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Monday, 29 May 2017

खबरों में लिखा क्या है और जाने हमने पढ़ा क्या है

आज 30 मई का अख़बार मेरे सामने है। अख़बार के नाम में क्या रखा है। खबरों में रखा है। सोचा आपको भी खबरों से रु ब रु करा दूँ। वैसे तो अख़बार आपके पास भी आता ही होगा पर खब्त है लिखने की। अपनी खब्त को समाज सेवा का नाम देना हम भारतीयों की पुरानी अदा है तो मैं क्यों पीछे रहूं। 

अख़बार के सबसे पिछले पन्ने की खबर है एक आर टी आई से पता चला है पिछले 3 सालों में रेलवे ने बिना रेल में यात्रा करवाए भारत की जनता से 8000   करोड़ रूपये वसूल लिए है। व्यापार खून में होने और सीए और गौड़ सारस्वत रेल मंन्त्री होने के साइड इफेक्ट है  कैंसिलेशन चार्जिज बढ़ा देना , विंडो वेटिंग टिकट स्वत् कैंसिल न होना और तमाम तरह की बेईमानियां है जो इस सरकार ने पिछले 3 साल में जनता के साथ की है जिसका नतीजा है 8000 करोड़ की अवैध कमाई । जो लोग व्यापार में ईमानदारी की बात करते है ईमानदार पूंजीवादी व्यबस्था की बात करते है वो बताये ये कहाँ की ईमानदारी है आपने रेल में बैठने तक नही दिया और जनता से 8000 करोड़ रुपये लूट लिए ? इस सरकार को घोटाले की जरुरत क्या है ? 

फ्रंट पेज पर रेवाड़ी कोसली की खबर है एक विवाहिता ने आत्म हत्या कर ली। कारण ? पड़ोस का एक लड़का उसे तंग करता था। शादी के बाद ससुराल तक पहुँच गया था। उससे परेशान होकर लड़की ने फांसी लगा ली। ऐसे सैंकड़ो केस है। कौन इस तरह की मानसिकता को बढ़ावा देता है ? डेमोक्रेसी की इस देश में क्या स्तिथि है वो साफ़ साफ़ दिख रही है। मेरे बहुत से काबिल दोस्त मानते है कि यहाँ सब शोषित है। लड़का भी शोषित है लड़की भी शोषित है। बात उनकी भी गौर करने लायक है।  लड़की लड़के को मना कर देती है लड़का शोषित हो गया। लड़के ने लड़की की फोटोशॉप फोटो फेसबुक पर अपलोड कर दी दोनों शोषित हो गए। लड़की मना नहीं करती तो लड़का क्यों फोटो डालता। लड़की लड़के से प्यार करती है तो लड़के के दोस्त को क्यों मना कर दिया ? लड़के का दोस्त शोषित हो गया। अब लड़के के दोस्त ने सारे गाँव में लड़की के बदचलन की अफवाह फैला दी। तो क्या ग़लत किया ? लड़का लड़की के पड़ोस में रहता था। उससे प्यार करता था फिर भी लड़की की शादी दूसरे गाँव में कर दी। कितना शोषण हुआ लड़के का। लड़के ने बेचारे ने गुस्से में आकर लड़की के ससुराल में बदनामी कर दी। कोई शोषक नहीं है कोई शोषित नहीं है सब शोषक है सब शोषित है। ये मैं कोई व्यंग्य या मजाक में नहीं लिख रहा हूँ। हमारा समाज ऐसे ही सोचता है। इसी को सच मानता है। पिछले दिनों फेसबुक पर मेरी एक दोस्त को एक गुंडे ने गालियों भरे सन्देश भेजे। मेरे बहुत से प्रगतिशील दोस्तों के मन में सवाल थे। उसके पास मेरी दोस्त का नंबर कैसे आया ? मेरी दोस्त ने उससे पहले दोस्ती क्यों की ? अब दोस्ती की तो गालियाँ तो दी ही जा सकती है। बहुत से प्रगतिशील तो गालियों को ग़लत भी कहाँ मानते है। पाद करना और गाली देना एक जैसा है। जिस मोटी  रस्सी से लटककर उस लड़की ने जान दी उसके बारीक़ बारीक़ टुकड़े हम सब बुन रहे थे। अब भी बुन रहे है। हमें कोई खेद भी नहीं है। जिस बॉलीवुड को हम मनोरंजन का खजाना मानते है वो भी उस रस्सी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। " तुम किसी और की हो जाओ ये मैं होने नहीं दूंगा " कैसे लोकतंत्र विरोधी डायलॉग और विचारधाराओ का बॉलीवुड मनोरंजन के नाम पर पालन पोषण करता है ये किसी से छुपा हुआ नहीं है। हजारो लड़कियां अपनी रस्सी की तलाश में है किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। अगर कोई लड़की उस लड़की को बेल्ट बनाकर सामने वाले को पीटने की कोशिश करती है तो सारा समाज एक जुट होकर लड़की के खिलाफ खड़ा मिलता है। अपनी भाषा को हथियार बनाकर प्रगतिशील मर्द अपनी जमात के गुंडे को बचाने में लग जाते है। यही हमारे समाज की हकीकत है और यही आइना भी। 


एडिटोरियल पेज पर चंद्रभान प्रसाद जी का एक शानदार लेख है जिसे पढ़कर लगा कि अख़बार के पैसे वसूल हो गए। 

इसके अलावा आखिरी पन्ने पर एक खबर और भी है। ज्यादा फेसबुक करने वाले ज्यादा दुखी होते है ऐसी कोई शोध आई है। बकवास खबर है। 

बाकी सब सरकार की रूटीन एड है। हरियाणा में छात्राओं को पढ़ने के लिए 150 किलोमीटर तक फ्री पास मिलेगा। अब 150 किलोमीटर दूर कौन अप डाउन करेगा ये देखने लायक बात है अगर टर्म्स एंड कंडीशन में झोल नहीं है तो फैसला अच्छा है पर इस सरकार की नीयत को जितना जानता हूँ लगता नहीं झोल नहीं होगा। 

आजके समाचार समाप्त हुए। कल फिर आएगा 

अमोल सरोज स्टेटस वाला 

4 comments:

  1. जिस मोटी रस्सी से लटककर उस लड़की ने जान दी उसके बारीक़ बारीक़ टुकड़े हम सब बुन रहे थे। अब भी बुन रहे है।

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  2. ख़बरों के पीछे की ख़बर देखने वाली नज़र कम ही होती है..अगले दिन के समाचार का इंतज़ार रहेगा

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  3. मुबारक़.. अच्छी शुरुआत!

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