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Tuesday, 30 May 2017

शराब का कसूर है सब। हम बहुत बेक़सूर है बचपन से

                             

आज शराब विशेष चर्चा में हैं दो मुख्तलिफ कारणों से।  यूपी में एक महिला मंत्री ने एक बियर बार का उद्घाटन किया जिसकी फोटो मजाक और व्यंग्य फेसबुक पर चर्चा में है।  दूसरी तरफ दिल्ली के मुखर्जी नगर में कथित रूप से दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले गुंडों ने एक ई रिक्शा चलाने वाले को इसलिए ईंटो से पीट पीट कर मार दिया क्योंकि रिक्शा चालक ने उन गुंडों को खुले में पेशाब करने  से मना किया था। यहाँ भी शराब शामिल है क्योंकि उन गुंडों के हाथ में बियर की कैन थी। 

मुखर्जी नगर ,जहाँ वो गुंडे कथित तौर पर रहते थे,  पूंजीवादी लूट और शोषण का जीता जागता नमूना है  यहाँ  पूरे देश से बच्चे सरकारी नौकरी की तलाश में आते है। छोटे छोटे दड्बो में रहते है महँगी कोचिंग लेते है। कुछ को नौकरी मिलती है शराब तो सब को मिल ही जाती होगी। मुखर्जी नगर के आसपास सिर्फ नौकरी के सपने पूरे करने वालो को सोने के लिए थोड़ी सी जगह देकर लोग करोड़पति बन गए। स्वस्थ पूंजीवाद और कस्टमर इज किंग का राग गाने वालो को मुखर्जी नगर , लक्ष्मी नगर , पांडव नगर जरूर घूम कर आना चाहिए। जहाँ एक छोटे से कमरे का किराया 7000 मिलेगा ऊपर से टर्म्स एंड कंडीशन अलग। पूंजीवाद बोलता है कि जिसके पास पैसा है उन सब के पास समान अवसर है।  क्या ऐसा सच में है ? अभी परसो का मजेदार किस्सा बताता हूँ। हमें द्वारका में एक फ्लेट की जरूरत थी। प्रॉपर्टी डीलर के पास पहुंचे। पहला सवाल किया कि  आपकी जॉब कहाँ है ? मैंने कहा - कहीं नहीं। उसने कहा ," फिर तो बहुत मुश्किल है द्वारका में अधिकतर मकान मालिक उन्हें ही मकान किराये पर देते है जो शादीशुदा हो और दोनों वर्किंग हो। " मेरा कहने का दिल हुआ रात भी किसी फुटपाथ पर गुजार लेंगे। आप अकाउंट नंबर बता दो बस। क्या एक सिंगल लड़की जो इंडेपेंडेंट है जिसके पास पैसे है मकान किराया पर लेना  आसान है ? और एक तलाकशुदा लड़की के लिए ? दलित के लिए ? अगर आपका जवाब हाँ है तो आपको अपने समाज के बारे में कुछ भी नहीं पता है। लड़कियों की आजादी के रास्ते में दुनिया भर की बंदिशे लगी है जो खुली आँखों से नहीं दिखती।  आर्थिक आजादी के बावजूद आधारभूत हको के लिए लड़ने में ज़िन्दगी चली जाती है। तलाक शुदा है बच्चा है। कौन कौन आएगा घर में ? माहौल ख़राब होगा। दरअसल वो कहना चाहते है कि अच्छा तलाक ले लिया अच्छा शादी नहीं करोगी। घरवालों को कन्विंस या लड़ाई करके समझ रही हो सब जीत लिया। हम आपको रहने के लिए मकान नहीं देंगे। बात करने को साथी नहीं देंगे। हम इतने एब्नॉर्मल है कि अंत में आपको ही एब्नॉर्मल घोषित कर देंगे। 
मेरे साथ ये बड़ी दिक्कत है मैं बिना शराब पिए लिखूं तो भटक जाता हूँ। शराब पर लिखना था मुखर्जी नगर से द्वारका पहुँच गया। हाँ तो वो गुंडे जिनके बारे में बताया जाता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे और मुखर्जी नगर में रहते थे। मेरी दिली इच्छा रहती है ऐसे हर केस में मारपीट करने वालो की कास्ट सबसे पहले बताई जाए और बाकायदा उस जाति की धर्मशाला में उनके नाम सुनहरे अक्षरों में लिखवाये जाए ताकि अपनी जाति पर गर्व करने वाले लोग अपने हिस्से की शर्म भी साथ लेकर सो सके। दिन में डेढ़ बजे की ये घटना है और रिक्शा चालक को रात में पीटा जाता है। ये शराब के नशे का काम तो बिलकुल नहीं है।  मर्द  , जाति और बल का नशा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा है। और ऐसा नहीं है कि हमारे सामने ये सब होता नहीं है। मामला समझदारी और नासमझी का है। मेरी ज़िन्दगी में कम से काम तीन से चार वाकये ऐसे हुए है जिनमे मैंने समझदारी का सहारा लिया और आज मैं न केवल ज़िंदा हूँ बल्कि लिख भी रहा हूँ। एक वाकया अभी 20 -25  दिन पहले का है।  दिल्ली जाने के लिये सुबह साढ़े चार बजे घर से निकला था । यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर दो पर दस पन्द्रह मिनट ऑटो का इंतजार कर के पैदल ही मलिक चौक के लिये निकल पड़ा । तकरीबन 300 - 400 मीटर चलने पर आगे देखा चार बन्दों ने बीच सड़क पर गाड़ी रोकी हुई है और चारो दिशाओं में सड़क के बीच मूत्र विसर्जन मतलब पेशाब कर रहे थे । मैं समझदार बिना टोके कोने से होकर निकल गया । चारो नशे के धुत थे एक उनमे से गाड़ी भी चला ही रहा होगा। पेशाब करते हुए को टोकना समझदारी नही है ।सड़क मेरा घर नही था अगर दारू में धुत मर्दों का टोला मेरे घर के दरवाजे पर भी पेशाब करेगा तो भी मैं टोकने से पहले दो बार सोचूँगा। ग़लत काम पर टोकना नही चाहिए पागल पीछे पड़ जाते है और घर से बाहर जाओ तो लाठी साथ लेकर चलना चाहिए कुत्ते पीछे पड़ जाते है  फेसबुक का हाल भी इससे जुदा नहीं है। जो फेसबुक को आभासी दुनिया मानते है वो बहुत बड़ी गफलत में है। फेसबुक हमारे समाज का आइना है। बिलकुल साफ़ आइना। हमारे समाज को इतना साफ़ असलियत में भी नहीं देखा जा सकता जितना फेसबुक पर देख सकते है। 

मैं फिर भटक गया। बात शराब की हो रही थी। शराब के नशे की हो रही थी। मुझे निजी तौर पर लगता है शराब पर गरीब मार हो रही है। शराब की आड़ में हिन्दू समाज के सभी उन नशो को छुपा लिया जाता है या बचा लिया जाता है जो ने केवल अमानवीय है बल्कि अब तो गैर क़ानूनी भी है। जाति का नशा ,  मर्दवाद का नशा सबके नशे को शराब पर थोपकर सबको पतली गली से बचा लिया जाता है। जब से थोड़ी बहुत सभ्यता डेमोक्रेसी आई है लोगो ने अपनी पत्नियों को पीटना बंद करना पड़ा है उसे ठीक नहीं समझा जाता। पर एक चोर रास्ता है शराब पीकर पीट सकते है और समाज की सहानुभूति भी ले सकते है। बेचारे  ने दारु पी रखी थी। सभ्य समाज में दलित विरोधी और नारी विरोधी गाली देने पर भी जेल हो सकती है। अब    गाली देने के भी चोर दरवाजे है। शराब पीकर दी जा सकती है या फेसबुक पर लिखी जा सकती है। अगर आप फेसबुक पर गाली देते है तो प्रगतिशील तबका बाकायदा आपके पक्ष  व्यंग्य लिख सकता है। वैसे दलित विरोधी और नारी विरोधी दोनों गालियाँ कानूनन जुर्म है शायद। 

बात शराब की थी मैं फिर गालियों पर आ गया। मंत्री जी  ने बियर बार का उद्घाटन किया। मुझे मेरे मित्र धीरेश भाई का स्टेटस सबसे सही लगा। बियर बार के उद्घाटन से कोई दिक्कत नहीं है बशर्ते वो बार सरकारी हो।  आदमी औरत सब सकून से बियर पी सके। कोई बकवास करे तो उसे जेल भेज दिया जाए।  बाकी शराब अगर ख़राब है तो सबके लिए ख़राब है बंद कर देनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो जो कानून की हद में रहकर पिए , पिए क्या दिक्कत है। वैसे मेरा निजी अनुभव है महफ़िल चाहे हो शराब की हो या बिना शराब की जहाँ आदमी औरत की संख्या बराबर होती है वहाँ का माहौल ज्यादा डेमोक्रेटिक होता है। गालियाँ कम दी जाती है। जिस महफ़िल में औरतो और दलितों की हिस्सेदारी ज्यादा होगी वहाँ उनको ही गाली देना  मुश्किल होगा और चूँकि अपर कास्ट मर्दो की संख्या कम होगी तो ऐसी महफ़िलो के हिंसक होने की सम्भावना भी कम होगी। 

2 comments:

  1. अमोलजी आप बहुत अच्छा लिखते हैं।

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  2. अमोल ऐसा लिखता है ना! सच में पढ़ने के बाद अंदर तक हलचल मच जाती है। सच कहूँ तो कई बार कमैण्ट करने की हिम्मत भी ना होती।

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