाता है ऐसी बातों को जानने के बाद...लड़कियों की भागीदारी हर जगह बढ़ाना एक बेहतरीन सुझाव है।

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