Followers

Thursday, 9 August 2018

आर्य वीर से मुलाक़ात -II




उनसे मेरी मुलाकात अचानक ही हो गयी। वैसे तो " उन जैसों " से मिलना कोई बड़ी अचरज की बात नहीं थी। उन की बिरादरी में अधिकतर उन जैसे ही है गाहे बगाहे मुलाक़ात होती ही रहती है पर वो कुछ हटके थे। वो प्रोफेसर थे एक यूनिवर्सिटी में।  एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में। पत्रकारिता पढ़ाते थे। वैसे तो सबको पता ही है भारत में प्रोफेसर या किसी भी पढ़ी लिखी जमात के इंसान का विज्ञान से उतना ही ताल्लुकात होता है जितना कि , जितना कि। ......  जाने दो मुझे कोई उदारहण देने को मिल नहीं रहा है। मतलब मेरे कहने का ये है कि आप प्रोफेसर हो  , टीचर हो , इंजीनियर हो , सीए हो , डॉक्टर हो कुछ चीजें हम विज्ञान के नाम पर विज्ञान से ऊपर रखते ही है जैसे ये साइंस है कि सूरज को पानी चढाने से अल्ट्रा वायलेट किरणे निकल कर हमारे शरीर में घुस जाती है।  जैसे उत्तर की तरफ मुंह कर के सोने से मेग्नेट दिमाग में चिपट जाते है जिससे नींद अच्छी आती है जैसे दक्षिण की तरफ घर का मुंह करने से अशांति होती है ये सब वो विज्ञान है जिसको दिमाग में दही की तरह जमाने के बाद हम किताबें पढ़ना मतलब रटना शुरू करते है।  कुछ मूर्खताओं को हमने आम सहमति से विज्ञान मान लिया है। उसमें बहस की गुंजाइश नहीं है। खैर बात उनकी हो रही थी। उनकी बात जरा अलग थी। वो एक सफर में सहयात्री थे। सरनेम आर्य था।  चार पांच घंटे के सफर में प्रोफेसर आर्य से बहुत विषयों में बातें हुई।  मुझे मेरी उम्मीद से बढ़कर ज्ञान मिला।  कभी सुना था कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है तो सोचा आप सब को भी वो ज्ञान बाँट दूँ।  तो प्रोफेसर साहब से जरा सी जान पहचान करा दूँ आपकी।   प्रोफेसर साहब बच्चो को पत्रकारिता पढ़ाते है।  पर उन्हें गिल्ट है कि जितनी तनखाह वो लेते है उतना काम नहीं कर पाते। उस गिल्ट को दूर करने के लिए कॉलेज टाइम के बाद आर्ट ऑफ़ लिविंग सिखाते है ताकि जब ऊपर जाकर भगवान् को हिसाब देना पड़े तो मामला ढीला न पड़े। आर्ट ऑफ़ लिविंग से भी गिल्ट कम नहीं होता तो वो पोस्ट लाइफ ट्रामा , घोस्ट मिराक्ल एनालिसिस , प्रीवियस लाइफ हिप्टोजिम जैसे काम भी करते है ये सारे काम उन्होंने अंग्रेजी में बोले इन्हे हिंदी में बोले तो भूत निकालते है लोगों के। उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि भारत के महान ग्रंथो से चीजें सीख सीख कर जर्मन कितनी आगे चले गए , नासा ने कितने जहाज मंगल तक भेज दिए और एक हम है कि अपने ग्रंथो से सिर्फ इतना सीख पाते है कि भगवान् मनु नारी और दलित विरोधी थी। हमारा यही रैवया हमें सुपर पॉवर बनने से रोक रहा है। 
तो ऐसे प्रोफेसर आर्य के साथ हमने चार पांच घंटे सफर किया हिंदी वाला सफर भी , अंग्रेजी वाला सफर भी। बात  साथ में सफर कर रही एक लड़की की बात से शुरू हुई जिसमें लड़की को अफ़सोस हो रहा था कि आजकल की गलाकाट प्रतियोगिता में जहाँ जनरल सीट पर भारी प्रतियोगिता है वही रिजर्व सीट के लिए कट ऑफ़ बहुत कम जाती है उन्हें एड्मिसन आसानी से मिल जाता है। मैंने उस लड़की से पूछा कि आजकल कितनी कट ऑफ़ लिस्ट जाती है रिजर्व्ड कैटेगरी की।  जवाब प्रोफेसर साहब की तरफ से आया 

- शेड्यूल कास्ट की तो बहुत कम होती है 
मैंने फिर सवाल किया - कितना कम होता है ?  मतलब दस परसेंट बीस परसेंट कितना कम ?
आर्य साहब ने जवाब दिया कि देखो अन्याय तो अन्याय ही है आरक्षण जो है वो सिर्फ दस साल के लिए लाया गया था। मैंने कहा कि आप तो जर्निलिस्म पढ़ाते है। ऐसी बात मत कीजिए। कहाँ पढ़ा आपने कि दस साल के लिए आरक्षण आया था ? 
(ये आरक्षण के दस साल वाली बात भी हमारे लिए उतनी ही परम सत्य है जितनी कि सूरज को पानी देने वाली या नार्थ में सोने से होने वाली मेग्नेट प्रभाव वाली।)
  मेरे इस सवाल ने प्रोफेसर आर्य को चौंका दिया।  चौंका क्या दिया वो हँसने लगे। कहने लगे आप मुझे पढ़े लिखे मालूम होते हो ऐसी बात बाहर किसी के आगे मत कह दीजियेगा लोग हंसी उड़ाएंगे। मेरा कहने का मन हुआ कि मेरी तो जब उड़ाएंगे तब उड़ाएंगे आपकी तो मैं अभी उड़ा ही रहा हूँ। पर मैंने अपने मन की बात कही नहीं। सबको कहाँ अपने मन की बात कहने का इख्तियार होता है। मैंने उनसे कहा कि आप संविधान में या और कही से कोई रिफ्रेंस दे सकते है जहाँ लिखा हो आरक्षण सिर्फ दस साल के लिए था। डॉक्टर आर्य थोड़ा सोचने के बाद बोले - आप दिखा दीजिये कहाँ नहीं लिखा है कि आरक्षण दस साल के लिए नहीं था।  मैंने कहा कि सर जो कहीं नहीं लिखा है उसे कैसे दिखाऊं। कल को आप कहेंगे कि दिखाओ भगवान् नहीं है।  जो है ही नहीं उसे कैसे दिखाया जा सकता है। (भगवान् वाली बात पर प्रोफेसर और ज्यादा चौंक गए। भगवान्  वाले किस्से पर फिर आते है अभी आरक्षण पर ही रहते है ) 

दस साल वाले किस्से को छोड़कर प्रोफेसर सीधे गरीबी पर आ गए। 

"अच्छा आप बताइये कि क्या सिर्फ दलित ही गरीब होते है ? गरीब तो हर जाति में है। "
मैंने कहा कि  उनका सामाजिक शोषण हुआ है । उनकी जातियों के नाम तक का गालियों की तरह इस्तेमाल हुआ है ।
(मॉडर्न आदमी आरक्षण की बुराई करने के साथ साथ प्रगतिशील होने की तारीफ़ भी साथ साथ लेना चाहता है उसी में कई बार टाइमिंग गड़बड़ा जाती है। प्रोफेसर आर्य के मन में भी दलितों का उद्धारक होने की भावना प्रबल हुई और वही गड़बड़ हो गयी। वो फ्लैशबैक में अपने बचपन में चले गए )
-वो बीते वक्त की बात है । मैं मानता हूं उनके साथ बहुत नाइंसाफी हुई है । उन्हें तो कुए पर से पानी भी नही पीने दिया जाता था । मैं आपको बताता हूँ बहुत पहले की बात है मैं एक बार गांव गया तो कुए के पास कसरत कर रहा था कि एक आदमी मुझसे कहने लगा कि कुएं में से पानी निकाल कर मैं उसे दे दूं । मैंने कहा कि तुम खुद ले लो तो वो कहने लगा कि मुझे कुए को छूना मना है तो मैंने कहा - तुम लो पानी मैं देखता हूँ कौन रोकता है ।
मैंने बीच में टोक दिया 
- एक मिनट ये कब की बात है ?
ये तो पुरानी बात है
- कितनी पुरानी ?
25 -30 साल पुरानी
- यानी 1988 - 93 के बीच की । तब तक छुआछात था ?
आर्य साहब गड़बड़ा गए। एक दम अपनी भूल को सुधारने में लग गए 
“अरे बस आखिरी दौर पर था खत्म होने की कगार पर ही था।“
(मैंने मन में सोचा कि यही वो महानुभाव थे जिनके हाथों से छुआछात की प्रथा खत्म हुई। )
फिर आर्य साहब का ध्यान आरक्षण से हटकर मेरे ऊपर चला गया।  पूछने लगे कि आप क्या करते हैं ? मैंने कहा जी पिछले 8 साल से फेसबुक कर रहा हूँ। फिर कहने लगे कि फेसबुक पर तो पता नहीं क्या क्या झूठ और अफवाह फैलाई जाती हैं और आप जैसे लोग उन्हें सच मान लेते हो।  इस बात पर मुझे उनकी हाँ में हाँ मिलानी पड़ी।  मैं बोला ," ये बात तो ठीक है फेसबुक व्हटसअप बहुत अफवाह फैलाते है।  " आर्य साहब खुश होकर बोले ," और नहीं तो।  अब देखो फेसबुक पर एक ज्ञानी बता रहे थे कि भगवान् मनु नारी और दलित विरोधी है। अब बताओ हमारे वेद पढ़कर जर्मन इतने आगे निकल गए।  नासा आज भी संस्कृत को कोडिंग के लिए सबसे अच्छी भाषा मानता है और हम क्या सीख रहे है कि मनु महाराज नारी विरोधी थे।  " 
मैंने आर्य से पूछा कि ये जर्मन और नासा वाली बात उन्होंने कहीं व्हटसअप पर तो नहीं पढ़ी ?  तो बोलते - नहीं नहीं ये तो मुझे बहुत पहले से पता थी व्हटसअप पर आने के बाद तो लोगों को मेरी बात पर विश्वास होने लगा है पहले नहीं मानते थे।  
मैंने फिर सवाल किया ," आप ये बातें बच्चो को भी बताते है ? "
आर्य साहब कहने लगे ," मैं तो कॉलेज के बाद बच्चों को आर्ट ऑफ़ लिविंग भी सिखाता हूँ। दरअसल जितनी सैलरी मिलती है मैं उसको जस्टिफाई नहीं कर पाता इसलिए गिल्ट फील से बचने के लिए शाम को उन्हें आर्ट ऑफ़ लिविंग सिखाता हूँ। ऊपर जाकर जवाब देना पड़ेगा तो उसकी तैयारी करनी पड़ती है। "
मैंने मजाक में कहा ," सर ऊपर तो मंगल तक जा आएं हैं कहीं कुछ नहीं है। कोई सवाल पूछने वाला नहीं है वहां "
आर्य साहब को थोड़ा सा गुस्सा आया पर वो उन्होंने आर्ट ऑफ़ लिविंग की मदद से नियंत्रण में कर लिया। फिर बोले ," आप भगवान् को भी नहीं मानते ? "
मैंने कहा जी नहीं मानता।  प्रोफेसर कहने लगे ," आप लोगों को बुरी तरह बरगलाया गया है क्या आपको पता है कि ये सिर्फ हिन्दू धर्म की बात नहीं है हर धर्म भगवन को मानता है। "
मैंने उनसे कहा ," सर दुनिया में दस फीसदी से ज्यादा ऐसे लोग है जो न किसी धर्म को मानते है न किसी भगवान् को।  "
उन्होंने ठंडी आह भरते हुए कहा ," इसी बात का तो डर है। ये विज्ञान इंसान की भलाई के लिए बना था ये इंसान को तबाही के रास्ते पर ले जाएगा।  "

इसी ठंडी आह के साथ हमारा वार्तालाप भी खत्म ही हो गया आगे उन्होंने ओशो और कुछ एक दो और के प्रवचन सुनाए जिनको सुनको लगा ये जिनको पत्रकारिता सिखाएंगे वो फिर युधिष्टर की गुफा ही ढूंढेगे।  उनका दोष नहीं है।  





Sunday, 27 May 2018

इस निर्मम वक्त में नायक होने के मायने

                                       
मंदिर में भीड़ एक लड़के को मारने पर उतारू है। एक पुलिस कर्मी उस लड़के को बचाने की कोशिश कर रहा है। भीड़ उसे पीटना चाहती है क्यूँकि वो मुसलमान है। भीड़ हिन्दू आतंकवादियों की है। आतंक का इतिहास भारत के लिए नया नहीं है। दलितों और औरतों ने सदियों से बीमार शोषक मर्दों का आतंक सहा है आज भी सह रहे है। भीड़ का न्याय भी नया नहीं है। चुड़ैल , डायन के नाम से पीट पीट कर हत्या या मुंह काला कर के गधे की सवारी कुंठित भीड़ के मनोरंजन के साधन रहे है। हमने अभी तक अपने इतिहास को स्वीकार तक नहीं किया है उससे सीखना तो बहुत दूर की कौड़ी है। पिछले चार सालों में भीड़ का इन्साफ जिस गति से बढ़ रहा है कि लगता है हमें कबीलाई समाज की तरफ वापिस जाने की बहुत जल्दी है। गौ आतंकवादियों से शुरू हुआ सिलसिला दिन ब दिन अपने कदम आगे बढ़ा रहा है। वो उसे पीटना चाहते थे क्योंकि वो दूसरे धर्म का था। इसी धर्म के लोग हर साल कितने ही लड़के लड़कियों के सपनो का गला घोंट देते है क्यूँकि वो अपने ही धर्म में किसी और जाती में शादी करना चाहते है। मनु महाराज ने कहा था कि लड़की को आजाद नहीं रहना चाहिए। लड़की की आजादी धर्म के खिलाफ है। दलितों की आजादी धर्म के खिलाफ है। कोई भी दलित या लड़की इस कानून का उलंघन करती है वो सजा के हकदार है। लड़की की आजादी गांव की अपेक्षा शहर , शहर की अपेक्षा बड़े शहर , बड़े शहर की अपेक्षा महानगर में ज्यादा होती जाती है। ये सब हमले उसी आजादी पर है। जो बीमार मर्दों की आँखों में जबरदस्त खटकती है। जिससे हतोत्साहित होकर गंदे वीभत्स गालियाँ और चुटकले बनाये जाते है। मंदिर वाली भीड़ हर जगह मौजूद है वो मौका मिलने पर किसी पर भी हमला कर सकती है। उस युवक को तो उस बहादुर पुलिसकर्मी के साहस ने बचा लिया। पर सबको ये मौका न मिल पाए। आज सोशल मिडिया पर उस पुलिसकर्मी की जमकर तारीफ हो रही है जिसका वो हकदार भी है। ठीक इसी वक्त उसी सोशल मिडिया पर उसके खिलाफ नफरत का प्रोपगेंडा भी चलाया जा रहा होगा जो उस भीड़ की खुराक है  जो सड़कों पर उतरती है। पर क्या जो सोशल मिडिया आज उस पुलिस कर्मी को नायक बना रही है वो उसके मुसीबत के वक्त में उसके साथ खड़ी होगी ? हमारा इतिहास तो कम से कम इस बात की गवाही नहीं देता।

पिछले साल सहारनपुर में दंगे हुए दलितों के घर जला दिए गए। उनके बचाव के लिए भीम आर्मी आती है। भीम आर्मी के सर्वेसर्वा चंद्र शेखर आजाद को बहुत ही कम समय में सोशल मिडिया में नायक बना दिया जाता है। आज चंद्र शेखर आजाद जेल में है उनपर बहुत संगीन धाराएं लगी है। उनका कसूर यही है कि दलित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई। पिछले एक साल में ऐसा कोई आंदोलन ऐसी कोई प्रभावी मुहीम दिखाई नहीं दी जो सरकार पर चंद्रशेखर की आजादी के लिए दबाव डाल सके।  क्या चंद्र शेखर आजाद से देश की आजादी को कोई खतरा है ? पिछले ही दिनों भीम आर्मी के एक और सदस्य की गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

पिछले ही साल अगस्त में गोरखपुर में सरकारी अस्पताल बालसंहार हुआ। छोटे  बच्चों की  एक के बाद एक
हत्या कर दी जाती है ठीक उसी वक्त डॉक्टर कफील की तस्वीर आती है उन बच्चों को बचाने की जीतोड़ कोशिश करते हुए।  डॉक्टर कफील भी एक नायक की तरह उभर कर आते है। हर जगह उनकी तस्वीर वायरल होती है। डॉक्टर कफील अगले नौ महीने जेल में गुजारते है बच्चों को बचाने की कोशिश करने के अपराध में। पर अफ़सोस ये है हमारे पास उनका साथ देने के लिए नौ महीने नहीं थे। हर रोज एक नया मुद्दा आता है दस  नए बयान आते है। हर दूसरे महीने चुनाव आते है। डॉक्टर कफील को जमानत मिल गयी है चंद्रशेखर आजाद अभी जेल में ही हैं।

मंदिर में उस लड़के को बचाने वाला पुलिसकर्मी सिख था। सिख की पहचान दूर से ही उनकी पगड़ी और दाढ़ी की वजह से हो जाती है। उसके लिए उनकी आई कार्ड देखने की जरूरत नहीं होती। पर अगर वो पुलिसकर्मी सिख न होता तो ? उसे पहले अपनी आईडी दिखाकर बताना पड़ता कि वो मुसलमान नहीं है। और अगर वो मुसलमान होता तो ?  तो  शायद उसे अपनी जान बचाने के लिए कोई कन्धा देखना पड़ता। पुलिसकर्मी गगनदीप ने बहुत प्यारी बात कही है कि हिन्दू मुस्लिम या सिख सबको प्यार करने का अधिकार है। क्या हम अपने दिल पर हाथ रखकर ये कह सकते है कि हमें अपने घर की औरतों के इस मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया है ?

किसी द्वारा किये सही काम को सराहना और उसकी हिम्मत बढ़ाना बहुत जरुरी है और उससे भी ज्यादा जरुरी है उस काम की वजह से उस पर आने वाली परेशानियों के वक्त उसके साथ होना। दूसरा काम थोड़ा मुश्किल है पर निहायत ही जरुरी है उसके बिना उस सराहना की कोई कीमत नहीं है वो बस आपके मनोरंजन मात्र का एक साधन बन के रह जाती है।


Friday, 25 May 2018

आर्यवीर से मुलाकात -1

                                             

उम्र 45 साल , पेट निकला हुआ। रंग गेहुँआ कद पांच आठ। आर्यवीर की शख्सियत में बयाँ करने लायक कोई ख़ास बात न थी सिवाय उसके बोलने के अंदाज से। बाकियों से बहुत ज्यादा बोलता था। राजनैतिक , सामाजिक ऐसा कोई विषय नहीं था ऐसी कोई समस्या नहीं थी जिसका समाधान आर्यवीर के पास न हो। चूँकि मुझे भी राजनैतिक सामाजिक विषयो पर सुनना बोलना अच्छा लगता था तो आर्यवीर से बातें लगभग हर रोज होने लगी। यूँ एक दिन बात चल रही थी

- बनारस में निर्माणाधीन पुल गिर गया काफी लोग मर गए। सरकार नागरिकों के लिए दिन ब दिन संवेदहीन होती जा रही है।

आर्यवीर - हर बात के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं हो सकती। इसके लिए हमारा शिक्षा तंत्र जिम्मेदार है

- वो कैसे

आर्यवीर- आधे से ज्यादा इंजीनियर कोटे से सेलेक्ट होते है जिनमें ना काबिलियत है न टैलेंट। अब ऐसे इंजीनियर फ्लाई ओवर बनाएंगे तो यही हश्र होगा। अब बताओ मेरे सामने मिश्रा जी का बेटा कितना मेहनती है टेस्ट में 90 नंबर आये फिर भी नहीं हुआ कोटे वाले 60 नंबर में एड्मिसन ले जाते है।

आर्यवीर की ख़ास बात है की वो जब बोलता है तो बस वो ही बोलता है। उसकी कही बात परम् सत्य होती है उसमें कहीं अगर मगर की गुंजाइश नहीं होती। आर्यवीर बोल ही रहा था कि उसके बेटे का फोन आ गया। फोन से बात में व्यवधान आ गया। बात का रुख सामाजिक की बजाय निजी परेशानियों की तरफ चला गया

आर्यवीर - बेटे के कॉलेज वालों ने 50000 रूपये और मांगे है। लूट मची हुई है हर जगह। इतना टफ कॉम्पिटिशन है हर जगह। बेटे को इंजीनियरिंग टेस्ट के लिए एक साल कोचिंग दिलाई थी फिर भी 55 ही नंबर आये अब इतने नंबर में तो पेड  सीट पर दाखिला हो पाया। पूरी इंजीनिरयिंग 25 लाख में पड़नी है। लड़के की उम्र बीत जानी है इतने पैसे कमाने में। अब बताओ लोग सरकारी नौकरों पर बेईमानी का आरोप लगाते है ( बताना भूल गया आर्यवीर एक सरकारी अफसर भी है ) बच्चो की पढाई इतनी महंगी हो रखी है तनखाह पर कैसे गुजारा सम्भव है। इतने पैसे लगाकर सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई करो तो वहां भी आरक्षण वाले आगे मिलते है। ये सब ऐसे ही चलता रहा तो हमारे बच्चो के लिए तो कुछ बचेगा ही नहीं। भूखे मरेंगे सब।

- आपको बेटे को पैसे ट्रांसफर करने थे  " मैंने याद दिलाया

आर्यवीर - हाँ यार। अभी एक कॉन्ट्रेक्टर को फोन करता हूँ दो महीने हो गए कमीशन देकर ही नहीं गया।

(आर्यवीर कॉन्ट्रेक्टर से मिलने चला गया। मैं भी अख़बार पढ़ने में व्यस्त हो गया। )

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है ?
क्या ये मुल्क हमारा है या ये भी बस एक नारा है ?

हवा पानी में जहर भरा , सीनों पर गोली दागी
जनता की चुनी सरकारों ने , चुन चुन जनता को मारा है।

हर जोर जुल्म की टक्कर हड़ताल हमारा नारा था।
हड़ताल ही  है अब देशद्रोह, मजदूर का कहाँ गुजारा है

वो राजा है या सेवक है वो  जोकर है या हिटलर है
भाइयों , बहनो वो जो भी है सेठो की आँख का तारा है।

बच्चों की साँसों को रोका मजदूरों को आग में झोंका
मरने पर इनाम है बांटा, हाकिम का खेल निराला है

ये कैसा गोरखधंधा है ये कैसा मुल्क हमारा है

Sunday, 20 May 2018

लोकतंत्र बच गया पर गरीब अवाम का बचना नहीं हो पा रहा है

अख़बार के बीच वाले पन्नो में कहीं एक खबर है - गोकशी के शक में दो लोगों की मार मार कर हत्या।
 


2015 की अखलाख की हत्या से लेकर 2018 की रियाज की हत्या तक , अख़बार के पहले पन्ने से बीच के पन्ने तक भारत सरकार ने गरीब मजलूम लोगों की धर्म के नाम पर हत्याएं सामान्य बनाने में बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। अब ये रोजमर्रा की चीज हो गयी है। दहेज़ के लिए जलाने , प्यार में तेजाब गिराने की तरह। राजनाथ सिंह ने कहा है कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। रियाज के पास भी मांस का टुकड़ा मिला है जिसे जांच के लिए भेजा गया है। चार लोगों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। अखलाख की हत्या के लिए जो आरोपी गिरफ्तार किया गया था वो जब जेल में  मरा तो  उसकी लाश तिरंगे में लपेट कर लायी गयी थी। शायद अब जो लोग गिरफ्तार हुए है उन्हें कोई न कोई वीरता पुरस्कार मिल जाए। रियाज पेशे से दर्जी था तीन बच्चे है। शकील अभी कॉमा में है। पिछले 4 साल में कितने लोग गौ आतंकवाद के हाथो अपनी जान गँवा चुके है। कितने भय के साये में रहने को मजबूर है इसका आंकड़ा शायद कहीं दर्ज नहीं होगा। सरकार का फर्ज है जनता को रोजगार मुहैया करवाए ताकि वो सुबह शाम खाना खा सके। यहाँ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि लोग खाना खाने से ही डरने लगे रोजगार की फिर जरुरत ही क्या होगी। शायद ये भी कोई मास्टर स्ट्रोक हो।

कर्नाटक के विधान सभा में भले ही तथाकथित रूप से लोकतंत्र की हत्या होते होते बची हो पर भारत की सड़को पर हर रोज गरीब लोग की साजिशन हत्या हो रही है। ये बहुत भयावय है। लोगों से ही लोकतंत्र बनता है। पूंजीपतियों की फेक्ट्रियो में जलाकर मार दिए गए गरीब मजदूर हो या पुल गिराकर उसके नीचे दबाये हुए निर्दोष लोग हो या ओक्सिजन के अभाव में दम तोड़ते बच्चे हो या गौ आतंकवादियों के हाथो बेरहमी से मारे गए रियाज और अखलाख हो इन सब की हत्याओं के साथ लोकतंत्र हर रोज मर रहा है। जितना इन घटनाओ के लिए प्रतिरोध का स्वर घटता जाएगा उतना ही हम फासिज्म की तरफ बढ़ते जाएंगे। जिस समाज में इस तरह की घटनाये बिना किसी विरोध प्रतिरोध के हो रही हो वहां डेमोक्रेसी के राग अलापना किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है

निकलना खलक से आदम का सुनते आये थे लेकिन



राजनीती मजेदार चीज है। कहाँ जाता है राजनीती में कुछ भी स्थाई नहीं होता न दुश्मनी न दोस्ती। राजनीती में जो होता है वो दिखता नहीं है। जो दिखता है वैसा हो भी जरुरी नहीं है। हर घटना के अलग अलग तरह से विश्लेषण किये जाते है। सब से ज्यादा मजे विश्लेषकों के ही है। लोकतंत्र की जान हर पल सांसत में रहती है। हर चुनाव में लोकतंत्र की हत्या हो जाती है। ठीक उसी पल दूसरे खेमे में लोकतंत्र की जीत भी हो रही होती है। लोकतंत्र पिछले 70 साल में कन्फ्यूजन में जी रहा है कि मरने का मातम बनाये या जीत का जश्न बनाये। कर्नाटक वाले ड्रामे में तो लोकतंत्र की हालत एकदम टाइट हो रखी थी। जब चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए तो बीजेपी तेजी से बहुमत की तरफ भाग रही थी। लड्डू वड्डू बंटने लगे। अख़बार , मिडिया सब मोदी का जादू , अमित शाह का जलवा , और राहुल का बचपना दिखाने में मशगूल हो गए। सट्टा बाजार के जुआरी भी जोश में आ गए। एक तो ये शेयर मार्किट की कहानी मेरे कभी समझ नहीं आयी। पिछले 15 सालों से जब जब बीजेपी जीतती है तो शेयर मार्किट बढ़ने लगता है। क्या सारे जुआरी बीजेपी के ही है क्या। जुआरियो को बीजेपी इतनी पसंद क्यों है ? क्या बाकी पार्टी वाले बिलकुल जुआ नहीं खेलते ? कुछ तो गड़बड़ है।  पर शाम होते होते बीजेपी सात आठ सीट कम रह गयी। कांग्रेस और बीजेपी की बी टीम जनता दल (सेक्युलर ) साथ आ गए। उनके पास 8 सीट ज्यादा हो गयी। पर जुआरियो के चेहरे पर ज्यादा चिंता नहीं नजर आ रही थी। सरकार अपनी ऊपर से स्वदेशी घर का बना हुआ,  शुद्ध 24 कैरेट का चाणक्य पास में ,  राज्यपाल साहब पहले से ही आरती में मशगूल है

जो खिल सके न वो फूल हम है
तुम्हारे चरणों की धूल हम है।

यदुरप्पा साहब बोले अपन बड़ी पार्टी , लोकतंत्र की जीत , अपन मुख्यमंत्री। दूसरी तरफ लोकतंत्र की हत्या होने ही वाली थी। हो ही गयी थी। कांग्रेस जेडीएस के पास बहुमत। लोकतंत्र बीच में फंसा हुआ था आधे मुंह में लड्डू  जबरन घुसेड़ खुश होने की कह रहे थे आधे उसके मरने की शोक बना रहे थे। इधर चेतन भगत का ट्वीट आया कि  हंग विधानसभा में नैतिकता नहीं देखी जानी चाहिए। हॉर्स ट्रेडिंग भी एक कला है। जो ख़रीदे  वो सिकंदर। चेतन को देखकर लगता है कि इस आदमी को मुन्नाभाई के झापड़ की सबसे सख्त जरूरत है। एक तो जिन विधायकों को भेड़ बकरियों की तरह रिसोर्ट में बंद कर दिया उन्हें ये घोडा कह रहा है। बेचारो के मोबाईल भी छीन लिए।   मोबाइल बच्चो के खेलने की चीज नहीं है , कोई टॉफी दिखाये तो पास मत जाना बोरी में बंद कर के ले जाते है। खैर चेतन अगर चुने हुए विधायकों की तुलना घोड़ों से कर रहा है तो अगर चेतन भगत और प्रसून जोशी जैसे लोगों की तुलना किसी जानवर से करनी हो तो किस से की जाए ? वो जो हड्डी के लालच में लार टपकाये मालिक के पास खड़े रहते है। पर मुझे नहीं लगता आदमी की तुलना किसी भी जानवर से की जा सकती है। केंचुए से भी नहीं। उसके पास तो रीढ़ की हड्डी होती ही नहीं।  रीढ़ की हड्डी होकर भी रेंगकर चलना ये आदमी के ही बस की बात है। विधायकों की खरीद फरोख्त को कला बताने वाला चेतन  भगत मेरिट पर लेक्चर देता है। भारत की सारी मेरिट का यही हाल है। इन लोगों को किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करवाकर बेसिक नॉलिज देनी चाहिए। बहुत जरूरत है इसकी।

राज्यपाल ने येदुरप्पा को 15 दिन का वक्त दे दिया। ऐसा दिलदार आदमी और कहाँ मिलना है। उधर चाणक्य साहब को पता न क्या दौरा पड़ा कि ऐसे ऊलजलूल बयान देने लगे कि बस अब हम सारे चुनाव जीतेंगे। इस साल जीतेंगे , अगले साल जीतेंगे और फिर अगले पचास साल जीतेंगे। ओवरटाइम ज्यादा करने का यही नतीजा होता है। दरअसल बीजेपी को 2014 से लेकर 2018 तक चार साल ही हुए है राज करते हुए। 2014 में धूम धड़ाम से जीतकर आयी बीजेपी 2018 तक हांफने लगी है। इतिहास की नजरो में चार साल के क्या मायने होते है सबको पता है। हम जब इतिहास में पढ़ते थे कि फलाने राजा ने 1728 से लेरक 1730 तक राज किया इसी बीच छह सात लड़ाई भी लड़ी तो हमारे दिमाग में यही आता था बेचारा दुखी ही रहा। खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आने। पिछले 4 सालों में अमरीका में, इंग्लैंड में शो करवा दिए। मिडिया से लेकर सोशल मिडिया तक नॉन स्टॉप पब्लिसिटी करवाई। नतीजा क्या निकला ? बिहार में पिटे। हालाँकि फिर नितीश के डीएनए से अपना डीएनए मैच करवा के उसे चाणक्य का नाम दे दिया। गोवा में ऐसी पिटाई हुई कि देश के रक्षा मंत्री को देश की रक्षा छोड़कर अपने गांव भागना पड़ा। नागालैंड मणिपुर का हाल पता ही है सबको। गुजरात में ऐसी टक्कर हुई कि प्रधानमंत्री को रोना पड़ गया। यूपी और असम के दो इलेक्शन को छोड़कर हर इलेक्शन में बीजेपी की दुर्गत ही हुई। पंजाब का तो क्या ही बोले। लोकसभा में 282 से 274 पर आ गयी। योगी जी अपने इलाके की सीट ही हार गए। 2014 में जिस धूम धड़ाके के साथ बीजेपी आयी थी सबको लगता था कि अगले दस साल तो आराम से गुजरेंगे। इस लोकसभा से पहले कभी भी किसी भी प्रधानमंत्री की इतनी दुर्गति किसी ने नहीं देखी थी। विधानसभा के चुनावो में सामन्यत प्रधानमंत्री एक आध रैली करते थे। यहाँ तो विधानसभा की कौन बात करे नगरपालिका के चुनाव तक  प्रधानमंत्री जी के जिम्मे लगा दिए। इतना मजबूर बेबस प्रधानमंत्री पहले नहीं देखा कभी जिसे हर चुनाव में इतनी मेहनत करनी पड़ रही है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री जी से बेगार करवाई जा रही है। हर जगह हर विधानसभा में दस दस रैली। इतना बर्डन होने के बाद कैसी किसी को याद रह सकता है कि भगत सिंह से मिलने कांग्रेस वाले गए थे या नहीं। अब उनके भाषणों में वो जोश दिखता भी नहीं है। मुझे तो लगता है हमें इंसानियत के नाते आरएसएस से गुहार लगानी चाहिए कि प्रधानमंत्री जी को थोड़ा आराम करने का मौका दिया जाए।  कल कर्नाटक का फ्लोर टेस्ट हो गया। इतनी बुरी तरह से पिटाई हुई कि ये भी याद न रहा कि जिस राष्ट्रीय गान को डेडपूल से पहले सिनेमाहाल में जबरन चलाने पर आमदा थे कम से कम उसे तो सुनते जाओ। आगे राजनीति में क्या होगा कौन जानता है पर कल जब येदुरप्पा जब विदाई गीत गए रहे थे तो मुझे उसमें ग़ालिब के शेर की झलक नजर आ रही थी

निकलना खलक से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।


Friday, 11 May 2018

असंवेदनशीलता और हम




खबर - हिसार के खेदड़ प्लांट में बॉयलर साफ़ करने गए 6 मजदूर दुर्घटना का शिकार हो गए उनमे से तीन अपनी जान गँवा चुके है और तीन गंभीर रूप से घायल है।



हरियाणा के मंत्री कृष्ण लाल पंवार खेदड़ में आकर घोषणा करते है कि मरने वाले के परिवार वालों को 17.50 लाख रूपये की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी यही नहीं रुकते है। इसके आगे घोषणा करते है कि घायलों को 7.50 लाख की नकद इनामी राशि दी जायेगी। मंत्री जी शायद सीधे किसी खेल प्रतियोगिता से घटना स्थल पर आ रहे थे। 6 मजदूर एक कम्पनी की लापरवाही की वजह से गंभीर हादसे का शिकार हुए थे। उनमे से तीन मजदूरों की जान जा चुकी थी। ऐसी जगह पर जाकर मंत्री जी कहते है कि मरने वालों को इनाम दिया जाएगा। ये महज 'स्लिप ऑफ़ टंग' नहीं है। ये हमारे समाज की असंवेदनशीलता की हकीकत है। मजदूरों के हत्याओं से किस को फर्क पड़ता है। हर दिन कहीं न कहीं मजदूरों की हत्याओं की खबर आती रहती है। एक जलते बायलर के अंदर मजदूरों को भेजने से संगीन अपराध क्या होगा ? मंत्री जी अपनी बदमजा ड्यूटी निभाने आते है और मजदूरों को उनकी मौत का इनाम सुनाकर चले जाते है। हमारे लिए ये मामूली घटना है। हो जाता है। ग़लती से मुंह से निकल गया। स्लिप ऑफ़ टंग।



मंत्री जी कहते है अगस्त में बच्चो का मरना नॉर्मल है। मंत्री जी मजदूरों की हत्याओं पर इनाम राशि की घोषणा करते है। ये सब सामान्य है। कोई बड़ी बात नहीं है कोई मंत्री इन हत्याओं के लिए मजदूरों को ही जिम्मेदार न बता दे। असंवेदनशीलता के जिस स्तर पर आज हम है वहां सब जायज है। हरियाणा सरकार बच्चो से सवाल पूछती है कि हरियाणा में इनमें से किस को अपशकुन नहीं माना जाता



A- खाली घड़ा
B ईंधन से भरा डिब्बा
C काले ब्राह्मण से मुलाकात
D ब्राह्मण लड़की का दिखना



इस सवाल में व्यंग्य की ढेरों संभावनाएं नजर आती है। इसमें सरकार का मजाक उड़ाया जा सकता है। पर शायद ही हम ये सोचने की जहमत करे कि इतनी असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करने का साहस सरकार में कहाँ से आता है। शायद लोगों का रिएक्शन देखकर ही आता हो। ये सवाल बहुत ही जातिवादी है। काला ब्राह्मण जैसा शब्द मैंने इससे पहले नहीं सुना था। काला रंग किस से जुड़ा हुआ है सब जानते है। किस को देखना खुद को उच्च कहने वाली बीमार जातियों के लोग अपशकुन मानते है ये भी जग जाहिर है। ये सवाल परीक्षा में देना नाकाबिले बर्दाश्त हरकत है , बेशर्मी की इंतेहा है पर हमारे लिए ये मजाक का विषय है। वो खुले आम शोषितो का , मजदूरों का बेशर्मी से मजाक उड़ा रहे है , उन्हें जान से मार रहे है। उनके अधिकारों पर चोट की जा रही है। दूसरी तरफ असंवेदनशीलता के सताए हुए लोग है जो रोड एक्सीडेंट पर सेल्फी खींचते है। भूकंप का , आंधी तूफ़ान का मजाक उड़ाते है। दरअसल अपनी हर असंवेदनशीलता को मजाक , व्यंग्य या मानवीय भूल का चोला ओढ़ाना हमारी आदत बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि हम में संवदनाएँ नहीं है या हम आहत नहीं होते है पर अफ़सोस की बात है कि हमारी सारी संवेदनाएं हमारे खुद के लिए ही है। हम सरे आम शोषितो का मजाक उड़ाते है। मई दिवस हमारे लिए मजाक है। मजदूर हमारे लिए कामचोर है। नारी विरोधी दलित विरोधी गालियाँ हमारे लिए कूल है। सलमान खान हमारे हीरो है। सलमान ने शेड्यूल कास्ट के लिए कैमरे के सामने बहुत ही अश्लील और गैर क़ानूनी बात कही। पर वो हमारे लिए नॉर्मल है। क्यूंकि हम दिन में दस बार बोलते है। कोर्ट में जब इस बात के लिए जनहित याचिका लगाई गयी तो जज ने याचिका कर्ता पर जुर्माना लगा दिया। ये हम है। ये हमारे जज है। ये सब हमारे लिए नॉर्मल है। शोषक के लिए हम बेहद नरम है। ग़लतियाँ हो जाती है। उनका वो मतलब नहीं था। पर अगर कोई हमारी सुविधाओं पर , हमारी गरीबों , वंचितों के प्रति मानसिकता पर व्यंग्य करता है तो वो हमारे लिए असंवेदनशीलता है। गाली पर टोकना असंवेनशीलता है। अत्याचारों पर बात करना अतिवाद है। दुनिया बहुत प्यारी है देखो मेरे तो बाजू वाला भी ऐसी में बैठता है दूसरी साइड वाला भी ऐसी में बैठता है मेरे दफ्तर में सभी ऐसी में बैठते है। हम तो साथ खाना भी खा लेते है। गालियां मजाक है हमारे दफ्तर में तो लड़कियाँ भी देती है।



हम कौन है ?



हम कुंठाओ के घर है हम मिडल क्लास बीमार जातियों की पैदाइश है हम वो है जिन्हे बचपन में ही मानवीयता से इतनी दूर कर दिया गया है कि अब इंसानियत भी एक रोग लगता है।